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नया मलयालम टीवी चैनल

कोच्चि: केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री, माननीय। मुरलीधरन ने ब्रह्म कुमारियों का नया मलयालम चैनल लॉन्च किया - मलयाली को समर्पित राजयोग टीवी मलयालम। यह एक पूर्ण चैनल है जो हमारी ज़रूरत की हर चीज़ वितरित करता है। भारतीय दर्शन विज्ञान और अध्यात्म का सामंजस्य है। यह चैनल ब्रह्म कुमारियों की मानवता की समग्र दृष्टि का प्रमाण है। मंत्री ने अपने…

आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र

मध्यप्रदेश के राज्य कैबिनेट मंत्री ने आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र प्रदान किया मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश सरकार ने आपदा प्रबंधन में ब्रह्मा कुमारिस संगठन के प्रयासों की सराहना की। मध्य प्रदेश सरकार में पशुपालन और मत्स्यपालन मंत्री और प्रभारी मंत्री श्री लखन सिंह यादव, मुरैना जिला कलेक्टर, प्रियंका दास के साथ, प्रशासन की ओर से इस…

निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर

निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर   ग्वालियर: प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय की सहयोगी संस्था राजयोग एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के मेडिकल विंग के स्थानीय सेवाकेंद्र “प्रभु उपहार भवन, माधवगंज लश्कर ग्वालियर” द्वारा निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर का आयोजन किया गया।शिविर में परामर्श देनें के लिए डॉ. निर्मला कंचन (स्त्री रोग विशेषज्ञ), एवं…

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19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन.

19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन.

19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन. केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र. संस्था के 80 वर्ष कार्यक्रम में वक्तव्य.Read more...

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युवा शिविर का सफल आयोजन.

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21-09-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - संगम पर तुम्हें प्यार का सागर बाप प्यार का ही वर्सा देते हैं, इसलिए तुम सबको प्यार दो, गुस्सा मत करो''

प्रश्नः-

अपने रजिस्टर को ठीक रखने के लिए बाप ने तुम्हें कौन सा रास्ता बताया है?

उत्तर:-

प्यार का ही रास्ता बाप तुम्हें बतलाते हैं, श्रीमत देते हैं बच्चे हर एक के साथ प्यार से चलो। किसी को भी दु:ख नहीं दो। कर्मेन्द्रियों से कभी भी कोई उल्टा कर्म नहीं करो। सदा यही जाँच करो कि मेरे में कोई आसुरी गुण तो नहीं हैं? मूडी तो नहीं हूँ? कोई बात में बिगड़ता तो नहीं हूँ?

गीत:-

यह वक्त जा रहा है........

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत सुना। दिन-प्रतिदिन अपना घर अथवा मंजिल नज़दीक होती जाती है। अब जो कुछ श्रीमत कहती है, उसमें ग़फलत न करो। बाप का डायरेक्शन मिलता है कि सबको मैसेज पहुँचाओ। बच्चे जानते हैं लाखों करोड़ों को यह मैसेज देना है। फिर कोई समय आ भी जायेंगे। जब बहुत हो जायेंगे तो बहुतों को मैसेज देंगे। बाप का मैसेज मिलना तो सबको है। मैसेज है बहुत सहज। सिर्फ बोलो अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो और कोई भी कर्मेन्द्रियों से मन्सा-वाचा-कर्मणा कोई बुरा काम नहीं करना है। पहले मन्सा में आता है तब वाचा में आता है। अभी तुमको राइट-रांग समझने की बुद्धि चाहिए, यह पुण्य का काम है, यह करना चाहिए। दिल में संकल्प आता है गुस्सा करें, अब बुद्धि तो मिली है-अगर गुस्सा करेंगे तो पाप बन जायेगा। बाप को याद करने से पुण्य आत्मा बन जायेंगे। ऐसे नहीं अच्छा अभी हुआ फिर नहीं करेंगे। ऐसे फिर-फिर कहते रहने से आदत पड़ जायेगी। मनुष्य ऐसा कर्म करते हैं तो समझते हैं यह पाप नहीं है। विकार को पाप नहीं समझते हैं। अभी बाप ने बताया है - यह बड़े से बड़ा पाप है, इन पर जीत पाना है और सबको बाप का मैसेज देना है कि बाप कहते हैं मुझे याद करो, मौत सामने खड़ा है। जब कोई मरने पर होते हैं तो उनको कहते हैं - गॉड फादर को याद करो। रिमेम्बर गॉड फादर। वह समझते हैं यह गॉड फादर पास जाते हैं। परन्तु वो लोग यह तो जानते नहीं कि गॉड फादर को याद करने से क्या होगा? कहाँ जायेंगे? आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। गॉड फादर के पास तो कोई जा न सके। तो अब तुम बच्चों को अविनाशी बाप की अविनाशी याद चाहिए। जब तमोप्रधान दु:खी बन जाते हैं तब तो एक-दो को कहते हैं गॉड फादर को याद करो, सब आत्मायें एक-दो को कहती हैं, कहती तो आत्मा है ना। ऐसे नहीं कि परमात्मा कहते हैं। आत्मा, आत्मा को कहती है - बाप को याद करो। यह एक कॉमन रसम है। मरने समय ईश्वर को याद करते हैं। ईश्वर का डर रहता है। समझते हैं अच्छे वा बुरे कर्मों का फल ईश्वर ही देते हैं, बुरा कर्म करेंगे तो ईश्वर धर्मराज द्वारा बहुत सज़ा देंगे इसलिए डर रहता है, बरोबर कर्मों की भोगना तो होती है ना। तुम बच्चे अभी कर्म-अकर्म-विकर्म की गति को समझते हो। जानते हो यह कर्म अकर्म हुआ। याद में रह जो कर्म करते हैं वह अच्छे करते हैं। रावण राज्य में मनुष्य बुरे कर्म ही करते हैं। राम राज्य में बुरा काम कभी होता नहीं। अब श्रीमत तो मिलती रहती है। कहाँ बुलावा होता है, यह करना चाहिए वा नहीं करना चाहिए - हर बात में पूछते रहो। समझो कोई पुलिस की नौकरी करते हैं तो उन्हें भी कहा जाता-तुम पहले प्यार से समझाओ। सच्ची न करे तो बाद में मार। प्यार से समझाने से हाथ आ सकते हैं परन्तु उस प्यार में भी योगबल भरा होगा तो उस प्यार की ताकत से कोई को भी समझाने से समझेंगे, यह तो जैसे ईश्वर समझाते हैं। तुम ईश्वर के बच्चे योगी हो ना। तुम्हारे में भी ईश्वरीय ताकत है। ईश्वर प्यार का सागर है, उनमें ताकत है ना। सबको वर्सा देते हैं। तुम जानते हो स्वर्ग में प्यार बहुत होता है। अभी तुम प्यार का पूरा वर्सा ले रहे हो। लेते-लेते नम्बरवार पुरुषार्थ करते-करते प्यारे बन जायेंगे।

बाप कहते हैं-किसको भी दु:ख नहीं देना है, नहीं तो दु:खी होकर मरेंगे। बाप प्यार का रास्ता बताते हैं। मन्सा में आने से वह शक्ल में भी आ जाता है। कर्मेन्द्रियों से कर लिया तो रजिस्टर खराब हो जायेगा। देवताओं की चाल-चलन का गायन करते हैं ना इसलिए बाबा कहते हैं-देवताओं के पुजारियों को समझाओ। वह महिमा गाते हैं आप सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण हो और अपनी चाल-चलन भी सुनाते हैं। तो उनको समझाओ तुम ऐसे थे, अब नहीं हो फिर होंगे जरूर। तुमको ऐसा देवता बनना है तो अपनी चाल ऐसी रखो, तो तुम यह बन जायेंगे। अपनी जांच करनी है-हम सम्पूर्ण निर्विकारी हैं? हमारे में कोई आसुरी गुण तो नहीं हैं? कोई बात में बिगड़ता तो नहीं हूँ, मूड़ी तो नहीं बनता हूँ? अनके बार तुमने पुरूषार्थ किया है। बाप कहते हैं तुमको ऐसा बनना है। बनाने वाला भी हाज़िर है। कहते हैं कल्प-कल्प तुमको ऐसा बनाता हूँ। कल्प पहले जिन्होंने ज्ञान लिया है वह जरूर आकर लेंगे। पुरूषार्थ भी कराया जाता है और बेफिक्र भी रहते हैं। ड्रामा की नूँध ऐसी है। कोई कहते हैं-ड्रामा में नूँध होगी तो जरूर करेंगे। अच्छा चार्ट होगा तो ड्रामा करायेगा। समझा जाता है - उनकी तकदीर में नहीं है। पहले-पहले भी एक ऐसे बिगड़ा था, तकदीर में नहीं था-बोला ड्रामा में होगा तो ड्रामा हमको पुरूषार्थ करायेगा। बस छोड़ दिया। ऐसे तुमको भी बहुत मिलते हैं। तुम्हारा एम ऑब्जेक्ट तो यह खड़ा है, बैज तो तुम्हारे पास है, जैसे अपना पोतामेल देखते हो तो बैज को भी देखो, अपनी चाल-चलन को भी देखो। कभी भी क्रिमिनल ऑखें न हों। मुख से कोई ईविल बात न निकले। ईविल बोलने वाला ही नहीं होगा तो कान सुनेंगे कैसे? सतयुग में सब दैवीगुण वाले होते हैं। ईविल कोई बात नहीं। इन्होंने भी प्रालब्ध बाप द्वारा ही पाई है। यह तो सबको बोलो बाप को याद करो तो विकर्म विनाश हो जायेंगे। इसमें नुकसान की कोई बात नहीं है। संस्कार आत्मा ले जाती है। सन्यासी होगा तो फिर सन्यास धर्म में आ जायेगा। झाड़ तो उनका बढ़ता रहता है ना। इस समय तुम बदल रहे हो। मनुष्य ही देवता बनते हैं। सब कोई इकट्ठे थोड़ेही आयेंगे। आयेंगे फिर नम्बरवार, ड्रामा में कोई बिगर समय एक्टर थोड़ेही स्टेज पर आ जायेंगे। अन्दर बैठे रहते हैं। जब समय होता है तो बाहर स्टेज़ पर आते हैं पार्ट बजाने। वह है हद का नाटक, यह है बेहद का। बुद्धि में है हम एक्टर्स को अपने समय पर आकर अपना पार्ट बजाना है। यह बेहद का बड़ा झाड़ है। नम्बरवार आते जाते हैं। पहले-पहले एक ही धर्म था सभी धर्म वाले तो पहले-पहले आ न सकें।

पहले तो देवी-देवता धर्म वाले ही आयेंगे पार्ट बजाने, सो भी नम्बरवार। झाड़ के राज़ को भी समझना है। बाप ही आकर सारे कल्प वृक्ष का ज्ञान सुनाते हैं। इनकी भेंट फिर निराकारी झाड़ से होती है। एक बाप ही कहते हैं मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ का बीज मैं हूँ। बीज में झाड़ समाया हुआ नहीं है लेकिन झाड़ का ज्ञान समाया हुआ है। हर एक का अपना-अपना पार्ट है। चैतन्य झाड़ है ना। झाड़ के पत्ते भी नम्बरवार निकलेंगे। इस झाड़ को कोई भी समझते नहीं हैं, इनका बीज ऊपर में है इसलिए इनको उल्टा वृक्ष कहा जाता है। रचयिता बाप है ऊपर में। तुम जानते हो हमको जाना है घर, जहाँ आत्मायें रहती हैं। अभी हमको पवित्र बनकर जाना है। तुम्हारे द्वारा योगबल से सारी विश्व पवित्र हो जाती है। तुम्हारे लिए तो पवित्र सृष्टि चाहिए ना। तुम पवित्र बनते हो तो दुनिया भी पवित्र बनानी पड़े। सब पवित्र हो जाते हैं। तुम्हारी बुद्धि में है, आत्मा में ही मन-बुद्धि है ना। चैतन्य है। आत्मा ही ज्ञान को धारण कर सकती है। तो मीठे-मीठे बच्चों को यह सारा राज़ बुद्धि में होना चाहिए-कैसे हम पुनर्जन्म लेते हैं। 84 का चक्र तुम्हारा पूरा होता है तो सबका पूरा होता है। सब पावन बन जाते हैं। यह अनादि बना हुआ ड्रामा है। एक सेकण्ड भी ठहरता नहीं है। सेकण्ड बाई सेकण्ड जो कुछ होता है, सो फिर कल्प बाद होगा। हर एक आत्मा में अविनाशी पार्ट भरा हुआ है। वह एक्टर्स करके 2-4 घण्टे का पार्ट बजाते हैं। यह तो आत्मा को नैचुरल पार्ट मिला हुआ है तो बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। अतीन्द्रिय सुख अभी संगम का ही गाया हुआ है। बाप आते हैं, 21 जन्मों के लिए हम सदा सुखी बनते हैं। खुशी की बात है ना। जो अच्छी रीति समझते और समझाते हैं वह सर्विस पर लगे रहते हैं। कोई बच्चे खुद ही अगर क्रोधी हैं तो दूसरे में भी प्रवेशता हो जाती है। ताली दो हाथ की बजती है। वहाँ ऐसे नहीं होता। यहाँ तुम बच्चों को शिक्षा मिलती है - कोई क्रोध करे तो तुम उन पर फूल चढ़ाओ। प्यार से समझाओ। यह भी एक भूत है, बहुत नुकसान कर देंगे। क्रोध कभी नहीं करना चाहिए। सिखलाने वाले में तो क्रोध बिल्कुल नहीं होना चाहिए। नम्बरवार पुरुषार्थ करते रहते हैं। किसका तीव्र पुरूषार्थ होता है, किसका ठण्डा। ठण्डे पुरूषार्थ वाले जरूर अपनी बदनामी करेंगे। कोई में क्रोध है तो जहाँ जाते हैं वहाँ से निकाल देते हैं। कोई भी बदचलन वाले रह नहीं सकते। इम्तहान जब पूरा होगा तो सबको पता पड़ेगा। कौन-कौन क्या बनते हैं, सब साक्षात्कार होगा। जो जैसा काम करते हैं, उनकी ऐसी महिमा होती है।

तुम बच्चे ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को जानते हो। तुम सब अन्तर्यामी हो। आत्मा अन्दर में जानती है - यह सृष्टि चक्र कैसे फिरता है। सारे सृष्टि के मनुष्यों की चाल-चलन का, सब धर्मों का तुम्हें ज्ञान है। उनको कहा जायेगा - अन्तर्यामी। आत्मा को सब मालूम पड़ गया। ऐसे नहीं, भगवान घट-घट वासी है, उनको जानने की क्या दरकार है? वो तो अभी भी कहते हैं जो जैसा पुरुषार्थ करेंगे ऐसा फल पायेंगे। मुझे जानने की क्या दरकार है। जो करता है उसकी सज़ा भी खुद पायेंगे। ऐसी चलन चलेंगे तो अधम गति को पायेंगे। पद बहुत कम हो जायेगा, उस स्कूल में तो नापास हो जाते हैं तो फिर दूसरे वर्ष पढ़ते हैं। यह पढ़ाई तो होती है कल्प-कल्पान्तर के लिए। अब न पढ़े तो कल्प-कल्पान्तर नहीं पढ़ेंगे। ईश्वरीय लॉटरी तो पूरी लेनी चाहिए ना। यह बातें तुम बच्चे समझ सकते हो। जब भारत सुखधाम होगा तब बाकी सब शान्तिधाम में होंगे। बच्चों को खुशी होनी चाहिए-अब हमारे सुख के दिन आते हैं। दीपमाला के दिन नज़दीक होते हैं तो कहते हैं ना बाकी इतने दिन हैं फिर नये कपड़े पहनेंगे। तुम भी कहते हो स्वर्ग आ रहा है, हम अपना श्रृंगार करें तो फिर स्वर्ग में अच्छा सुख पायेंगे। साहूकार को तो साहूकारी का नशा रहता है। मनुष्य बिल्कुल घोर नींद में हैं फिर अचानक पता पड़ेगा-यह तो सच कहते थे। सच को तब समझें जब सच का संग हो। तुम अभी सच के संग में हो। तुम सत बनते हो सत बाप द्वारा। वह सब असत्य बनते हैं, असत्य द्वारा। अभी कान्ट्रास्ट भी छपा रहे हैं कि भगवान क्या कहते हैं और मनुष्य क्या कहते हैं। मैगजीन में भी डाल सकते हो। आखरीन विजय तो तुम्हारी ही है, जिन्होंने कल्प पहले पद पाया है वह जरूर पायेंगे। यह सरटेन है। वहाँ अकाले मृत्यु होता नहीं। आयु भी बड़ी होती है। जब पवित्रता थी तो बड़ी आयु थी। पतित-पावन परमात्मा बाप है तो जरूर उसने ही पावन बनाया होगा। कृष्ण की बात शोभती नहीं। पुरूषोत्तम संगमयुग पर कृष्ण फिर कहाँ से आयेगा। वही फीचर्स वाला मनुष्य तो फिर होता नहीं। 84 जन्म, 84 फीचर्स, 84 एक्टिविटी-यह बना-बनाया खेल है। उसमें फ़र्क नहीं पड़ सकता। ड्रामा कैसा वन्डरफुल बना हुआ है। आत्मा छोटी बिन्दी है, उसमें अनादि पार्ट भरा हुआ है - इसको कुदरत कहा जाता है। मनुष्य सुनकर वन्डर खायेंगे। परन्तु पहले तो यह पैगाम देना है कि बाप को याद करो। वही पतित-पावन है, सर्व का सद्गति दाता है। सतयुग में दु:ख की बात होती नहीं। कलियुग में तो कितना दु:ख है। परन्तु यह बातें समझने वाले नम्बरवार हैं। बाप तो रोज़ समझाते रहते हैं। तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा आया हुआ है हमको पढ़ाने, फिर साथ ले जायेंगे। साथ में रहने वालों से भी बांधेलियाँ ज्यादा याद करती हैं। वह ऊंच पद पा सकती हैं। यह भी समझ की बात है ना। बाबा की याद में बहुत तड़फती हैं। बाप कहते हैं बच्चे याद की यात्रा में रहो, दैवीगुण भी धारण करो तो बन्धन कटते जायेंगे। पाप का घड़ा खत्म हो जायेगा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रुहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपनी चाल-चलन देवताओं जैसी बनानी है। कोई भी ईविल बोल मुख से नहीं बोलने हैं। यह आंखें कभी क्रिमिनल न हों।

2) क्रोध का भूत बहुत नुकसान करता है। ताली दो हाथ से बजती है इसलिए कोई क्रोध करे तो किनारा कर लेना है, उन्हें प्यार से समझाना है।

वरदान:-

अव्यक्त स्वरूप की साधना द्वारा पावरफुल वायुमण्डल बनाने वाले अव्यक्त फरिश्ता भव

वायुमण्डल को पावरफुल बनाने का साधन है अपने अव्यक्त स्वरूप की साधना। इसका बार-बार अटेन्शन रहे क्योंकि जिस बात की साधना की जाती है उसी बात का ध्यान रहता है। तो अव्यक्त स्वरूप की साधना अर्थात् बार-बार अटेन्शन की तपस्या चाहिए इसलिए अव्यक्त फरिश्ता भव के वरदान को स्मृति में रख शक्तिशाली वायुमण्डल बनाने की तपस्या करो तो आपके सामने जो भी आयेगा वह व्यक्त और व्यर्थ बातों से परे हो जायेगा।

स्लोगन:-

सर्व शक्तिमान् बाप को प्रत्यक्ष करने के लिए एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाओ।

 

 


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बोध कथा-

विचार की पवित्रता

एक राजा और नगर सेठ में गहरी मित्रता थी। वे रोज एक दूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे। नगर सेठ चंदन की लकड़ी का व्यापार करता था। एक दिन उसके मुनीम ने बताया कि लकड़ी की बिक्री कम हो गई है। तत्काल सेठ के मन में यह विचार कौंधा कि अगर राजा की मृत्यु हो जाए, तो मंत्रिगण चंदन की लकडि़यां उसी से खरीदेंगे। उसे कुछ तो मुनाफा होगा। शाम को सेठ हमेशा की तरह राजा से मिलने गया। उसे देख राजा ने सोचा कि इस नगर सेठ ने उससे दोस्ती करके न जाने कितनी दौलत जमा कर ली है, ऐसा कोई नियम बनाना होगा जिससे इसका सारा धन राज खजाने में जमा हो जाए।
दोनों इसी तरह मिलते रहे, लेकिन पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। एक दिन नगर सेठ ने पूछ ही लिया, ‘पिछले कुछ दिनों से हमारे रिश्तों में एक ठंडापन आ गया है। ऐसा क्यों?’ राजा ने कहा, ‘मुझे भी ऐसा लग रहा है। चलो, नगर के बाहर जो महात्मा रहते हैं, उनसे इसका हल पूछा जाए।’ उन्होंने महात्मा को सब कुछ बताया। महात्मा ने कहा, ‘सीधी सी बात है। आप दोनों पहले शुद्ध भाव से मिलते रहे होंगे, पर अब संभवत: एक दूसरे के प्रति आप लोगों के मन में कुछ बुरे विचार आ गए हैं इसलिए मित्रता में पहले जैसा सुख नहीं रह गया।’ नगर सेठ और राजा ने अपने-अपने मन की बातें कह सुनाईं। महात्मा ने सेठ से कहा,’ तुमने ऐसा क्यों नहीं सोचा कि राजा के मन में चंदन की लकड़ी का आलीशान महल बनवाने की बात आ जाए? इससे तुम्हारा चंदन भी बिक जाता। विचार की पवित्रता से ही संबंधों में मिठास आती है। तुमने राजा के लिए गलत सोचा इसलिए राजा के मन में भी तुम्हारे लिए अनुचित विचार आया। गलत सोच ने दोनों के बीच दूरी बढ़ा दी। अब तुम दोनों प्रायश्चित करके अपना मन शुद्ध कर लो, तो पहले जैसा सुख फिर से मिलने लगेगा।’ 5  

07-08-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - श्रीमत पर चल सबको मुक्ति-जीवनमुक्ति पाने का रास्ता बताओ, सारा दिन यही धन्धा करते रहो''

प्रश्नः-

बाप ने कौन-सी सूक्ष्म बातें सुनाई हैं जो बहुत समझने की हैं?

उत्तर:-

सतयुग अमरलोक है, वहाँ आत्मा एक चोला बदल दूसरा लेती है लेकिन मृत्यु का नाम नहीं इसलिए उसे मृत्युलोक नहीं कहा जाता। 2. शिवबाबा की बेहद रचना है, ब्रह्मा की रचना इस समय सिर्फ तुम ब्राह्मण हो। त्रिमूर्ति शिव कहेंगे, त्रिमूर्ति ब्रह्मा नहीं। यह सब बहुत सूक्ष्म बातें बाप ने सुनाई हैं। ऐसी-ऐसी बातों पर विचार कर बुद्धि के लिए स्वयं ही भोजन तैयार करना है।

ओम् शान्ति। त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। अब वो लोग त्रिमूर्ति ब्रह्मा कहते हैं। बाप कहते हैं - त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। त्रिमूर्ति ब्रह्मा भगवानुवाच नहीं कहते। तुम त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच कह सकते हो। वो लोग तो शिव-शंकर कह मिला देते हैं। यह तो सीधा है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा के बदले त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। मनुष्य तो कह देते - शंकर आंख खोलते हैं तो विनाश हो जाता है। यह सब बुद्धि से काम लिया जाता है। तीन का ही मुख्य पार्ट है। ब्रह्मा और विष्णु का तो बड़ा पार्ट है 84 जन्मों का। विष्णु का और प्रजापिता ब्रह्मा का अर्थ भी समझा है, पार्ट है इन तीन का। ब्रह्मा का तो नाम गाया हुआ है आदि देव, एडम। प्रजापिता का मन्दिर भी है। यह है विष्णु का अथवा कृष्ण का अन्तिम 84 वां जन्म, जिसका नाम ब्रह्मा रखा है। सिद्ध तो करना ही है - ब्रह्मा और विष्णु। अब ब्रह्मा को तो एडाप्टेड कहेंगे। यह दोनों बच्चे हैं शिव के। वास्तव में बच्चा एक है। हिसाब करेंगे तो ब्रह्मा है शिव का बच्चा। बाप और दादा। विष्णु का नाम ही नहीं आता। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा स्थापना कर रहे हैं। विष्णु द्वारा स्थापना नहीं कराते। शिव के भी बच्चे हैं, ब्रह्मा के भी बच्चे हैं। विष्णु के बच्चे नहीं कह सकते। न लक्ष्मी-नारायण को ही बहुत बच्चे हो सकते हैं। यह है बुद्धि के लिए भोजन। आपेही भोजन बनाना चाहिए। सबसे जास्ती पार्ट कहेंगे विष्णु का। 84 जन्मों का विराट रूप भी विष्णु का दिखाते हैं, न कि ब्रह्मा का। विराट रूप विष्णु का ही बनाते हैं क्योंकि पहले-पहले प्रजापिता ब्रह्मा का नाम धरते हैं। ब्रह्मा का तो बहुत थोड़ा पार्ट है इसलिए विराट रूप विष्णु का दिखाते हैं। चतुर्भुज भी विष्णु का बना देते। वास्तव में यह अलंकार तो तुम्हारे हैं। यह भी बड़ी समझने की बातें हैं। कोई मनुष्य समझा न सके। बाप नये-नये तरीके से समझाते रहते हैं। बाप कहते हैं त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच राइट है ना। विष्णु, ब्रह्मा और शिव। इसमें भी प्रजापिता ब्रह्मा ही बच्चा है। विष्णु को बच्चा नहीं कहेंगे। भल क्रियेशन कहते हैं परन्तु रचना तो ब्रह्मा की होगी ना। जो फिर भिन्न नाम रूप लेती है। मुख्य पार्ट तो उनका है। ब्रह्मा का पार्ट भी बहुत थोड़ा है इस समय का। विष्णु का कितना समय राज्य है! सारे झाड़ का बीज रूप है शिवबाबा। उनकी रचना को सालिग्राम कहेंगे। ब्रह्मा की रचना को ब्राह्मण-ब्राह्मणियां कहेंगे। अब जितनी शिव की रचना है उतनी ब्रह्मा की नहीं। शिव की रचना तो बहुत है। सभी आत्मायें उनकी औलाद हैं। ब्रह्मा की रचना तो सिर्फ तुम ब्राह्मण ही बनते हो। हद में आ गये ना। शिवबाबा की है बेहद की रचना - सभी आत्मायें। बेहद की आत्माओं का कल्याण करते हैं। ब्रह्मा द्वारा स्वर्ग की स्थापना करते हैं। तुम ब्राह्मण ही जाकर स्वर्गवासी बनेंगे। और तो कोई को स्वर्गवासी नहीं कहेंगे, निर्वाणवासी अथवा शान्तिधाम वासी तो सब बनते हैं। सबसे ऊंच सर्विस शिवबाबा की होती है। सभी आत्माओं को ले जाते हैं। सभी का पार्ट अलग-अलग है। शिवबाबा भी कहते हैं मेरा पार्ट अलग है। सबका हिसाब-किताब चुक्तू कराए तुमको पतित से पावन बनाए ले जाता हूँ। तुम यहाँ मेहनत कर रहे हो पावन बनने के लिए। दूसरे सब कयामत के समय हिसाब-किताब चुक्तू कर जायेंगे। फिर मुक्तिधाम में बैठे रहेंगे। सृष्टि का चक्र तो फिरना है।

तुम बच्चे ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण बन फिर देवता बन जाते हो। तुम ब्राह्मण श्रीमत पर सेवा करते हो। सिर्फ मनुष्यों को रास्ता बताते हो - मुक्ति और जीवनमुक्ति को पाना है तो ऐसे पा सकते हो। दोनों चाबी हाथ में हैं। यह भी जानते हो कौन-कौन मुक्ति में, कौन-कौन जीवनमुक्ति में जायेंगे। तुम्हारा सारा दिन यही धंधा है। कोई अनाज आदि का धन्धा करते हैं तो बुद्धि में सारा दिन वही रहता है। तुम्हारा धन्धा है रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानना और किसको मुक्ति-जीवनमुक्ति का रास्ता बताना। जो इस धर्म के होंगे वह निकल आयेंगे। ऐसे बहुत धर्म के हैं जो बदल नहीं सकते। ऐसे नहीं कि फीचर्स बदल जाते हैं। सिर्फ धर्म को मान लेते हैं। कई बौद्ध धर्म को मानते हैं क्योंकि देवी-देवता धर्म तो प्राय: लोप है ना। एक भी ऐसा नहीं जो कहे हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हैं। देवताओं के चित्र काम में आते हैं, आत्मा तो अविनाशी है, वह कभी मरती नहीं। एक शरीर छोड़ फिर दूसरा लेकर पार्ट बजाती है। उनको मृत्युलोक नहीं कहा जाता। वह है ही अमरलोक। चोला सिर्फ बदलती है। यह बातें बड़ी सूक्ष्म समझने की हैं। मुट्टा (थोक अथवा सारा) नहीं है। जैसे शादी होती है तो किनको रेज़गारी, किनको मुट्टा देते हैं। कोई सब दिखाकर देते हैं, कोई बन्द पेटी ही देते हैं। किस्म-किस्म के होते हैं। तुमको तो वर्सा मिलता है मुट्टा, क्योंकि तुम सब ब्राइड्स हो। बाप है ब्राइडग्रुम। तुम बच्चों को श्रृंगार कर विश्व की बादशाही मुट्टे में देते हैं। विश्व का मालिक तुम बनते हो।

मुख्य बात है याद की। ज्ञान तो बहुत सहज है। भल है तो सिर्फ अल्फ को याद करना। परन्तु विचार किया जाता है याद ही झट खिसक जाती है। बहुत करके कहते हैं बाबा याद भूल जाती है। तुम किसको भी समझाओ तो हमेशा याद अक्षर बोलो। योग अक्षर रांग है। टीचर को स्टूडेन्ट की याद रहती है। फादर है सुप्रीम सोल। तुम आत्मा सुप्रीम नहीं हो। तुम हो पतित। अब बाप को याद करो। टीचर को, बाप को, गुरू को याद किया जाता है। गुरू लोग बैठ शास्त्र सुनायेंगे, मंत्र देंगे। बाबा का मंत्र एक ही है - मनमनाभव। फिर क्या होगा? मध्याजी भव। तुम विष्णुपुरी में चले जायेंगे। तुम सब तो राजा-रानी नहीं बनेंगे। राजा-रानी और प्रजा होती है। तो मुख्य है त्रिमूर्ति। शिवबाबा के बाद है ब्रह्मा जो फिर मनुष्य सृष्टि अर्थात् ब्राह्मण रचते हैं। ब्राह्मणों को बैठ फिर पढ़ाते हैं। यह नई बात है ना। तुम ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ बहन-भाई ठहरे। बुढ़े भी कहेंगे हम भाई-बहन हैं। यह अन्दर में समझना है। किसको फालतू ऐसे कहना नहीं है। भगवान ने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रची तो भाई-बहन हुए ना। जबकि एक प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे हैं, यह समझने की बातें हैं। तुम बच्चों को तो बड़ी खुशी होनी चाहिए - हमको पढ़ाते कौन हैं? शिवबाबा। त्रिमूर्ति शिव। ब्रह्मा का भी बहुत थोड़ा समय पार्ट है। विष्णु का सतयुगी राजधानी में 8 जन्म पार्ट चलता है। ब्रह्मा का तो एक ही जन्म का पार्ट है। विष्णु का पार्ट बड़ा कहेंगे। त्रिमूर्ति शिव है मुख्य। फिर आता है ब्रह्मा का पार्ट जो तुम बच्चों को विष्णुपुरी का मालिक बनाते हैं। ब्रह्मा से ब्राह्मण सो फिर देवता बनते हैं। तो यह हो गया अलौकिक फादर। थोड़ा समय यह फादर है जिसको अब मानते हैं। आदि देव, आदम और बीबी। इनके बिगर सृष्टि कैसे रचेंगे। आदि देव और आदि देवी है ना। ब्रह्मा का पार्ट भी सिर्फ संगम समय का है। देवताओं का पार्ट तो फिर भी बहुत चलता है। देवतायें भी सिर्फ सतयुग में कहेंगे। त्रेता में क्षत्रिय कहा जाता। यह बड़ी गुह्य-गुह्य प्वाइंट्स मिलती हैं। सब तो एक ही समय वर्णन नहीं कर सकते। वह त्रिमूर्ति ब्रह्मा कहते हैं। शिव को उड़ा दिया है। हम फिर त्रिमूर्ति शिव कहते हैं। यह चित्र आदि सब हैं भक्ति मार्ग के। प्रजा रचते हैं ब्रह्मा द्वारा फिर तुम देवता बनते हो। विनाश के समय नैचुरल कैलेमिटीज भी आती है। विनाश तो होना ही है, कलियुग के बाद फिर सतयुग होगा। इतने सब शरीरों का विनाश तो होना ही है। सब कुछ प्रैक्टिकल में चाहिए ना। सिर्फ आंख खोलने से थोड़ेही हो सकता। जब स्वर्ग गुम होता है तो उस समय भी अर्थक्वेक आदि होती हैं। तो क्या उस समय भी शंकर आंख ऐसे मीचते हैं। गाते हैं ना द्वारिका अथवा लंका पानी के नीचे चली गई।

अब बाप समझाते हैं - मैं आया हूँ पत्थरबुद्धियों को पारसबुद्धि बनाने। मनुष्य पुकारते हैं - हे पतित-पावन आओ, आकर पावन दुनिया बनाओ। परन्तु यह नहीं समझते हैं कि अभी कलियुग है इसके बाद सतयुग आयेगा। तुम बच्चों को खुशी में नाचना चाहिए। बैरिस्टर आदि इम्तहान पास करते हैं तो अन्दर में ख्याल करते हैं ना - हम पैसे कमायेंगे, फिर मकान बनायेंगे। यह करेंगे। तो तुम अभी सच्ची कमाई कर रहे हो। स्वर्ग में तुमको सब कुछ नया माल मिलेगा। ख्याल करो सोमनाथ का मन्दिर क्या था! एक मन्दिर तो नहीं होगा। उस मन्दिर को 2500 वर्ष हुआ। बनाने में टाइम तो लगा होगा। पूजा की होगी उसके बाद फिर वह लूटकर ले गये। फौरन तो नहीं आये होंगे। बहुत मन्दिर होंगे। पूजा के लिए बैठ मन्दिर बनाये हैं। अभी तुम जानते हो बाप को याद करते-करते हम गोल्डन एज में चले जायेंगे। आत्मा पवित्र बन जायेगी। मेहनत करनी पड़ती है। मेहनत बिगर काम नहीं चलेगा। गाया भी जाता है - सेकेण्ड में जीवनमुक्ति। परन्तु ऐसे थोड़ेही मिल जाती है, यह समझा जाता है - बच्चे बनेंगे तो मिलेगी जरूर। तुम अभी मेहनत कर रहे हो मुक्तिधाम में जाने के लिए। बाप की याद में रहना पड़ता है। दिन-प्रतिदिन बाप तुम बच्चों को रिफाइन बुद्धि बनाते हैं। बाप कहते हैं तुमको बहुत-बहुत गुह्य बातें सुनाता हूँ। आगे थोड़ेही यह सुनाया था कि आत्मा भी बिन्दी है, परमात्मा भी बिन्दी है। कहेंगे पहले क्यों नहीं यह बताया। ड्रामा में नहीं था। पहले ही तुमको यह सुनायें तो तुम समझ न सको। धीरे-धीरे समझाते रहते हैं। यह है रावण राज्य। रावण राज्य में सब देह-अभिमानी बन जाते हैं। सतयुग में होते हैं आत्म-अभिमानी। अपने को आत्मा जानते हैं। हमारा शरीर बड़ा हुआ है, अब यह छोड़कर फिर छोटा लेना है। आत्मा का शरीर पहले छोटा होता है फिर बड़ा होता है। यहाँ तो कोई की कितनी आयु, कोई की कितनी। कोई की अकाले मृत्यु हो जाती है। कोई-कोई की 125 वर्ष की भी आयु होती है। तो बाप समझाते हैं तुमको खुशी बहुत होनी चाहिए - बाप से वर्सा लेने की। गन्धर्वी विवाह किया यह कोई खुशी की बात नहीं, यह तो कमज़ोरी है। कुमारी अगर कहे हम पवित्र रहना चाहते हैं तो कोई मार थोड़ेही सकते हैं। ज्ञान कम है तो डरते हैं। छोटी कुमारी को भी अगर कोई मारे, खून आदि निकले तो पुलिस में रिपोर्ट करे तो उसकी भी सज़ा मिल सकती है। जानवर को भी अगर कोई मारते हैं तो उन पर केस होता है, दण्ड पड़ता है। तुम बच्चों को भी मार नहीं सकते। कुमार को भी मार नहीं सकते। वह तो अपना कमा सकते हैं। शरीर निर्वाह कर सकते हैं। पेट कोई जास्ती नहीं खाता है - एक मनुष्य का पेट 4-5 रूपया, एक मनुष्य का पेट 400-500 रूपया। पैसा बहुत है तो हबच हो जाती है। गरीबों को पैसे ही नहीं तो हबच भी नहीं। वह सूखी रोटी में ही खुश होते हैं। बच्चों को जास्ती खान-पान के हंगामें में भी नहीं जाना चाहिए। खाने का शौक नहीं रहना चाहिए।

तुम जानते हो वहाँ हमें क्या नहीं मिलेगा! बेहद की बादशाही, बेहद का सुख मिलता है। वहाँ कोई बीमारी आदि होती नहीं। हेल्थ वेल्थ हैप्पीनेस सब रहता है। बुढ़ापा भी वहाँ बहुत अच्छा रहता। खुशी रहती है। कोई प्रकार की तकलीफ नहीं रहती है। प्रजा भी ऐसी बनती है। परन्तु ऐसे भी नहीं - अच्छा, प्रजा तो प्रजा ही सही। फिर तो ऐसे होंगे जैसे यहाँ के भील। सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण बनना है तो फिर इतना पुरूषार्थ करना चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) हम ब्रह्मा की नई रचना आपस में भाई-बहन हैं, यह अन्दर समझना है किसी को कहने की दरकार नहीं। सदा इसी खुशी में रहना है कि हमें शिवबाबा पढ़ाते हैं।

2) खान-पान के हंगामें में जास्ती नहीं जाना है। हबच (लालच) छोड़ बेहद बादशाही के सुखों को याद करना है।

वरदान:-

माया के सम्बन्धों को डायवोर्स दे बाप के सम्बन्ध से सौदा करने वाले मायाजीत, मोहजीत भव

अब स्मृति से पुराना सौदा कैन्सिल कर सिंगल बनो। आपस में एक दो के सहयोगी भल रहो लेकिन कम्पेनियन नहीं। कम्पेनियन एक को बनाओ तो माया के सम्बन्धों से डायवोर्स हो जायेगा। मायाजीत, मोहजीत विजयी रहेंगे। अगर जरा भी किसी में मोह होगा तो तीव्र पुरूषार्थी के बजाए पुरूषार्थी बन जायेंगे इसलिए क्या भी हो, कुछ भी हो खुशी में नाचते रहो, मिरूआ मौत मलूका शिकार - इसको कहते हैं नष्टोमोहा। ऐसा नष्टोमोहा रहने वाले ही विजय माला के दाने बनते हैं।

स्लोगन:-

सत्यता की विशेषता से डायमण्ड की चमक को बढ़ाओ।

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07-03-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा”मधुबन


“मीठे बच्चे-तुम्हें अपने योगबल से सारी सृष्टि को पावन बनाना है, तुम योगबल से ही माया पर जीत पाकर जगतजीत बन सकते हो"

प्रश्न:

बाप का पार्ट क्या है, उस पार्ट को तुम बच्चों ने किस आधार पर जाना है

उत्तर:

बाप का पार्ट है-सबके दु:ख हरकर सुख देना, रावण की जंजीरों से छुड़ाना। जब बाप आते हैं तो भक्ति की रात पूरी होती है। बाप तुम्हें स्वयं अपना और अपनी जायदाद का परिचय देते हैं। तुम एक बाप को जानने से ही सब कुछ जान जाते हो।

गीत:-

तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो......

ओम् शान्ति।

बच्चों ने ओम् शान्ति का अर्थ समझा है, बाप ने समझाया है हम आत्मा हैं, इस सृष्टि ड्रामा के अन्दर हमारा मुख्य पार्ट है। किसका पार्ट है? आत्मा शरीर धारण कर पार्ट बजाती है। तो बच्चों को अब आत्म-अभिमानी बना रहे हैं। इतना समय देह-अभिमानी थे। अब अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है। हमारा बाबा आया हुआ है ड्रामा प्लैन अनुसार। बाप आते भी हैं रात्रि में। कब आते हैं-उसकी तिथि-तारीख कोई नहीं है। तिथि-तारीख उनकी होती है जो लौकिक जन्म लेते हैं। यह तो है पारलौकिक बाप। इनका लौकिक जन्म नहीं है। कृष्ण की तिथि, तारीख, समय आदि सब देते हैं। इनका तो कहा जाता है दिव्य जन्म। बाप इनमें प्रवेश कर बताते हैं कि यह बेहद का ड्रामा है। उसमें आधाकल्प है रात। जब रात अर्थात् घोर अन्धियारा होता है तब मैं आता हूँ। तिथि-तारीख कोई नहीं। इस समय भक्ति भी तमोप्रधान है। आधा कल्प है बेहद का दिन । बाप खुद कहते हैं मैंने इनमें प्रवेश किया है। गीता में है भगवानुवाच, परन्तु भगवान मनुष्य हो नहीं सकता। कृष्ण भी दैवी गुणों वाला है। यह मनुष्य लोक है। यह देव लोक नहीं है। गाते भी हैं ब्रह्मा देवताए नमः...... वह है सूक्ष्मवतनवासी। बच्चे जानते हैं वहाँ हड्डी-मास नहीं होता है। वह है सूक्ष्म सफेद छाया। जब मूलवतन में है तो आत्मा को न सूक्ष्म शरीर छाया वाला है, न हड्डी वाला है। इन बातों को कोई भी मनुष्य मात्र नहीं जानते हैं। बाप ही आकर सुनाते हैं, ब्राह्मण ही सुनते हैं, और कोई नहीं सुनते। ब्राह्मण वर्ण होता ही है भारत में, वह भी तब होता है जब परमपिता परमात्मा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण धर्म की स्थापना करते हैं। अब इनको रचता भी नहीं कहेंगे। नई रचना कोई रचते नहीं हैं। सिर्फ रिज्युवनेट करते हैं। बुलाते भी हैं - हे बाबा, पतित दुनिया में आकर हमको पावन बनाओ। अभी तुमको पावन बना रहे हैं। तुम फिर योगबल से इस सृष्टि को पावन बना रहे हो। माया पर तुम जीत पाकर जगत जीत बनते हो। योगबल को साइंस बल भी कहा जाता है। ऋषि-मुनि आदि सब शान्ति चाहते हैं परन्तु शान्ति का अर्थ तो जानते नहीं। यहाँ तो जरूर पार्ट बजाना है ना। शान्तिधाम है स्वीट साइलेन्स होम। तुम आत्माओं को अब यह मालूम है कि हमारा घर शान्तिधाम है। यहाँ हम पार्ट बजाने आये हैं। बाप को भी बुलाते हैं-हे पतित-पावन, दु:ख हर्ता, सुख कर्ता आओ, हमको इस रावण की जंजीरों से छुड़ाओ। भक्ति है रात, ज्ञान है दिन। रात मुर्दाबाद होती है फिर ज्ञान जिंदाबाद होता है। यह खेल है सुख और दुःख का। तुम जानते हो पहले हम स्वर्ग में थे फिर उतरते-उतरते आकर नीचे हेल में पड़े हैं। कलियुग कब खलास होगा फिर सतयुग कब आयेगा, यह कोई नहीं जानते। तुम बाप को जानने से बाप द्वारा सब कुछ जान गये हो। मनुष्य भगवान को ढूँढने के लिए कितना धक्का खाते हैं। बाप को जानते ही नहीं। जानें तब जब बाप आकर अपना और जायदाद का परिचय दें। वर्सा बाप से ही मिलता है, माँ से नहीं। इनको मम्मा भी कहते हैं, परन्तु इनसे वर्सा नहीं मिलता है, इनको याद भी नहीं करना है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी शिव के बच्चे हैं - यह भी कोई नहीं जानते। बेहद की सारी दुनिया का रचयिता एक ही बाप है। बाकी सब हैं उनकी रचना या हद के रचयिता। अब तुम बच्चों को बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हों। मनुष्य बाप को नहीं जानते हैं तो किसको याद करें? इसलिए बाप कहते हैं कितने निधनके बन पड़े हैं। यह भी ड्रामा में गूंध है। भक्ति और ज्ञान दोनों में सबसे श्रेष्ठ कर्म है-दान करना। भक्ति मार्ग में ईश्वर अर्थ दान करते हैं। किसलिए? कोई कामना तो जरूर रहती है। समझते हैं जैसा कर्म करेंगे वैसा फल दूसरे जन्म में पायेंगे, इस जन्म में जो करेंगे उसका फल दूसरे जन्म में पायेंगे। जन्म-जन्मान्तर नहीं पायेंगे। एक जन्म के लिए फल मिलता है। सबसे अच्छे ते अच्छा कर्म होता है दान। दानी को पुण्यात्मा कहा जाता है। भारत को महादानी कहा जाता है। भारत में जितना दान होता है उतना और कोई खण्ड में नहीं। बाप भी आकर बच्चों को दान करते हैं, बच्चे फिर बाप को दान करते हैं। कहते हैं बाबा आप आयेंगे तो हम अपना तन-मन-धन सब आपके हवाले कर देंगे। आप बिगर हमारा कोई नहीं। बाप भी कहते हैं मेरे लिए तुम बच्चे ही हो। मुझे कहते ही हैं हेविनली गॉड फादर अर्थात् स्वर्ग की स्थापना करने वाला। मैं आकर तुमको स्वर्ग की बादशाही देता हूँ। बच्चे मेरे अर्थ सब कुछ दे देते हैं - बाबा सब कुछ आपका है। भक्ति मार्ग में भी कहते थे-बाबा, यह सब कुछ आपका दिया हुआ है। फिर वह चला जाता है तो दुःखी हो जाते हैं। वह है भक्ति का अल्पकाल का सुख। बाप समझाते हैं भक्ति मार्ग में तुम मुझे दान-पुण्य करते हो इनडायरेक्ट । उसका फल तो तुमको मिलता रहता है। अब इस समय मैं तुमको कर्मअकर्म-विकर्म का राज़ बैठ समझाता हूँ। भक्ति मार्ग में तुम जैसे कर्म करते हो उसका अल्पकाल सुख भी मेरे द्वारा तुमको मिलता है। इन बातों का दुनिया में किसको पता नहीं है। बाप ही आकर कर्मों की गति समझाते हैं। सतयुग में कभी कोई बुरा कर्म करते ही नहीं। सदैव सुख ही सुख है। याद भी करते हैं सुखधाम, स्वर्ग को। अभी बैठे हैं नर्क में। फिर भी कह देते–फलाना स्वर्ग पधारा। आत्मा को स्वर्ग कितना अच्छा लगता है। आत्मा ही कहती है ना–फलाना स्वर्ग पधारा। परन्तु तमोप्रधान होने के कारण उनको कुछ पता नहीं पड़ता है कि स्वर्ग क्या, नर्क क्या है? बेहद का बाप कहते हैं तुम सब कितने तमोप्रधान बन गये हो। ड्रामा को तो जानते नहीं। समझते भी हैं कि सृष्टि का चक्र फिरता है तो जरूर हूबहू फिरेगा ना। वह सिर्फ कहने मात्र कह देते हैं। अभी यह है संगमयुग। इस एक ही संगमयुग का गायन है। आधाकल्प देवताओं का राज्य चलता है फिर वह राज्य कहाँ चला जाता, कौन जीत लेते हैं? यह भी किसको पता नहीं। बाप कहते हैं रावण जीत लेता है। उन्होंने फिर देवताओं और असुरों की लड़ाई बैठ दिखाई है। अब बाप समझाते हैं-5 विकारों रूपी रावण से हारते हैं फिर जीत भी पाते हैं रावण पर। तुम तो पूज्य थे फिर पुजारी पतित बन जाते हो तो रावण से हारे ना। यह तुम्हारा दुश्मन होने के कारण तुम सदैव जलाते आये हो। परन्तु तुमको पता नहीं है। अब बाप समझाते हैं रावण के कारण तुम पतित बने हो। इन विकारों को ही माया कहा जाता है। माया जीत, जगत जीत। यह रावण सबसे पुराना दुश्मन है। अभी श्रीमत से तुम इन 5 विकारों पर जीत पाते हो। बाप आये हैं जीत पहनाने। यह खेल है ना। माया ते हारे हार, माया ते जीते जीत। जीत बाप ही पहनाते हैं इसलिए इनको सर्वशक्तिमान कहा जाता है। रावण भी कम शक्तिमान नहीं है। परन्तु वह दुःख देते हैं इसलिए गायन नहीं है। रावण है बहुत दुश्तर। तुम्हारी राजाई ही छीन लेते हैं। अभी तुम समझ गये हो– हम कैसे हारते हैं फिर कैसे जीत पाते हैं? आत्मा चाहती भी है हमको शान्ति चाहिए। हम अपने घर जावें। भक्त भगवान को याद करते हैं परन्तु पत्थरबुद्धि होने कारण समझते नहीं हैं। भगवान बाबा है, तो बाप से जरूर वर्सा मिलता होगा। मिलता भी जरूर है परन्तु कब मिलता है फिर कैसे गँवाते हैं, यह नहीं जानते हैं। बाप कहते हैं मैं इस ब्रह्मा तन द्वारा तुमको बैठ समझाता हूँ। मुझे भी आरगन्स चाहिए ना। मुझे अपनी कर्मेन्द्रियां तो हैं नहीं। सूक्ष्मवतन में भी कर्मेन्द्रियां हैं। चलते फिरते जैसे मूवी बाइसकोप होता है, यह मूवी टॉकी बाइसकोप निकले हैं तो बाप को भी समझाने में सहज होता है। उन्हों का है बाहुबल, तुम्हारा है योगबल। वह दो भाई भी अगर आपस में मिल जाएं तो विश्व पर राज्य कर सकते हैं। परन्तु अभी तो फूट पड़ी हुई है। तुम बच्चों को साइलेन्स का शुद्ध घमण्ड रहना चाहिए। तुम मनमनाभव के आधार से साइलेन्स द्वारा जगतजीत बन जाते हो। वह है साइंस घमण्डी। तुम साइलेन्स घमण्डी अपने को
आत्मा समझ बाप को याद करते हो। याद से तुम सतोप्रधान बन जायेंगे। बहुत सहज उपाय बताते हैं। तुम जानते हो शिवबाबा आये हैं हम बच्चों को फिर से स्वर्ग का वर्सा देने। तुम्हारा जो भी कलियुगी कर्मबन्धन है, बाप कहते हैं उनको भूल जाओ। 5 विकार भी मुझे दान में दे दो। तुम जो मेरा-मेरा करते आये हो, मेरा पति, मेरा फलाना, यह सब भूलते जाओ। सब देखते हुए भी उनसे ममत्व मिटा दो। यह बात बच्चों को ही समझाते हैं। जो बाप को जानते ही नहीं, वह तो इस भाषा को भी समझ न सकें। बाप आकर मनुष्य से देवता बनाते हैं। देवतायें होते ही सतयुग में हैं। कलियुग में होते हैं मनुष्य। अभी तक उनकी निशानियां हैं अर्थात् चित्र हैं। मुझे कहते ही हैं पतित-पावन । मैं तो डिग्रेड होता नहीं हूँ। तुम कहते हो हम पावन थे फिर डिग्रेड हो पतित बने हैं। अब आप आकर पावन बनाओ तो हम अपने घर में जायें। यह है स्पीचूअल नॉलेज। अविनाशी ज्ञान रत्न हैं ना। यह है नई नॉलेज। अभी तुमको यह नॉलेज सिखाता हूँ। रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अन्त का राज़ बताता हूँ। अभी यह तो है पुरानी दुनिया। इसमें तुम्हारे जो भी मित्र सम्बन्धी आदि हैं, देह सहित सबसे ममत्व निकाल दो। अभी तुम बच्चे अपना सब कुछ बाप हवाले करते हो। बाप फिर स्वर्ग की बादशाही 21 जन्मों के लिए तुम्हारे हवाले कर देते हैं। लेन-देन तो होती है ना। बाप तुमको 21 जन्मों के लिए राज्य-भाग्य देते हैं। 21 जन्म, 21 पीढ़ी गाये जाते हैं ना अर्थात् 21 जन्म पूरी लाइफ चलती है। बीच में कभी शरीर छूट नहीं सकता। अकाले मृत्यु नहीं होती। तुम अमर बन और अमरपुरी के मालिक बनते हो। तुमको कभी काल खा न सके। अभी तुम मरने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो। बाप कहते हैं देह सहित देह के सब सम्बन्ध छोड़ एक बाप से सम्बन्ध रखना है। अब जाना ही है सुख के सम्बन्ध में। दु:ख के बन्धनों को भूलते जायेंगे। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनना है। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो, साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करो। इन देवताओं जैसा बनना है। यह है एम ऑबजेक्ट। यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक थे, इन्हों ने कैसे राज्य पाया, फिर कहाँ गये, यह किसको पता नहीं है। अभी तुम बच्चों को दैवी गुण धारण करने हैं। किसको भी दु:ख नहीं देना है। बाप है ही दुःख हर्ता, सुख कर्ता। तो तुमको भी सुख का रास्ता सबको बताना है अर्थात् अन्धों की लाठी बनना है। अभी बाप ने तुम्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र दिया है। तुम जानते हो बाप कैसे पार्ट बजाते हैं। अभी बाप जो तुमको पढ़ा रहे हैं फिर यह पढ़ाई प्राय:लोप हो जायेगी। देवताओं में यह नॉलेज रहती नहीं। तुम ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण ही रचता और रचना के ज्ञान को जानते हो। और कोई जान नहीं सकते। इन लक्ष्मी-नारायण आदि में भी अगर यह ज्ञान होता तो परम्परा चला आता। वहाँ ज्ञान की दरकार ही नहीं रहती क्योंकि वहाँ है ही सद्गति। अभी तुम सब कुछ बाप को दान देते हो तो फिर बाप तुमको 21 जन्मों के लिए सब कुछ दे देते हैं। ऐसा दान कभी होता नहीं। तुम जानते हो हम सर्वन्श देते हैं – बाबा यह सब कुछ आपका है, आप ही हमारे सब कुछ हो। त्वमेव माताश्च पिता... पार्ट तो बजाते हैं ना। बच्चों को एडाप्ट भी करते हैं फिर खुद ही पढ़ाते हैं। फिर खुद ही गुरू बन सबको ले जाते हैं। कहते हैं तुम मुझे याद करो तो पावन बन जायेंगे फिर तुमको साथ ले जाऊंगा। यह यज्ञ रचा हुआ है। यह है शिव ज्ञान यज्ञ, इसमें तुम तन-मन-धन सब स्वाहा कर देते हो। खुशी से सब अर्पण हो जाता है। बाकी आत्मा रह जाती है। बाबा, बस अब हम आपकी श्रीमत पर ही चलेंगे। बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनना है। 60 वर्ष की आयु जब होती है तो वानप्रस्थ अवस्था में जाने की तैयारी करते हैं परन्तु वह कोई वापिस जाने के लिए थोड़ेही तैयारी करते हैं। अभी तुम सतगुरू का मन्त्र लेते हो मनमनाभव। भगवानुवाच - तुम मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। सबको कहो आप सबकी वानप्रस्थ अवस्था है। शिवबाबा को याद करो, अब जाना है अपने घर। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1. कलियुगी सर्व कर्मबन्धनों को बुद्धि से भूल 5 विकारों का दान कर आत्मा को सतोप्रधान बनाना है।

2. इस रूद्र यज्ञ में खुशी से अपना तन-मन-धन सब अर्पण कर सफल करना है। इस समय सब कुछ बाप हवाले कर 21 जन्मों की बादशाही बाप से ले लेनी है।

वरदान:

निमित्त भाव की स्मृति से हलचल को समाप्त करने वाले सदा अचल-अडोल भव

निमित्त भाव से अनेक प्रकार का मैं पन, मेरा पन सहज ही खत्म हो जाता है। यह स्मृति सर्व प्रकार की हलचल से छुड़ाकर अचल-अडोल स्थिति का अनुभव कराती है। सेवा में भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। क्योंकि निमित्त बनने वालों की बुद्धि में सदा याद रहता है कि जो हम करेंगे हमें देख सब करेंगे। सेवा के निमित्त बनना अर्थात् स्टेज पर आना। स्टेज तरफ स्वत: सबकी नजर जाती है। तो यह स्मृति भी सेफ्टी का साधन बन जाती है।

स्लोगन:

सर्व बातों में न्यारे बनो तो परमात्म बाप के सहारे का अनुभव होगा।

 

महाशिवरात्री संदेश दि. 22 से 28 फरवरी, 2017 रात 12 बजे तक 7 दिनमें 

7 करोंड व्हाटसएप युजर्स को दिया जायेगा महाशिवरात्री का आध्यात्मिक रहस्य

ओमशान्ति मीडिया पत्रिका, बीकवार्ता वेबपोर्टल तथा डॉ. दिपक हरके का संयुक्त उपक्रम

वंडर बुक ऑफ रिकार्ड इंटरनॅशनल, लंदन में दर्ज होगा विश्व किर्तीमान

 

अहमदनगर (प्रतिनिधी) हम प्रतिवर्ष भक्तिभाव से महाशिवरात्री महोत्सव मनाते है, किन्तू यह उत्सव क्या मनाते ? इसके पिछे छिपा आध्यात्मिक क्या है ? इसकी जानकारी कुछ ही लोगो के पास है ? महाशिवरात्री के आध्यात्मिक रहस्य को हम अपने जीवन में समझकर अपने जीवनमें प्रतिपल खुश रहने हेतू महाशिवरात्री संदेश देना आवश्यक है  दि. 22 से 28 फरवरी, 2017 की रात 12 से 7 करोड व्हॉटसअॅप युजर्सको महाशिवरात्रीका आध्यात्मिक संदेश प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की ओरसे पहूंचाया जायेगा. ओमशान्ति मीडिया पत्रिका, www.bkvarta.com बीकवार्ता वेबपोर्टल तथा डॉ. दिपक हरके का यह संयुक्त उपक्रम है.

 

इसके पूर्व का विश्व विक्रम डॉ. दिपक हरके इनके नाम पर है, दिपावली का आध्यात्मिक रहस्य का ऑडिओ मॅसेज 1 करोड 352 व्हॉटस्अॅप युजर्स को 29 अक्तुबर 2016 को रात 12 बजे से 20 अक्तुबर, 2016 के रात बजे बजे तक भेजकर उन्होने यह उपलब्ध हासिल की थी. महाशिवरात्री का विश्वविक्रमी संदेश प्राप्त करने के लिए 9422288888 इस व्हॉटसअॅप मैसेज पर WR एैसा मॅसेज भेजकर आप यह संदेश प्राप्त कर सकतें है. विश्वविक्रम में सहभागीता पत्र प्राप्त करने के लिए हरएक सहभागी व्यक्ति निर्धारीत राशी जमा कर वंडर बुक ऑफ रिकार्डमें सहभाग प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकतें है . इस विश्वविक्रम का उदघाटन भारतीय क्रीकेट टिम के उपकप्तान अजिंक्य रहणे इनके शुभहस्तोंसे मुंबई के बीकेसीस्थित एमसीए क्लब में सपन्न हूआ. इस उपक्रम के बारें में रहाने ने डॉ. दिपक हरके को बधाई दी तथा ब्रह्माकुमारीज् के मानवसेवा के कार्य की सराहना की. 

 

 

१३ मार्च (पालक्कड:केरला) ध्यान महोत्सव का आयोजन. विभीन्य मान्यवारोंने किया राजयोग ध्यान अभ्यास.

 

31 जनवरी (भूवनेश्वर) वार्षिकोत्सव मनाया गया. सेवाकेंद्र के एक वर्ष पूर्ती पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

 


 

30 जनवरी (विलेपार्ले:मुंबई) सफल सारथी अवार्ड. ट्रान्सपोर्ट एण्ड ट्रॅव्हल्स प्रभागद्वारा यह अवार्ड प्राप्त ड्रायव्हर भाईयों को सम्मानित किया गया.

 


 

29 जनवरी (हैद्राबाद) मुख्यमंत्री महोदय शान्तिसरोवर में. भ्राता एम. चंद्राबाबू नायडूजीने शांती सरोवर भेट की. शांतीसरांेवर के दसवें वर्धापन दिन कार्यक्रम का उदघाटन उन्होंने किया.


 

28 जनवरी (जयपूर:राज.) अंतरराष्ट्रीय खेल सम्मेलन मंें ईश्वरीय संदेश. स्पोटर्स एण्ड फिजिकल एज्युकेशन विषयपर आयोजित इस मम्मेलन में बीके जगबीरभाईने दिया संदेश.


 

27 जनवरी (मडिकेरी:कर्ना.) कर्म की गती गुह्य है. - भगवानभाई सेंट्रल जेल में ब्र.कु भगवानभाई, माऊंट आबू ने दिया ईश्वरीय संदेश


 

26 जनवरी (मंगलौर:कर्ना.) सेंट्रल जेल में दिया ईश्वरीय संदेश. ब्र.कु भगवानभाई, माऊंट आबू ने दिया ईश्वरीय संदेश.


 

25 जनवरी (मालाड:मुंबई)फिल्म इन्स्टि. में मेडिटेशन रुम का उदघाटन. प्रसिध्द फिल्म निर्देशक तथा निर्माता भ्राता सुभाष घई ने विशअलींग फिल्म इन्स्टि. में मेडिटेशन रुम का उघाटन किया

 


 

24 जनवरी (कटघोरा) आध्यात्मिक समागम एवं सम्मान समारोह संपन्न. नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधीयों का सम्मान समारोह आयोजित किया गया.


 

23 जनवरी (लातूर:महा.) उर्जा छात्र-क्लब स्थापित. गणतंत्र दिवस के अवसरपर विवेकानंद विद्यालय, सीबीएससी लातूर में महाराष्ट्र उर्जा छात्र क्लब की स्थापना की गई


 

22 जनवरी (बिलासपूर:छ.ग.) आरके नगर में सरस्वती झाँकी. राजकिशोर नगर, बीके रुपा बहनने माँ सरस्वती की महिमा का प्रवचन किया.


21 जनवरी (शान्तिवन) रेडिओ मधुबन वर्धापन दिन. ब्रहमाकुमारीज कम्युनिटी रेडिओ मधुबन का 4 था वर्धापन दिवस मनाया गया.

 


 

20 जनवरी (मालाड:मुंबई) सुरक्षीत रास्ता सप्ताह. एसटी डिपो में हुआ कार्यक्रम.


 

19 जनवारी (केशोद:गुज) यात्रा खुशनुमा जीवन की और कार्यक्रम संपन्न. ब्र.कु.डा. सविता, माऊंट आबूने किया मार्गदर्शन.


 

18 जनवरी (आबूपर्वत:पाण्डवभवन) पिताश्रीजी का स्मृतिदिवस. विश्वशांती दिवस के रुप में समूचे विश्व में मनाया गया.


 

17 जनवरी (विशाखापट्टणम) विधायक महोदय को दिया संदेश. नये वर्ष का संदेश भ्राता विष्णु कुमार राजू जी को बीके शशीकला बहनने दिया 


 

16 जनवरी (मुंबई) 102वीं विज्ञान परिषद में स्पार्क सेवा. मुंबई विश्व विद्यालय में आयोजित इस परिषदमें स्प्रिच्ुअल एप्लीकेशन एण्ड रिसर्च की सुंदर सेवा हुई


 

15 जनवरी (जयपूर) नारित्वदर्शन की सहभागीता. जयपूर अन्तरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल में नारित्व दर्शन को नॉमिनेट किया गया.


 

14 जनवरी (शान्तिवन) रिडिकव्हरींग ऑफ लाईफ. वैज्ञानिक तथा अभियंता प्रभागद्वारा राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया


 

13 जनवरी (शान्तिवन) ब्र.कु. करुणाभाईजी का 75 वाँ जनमदिन. ब्रहमाकुमारीज संस्था के मीडिया उपाध्यक्ष तथा मल्टीमीडिया प्रभारी ब्र.कु. करुणाभाईजी के जनमदिन की प्लेटिनम ज्युबिली हर्षोल्हाससे मनाई गई.


 

12 जनवरी (शांतीवन)दादीजी का 99 वाँ जनमदिन मनाया. ब्रहमाकुमारीज संस्था की मुख्य प्रशासिका ददी जानकीजी का जन्मदिन बहुत ही उमंग उत्साहसे मनाया गया


 

11 जनवरी (मा.आबू) बीके केदारभाई का अभिनंदन किया दादीजीने. राजस्थान सरकारद्वारा उर्जा संरक्षण पुरस्कार प्राप्त करनेवाले बीके केदारभाई (उर्जा ऑडिटर) का अभिनंदन दादी रतनमोहिनीजी, बीके रमेशभाईजीने किया.


 

10 जनवरी (टिकरापारा:बीलासपूर) बालिका शिक्षा शिविर में सदेश. सरस्वती शिशु मंदिर उच्चस्तर मा. विद्यालय में बीके मंजू बहनने दिया ईश्वरीय संदेश.


 

09 जनवरी (राहूरी:महा.) आज की शाम भगवान के नाम. ब्र.कु. सुरजभाई, मा. आबू, ब्र.कु. गीताबहन पुना तथा उषा बहन राहूरी ने दिया ईश्वरीय संदेश. ब्र.कु. बद्रिश हेहाडरायने मीडियाद्वारा पहूंचाया संदेश


 

08 जनवरी (कलपेट्टा:केरला) केंद्रीय विद्यालय में दिया ईश्वरीय संदेश. ब्र.कु. भगवानभाई, आबू पर्वत ने  कही नैतिक मूल्यों की बा


 

07 जनवरी (बार्शि:महा.) कुंकूलोक हायस्कूल में ईश्वरीय संदेश. बीके संगीताबहनने दिया संदेश


 

06 जनवरी (केशोद) महान जादुगर विरागभाई हकुभा को दिया संदेश. बी.के. सत्याबहन, तथा बीके शिल्पा बहनने दिया परिचय.


 

05 जनवरी (हरिद्वार) ऋषीकुल में संत स्नेहमीलन, ब्र.कु.मिनाबहनने परमपिता परमात्मा का दिया सत्य परिच


 

04 जनवारी (बंेगलौर) फ्रि आय चेकींग कॅम्प. सेवाकेंद्र की ओरसे आयोजित कॅम्प में सहभागीयों दिया गया संदे


 

03 जनवरी (लिमा,पेरु:फ्रान्स)कोप-20 में ब्रहमाकुमारीज् की सहभागीता. क्लायमेंट चेंज कॉन्फरन्स में ब्रहमाकुमारीजने किया सहभाग


 

02 जनवरी (वाशी:मुंबई) सदभावना सभा में ब्रहमाकुमारीज् सहभाग. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की औरसे आयोजित इस मीटिंग में बहनोंने दिया संदेश


 

01 जनवरी (तिनसुखीया:आसाम) स्वर्णीम युग की पुन:स्थापना. गीता के भगवान को प्रत्यक्ष करने के सम्मेलनको, बी के ब्रजमोहनभाईजी, देहली, ब्र.कु. उषाबहनजी मा. आबू, बीके आशा बहनजी ने किया सम्बोधित

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