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नया मलयालम टीवी चैनल

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आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र

मध्यप्रदेश के राज्य कैबिनेट मंत्री ने आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र प्रदान किया मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश सरकार ने आपदा प्रबंधन में ब्रह्मा कुमारिस संगठन के प्रयासों की सराहना की। मध्य प्रदेश सरकार में पशुपालन और मत्स्यपालन मंत्री और प्रभारी मंत्री श्री लखन सिंह यादव, मुरैना जिला कलेक्टर, प्रियंका दास के साथ, प्रशासन की ओर से इस…

निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर

निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर   ग्वालियर: प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय की सहयोगी संस्था राजयोग एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के मेडिकल विंग के स्थानीय सेवाकेंद्र “प्रभु उपहार भवन, माधवगंज लश्कर ग्वालियर” द्वारा निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर का आयोजन किया गया।शिविर में परामर्श देनें के लिए डॉ. निर्मला कंचन (स्त्री रोग विशेषज्ञ), एवं…

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19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन.

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युवा शिविर का सफल आयोजन.

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19-01-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - अपने स्वीट बाप को याद करो तो तुम सतोप्रधान देवता बन जायेंगे, सारा मदार याद की यात्रा पर है''

प्रश्नः-

जैसे बाप की कशिश बच्चों को होती है वैसे किन बच्चों की कशिश सबको होगी?

उत्तर:-

जो फूल बने हैं। जैसे छोटे बच्चे फूल होते हैं, उन्हें विकारों का पता भी नहीं तो वह सबको कशिश करते हैं ना। ऐसे तुम बच्चे भी जब फूल अर्थात् पवित्र बन जायेंगे तो सबको कशिश होगी। तुम्हारे में विकारों का कोई भी कांटा नहीं होना चाहिए।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चे जानते हैं कि यह पुरूषोत्तम संगमयुग है। अपना भविष्य का पुरूषोत्तम मुख देखते हो? पुरूषोत्तम चोला देखते हो? फील करते हो कि हम फिर नई दुनिया सतयुग में इनकी (लक्ष्मी-नारायण की) वंशावली में जायेंगे अर्थात् सुखधाम में जायेंगे अथवा पुरूषोत्तम बनेंगे। बैठे-बैठे यह विचार आते हैं! स्टूडेन्ट जो पढ़ते हैं तो जो दर्जा पढ़ते हैं, वह जरूर बुद्धि में होगा ना - मैं बैरिस्टर या फलाना बनूँगा। वैसे तुम भी जब यहाँ बैठते हो तो यह जानते हो हम विष्णु डिनायस्टी में जायेंगे। विष्णु के दो रूप हैं - लक्ष्मी-नारायण, देवी-देवता। तुम्हारी बुद्धि अभी अलौकिक है। और कोई मनुष्य की बुद्धि में यह बातें रमण नहीं करती होंगी। तुम बच्चों की बुद्धि में यह सब बातें हैं। यह कोई कॉमन सतसंग नहीं है। यहाँ बैठे हो समझते हो सत बाबा जिसको शिव कहा जाता है, उनके संग में बैठे हैं। शिवबाबा ही रचता है, वही रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानते हैं और यह नॉलेज देते हैं। जैसेकि कल की बात सुनाते हैं। यहाँ बैठे हो तो यह तो याद होगा ना कि हम आये हैं - रिज्युवनेट होने अर्थात् यह शरीर बदल देवता शरीर लेने। आत्मा कहती है हमारा यह तमोप्रधान पुराना शरीर है, इसे बदलकर ऐसा लक्ष्मी-नारायण बनने का है। एम ऑब्जेक्ट कितनी श्रेष्ठ है। पढ़ाने वाला टीचर जरूर पढ़ने वाले स्टूडेन्ट से होशियार होगा ना। पढ़ाते हैं, अच्छे कर्म सिखलाते हैं तो जरूर ऊंच होगा ना। तुम जानते हो हमको सबसे ऊंच ते ऊंच भगवान पढ़ाते हैं। भविष्य में हम सो देवता बनेंगे। हम जो पढ़ते हैं सो भविष्य नई दुनिया के लिए। और कोई को नई दुनिया का पता भी नहीं है। तुम्हारी बुद्धि में अब आता है यह लक्ष्मी-नारायण नई दुनिया के मालिक थे। तो जरूर फिर रिपीट होगा। तो बाप समझाते हैं तुमको पढ़ाकर मनुष्य से देवता बनाता हूँ। देवताओं में भी जरूर नम्बरवार होंगे। दैवी राजधानी होती है ना। तुम्हारा सारा दिन यही ख्यालात चलता होगा कि हम आत्मा हैं। हमारी आत्मा जो बहुत पतित थी, सो अब पावन बनने के लिए पावन बाप को याद करती है। याद का अर्थ भी समझना है। आत्मा याद करती है अपने स्वीट बाप को। बाप खुद कहते हैं - बच्चे, मुझे याद करने से तुम सतोप्रधान देवता बन जायेंगे। सारा मदार याद की यात्रा पर है। बाप जरूर पूछेंगे ना - बच्चे कितना समय याद करते हो? याद करने में ही माया की लड़ाई होती है। तुम खुद समझते हो यह यात्रा नहीं परन्तु जैसेकि लड़ाई है, इसमें विघ्न बहुत पड़ते हैं। याद की यात्रा में रहने में ही माया विघ्न डालती है अर्थात् याद भुला देती है। कहते भी हैं बाबा हमको आपकी याद में रहने में माया के तूफान बहुत लगते हैं। नम्बरवन तूफान है देह-अभिमान का। फिर है काम, क्रोध, लोभ, मोह.....। आज काम का तूफान, कल क्रोध का तूफान, लोभ का तूफान आया.... आज हमारी अवस्था अच्छी रही, कोई भी तूफान नहीं आया। याद की यात्रा में सारा दिन रहे, बड़ी खुशी थी। बाबा को बहुत याद किया। याद में प्रेम के आंसू बहते रहते हैं। बाप की याद में रहने से तुम मीठे बन जायेंगे।

तुम बच्चे यह भी समझते हो कि हम माया से हार खाते-खाते कहाँ तक आकर पहुँचे हैं। बच्चे हिसाब निकालते हैं। कल्प में कितने मास, कितने दिन.. हैं। बुद्धि में आता है ना। अगर कोई कहे लाखों वर्ष आयु है तो फिर कोई हिसाब थोड़ेही कर सके। बाप समझाते हैं - यह सृष्टि का चक्र फिरता रहता है। इस सारे चक्र में हम कितने जन्म लेते हैं। कैसे डिनायस्टी में जाते हैं। यह तो जानते हो ना। यह बिल्कुल नई बातें, नई नॉलेज है नई दुनिया के लिए। नई दुनिया स्वर्ग को कहा जाता है। तुम कहेंगे हम अभी मनुष्य हैं, देवता बन रहे हैं। देवता पद है ऊंच। तुम बच्चे जानते हो हम सबसे न्यारी नॉलेज ले रहे हैं। हमको पढ़ाने वाला बिल्कुल न्यारा विचित्र है। उनको यह साकार चित्र नहीं है। वह है ही निराकार। तो ड्रामा में देखो कैसा अच्छा पार्ट रखा हुआ है। बाप पढ़ाये कैसे? तो खुद बतलाते हैं - मैं फलाने तन में आता हूँ। किस तन में आता हूँ, वह भी बताते हैं। मनुष्य मूँझते हैं - क्या एक ही तन में आयेगा! परन्तु यह तो ड्रामा है ना। इसमें चेंज हो नहीं सकती। यह बातें तुम ही सुनते हो और धारण करते हो और सुनाते हो - कैसे हमको शिवबाबा पढ़ाते हैं? हम फिर और आत्माओं को पढ़ाते हैं। पढ़ती आत्मा है। आत्मा ही सीखती, सिखलाती है। आत्मा मोस्ट वैल्युबुल है। आत्मा अविनाशी, अमर है। सिर्फ शरीर खत्म होता है। हम आत्मायें अपने परमपिता परमात्मा से नॉलेज ले रही हैं। रचयिता और रचना के आदि-मध्य-अन्त, 84 जन्मों की नॉलेज ले रहे हैं। नॉलेज कौन लेते हैं? आत्मा। आत्मा अविनाशी है। मोह भी रखना चाहिए अविनाशी चीज़ में, न कि विनाशी चीज़ में। इतना समय तुम विनाशी शरीर में मोह रखते आये हो। अभी समझते हो - हम आत्मा हैं, शरीर का भान छोड़ना है। कोई-कोई बच्चे लिखते भी हैं मुझ आत्मा ने यह काम किया। मुझ आत्मा ने आज यह भाषण किया। मुझ आत्मा ने आज बहुत बाबा को याद किया। वह है सुप्रीम आत्मा, नॉलेजफुल। तुम बच्चों को कितनी नॉलेज देते हैं। मूलवतन, सूक्ष्मवतन को तुम जानते हो। मनुष्यों की बुद्धि में तो कुछ भी नहीं है। तुम्हारी बुद्धि में है रचता कौन है? इस मनुष्य सृष्टि का क्रियेटर गाया जाता है, तो जरूर कर्तव्य में आते हैं।

तुम जानते हो और कोई मनुष्य नहीं जिसको आत्मा और परमात्मा बाप याद हो। बाप ही नॉलेज देते हैं कि अपने को आत्मा समझो। तुम अपने को शरीर समझ उल्टे लटक पड़े हो। आत्मा सत् चित आनन्द स्वरूप है। आत्मा की सबसे जास्ती महिमा है। एक बाप के आत्मा की कितनी महिमा है। वही दु:ख हर्ता सुख कर्ता है। मच्छर आदि की तो महिमा नहीं करेंगे कि वह दु:ख हर्ता सुख कर्ता है, ज्ञान का सागर है। नहीं, यह बाप की महिमा है। तुम भी हर एक खुद दु:ख हर्ता सुख कर्ता हो क्योंकि उस बाप के बच्चे हो ना, जो सबका दु:ख हरकर और सुख देते हैं। सो भी आधाकल्प के लिए। यह नॉलेज और कोई में है नहीं। नॉलेजफुल एक ही बाप है। हमारे में नो नॉलेज। एक बाप को ही नहीं जानते हैं तो बाकी फिर क्या नॉलेज होगी। अभी तुम फील करते हो हम पहले नॉलेज लेते थे, कुछ भी नहीं जानते थे। बेबी में (छोटे बच्चे में) नॉलेज नहीं होती है और कोई अवगुण भी नहीं होता है, इसलिए उनको महात्मा कहा जाता है क्योंकि पवित्र है। जितना छोटा बच्चा उतना नम्बरवन फूल। बिल्कुल ही जैसे कर्मातीत अवस्था है। कर्म विकर्म को कुछ नहीं जानते। सिर्फ अपने को ही जानते हैं। वह फूल हैं इसलिए सबको कशिश करते हैं। जैसे अब बाबा कशिश करते हैं। बाप आये ही हैं तुम सबको फूल बनाने। तुम्हारे में कई बहुत खराब कांटे भी हैं। 5 विकार रूपी कांटे हैं ना। इस समय तुमको फूलों और कांटों का ज्ञान हैं। कांटों का जंगल भी होता है। बबूल का कांटा सबसे बड़ा होता है। उन कांटों से भी बहुत चीज़ें बनती हैं। भेंट की जाती है मनुष्यों की। बाप समझाते हैं, इस समय बहुत दु:ख देने वाले मनुष्य कांटे हैं इसलिए इनको दु:ख की दुनिया कहा जाता है। कहते भी हैं बाप सुखदाता है। माया रावण दु:ख दाता है। फिर सतयुग में माया नहीं होगी तो यह कुछ भी बातें नहीं होंगी। ड्रामा में एक पार्ट दो वारी नहीं हो सकता। बुद्धि में है सारी दुनिया में जो पार्ट बजता है, वह सब नया। तुम विचार करो - सतयुग से लेकर यहाँ तक के दिन ही बदल जाते, एक्टिविटी बदल जाती। 5 हज़ार वर्ष की पूरी एक्टिविटी का रिकार्ड आत्मा में भरा हुआ है, वह बदल नहीं सकता। हर आत्मा में अपना पार्ट भरा हुआ है। यह एक बात भी कोई समझ नहीं सकते। अभी आदि-मध्य-अन्त को तुम जानते हो। यह स्कूल है ना। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को जानना है और फिर बाप को याद कर पवित्र बनने की पढ़ाई है। इनके पहले जानते थे क्या - हमको यह बनना है। बाप कितना क्लीयर कर समझाते हैं। तुम पहले नम्बर में यह थे फिर तुम नीचे उतरते-उतरते अब क्या बन गये हो। दुनिया को तो देखो क्या बन गई है! कितने ढेर मनुष्य हैं। इन लक्ष्मी-नारायण की राजधानी का विचार करो - क्या होगा! यह जहाँ रहते होंगे कैसे हीरे-जवाहरातों के महल होंगे। बुद्धि में आता है - अभी हम स्वर्गवासी बन रहे हैं। वहाँ हम अपने मकान आदि बनायेंगे। ऐसे नहीं कि नीचे से द्वारिका निकल आयेगी। जैसे शास्त्रों में दिखाया है। शास्त्र नाम ही चला आता है, और तो कोई नाम रख नहीं सकते। और किताब होते हैं पढ़ाई के। दूसरे नाविल्स होते हैं। बाकी इनको पुस्तक अथवा शास्त्र कहते हैं। वह है पढ़ाई के किताब। शास्त्र पढ़ने वालों को भक्त कहा जाता है। भक्ति और ज्ञान दो चीज़ें हैं। अब वैराग्य किसका? भक्ति का या ज्ञान का? जरूर कहेंगे भक्ति का। अब तुमको ज्ञान मिल रहा है, जिससे तुम इतना ऊंच बनते हो। अब बाप तुमको सुखदाई बनाते हैं। सुखधाम को ही स्वर्ग कहा जाता है। सुखधाम में तुम चलने वाले हो तो तुमको ही पढ़ाते हैं। यह ज्ञान भी तुम्हारी आत्मा लेती है। आत्मा का कोई धर्म नहीं है। वह तो आत्मा है। फिर आत्मा जब शरीर में आती है तो शरीर के धर्म अलग होते हैं। आत्मा का धर्म क्या है? एक तो आत्मा बिन्दु मिसल है और शान्त स्वरूप है। शान्तिधाम, मुक्तिधाम में रहती है। अब बाप समझाते हैं - सब बच्चों का हक है। बहुत बच्चे हैं जो और और धर्मों में कनवर्ट हो गये हैं। वह फिर निकलकर अपने असली धर्म में आ जायेंगे। जो देवी-देवता धर्म छोड़ दूसरे धर्म में गये हैं, वह सब पत्ते लौटकर आ जायेंगे, अपनी जगह पर। इन सब बातों को और कोई समझ नहीं सकेंगे। पहले-पहले तो बाप का परिचय देना है इनमें ही सब मूँझ पड़े हैं। तुम बच्चे जानते हो अभी हमको कौन पढ़ाते हैं? बाप पढ़ाते हैं। कृष्ण तो देहधारी है। इनको (ब्रह्मा को) दादा कहेंगे। सब भाई-भाई हैं ना। फिर है मर्तबे के ऊपर। यह भाई का शरीर है, यह बहन का शरीर है। यह भी अब तुम जानते हो। आत्मा तो एक छोटा सा सितारा है। इतनी सब नॉलेज छोटे सितारे में है। सितारा शरीर के सिवाए बात भी नहीं कर सकता। सितारे को पार्ट बजाने के लिए अंग भी चाहिए। सितारों की दुनिया ही अलग है। फिर यहाँ आकर आत्मा शरीर धारण करती है। वह है आत्माओं का घर। आत्मा छोटी बिन्दी है। शरीर बड़ी चीज़ है। तो उनको कितना याद करते हैं! अभी तुमको याद करना है - एक परमपिता परमात्मा को। यही सत्य है जबकि आत्माओं और परमात्मा का मेला होता है। गायन भी है आत्मायें परमात्मा अलग रहे बहुकाल.. हम बाबा से अलग हुए हैं ना। याद आता है कितना समय अलग हुए हैं! बाप जो कल्प-कल्प सुनाते आये हैं, वही आकर सुनाते हैं। इसमें ज़रा भी फर्क नहीं हो सकता। सेकण्ड बाई सेकण्ड जो एक्ट चलती है वह नई। एक सेकण्ड पास होता है, मिनट पास होता है, उनको जैसे छोड़ते जाते हैं। पास होता जाता है ताकि कहेंगे - इतने वर्ष, इतने दिन, मिनट, इतने सेकण्ड पास कर आये हैं। पूरा 5 हज़ार वर्ष होगा फिर एक नम्बर से शुरू होगा। एक्यूरेट हिसाब है ना। मिनट सेकण्ड सब नोट करते हैं। अभी तुमसे कोई पूछे - इसने कब जन्म लिया था? तुम गिनती कर बताते हो। कृष्ण ने पहले नम्बर में जन्म लिया है। शिव का तो मिनट, सेकण्ड कुछ भी नहीं निकाल सकते हो। कृष्ण की तिथि-तारीख पूरा लिखा हुआ है। मनुष्यों की घड़ी में फर्क पड़ सकता है - मिनट सेकण्ड का। शिवबाबा के अवतरण में तो बिल्कुल फर्क नहीं पड़ सकता। पता भी नहीं पड़ता है कि कब आया! ऐसे भी नहीं साक्षात्कार हुआ तब आया। नहीं, अन्दाज़ से कह देते हैं। बाकी ऐसे नहीं उस समय प्रवेश हुआ। साक्षात्कार हुआ कि हम फलाना बनेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सुखधाम में चलने के लिए सुखदाई बनना है। सबके दु:ख हरकर सुख देना है। कभी भी दु:खदाई कांटा नहीं बनना है।

2) इस विनाशी शरीर में आत्मा ही मोस्ट वैल्युबुल है, वही अमर अविनाशी है इसलिए अविनाशी चीज़ से प्यार रखना है। देह का भान मिटा देना है।

वरदान:-

एक बल एक भरोसे के आधार पर मंजिल को समीप अनुभव करने वाले हिम्मतवान भव

ऊंची मंजिल पर पहुंचने से पहले आंधी तूफान लगते ही हैं, स्टीमर को पार जाने के लिए बीच भंवर से क्रास करना ही पड़ता है इसलिए जल्दी में घबराओ मत, थको वा रूको मत। साथी को साथ रखो तो हर मुश्किल सहज हो जायेगी, हिम्मतवान बन बाप की मदद के पात्र बनो। एक बल एक भरोसा - इस पाठ को सदा पक्का रखो तो बीच भंवर से सहज निकल आयेंगे और मंजिल समीप अनुभव होगी।

स्लोगन:-

विश्व कल्याणकारी वह है जो प्रकृति सहित हर आत्मा के प्रति शुभ भावना रखते हैं।

 

 

 


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बोध कथा-

विचार की पवित्रता

एक राजा और नगर सेठ में गहरी मित्रता थी। वे रोज एक दूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे। नगर सेठ चंदन की लकड़ी का व्यापार करता था। एक दिन उसके मुनीम ने बताया कि लकड़ी की बिक्री कम हो गई है। तत्काल सेठ के मन में यह विचार कौंधा कि अगर राजा की मृत्यु हो जाए, तो मंत्रिगण चंदन की लकडि़यां उसी से खरीदेंगे। उसे कुछ तो मुनाफा होगा। शाम को सेठ हमेशा की तरह राजा से मिलने गया। उसे देख राजा ने सोचा कि इस नगर सेठ ने उससे दोस्ती करके न जाने कितनी दौलत जमा कर ली है, ऐसा कोई नियम बनाना होगा जिससे इसका सारा धन राज खजाने में जमा हो जाए।
दोनों इसी तरह मिलते रहे, लेकिन पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। एक दिन नगर सेठ ने पूछ ही लिया, ‘पिछले कुछ दिनों से हमारे रिश्तों में एक ठंडापन आ गया है। ऐसा क्यों?’ राजा ने कहा, ‘मुझे भी ऐसा लग रहा है। चलो, नगर के बाहर जो महात्मा रहते हैं, उनसे इसका हल पूछा जाए।’ उन्होंने महात्मा को सब कुछ बताया। महात्मा ने कहा, ‘सीधी सी बात है। आप दोनों पहले शुद्ध भाव से मिलते रहे होंगे, पर अब संभवत: एक दूसरे के प्रति आप लोगों के मन में कुछ बुरे विचार आ गए हैं इसलिए मित्रता में पहले जैसा सुख नहीं रह गया।’ नगर सेठ और राजा ने अपने-अपने मन की बातें कह सुनाईं। महात्मा ने सेठ से कहा,’ तुमने ऐसा क्यों नहीं सोचा कि राजा के मन में चंदन की लकड़ी का आलीशान महल बनवाने की बात आ जाए? इससे तुम्हारा चंदन भी बिक जाता। विचार की पवित्रता से ही संबंधों में मिठास आती है। तुमने राजा के लिए गलत सोचा इसलिए राजा के मन में भी तुम्हारे लिए अनुचित विचार आया। गलत सोच ने दोनों के बीच दूरी बढ़ा दी। अब तुम दोनों प्रायश्चित करके अपना मन शुद्ध कर लो, तो पहले जैसा सुख फिर से मिलने लगेगा।’ 5  

 

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07-03-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा”मधुबन


“मीठे बच्चे-तुम्हें अपने योगबल से सारी सृष्टि को पावन बनाना है, तुम योगबल से ही माया पर जीत पाकर जगतजीत बन सकते हो"

प्रश्न:

बाप का पार्ट क्या है, उस पार्ट को तुम बच्चों ने किस आधार पर जाना है

उत्तर:

बाप का पार्ट है-सबके दु:ख हरकर सुख देना, रावण की जंजीरों से छुड़ाना। जब बाप आते हैं तो भक्ति की रात पूरी होती है। बाप तुम्हें स्वयं अपना और अपनी जायदाद का परिचय देते हैं। तुम एक बाप को जानने से ही सब कुछ जान जाते हो।

गीत:-

तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो......

ओम् शान्ति।

बच्चों ने ओम् शान्ति का अर्थ समझा है, बाप ने समझाया है हम आत्मा हैं, इस सृष्टि ड्रामा के अन्दर हमारा मुख्य पार्ट है। किसका पार्ट है? आत्मा शरीर धारण कर पार्ट बजाती है। तो बच्चों को अब आत्म-अभिमानी बना रहे हैं। इतना समय देह-अभिमानी थे। अब अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है। हमारा बाबा आया हुआ है ड्रामा प्लैन अनुसार। बाप आते भी हैं रात्रि में। कब आते हैं-उसकी तिथि-तारीख कोई नहीं है। तिथि-तारीख उनकी होती है जो लौकिक जन्म लेते हैं। यह तो है पारलौकिक बाप। इनका लौकिक जन्म नहीं है। कृष्ण की तिथि, तारीख, समय आदि सब देते हैं। इनका तो कहा जाता है दिव्य जन्म। बाप इनमें प्रवेश कर बताते हैं कि यह बेहद का ड्रामा है। उसमें आधाकल्प है रात। जब रात अर्थात् घोर अन्धियारा होता है तब मैं आता हूँ। तिथि-तारीख कोई नहीं। इस समय भक्ति भी तमोप्रधान है। आधा कल्प है बेहद का दिन । बाप खुद कहते हैं मैंने इनमें प्रवेश किया है। गीता में है भगवानुवाच, परन्तु भगवान मनुष्य हो नहीं सकता। कृष्ण भी दैवी गुणों वाला है। यह मनुष्य लोक है। यह देव लोक नहीं है। गाते भी हैं ब्रह्मा देवताए नमः...... वह है सूक्ष्मवतनवासी। बच्चे जानते हैं वहाँ हड्डी-मास नहीं होता है। वह है सूक्ष्म सफेद छाया। जब मूलवतन में है तो आत्मा को न सूक्ष्म शरीर छाया वाला है, न हड्डी वाला है। इन बातों को कोई भी मनुष्य मात्र नहीं जानते हैं। बाप ही आकर सुनाते हैं, ब्राह्मण ही सुनते हैं, और कोई नहीं सुनते। ब्राह्मण वर्ण होता ही है भारत में, वह भी तब होता है जब परमपिता परमात्मा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण धर्म की स्थापना करते हैं। अब इनको रचता भी नहीं कहेंगे। नई रचना कोई रचते नहीं हैं। सिर्फ रिज्युवनेट करते हैं। बुलाते भी हैं - हे बाबा, पतित दुनिया में आकर हमको पावन बनाओ। अभी तुमको पावन बना रहे हैं। तुम फिर योगबल से इस सृष्टि को पावन बना रहे हो। माया पर तुम जीत पाकर जगत जीत बनते हो। योगबल को साइंस बल भी कहा जाता है। ऋषि-मुनि आदि सब शान्ति चाहते हैं परन्तु शान्ति का अर्थ तो जानते नहीं। यहाँ तो जरूर पार्ट बजाना है ना। शान्तिधाम है स्वीट साइलेन्स होम। तुम आत्माओं को अब यह मालूम है कि हमारा घर शान्तिधाम है। यहाँ हम पार्ट बजाने आये हैं। बाप को भी बुलाते हैं-हे पतित-पावन, दु:ख हर्ता, सुख कर्ता आओ, हमको इस रावण की जंजीरों से छुड़ाओ। भक्ति है रात, ज्ञान है दिन। रात मुर्दाबाद होती है फिर ज्ञान जिंदाबाद होता है। यह खेल है सुख और दुःख का। तुम जानते हो पहले हम स्वर्ग में थे फिर उतरते-उतरते आकर नीचे हेल में पड़े हैं। कलियुग कब खलास होगा फिर सतयुग कब आयेगा, यह कोई नहीं जानते। तुम बाप को जानने से बाप द्वारा सब कुछ जान गये हो। मनुष्य भगवान को ढूँढने के लिए कितना धक्का खाते हैं। बाप को जानते ही नहीं। जानें तब जब बाप आकर अपना और जायदाद का परिचय दें। वर्सा बाप से ही मिलता है, माँ से नहीं। इनको मम्मा भी कहते हैं, परन्तु इनसे वर्सा नहीं मिलता है, इनको याद भी नहीं करना है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी शिव के बच्चे हैं - यह भी कोई नहीं जानते। बेहद की सारी दुनिया का रचयिता एक ही बाप है। बाकी सब हैं उनकी रचना या हद के रचयिता। अब तुम बच्चों को बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हों। मनुष्य बाप को नहीं जानते हैं तो किसको याद करें? इसलिए बाप कहते हैं कितने निधनके बन पड़े हैं। यह भी ड्रामा में गूंध है। भक्ति और ज्ञान दोनों में सबसे श्रेष्ठ कर्म है-दान करना। भक्ति मार्ग में ईश्वर अर्थ दान करते हैं। किसलिए? कोई कामना तो जरूर रहती है। समझते हैं जैसा कर्म करेंगे वैसा फल दूसरे जन्म में पायेंगे, इस जन्म में जो करेंगे उसका फल दूसरे जन्म में पायेंगे। जन्म-जन्मान्तर नहीं पायेंगे। एक जन्म के लिए फल मिलता है। सबसे अच्छे ते अच्छा कर्म होता है दान। दानी को पुण्यात्मा कहा जाता है। भारत को महादानी कहा जाता है। भारत में जितना दान होता है उतना और कोई खण्ड में नहीं। बाप भी आकर बच्चों को दान करते हैं, बच्चे फिर बाप को दान करते हैं। कहते हैं बाबा आप आयेंगे तो हम अपना तन-मन-धन सब आपके हवाले कर देंगे। आप बिगर हमारा कोई नहीं। बाप भी कहते हैं मेरे लिए तुम बच्चे ही हो। मुझे कहते ही हैं हेविनली गॉड फादर अर्थात् स्वर्ग की स्थापना करने वाला। मैं आकर तुमको स्वर्ग की बादशाही देता हूँ। बच्चे मेरे अर्थ सब कुछ दे देते हैं - बाबा सब कुछ आपका है। भक्ति मार्ग में भी कहते थे-बाबा, यह सब कुछ आपका दिया हुआ है। फिर वह चला जाता है तो दुःखी हो जाते हैं। वह है भक्ति का अल्पकाल का सुख। बाप समझाते हैं भक्ति मार्ग में तुम मुझे दान-पुण्य करते हो इनडायरेक्ट । उसका फल तो तुमको मिलता रहता है। अब इस समय मैं तुमको कर्मअकर्म-विकर्म का राज़ बैठ समझाता हूँ। भक्ति मार्ग में तुम जैसे कर्म करते हो उसका अल्पकाल सुख भी मेरे द्वारा तुमको मिलता है। इन बातों का दुनिया में किसको पता नहीं है। बाप ही आकर कर्मों की गति समझाते हैं। सतयुग में कभी कोई बुरा कर्म करते ही नहीं। सदैव सुख ही सुख है। याद भी करते हैं सुखधाम, स्वर्ग को। अभी बैठे हैं नर्क में। फिर भी कह देते–फलाना स्वर्ग पधारा। आत्मा को स्वर्ग कितना अच्छा लगता है। आत्मा ही कहती है ना–फलाना स्वर्ग पधारा। परन्तु तमोप्रधान होने के कारण उनको कुछ पता नहीं पड़ता है कि स्वर्ग क्या, नर्क क्या है? बेहद का बाप कहते हैं तुम सब कितने तमोप्रधान बन गये हो। ड्रामा को तो जानते नहीं। समझते भी हैं कि सृष्टि का चक्र फिरता है तो जरूर हूबहू फिरेगा ना। वह सिर्फ कहने मात्र कह देते हैं। अभी यह है संगमयुग। इस एक ही संगमयुग का गायन है। आधाकल्प देवताओं का राज्य चलता है फिर वह राज्य कहाँ चला जाता, कौन जीत लेते हैं? यह भी किसको पता नहीं। बाप कहते हैं रावण जीत लेता है। उन्होंने फिर देवताओं और असुरों की लड़ाई बैठ दिखाई है। अब बाप समझाते हैं-5 विकारों रूपी रावण से हारते हैं फिर जीत भी पाते हैं रावण पर। तुम तो पूज्य थे फिर पुजारी पतित बन जाते हो तो रावण से हारे ना। यह तुम्हारा दुश्मन होने के कारण तुम सदैव जलाते आये हो। परन्तु तुमको पता नहीं है। अब बाप समझाते हैं रावण के कारण तुम पतित बने हो। इन विकारों को ही माया कहा जाता है। माया जीत, जगत जीत। यह रावण सबसे पुराना दुश्मन है। अभी श्रीमत से तुम इन 5 विकारों पर जीत पाते हो। बाप आये हैं जीत पहनाने। यह खेल है ना। माया ते हारे हार, माया ते जीते जीत। जीत बाप ही पहनाते हैं इसलिए इनको सर्वशक्तिमान कहा जाता है। रावण भी कम शक्तिमान नहीं है। परन्तु वह दुःख देते हैं इसलिए गायन नहीं है। रावण है बहुत दुश्तर। तुम्हारी राजाई ही छीन लेते हैं। अभी तुम समझ गये हो– हम कैसे हारते हैं फिर कैसे जीत पाते हैं? आत्मा चाहती भी है हमको शान्ति चाहिए। हम अपने घर जावें। भक्त भगवान को याद करते हैं परन्तु पत्थरबुद्धि होने कारण समझते नहीं हैं। भगवान बाबा है, तो बाप से जरूर वर्सा मिलता होगा। मिलता भी जरूर है परन्तु कब मिलता है फिर कैसे गँवाते हैं, यह नहीं जानते हैं। बाप कहते हैं मैं इस ब्रह्मा तन द्वारा तुमको बैठ समझाता हूँ। मुझे भी आरगन्स चाहिए ना। मुझे अपनी कर्मेन्द्रियां तो हैं नहीं। सूक्ष्मवतन में भी कर्मेन्द्रियां हैं। चलते फिरते जैसे मूवी बाइसकोप होता है, यह मूवी टॉकी बाइसकोप निकले हैं तो बाप को भी समझाने में सहज होता है। उन्हों का है बाहुबल, तुम्हारा है योगबल। वह दो भाई भी अगर आपस में मिल जाएं तो विश्व पर राज्य कर सकते हैं। परन्तु अभी तो फूट पड़ी हुई है। तुम बच्चों को साइलेन्स का शुद्ध घमण्ड रहना चाहिए। तुम मनमनाभव के आधार से साइलेन्स द्वारा जगतजीत बन जाते हो। वह है साइंस घमण्डी। तुम साइलेन्स घमण्डी अपने को
आत्मा समझ बाप को याद करते हो। याद से तुम सतोप्रधान बन जायेंगे। बहुत सहज उपाय बताते हैं। तुम जानते हो शिवबाबा आये हैं हम बच्चों को फिर से स्वर्ग का वर्सा देने। तुम्हारा जो भी कलियुगी कर्मबन्धन है, बाप कहते हैं उनको भूल जाओ। 5 विकार भी मुझे दान में दे दो। तुम जो मेरा-मेरा करते आये हो, मेरा पति, मेरा फलाना, यह सब भूलते जाओ। सब देखते हुए भी उनसे ममत्व मिटा दो। यह बात बच्चों को ही समझाते हैं। जो बाप को जानते ही नहीं, वह तो इस भाषा को भी समझ न सकें। बाप आकर मनुष्य से देवता बनाते हैं। देवतायें होते ही सतयुग में हैं। कलियुग में होते हैं मनुष्य। अभी तक उनकी निशानियां हैं अर्थात् चित्र हैं। मुझे कहते ही हैं पतित-पावन । मैं तो डिग्रेड होता नहीं हूँ। तुम कहते हो हम पावन थे फिर डिग्रेड हो पतित बने हैं। अब आप आकर पावन बनाओ तो हम अपने घर में जायें। यह है स्पीचूअल नॉलेज। अविनाशी ज्ञान रत्न हैं ना। यह है नई नॉलेज। अभी तुमको यह नॉलेज सिखाता हूँ। रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अन्त का राज़ बताता हूँ। अभी यह तो है पुरानी दुनिया। इसमें तुम्हारे जो भी मित्र सम्बन्धी आदि हैं, देह सहित सबसे ममत्व निकाल दो। अभी तुम बच्चे अपना सब कुछ बाप हवाले करते हो। बाप फिर स्वर्ग की बादशाही 21 जन्मों के लिए तुम्हारे हवाले कर देते हैं। लेन-देन तो होती है ना। बाप तुमको 21 जन्मों के लिए राज्य-भाग्य देते हैं। 21 जन्म, 21 पीढ़ी गाये जाते हैं ना अर्थात् 21 जन्म पूरी लाइफ चलती है। बीच में कभी शरीर छूट नहीं सकता। अकाले मृत्यु नहीं होती। तुम अमर बन और अमरपुरी के मालिक बनते हो। तुमको कभी काल खा न सके। अभी तुम मरने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो। बाप कहते हैं देह सहित देह के सब सम्बन्ध छोड़ एक बाप से सम्बन्ध रखना है। अब जाना ही है सुख के सम्बन्ध में। दु:ख के बन्धनों को भूलते जायेंगे। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनना है। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो, साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करो। इन देवताओं जैसा बनना है। यह है एम ऑबजेक्ट। यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक थे, इन्हों ने कैसे राज्य पाया, फिर कहाँ गये, यह किसको पता नहीं है। अभी तुम बच्चों को दैवी गुण धारण करने हैं। किसको भी दु:ख नहीं देना है। बाप है ही दुःख हर्ता, सुख कर्ता। तो तुमको भी सुख का रास्ता सबको बताना है अर्थात् अन्धों की लाठी बनना है। अभी बाप ने तुम्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र दिया है। तुम जानते हो बाप कैसे पार्ट बजाते हैं। अभी बाप जो तुमको पढ़ा रहे हैं फिर यह पढ़ाई प्राय:लोप हो जायेगी। देवताओं में यह नॉलेज रहती नहीं। तुम ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण ही रचता और रचना के ज्ञान को जानते हो। और कोई जान नहीं सकते। इन लक्ष्मी-नारायण आदि में भी अगर यह ज्ञान होता तो परम्परा चला आता। वहाँ ज्ञान की दरकार ही नहीं रहती क्योंकि वहाँ है ही सद्गति। अभी तुम सब कुछ बाप को दान देते हो तो फिर बाप तुमको 21 जन्मों के लिए सब कुछ दे देते हैं। ऐसा दान कभी होता नहीं। तुम जानते हो हम सर्वन्श देते हैं – बाबा यह सब कुछ आपका है, आप ही हमारे सब कुछ हो। त्वमेव माताश्च पिता... पार्ट तो बजाते हैं ना। बच्चों को एडाप्ट भी करते हैं फिर खुद ही पढ़ाते हैं। फिर खुद ही गुरू बन सबको ले जाते हैं। कहते हैं तुम मुझे याद करो तो पावन बन जायेंगे फिर तुमको साथ ले जाऊंगा। यह यज्ञ रचा हुआ है। यह है शिव ज्ञान यज्ञ, इसमें तुम तन-मन-धन सब स्वाहा कर देते हो। खुशी से सब अर्पण हो जाता है। बाकी आत्मा रह जाती है। बाबा, बस अब हम आपकी श्रीमत पर ही चलेंगे। बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनना है। 60 वर्ष की आयु जब होती है तो वानप्रस्थ अवस्था में जाने की तैयारी करते हैं परन्तु वह कोई वापिस जाने के लिए थोड़ेही तैयारी करते हैं। अभी तुम सतगुरू का मन्त्र लेते हो मनमनाभव। भगवानुवाच - तुम मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। सबको कहो आप सबकी वानप्रस्थ अवस्था है। शिवबाबा को याद करो, अब जाना है अपने घर। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1. कलियुगी सर्व कर्मबन्धनों को बुद्धि से भूल 5 विकारों का दान कर आत्मा को सतोप्रधान बनाना है।

2. इस रूद्र यज्ञ में खुशी से अपना तन-मन-धन सब अर्पण कर सफल करना है। इस समय सब कुछ बाप हवाले कर 21 जन्मों की बादशाही बाप से ले लेनी है।

वरदान:

निमित्त भाव की स्मृति से हलचल को समाप्त करने वाले सदा अचल-अडोल भव

निमित्त भाव से अनेक प्रकार का मैं पन, मेरा पन सहज ही खत्म हो जाता है। यह स्मृति सर्व प्रकार की हलचल से छुड़ाकर अचल-अडोल स्थिति का अनुभव कराती है। सेवा में भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। क्योंकि निमित्त बनने वालों की बुद्धि में सदा याद रहता है कि जो हम करेंगे हमें देख सब करेंगे। सेवा के निमित्त बनना अर्थात् स्टेज पर आना। स्टेज तरफ स्वत: सबकी नजर जाती है। तो यह स्मृति भी सेफ्टी का साधन बन जाती है।

स्लोगन:

सर्व बातों में न्यारे बनो तो परमात्म बाप के सहारे का अनुभव होगा।

 

महाशिवरात्री संदेश दि. 22 से 28 फरवरी, 2017 रात 12 बजे तक 7 दिनमें 

7 करोंड व्हाटसएप युजर्स को दिया जायेगा महाशिवरात्री का आध्यात्मिक रहस्य

ओमशान्ति मीडिया पत्रिका, बीकवार्ता वेबपोर्टल तथा डॉ. दिपक हरके का संयुक्त उपक्रम

वंडर बुक ऑफ रिकार्ड इंटरनॅशनल, लंदन में दर्ज होगा विश्व किर्तीमान

 

अहमदनगर (प्रतिनिधी) हम प्रतिवर्ष भक्तिभाव से महाशिवरात्री महोत्सव मनाते है, किन्तू यह उत्सव क्या मनाते ? इसके पिछे छिपा आध्यात्मिक क्या है ? इसकी जानकारी कुछ ही लोगो के पास है ? महाशिवरात्री के आध्यात्मिक रहस्य को हम अपने जीवन में समझकर अपने जीवनमें प्रतिपल खुश रहने हेतू महाशिवरात्री संदेश देना आवश्यक है  दि. 22 से 28 फरवरी, 2017 की रात 12 से 7 करोड व्हॉटसअॅप युजर्सको महाशिवरात्रीका आध्यात्मिक संदेश प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की ओरसे पहूंचाया जायेगा. ओमशान्ति मीडिया पत्रिका, www.bkvarta.com बीकवार्ता वेबपोर्टल तथा डॉ. दिपक हरके का यह संयुक्त उपक्रम है.

 

इसके पूर्व का विश्व विक्रम डॉ. दिपक हरके इनके नाम पर है, दिपावली का आध्यात्मिक रहस्य का ऑडिओ मॅसेज 1 करोड 352 व्हॉटस्अॅप युजर्स को 29 अक्तुबर 2016 को रात 12 बजे से 20 अक्तुबर, 2016 के रात बजे बजे तक भेजकर उन्होने यह उपलब्ध हासिल की थी. महाशिवरात्री का विश्वविक्रमी संदेश प्राप्त करने के लिए 9422288888 इस व्हॉटसअॅप मैसेज पर WR एैसा मॅसेज भेजकर आप यह संदेश प्राप्त कर सकतें है. विश्वविक्रम में सहभागीता पत्र प्राप्त करने के लिए हरएक सहभागी व्यक्ति निर्धारीत राशी जमा कर वंडर बुक ऑफ रिकार्डमें सहभाग प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकतें है . इस विश्वविक्रम का उदघाटन भारतीय क्रीकेट टिम के उपकप्तान अजिंक्य रहणे इनके शुभहस्तोंसे मुंबई के बीकेसीस्थित एमसीए क्लब में सपन्न हूआ. इस उपक्रम के बारें में रहाने ने डॉ. दिपक हरके को बधाई दी तथा ब्रह्माकुमारीज् के मानवसेवा के कार्य की सराहना की. 

 

 

१३ मार्च (पालक्कड:केरला) ध्यान महोत्सव का आयोजन. विभीन्य मान्यवारोंने किया राजयोग ध्यान अभ्यास.

 

31 जनवरी (भूवनेश्वर) वार्षिकोत्सव मनाया गया. सेवाकेंद्र के एक वर्ष पूर्ती पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

 


 

30 जनवरी (विलेपार्ले:मुंबई) सफल सारथी अवार्ड. ट्रान्सपोर्ट एण्ड ट्रॅव्हल्स प्रभागद्वारा यह अवार्ड प्राप्त ड्रायव्हर भाईयों को सम्मानित किया गया.

 


 

29 जनवरी (हैद्राबाद) मुख्यमंत्री महोदय शान्तिसरोवर में. भ्राता एम. चंद्राबाबू नायडूजीने शांती सरोवर भेट की. शांतीसरांेवर के दसवें वर्धापन दिन कार्यक्रम का उदघाटन उन्होंने किया.


 

28 जनवरी (जयपूर:राज.) अंतरराष्ट्रीय खेल सम्मेलन मंें ईश्वरीय संदेश. स्पोटर्स एण्ड फिजिकल एज्युकेशन विषयपर आयोजित इस मम्मेलन में बीके जगबीरभाईने दिया संदेश.


 

27 जनवरी (मडिकेरी:कर्ना.) कर्म की गती गुह्य है. - भगवानभाई सेंट्रल जेल में ब्र.कु भगवानभाई, माऊंट आबू ने दिया ईश्वरीय संदेश


 

26 जनवरी (मंगलौर:कर्ना.) सेंट्रल जेल में दिया ईश्वरीय संदेश. ब्र.कु भगवानभाई, माऊंट आबू ने दिया ईश्वरीय संदेश.


 

25 जनवरी (मालाड:मुंबई)फिल्म इन्स्टि. में मेडिटेशन रुम का उदघाटन. प्रसिध्द फिल्म निर्देशक तथा निर्माता भ्राता सुभाष घई ने विशअलींग फिल्म इन्स्टि. में मेडिटेशन रुम का उघाटन किया

 


 

24 जनवरी (कटघोरा) आध्यात्मिक समागम एवं सम्मान समारोह संपन्न. नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधीयों का सम्मान समारोह आयोजित किया गया.


 

23 जनवरी (लातूर:महा.) उर्जा छात्र-क्लब स्थापित. गणतंत्र दिवस के अवसरपर विवेकानंद विद्यालय, सीबीएससी लातूर में महाराष्ट्र उर्जा छात्र क्लब की स्थापना की गई


 

22 जनवरी (बिलासपूर:छ.ग.) आरके नगर में सरस्वती झाँकी. राजकिशोर नगर, बीके रुपा बहनने माँ सरस्वती की महिमा का प्रवचन किया.


21 जनवरी (शान्तिवन) रेडिओ मधुबन वर्धापन दिन. ब्रहमाकुमारीज कम्युनिटी रेडिओ मधुबन का 4 था वर्धापन दिवस मनाया गया.

 


 

20 जनवरी (मालाड:मुंबई) सुरक्षीत रास्ता सप्ताह. एसटी डिपो में हुआ कार्यक्रम.


 

19 जनवारी (केशोद:गुज) यात्रा खुशनुमा जीवन की और कार्यक्रम संपन्न. ब्र.कु.डा. सविता, माऊंट आबूने किया मार्गदर्शन.


 

18 जनवरी (आबूपर्वत:पाण्डवभवन) पिताश्रीजी का स्मृतिदिवस. विश्वशांती दिवस के रुप में समूचे विश्व में मनाया गया.


 

17 जनवरी (विशाखापट्टणम) विधायक महोदय को दिया संदेश. नये वर्ष का संदेश भ्राता विष्णु कुमार राजू जी को बीके शशीकला बहनने दिया 


 

16 जनवरी (मुंबई) 102वीं विज्ञान परिषद में स्पार्क सेवा. मुंबई विश्व विद्यालय में आयोजित इस परिषदमें स्प्रिच्ुअल एप्लीकेशन एण्ड रिसर्च की सुंदर सेवा हुई


 

15 जनवरी (जयपूर) नारित्वदर्शन की सहभागीता. जयपूर अन्तरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल में नारित्व दर्शन को नॉमिनेट किया गया.


 

14 जनवरी (शान्तिवन) रिडिकव्हरींग ऑफ लाईफ. वैज्ञानिक तथा अभियंता प्रभागद्वारा राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया


 

13 जनवरी (शान्तिवन) ब्र.कु. करुणाभाईजी का 75 वाँ जनमदिन. ब्रहमाकुमारीज संस्था के मीडिया उपाध्यक्ष तथा मल्टीमीडिया प्रभारी ब्र.कु. करुणाभाईजी के जनमदिन की प्लेटिनम ज्युबिली हर्षोल्हाससे मनाई गई.


 

12 जनवरी (शांतीवन)दादीजी का 99 वाँ जनमदिन मनाया. ब्रहमाकुमारीज संस्था की मुख्य प्रशासिका ददी जानकीजी का जन्मदिन बहुत ही उमंग उत्साहसे मनाया गया


 

11 जनवरी (मा.आबू) बीके केदारभाई का अभिनंदन किया दादीजीने. राजस्थान सरकारद्वारा उर्जा संरक्षण पुरस्कार प्राप्त करनेवाले बीके केदारभाई (उर्जा ऑडिटर) का अभिनंदन दादी रतनमोहिनीजी, बीके रमेशभाईजीने किया.


 

10 जनवरी (टिकरापारा:बीलासपूर) बालिका शिक्षा शिविर में सदेश. सरस्वती शिशु मंदिर उच्चस्तर मा. विद्यालय में बीके मंजू बहनने दिया ईश्वरीय संदेश.


 

09 जनवरी (राहूरी:महा.) आज की शाम भगवान के नाम. ब्र.कु. सुरजभाई, मा. आबू, ब्र.कु. गीताबहन पुना तथा उषा बहन राहूरी ने दिया ईश्वरीय संदेश. ब्र.कु. बद्रिश हेहाडरायने मीडियाद्वारा पहूंचाया संदेश


 

08 जनवरी (कलपेट्टा:केरला) केंद्रीय विद्यालय में दिया ईश्वरीय संदेश. ब्र.कु. भगवानभाई, आबू पर्वत ने  कही नैतिक मूल्यों की बा


 

07 जनवरी (बार्शि:महा.) कुंकूलोक हायस्कूल में ईश्वरीय संदेश. बीके संगीताबहनने दिया संदेश


 

06 जनवरी (केशोद) महान जादुगर विरागभाई हकुभा को दिया संदेश. बी.के. सत्याबहन, तथा बीके शिल्पा बहनने दिया परिचय.


 

05 जनवरी (हरिद्वार) ऋषीकुल में संत स्नेहमीलन, ब्र.कु.मिनाबहनने परमपिता परमात्मा का दिया सत्य परिच


 

04 जनवारी (बंेगलौर) फ्रि आय चेकींग कॅम्प. सेवाकेंद्र की ओरसे आयोजित कॅम्प में सहभागीयों दिया गया संदे


 

03 जनवरी (लिमा,पेरु:फ्रान्स)कोप-20 में ब्रहमाकुमारीज् की सहभागीता. क्लायमेंट चेंज कॉन्फरन्स में ब्रहमाकुमारीजने किया सहभाग


 

02 जनवरी (वाशी:मुंबई) सदभावना सभा में ब्रहमाकुमारीज् सहभाग. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की औरसे आयोजित इस मीटिंग में बहनोंने दिया संदेश


 

01 जनवरी (तिनसुखीया:आसाम) स्वर्णीम युग की पुन:स्थापना. गीता के भगवान को प्रत्यक्ष करने के सम्मेलनको, बी के ब्रजमोहनभाईजी, देहली, ब्र.कु. उषाबहनजी मा. आबू, बीके आशा बहनजी ने किया सम्बोधित

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