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नया मलयालम टीवी चैनल

कोच्चि: केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री, माननीय। मुरलीधरन ने ब्रह्म कुमारियों का नया मलयालम चैनल लॉन्च किया - मलयाली को समर्पित राजयोग टीवी मलयालम। यह एक पूर्ण चैनल है जो हमारी ज़रूरत की हर चीज़ वितरित करता है। भारतीय दर्शन विज्ञान और अध्यात्म का सामंजस्य है। यह चैनल ब्रह्म कुमारियों की मानवता की समग्र दृष्टि का प्रमाण है। मंत्री ने अपने…

आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र

मध्यप्रदेश के राज्य कैबिनेट मंत्री ने आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र प्रदान किया मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश सरकार ने आपदा प्रबंधन में ब्रह्मा कुमारिस संगठन के प्रयासों की सराहना की। मध्य प्रदेश सरकार में पशुपालन और मत्स्यपालन मंत्री और प्रभारी मंत्री श्री लखन सिंह यादव, मुरैना जिला कलेक्टर, प्रियंका दास के साथ, प्रशासन की ओर से इस…

निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर

निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर   ग्वालियर: प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय की सहयोगी संस्था राजयोग एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के मेडिकल विंग के स्थानीय सेवाकेंद्र “प्रभु उपहार भवन, माधवगंज लश्कर ग्वालियर” द्वारा निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर का आयोजन किया गया।शिविर में परामर्श देनें के लिए डॉ. निर्मला कंचन (स्त्री रोग विशेषज्ञ), एवं…

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नया मलयालम टीवी चैनल

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19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन.

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19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन. केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र. संस्था के 80 वर्ष कार्यक्रम में वक्तव्य.Read more...

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युवा शिविर का सफल आयोजन.

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त्रिनिदाद) युवा शिविर का सफल आयोजन. टोका त्रिनिदाद मेंे हासन्ना बीच रिसोर्ट पर युवा शिविर का आयोजन किया गया. Read more...

 

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13-11-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - यह भूल-भुलैया का खेल है, तुम घड़ी-घड़ी बाप को भूल जाते हो, निश्चयबुद्धि बनो तो इस खेल में फसेंगे नहीं''

प्रश्नः-

कयामत के समय को देखते हुए तुम बच्चों का कर्तव्य क्या है?

उत्तर:-

तुम्हारा कर्तव्य है - अपनी पढ़ाई में अच्छी रीति लग जाना, और बातों में नहीं जाना है। बाप तुम्हें नयनों पर बिठाकर, गले का हार बनाकर साथ ले जायेंगे। बाकी तो सबको अपना-अपना हिसाब-किताब चुक्तू करके जाना ही है। बाप आये हैं सबको अपने साथ घर ले जाने।

गीत:-

दूर देश का रहने वाला........

ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों को बैठ समझाते हैं - भारत खास और दुनिया आम सब विश्व में शान्ति चाहते हैं। अब यह तो समझना चाहिए - जरूर विश्व का मालिक ही विश्व में शान्ति स्थापन करते हैं। गॉड फादर को ही पुकारना चाहिए कि आकर विश्व में शान्ति फैलाओ। किसको पुकारें वह भी बिचारों को पता नहीं है। सारे विश्व की बात है ना। सारे विश्व में शान्ति चाहते हैं। अब शान्ति का धाम तो अलग है, जहाँ बाप और आप आत्मायें रहती हो। यह भी बेहद का बाप ही समझाते हैं। अब इस दुनिया में तो ढेर के ढेर मनुष्य हैं, अनेक धर्म हैं। कहते हैं - एक धर्म हो जाए तो शान्ति हो। सब धर्म मिलकर एक तो हो नहीं सकते। त्रिमूर्ति की महिमा भी है। त्रिमूर्ति के चित्र बहुत रखते हैं। यह भी जानते हैं ब्रह्मा द्वारा स्थापना। किसकी? सिर्फ शान्ति की थोड़ेही होगी। शान्ति और सुख की स्थापना होती है। इस भारत में ही 5 हज़ार वर्ष पहले जब इनका राज्य था तो जरूर बाकी सब जीव आत्मायें, जीव को छोड़ अपने घर गई होंगी। अब चाहते हैं एक धर्म, एक राज्य, एक भाषा। अब तुम बच्चे जानते हो - बाप शान्ति, सुख, सम्पत्ति की स्थापना कर रहे हैं। एक राज्य भी जरूर यहाँ ही होगा ना। एक राज्य की स्थापना हो रही है - यह कोई नई बात नहीं। अनेक बार एक राज्य स्थापन हुआ है। फिर अनेक धर्मों की वृद्धि होते-होते झाड़ बड़ा हो जाता है फिर बाप को आना पड़ता है। आत्मा ही सुनती है, पढ़ती है, आत्मा में ही संस्कार हैं। हम आत्मा भिन्न-भिन्न शरीर धारण करती हैं। बच्चों को इस निश्चय बुद्धि होने में भी बड़ी मेहनत लगती है। कहते हैं बाबा घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। बाप समझाते हैं - यह खेल भूल-भुलैया का है। इसमें तुम जैसे फँस गये हो, पता नहीं है हम अपने घर अथवा राजधानी में कैसे जायेंगे। अब बाप ने समझाया है आगे कुछ नहीं जानते थे। आत्मा कितनी पत्थरबुद्धि बन जाती है। पत्थरबुद्धि और पारसबुद्धि का भारत में ही गायन है। पत्थरबुद्धि राजायें और पारसबुद्धि राजायें यहाँ ही हैं। पारसनाथ का मन्दिर भी है। अभी तुम जानते हो हम आत्मायें कहाँ से आई हैं पार्ट बजाने। आगे तो कुछ भी नहीं जानते थे। इनको कहते हैं कांटों का जंगल। यह सारी दुनिया कांटों का जंगल हैं। फूलों के बगीचे को आग लगी, ऐसा कभी सुना नहीं होगा। हमेशा जंगल को आग लगती है। यह भी जंगल है, इनको आग लगनी है जरूर। भंभोर को आग लगनी है। इस सारी दुनिया को ही भंभोर कहा जाता है। अभी तुम बच्चों ने बाप को जान लिया है। सम्मुख बैठे हो। जो गाते थे तुम्हीं से बैठूँ.....। वह सब कुछ हो रहा है। भगवानुवाच तो जरूर पढ़ेंगे ना। भगवानुवाच बच्चों प्रति ही होगा ना। तुम जानते हो भगवान पढ़ाते हैं। भगवान कौन है? निराकार शिव को ही कहेंगे। भगवान शिव की पूजा भी यहाँ होती है। सतयुग में पूजा आदि नहीं होती। याद भी नहीं करते। भक्तों को सतयुग की राजधानी का फल मिलता है। तुम समझते हो हमने सबसे जास्ती भक्ति की है इसलिए हम ही पहले-पहले बाप के पास आये हैं। फिर हम ही राजधानी में आयेंगे। तो बच्चों को पूरा पुरुषार्थ करना चाहिए - नई दुनिया में ऊंच पद पाने। बच्चों की दिल होती है अब हम जल्दी नये घर में जायें। शुरू में ही नया घर होगा फिर पुराना होता जायेगा। घर में बच्चों की वृद्धि होती जायेगी। पुत्र, पोत्रे, पर-पोत्रे वह तो पुराने घर में आयेंगे ना। कहेंगे हमारे दादा, परदादा का यह मकान है। पीछे आने वाले भी बहुत होते हैं ना। जितना जोर से पुरूषार्थ करेंगे तो पहले नये घर में आयेंगे। पुरुषार्थ की युक्ति बाप बहुत सहज समझाते हैं। भक्ति में भी पुरुषार्थ करते हैं ना। बहुत भक्ति करने वालों का नाम बाला होता है। कई भक्तों की स्टैम्प भी निकालते हैं। ज्ञान की माला का तो कोई को पता नहीं है। पहले है ज्ञान, पीछे है भक्ति। यह तुम बच्चों की बुद्धि में है। आधा समय है ज्ञान - सतयुग-त्रेता। अभी तुम बच्चे नॉलेजफुल बनते जाते हो। टीचर सदैव फुल नॉलेज वाले होते हैं। स्टूडेन्ट में नम्बरवार मार्क्स उठाते हैं। यह है बेहद का टीचर। तुम हो बेहद के स्टूडेन्ट, स्टूडेन्ट तो नम्बरवार ही पास होंगे। जैसे कल्प पहले हुए हैं। बाप समझाते हैं तुमने ही 84 जन्म लिए हैं। 84 जन्मों में 84 टीचर होते हैं। पुनर्जन्म तो जरूर लेना ही है। पहले जरूर सतोप्रधान दुनिया होती है फिर पुरानी तमोप्रधान दुनिया होती है। मनुष्य भी तमोप्रधान होंगे ना। झाड़ भी पहले नया सतोप्रधान होता है। नये पत्ते बहुत अच्छे-अच्छे होते हैं। यह तो बेहद का झाड़ है। ढेर धर्म हैं। तुम्हारी बुद्धि अब बेहद तरफ जायेगी। कितना बड़ा झाड़ है। पहले-पहले आदि सनातन देवी-देवता धर्म ही होगा। फिर वैरायटी धर्म आयेंगे। तुमने ही 84 वैरायटी जन्म लिए हैं। वह भी अविनाशी हैं। तुम जानते हो कल्प-कल्प 84 का चक्र हम फिरते रहते हैं। 84 के चक्र में हम ही आते हैं। 84 लाख जन्म कोई मनुष्य की आत्मा नहीं लेती है। वह तो वैरायटी जानवर आदि ढेर हैं। उनकी कोई गिनती भी नहीं कर सकते। मनुष्य की आत्मा ने 84 जन्म लिए हैं। तो यह पार्ट बजाते-बजाते एकदम जैसे टायर्ड हो गये हैं। दु:खी बन गये हैं। सीढ़ी उतरते सतोप्रधान से तमोप्रधान बन गये हैं। बाप फिर तमोप्रधान से सतोप्रधान बनाते हैं। बाप कहते हैं - मैं तमोप्रधान शरीर तमोप्रधान दुनिया में आया हूँ। अब सारी दुनिया तमोप्रधान है। मनुष्य तो ऐसे कह देते हैं - सारे विश्व में शान्ति कैसे हो। समझते नहीं कि विश्व में शान्ति कब थी। बाप कहते हैं तुम्हारे घर में तो चित्र रखे हैं ना। इनका राज्य था - तो सारे विश्व में शान्ति थी, उनको स्वर्ग कहा जाता है। नई दुनिया को ही हेविन गोल्डन एज कहा जाता है। अभी ये पुरानी दुनिया बदलनी है। वह राजधानी स्थापन हो रही है। विश्व में राज्य तो इनका ही था। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में बहुत मनुष्य जाते हैं। यह थोड़ेही किसकी बुद्धि में है कि यही भारत के मालिक थे - इनके राज्य में जरूर सुख-शान्ति थी। 5 हजार वर्ष की बात है - जब इनका राज्य था। आधाकल्प के बाद पुरानी दुनिया कहा जाता है इसलिए धन्धे वाले स्वास्तिका रखते हैं चौपड़े में। उनका भी अर्थ है ना। वह तो गणेश कह देते हैं। गणेश को फिर विघ्न विनाशक देवता समझते हैं। स्वास्तिका में पूरे 4 भाग होते हैं। यह सब है भक्ति-मार्ग। अभी दीपावली मनाते हैं, वास्तव में सच्ची-सच्ची दीवाली याद की यात्रा ही है जिससे आत्मा की ज्योति 21 जन्मों के लिए जग जाती है। बहुत कमाई होती है। तुम बच्चों को बहुत खुशी होनी चाहिए। अभी तुम्हारा नया खाता शुरू होता है - नई दुनिया के लिए। 21 जन्मों के लिए खाता अभी जमा करना है। अब बाप बच्चों को समझाते हैं, अपने को आत्मा समझ सुन रहे हो। आत्मा समझ सुनेंगे तो खुशी भी रहेगी। बाप हमको पढ़ाते हैं। भगवानुवाच भी है ना। भगवान तो एक ही होता है। जरूर वह आकर शरीर लेता होगा, तब भगवानुवाच कहा जाता है। यह भी किसको पता नहीं है तब नेती-नेती करते आये हैं। कहते भी हैं वह परमपिता परमात्मा है। फिर कह देते - हम नहीं जानते। कहते भी हैं शिवबाबा, ब्रह्मा को भी बाबा कहते हैं। विष्णु को कभी बाबा नहीं कहेंगे। प्रजापिता तो बाबा ठहरा ना। तुम हो बी.के., प्रजापिता नाम न होने से समझते नहीं हैं। इतने ढेर बी.के. हैं तो जरूर प्रजापिता ही होगा इसलिए प्रजापिता अक्षर जरूर डालो। तो समझेंगे प्रजापिता तो हमारा ही बाप ठहरा। नई सृष्टि जरूर प्रजापिता द्वारा ही रची जाती है। हम आत्मायें भाई-भाई हैं फिर शरीर धारण कर भाई-बहन हो जाते। बाप के बच्चे तो अविनाशी हैं फिर साकार में बहन-भाई चाहिए। तो नाम है प्रजापिता ब्रह्मा। परन्तु ब्रह्मा को कोई हम याद नहीं करते। याद लौकिक को करते और पारलौकिक को करते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा को कोई याद नहीं करते। दु:ख में बाप का सिमरण करते हैं, ब्रह्मा का नहीं। कहेंगे हे भगवान। हे ब्रह्मा नहीं कहेंगे। सुख में तो किसी को भी याद नहीं करते हैं। वहाँ सुख ही सुख है। यह भी किसको पता नहीं है। तुम जानते हो इस समय हैं 3 बाप। भक्तिमार्ग में लौकिक और पारलौकिक बाप को याद करते हैं। सतयुग में सिर्फ लौकिक को याद करते हैं। संगम पर तीनों को याद करते हैं। लौकिक भी है परन्तु जानते हैं वह है हद का बाप। उनसे हद का वर्सा मिलता है। अभी हमको बेहद का बाप मिला है जिससे बेहद का वर्सा मिलता है। यह समझ की बात है। अब बेहद का बाप आये हैं ब्रह्मा के तन में - हम बच्चों को बेहद का सुख देने। उनका बनने से हम बेहद का वर्सा पाते हैं। यह जैसे दादे का वर्सा मिलता है - ब्रह्मा द्वारा, वह कहते हैं वर्सा तुमको मैं देता हूँ। पढ़ाता मैं हूँ। ज्ञान मेरे पास है। बाकी न मनुष्यों में ज्ञान है, न देवताओं में। ज्ञान है मेरे में। जो मैं तुम बच्चों को देता हूँ। यह है रूहानी ज्ञान।

तुम जानते हो रूहानी बाप द्वारा हमको यह पद मिलता है। ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन करना चाहिए। गायन है मन के जीते जीत, मन से हारे हार....... वास्तव में कहना चाहिए - माया पर जीत क्योंकि मन को तो जीता नहीं जाता। मनुष्य कहते हैं मन की शान्ति कैसे हो? बाप कहते हैं आत्मा कैसे कहेगी कि मन की शान्ति चाहिए। आत्मा तो है ही शान्तिधाम में रहने वाली। आत्मा जब शरीर में आती है तब कार्य करने लग पड़ती है। बाप कहते हैं तुम अब स्वधर्म में टिको, अपने को आत्मा समझो। आत्मा का स्वधर्म है शान्त। बाकी शान्ति कहाँ से ढूंढेगी। इस पर रानी का भी दृष्टान्त है हार का। संन्यासी दृष्टान्त देते हैं और फिर खुद जंगल में जाकर शान्ति ढूढते हैं। बाप कहते हैं कि तुम आत्मा का धर्म ही शान्ति है। शान्तिधाम तुम्हारा घर है, जहाँ से पार्ट बजाने तुम आते हो। शरीर से फिर कर्म करना पड़ता है। शरीर से अलग होने से सन्नाटा हो जाता है। आत्मा ने जाकर दूसरा शरीर लिया फिर चिंता क्यों करनी चाहिए। वापिस थोड़ेही आयेगी। परन्तु मोह सताता है। वहाँ तुमको मोह नहीं सतायेगा। वहाँ 5 विकार होते नहीं। रावणराज्य ही नहीं। वह है रामराज्य। हमेशा रावण राज्य हो तो फिर मनुष्य थक जाएं। कभी सुख देख न सकें। अभी तुम आस्तिक बने हो और त्रिकालदर्शी भी बने हो। मनुष्य बाप को नहीं जानते इसलिए नास्तिक कहा जाता है।

अभी तुम बच्चे जानते हो यह शास्त्र आदि जो पास्ट हो चुके हैं, यह सब है भक्ति मार्ग। अभी तुम हो ज्ञान मार्ग में। बाप तुम बच्चों को कितना प्यार से नयनों पर बिठाकर ले जाते हैं। गले का हार बनाए सबको ले जाता हूँ। पुकारते भी सब हैं। जो काम चिता पर बैठ काले हो गये हैं उनको ज्ञान चिता पर बिठाए, हिसाब-किताब चुक्तू कराए वापिस ले जाते हैं। अब तुम्हारा काम है पढ़ने से, और बातों में क्यों जाना चाहिए। कैसे मरेंगे, क्या होगा...... इन बातों में हम क्यों जायें। यह तो कयामत का समय है, सब हिसाब-किताब चुक्तू कर वापिस चले जायेंगे। यह बेहद के ड्रामा का राज़ तुम बच्चों की बुद्धि में है, और कोई नहीं जानते। बच्चे जानते हैं हम बाबा के पास कल्प-कल्प आते हैं, बेहद का वर्सा लेने। हम जीव की आत्मायें हैं। बाबा ने भी देह में आकर प्रवेश किया है। बाप कहते हैं मैं साधारण तन में आता हूँ, इनको भी बैठ समझाता हूँ कि तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो। और कोई ऐसे कह न सके कि बच्चों, देही-अभिमानी बनो, बाप को याद करो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) याद की यात्रा में रहकर सच्ची-सच्ची दीपावली रोज मनानी है। अपना नया खाता 21 जन्मों के लिए जमा करना है।

2) ड्रामा के राज़ को बुद्धि में रख पढ़ाई के सिवाए और किसी भी बात में नहीं जाना है। सब हिसाब-किताब चुक्तू करने हैं।

वरदान:-

लगन की अग्नि द्वारा एक दीप से अनेक दीप जगाने वाले सच्चे सेवाधारी भव

जैसे दीपावली पर एक दीप से अनेक दीप जगाते, दीपमाला मनाते हैं। दीपक में अग्नि होती है ऐसे आप दीपकों में लगन की अग्नि है। अगर एक एक दीपक की एक दीपक के साथ लगन लग गई तो यही सच्ची दीपमाला है। तो देखना है कि हम दीपक लगन लगाकर अग्नि रूप बनने वाले, अपनी रोशनी से अज्ञानता का अंधकार मिटाने वाले ही सच्चे सेवाधारी हैं।

स्लोगन:-

एक बल, एक भरोसा-इस पाठ को सदा पक्का रखो तो बीच भंवर से सहज निकल जायेंगे।


ब्रह्माकुमारीज् की प्रमुख खबरें -

 

 

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बोध कथा-

विचार की पवित्रता

एक राजा और नगर सेठ में गहरी मित्रता थी। वे रोज एक दूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे। नगर सेठ चंदन की लकड़ी का व्यापार करता था। एक दिन उसके मुनीम ने बताया कि लकड़ी की बिक्री कम हो गई है। तत्काल सेठ के मन में यह विचार कौंधा कि अगर राजा की मृत्यु हो जाए, तो मंत्रिगण चंदन की लकडि़यां उसी से खरीदेंगे। उसे कुछ तो मुनाफा होगा। शाम को सेठ हमेशा की तरह राजा से मिलने गया। उसे देख राजा ने सोचा कि इस नगर सेठ ने उससे दोस्ती करके न जाने कितनी दौलत जमा कर ली है, ऐसा कोई नियम बनाना होगा जिससे इसका सारा धन राज खजाने में जमा हो जाए।
दोनों इसी तरह मिलते रहे, लेकिन पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। एक दिन नगर सेठ ने पूछ ही लिया, ‘पिछले कुछ दिनों से हमारे रिश्तों में एक ठंडापन आ गया है। ऐसा क्यों?’ राजा ने कहा, ‘मुझे भी ऐसा लग रहा है। चलो, नगर के बाहर जो महात्मा रहते हैं, उनसे इसका हल पूछा जाए।’ उन्होंने महात्मा को सब कुछ बताया। महात्मा ने कहा, ‘सीधी सी बात है। आप दोनों पहले शुद्ध भाव से मिलते रहे होंगे, पर अब संभवत: एक दूसरे के प्रति आप लोगों के मन में कुछ बुरे विचार आ गए हैं इसलिए मित्रता में पहले जैसा सुख नहीं रह गया।’ नगर सेठ और राजा ने अपने-अपने मन की बातें कह सुनाईं। महात्मा ने सेठ से कहा,’ तुमने ऐसा क्यों नहीं सोचा कि राजा के मन में चंदन की लकड़ी का आलीशान महल बनवाने की बात आ जाए? इससे तुम्हारा चंदन भी बिक जाता। विचार की पवित्रता से ही संबंधों में मिठास आती है। तुमने राजा के लिए गलत सोचा इसलिए राजा के मन में भी तुम्हारे लिए अनुचित विचार आया। गलत सोच ने दोनों के बीच दूरी बढ़ा दी। अब तुम दोनों प्रायश्चित करके अपना मन शुद्ध कर लो, तो पहले जैसा सुख फिर से मिलने लगेगा।’ 5  

07-08-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - श्रीमत पर चल सबको मुक्ति-जीवनमुक्ति पाने का रास्ता बताओ, सारा दिन यही धन्धा करते रहो''

प्रश्नः-

बाप ने कौन-सी सूक्ष्म बातें सुनाई हैं जो बहुत समझने की हैं?

उत्तर:-

सतयुग अमरलोक है, वहाँ आत्मा एक चोला बदल दूसरा लेती है लेकिन मृत्यु का नाम नहीं इसलिए उसे मृत्युलोक नहीं कहा जाता। 2. शिवबाबा की बेहद रचना है, ब्रह्मा की रचना इस समय सिर्फ तुम ब्राह्मण हो। त्रिमूर्ति शिव कहेंगे, त्रिमूर्ति ब्रह्मा नहीं। यह सब बहुत सूक्ष्म बातें बाप ने सुनाई हैं। ऐसी-ऐसी बातों पर विचार कर बुद्धि के लिए स्वयं ही भोजन तैयार करना है।

ओम् शान्ति। त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। अब वो लोग त्रिमूर्ति ब्रह्मा कहते हैं। बाप कहते हैं - त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। त्रिमूर्ति ब्रह्मा भगवानुवाच नहीं कहते। तुम त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच कह सकते हो। वो लोग तो शिव-शंकर कह मिला देते हैं। यह तो सीधा है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा के बदले त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। मनुष्य तो कह देते - शंकर आंख खोलते हैं तो विनाश हो जाता है। यह सब बुद्धि से काम लिया जाता है। तीन का ही मुख्य पार्ट है। ब्रह्मा और विष्णु का तो बड़ा पार्ट है 84 जन्मों का। विष्णु का और प्रजापिता ब्रह्मा का अर्थ भी समझा है, पार्ट है इन तीन का। ब्रह्मा का तो नाम गाया हुआ है आदि देव, एडम। प्रजापिता का मन्दिर भी है। यह है विष्णु का अथवा कृष्ण का अन्तिम 84 वां जन्म, जिसका नाम ब्रह्मा रखा है। सिद्ध तो करना ही है - ब्रह्मा और विष्णु। अब ब्रह्मा को तो एडाप्टेड कहेंगे। यह दोनों बच्चे हैं शिव के। वास्तव में बच्चा एक है। हिसाब करेंगे तो ब्रह्मा है शिव का बच्चा। बाप और दादा। विष्णु का नाम ही नहीं आता। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा स्थापना कर रहे हैं। विष्णु द्वारा स्थापना नहीं कराते। शिव के भी बच्चे हैं, ब्रह्मा के भी बच्चे हैं। विष्णु के बच्चे नहीं कह सकते। न लक्ष्मी-नारायण को ही बहुत बच्चे हो सकते हैं। यह है बुद्धि के लिए भोजन। आपेही भोजन बनाना चाहिए। सबसे जास्ती पार्ट कहेंगे विष्णु का। 84 जन्मों का विराट रूप भी विष्णु का दिखाते हैं, न कि ब्रह्मा का। विराट रूप विष्णु का ही बनाते हैं क्योंकि पहले-पहले प्रजापिता ब्रह्मा का नाम धरते हैं। ब्रह्मा का तो बहुत थोड़ा पार्ट है इसलिए विराट रूप विष्णु का दिखाते हैं। चतुर्भुज भी विष्णु का बना देते। वास्तव में यह अलंकार तो तुम्हारे हैं। यह भी बड़ी समझने की बातें हैं। कोई मनुष्य समझा न सके। बाप नये-नये तरीके से समझाते रहते हैं। बाप कहते हैं त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच राइट है ना। विष्णु, ब्रह्मा और शिव। इसमें भी प्रजापिता ब्रह्मा ही बच्चा है। विष्णु को बच्चा नहीं कहेंगे। भल क्रियेशन कहते हैं परन्तु रचना तो ब्रह्मा की होगी ना। जो फिर भिन्न नाम रूप लेती है। मुख्य पार्ट तो उनका है। ब्रह्मा का पार्ट भी बहुत थोड़ा है इस समय का। विष्णु का कितना समय राज्य है! सारे झाड़ का बीज रूप है शिवबाबा। उनकी रचना को सालिग्राम कहेंगे। ब्रह्मा की रचना को ब्राह्मण-ब्राह्मणियां कहेंगे। अब जितनी शिव की रचना है उतनी ब्रह्मा की नहीं। शिव की रचना तो बहुत है। सभी आत्मायें उनकी औलाद हैं। ब्रह्मा की रचना तो सिर्फ तुम ब्राह्मण ही बनते हो। हद में आ गये ना। शिवबाबा की है बेहद की रचना - सभी आत्मायें। बेहद की आत्माओं का कल्याण करते हैं। ब्रह्मा द्वारा स्वर्ग की स्थापना करते हैं। तुम ब्राह्मण ही जाकर स्वर्गवासी बनेंगे। और तो कोई को स्वर्गवासी नहीं कहेंगे, निर्वाणवासी अथवा शान्तिधाम वासी तो सब बनते हैं। सबसे ऊंच सर्विस शिवबाबा की होती है। सभी आत्माओं को ले जाते हैं। सभी का पार्ट अलग-अलग है। शिवबाबा भी कहते हैं मेरा पार्ट अलग है। सबका हिसाब-किताब चुक्तू कराए तुमको पतित से पावन बनाए ले जाता हूँ। तुम यहाँ मेहनत कर रहे हो पावन बनने के लिए। दूसरे सब कयामत के समय हिसाब-किताब चुक्तू कर जायेंगे। फिर मुक्तिधाम में बैठे रहेंगे। सृष्टि का चक्र तो फिरना है।

तुम बच्चे ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण बन फिर देवता बन जाते हो। तुम ब्राह्मण श्रीमत पर सेवा करते हो। सिर्फ मनुष्यों को रास्ता बताते हो - मुक्ति और जीवनमुक्ति को पाना है तो ऐसे पा सकते हो। दोनों चाबी हाथ में हैं। यह भी जानते हो कौन-कौन मुक्ति में, कौन-कौन जीवनमुक्ति में जायेंगे। तुम्हारा सारा दिन यही धंधा है। कोई अनाज आदि का धन्धा करते हैं तो बुद्धि में सारा दिन वही रहता है। तुम्हारा धन्धा है रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानना और किसको मुक्ति-जीवनमुक्ति का रास्ता बताना। जो इस धर्म के होंगे वह निकल आयेंगे। ऐसे बहुत धर्म के हैं जो बदल नहीं सकते। ऐसे नहीं कि फीचर्स बदल जाते हैं। सिर्फ धर्म को मान लेते हैं। कई बौद्ध धर्म को मानते हैं क्योंकि देवी-देवता धर्म तो प्राय: लोप है ना। एक भी ऐसा नहीं जो कहे हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हैं। देवताओं के चित्र काम में आते हैं, आत्मा तो अविनाशी है, वह कभी मरती नहीं। एक शरीर छोड़ फिर दूसरा लेकर पार्ट बजाती है। उनको मृत्युलोक नहीं कहा जाता। वह है ही अमरलोक। चोला सिर्फ बदलती है। यह बातें बड़ी सूक्ष्म समझने की हैं। मुट्टा (थोक अथवा सारा) नहीं है। जैसे शादी होती है तो किनको रेज़गारी, किनको मुट्टा देते हैं। कोई सब दिखाकर देते हैं, कोई बन्द पेटी ही देते हैं। किस्म-किस्म के होते हैं। तुमको तो वर्सा मिलता है मुट्टा, क्योंकि तुम सब ब्राइड्स हो। बाप है ब्राइडग्रुम। तुम बच्चों को श्रृंगार कर विश्व की बादशाही मुट्टे में देते हैं। विश्व का मालिक तुम बनते हो।

मुख्य बात है याद की। ज्ञान तो बहुत सहज है। भल है तो सिर्फ अल्फ को याद करना। परन्तु विचार किया जाता है याद ही झट खिसक जाती है। बहुत करके कहते हैं बाबा याद भूल जाती है। तुम किसको भी समझाओ तो हमेशा याद अक्षर बोलो। योग अक्षर रांग है। टीचर को स्टूडेन्ट की याद रहती है। फादर है सुप्रीम सोल। तुम आत्मा सुप्रीम नहीं हो। तुम हो पतित। अब बाप को याद करो। टीचर को, बाप को, गुरू को याद किया जाता है। गुरू लोग बैठ शास्त्र सुनायेंगे, मंत्र देंगे। बाबा का मंत्र एक ही है - मनमनाभव। फिर क्या होगा? मध्याजी भव। तुम विष्णुपुरी में चले जायेंगे। तुम सब तो राजा-रानी नहीं बनेंगे। राजा-रानी और प्रजा होती है। तो मुख्य है त्रिमूर्ति। शिवबाबा के बाद है ब्रह्मा जो फिर मनुष्य सृष्टि अर्थात् ब्राह्मण रचते हैं। ब्राह्मणों को बैठ फिर पढ़ाते हैं। यह नई बात है ना। तुम ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ बहन-भाई ठहरे। बुढ़े भी कहेंगे हम भाई-बहन हैं। यह अन्दर में समझना है। किसको फालतू ऐसे कहना नहीं है। भगवान ने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रची तो भाई-बहन हुए ना। जबकि एक प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे हैं, यह समझने की बातें हैं। तुम बच्चों को तो बड़ी खुशी होनी चाहिए - हमको पढ़ाते कौन हैं? शिवबाबा। त्रिमूर्ति शिव। ब्रह्मा का भी बहुत थोड़ा समय पार्ट है। विष्णु का सतयुगी राजधानी में 8 जन्म पार्ट चलता है। ब्रह्मा का तो एक ही जन्म का पार्ट है। विष्णु का पार्ट बड़ा कहेंगे। त्रिमूर्ति शिव है मुख्य। फिर आता है ब्रह्मा का पार्ट जो तुम बच्चों को विष्णुपुरी का मालिक बनाते हैं। ब्रह्मा से ब्राह्मण सो फिर देवता बनते हैं। तो यह हो गया अलौकिक फादर। थोड़ा समय यह फादर है जिसको अब मानते हैं। आदि देव, आदम और बीबी। इनके बिगर सृष्टि कैसे रचेंगे। आदि देव और आदि देवी है ना। ब्रह्मा का पार्ट भी सिर्फ संगम समय का है। देवताओं का पार्ट तो फिर भी बहुत चलता है। देवतायें भी सिर्फ सतयुग में कहेंगे। त्रेता में क्षत्रिय कहा जाता। यह बड़ी गुह्य-गुह्य प्वाइंट्स मिलती हैं। सब तो एक ही समय वर्णन नहीं कर सकते। वह त्रिमूर्ति ब्रह्मा कहते हैं। शिव को उड़ा दिया है। हम फिर त्रिमूर्ति शिव कहते हैं। यह चित्र आदि सब हैं भक्ति मार्ग के। प्रजा रचते हैं ब्रह्मा द्वारा फिर तुम देवता बनते हो। विनाश के समय नैचुरल कैलेमिटीज भी आती है। विनाश तो होना ही है, कलियुग के बाद फिर सतयुग होगा। इतने सब शरीरों का विनाश तो होना ही है। सब कुछ प्रैक्टिकल में चाहिए ना। सिर्फ आंख खोलने से थोड़ेही हो सकता। जब स्वर्ग गुम होता है तो उस समय भी अर्थक्वेक आदि होती हैं। तो क्या उस समय भी शंकर आंख ऐसे मीचते हैं। गाते हैं ना द्वारिका अथवा लंका पानी के नीचे चली गई।

अब बाप समझाते हैं - मैं आया हूँ पत्थरबुद्धियों को पारसबुद्धि बनाने। मनुष्य पुकारते हैं - हे पतित-पावन आओ, आकर पावन दुनिया बनाओ। परन्तु यह नहीं समझते हैं कि अभी कलियुग है इसके बाद सतयुग आयेगा। तुम बच्चों को खुशी में नाचना चाहिए। बैरिस्टर आदि इम्तहान पास करते हैं तो अन्दर में ख्याल करते हैं ना - हम पैसे कमायेंगे, फिर मकान बनायेंगे। यह करेंगे। तो तुम अभी सच्ची कमाई कर रहे हो। स्वर्ग में तुमको सब कुछ नया माल मिलेगा। ख्याल करो सोमनाथ का मन्दिर क्या था! एक मन्दिर तो नहीं होगा। उस मन्दिर को 2500 वर्ष हुआ। बनाने में टाइम तो लगा होगा। पूजा की होगी उसके बाद फिर वह लूटकर ले गये। फौरन तो नहीं आये होंगे। बहुत मन्दिर होंगे। पूजा के लिए बैठ मन्दिर बनाये हैं। अभी तुम जानते हो बाप को याद करते-करते हम गोल्डन एज में चले जायेंगे। आत्मा पवित्र बन जायेगी। मेहनत करनी पड़ती है। मेहनत बिगर काम नहीं चलेगा। गाया भी जाता है - सेकेण्ड में जीवनमुक्ति। परन्तु ऐसे थोड़ेही मिल जाती है, यह समझा जाता है - बच्चे बनेंगे तो मिलेगी जरूर। तुम अभी मेहनत कर रहे हो मुक्तिधाम में जाने के लिए। बाप की याद में रहना पड़ता है। दिन-प्रतिदिन बाप तुम बच्चों को रिफाइन बुद्धि बनाते हैं। बाप कहते हैं तुमको बहुत-बहुत गुह्य बातें सुनाता हूँ। आगे थोड़ेही यह सुनाया था कि आत्मा भी बिन्दी है, परमात्मा भी बिन्दी है। कहेंगे पहले क्यों नहीं यह बताया। ड्रामा में नहीं था। पहले ही तुमको यह सुनायें तो तुम समझ न सको। धीरे-धीरे समझाते रहते हैं। यह है रावण राज्य। रावण राज्य में सब देह-अभिमानी बन जाते हैं। सतयुग में होते हैं आत्म-अभिमानी। अपने को आत्मा जानते हैं। हमारा शरीर बड़ा हुआ है, अब यह छोड़कर फिर छोटा लेना है। आत्मा का शरीर पहले छोटा होता है फिर बड़ा होता है। यहाँ तो कोई की कितनी आयु, कोई की कितनी। कोई की अकाले मृत्यु हो जाती है। कोई-कोई की 125 वर्ष की भी आयु होती है। तो बाप समझाते हैं तुमको खुशी बहुत होनी चाहिए - बाप से वर्सा लेने की। गन्धर्वी विवाह किया यह कोई खुशी की बात नहीं, यह तो कमज़ोरी है। कुमारी अगर कहे हम पवित्र रहना चाहते हैं तो कोई मार थोड़ेही सकते हैं। ज्ञान कम है तो डरते हैं। छोटी कुमारी को भी अगर कोई मारे, खून आदि निकले तो पुलिस में रिपोर्ट करे तो उसकी भी सज़ा मिल सकती है। जानवर को भी अगर कोई मारते हैं तो उन पर केस होता है, दण्ड पड़ता है। तुम बच्चों को भी मार नहीं सकते। कुमार को भी मार नहीं सकते। वह तो अपना कमा सकते हैं। शरीर निर्वाह कर सकते हैं। पेट कोई जास्ती नहीं खाता है - एक मनुष्य का पेट 4-5 रूपया, एक मनुष्य का पेट 400-500 रूपया। पैसा बहुत है तो हबच हो जाती है। गरीबों को पैसे ही नहीं तो हबच भी नहीं। वह सूखी रोटी में ही खुश होते हैं। बच्चों को जास्ती खान-पान के हंगामें में भी नहीं जाना चाहिए। खाने का शौक नहीं रहना चाहिए।

तुम जानते हो वहाँ हमें क्या नहीं मिलेगा! बेहद की बादशाही, बेहद का सुख मिलता है। वहाँ कोई बीमारी आदि होती नहीं। हेल्थ वेल्थ हैप्पीनेस सब रहता है। बुढ़ापा भी वहाँ बहुत अच्छा रहता। खुशी रहती है। कोई प्रकार की तकलीफ नहीं रहती है। प्रजा भी ऐसी बनती है। परन्तु ऐसे भी नहीं - अच्छा, प्रजा तो प्रजा ही सही। फिर तो ऐसे होंगे जैसे यहाँ के भील। सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण बनना है तो फिर इतना पुरूषार्थ करना चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) हम ब्रह्मा की नई रचना आपस में भाई-बहन हैं, यह अन्दर समझना है किसी को कहने की दरकार नहीं। सदा इसी खुशी में रहना है कि हमें शिवबाबा पढ़ाते हैं।

2) खान-पान के हंगामें में जास्ती नहीं जाना है। हबच (लालच) छोड़ बेहद बादशाही के सुखों को याद करना है।

वरदान:-

माया के सम्बन्धों को डायवोर्स दे बाप के सम्बन्ध से सौदा करने वाले मायाजीत, मोहजीत भव

अब स्मृति से पुराना सौदा कैन्सिल कर सिंगल बनो। आपस में एक दो के सहयोगी भल रहो लेकिन कम्पेनियन नहीं। कम्पेनियन एक को बनाओ तो माया के सम्बन्धों से डायवोर्स हो जायेगा। मायाजीत, मोहजीत विजयी रहेंगे। अगर जरा भी किसी में मोह होगा तो तीव्र पुरूषार्थी के बजाए पुरूषार्थी बन जायेंगे इसलिए क्या भी हो, कुछ भी हो खुशी में नाचते रहो, मिरूआ मौत मलूका शिकार - इसको कहते हैं नष्टोमोहा। ऐसा नष्टोमोहा रहने वाले ही विजय माला के दाने बनते हैं।

स्लोगन:-

सत्यता की विशेषता से डायमण्ड की चमक को बढ़ाओ।

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विश्व और भारत महत्वपूर्ण दिवस


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31 अगस्त (रशिया) स्वतंत्रता दिवस मनाया गया.ाारतीय मूल निवासीयोंने भारतीय स्वतंत्रता दिवस मनया तथा इस अवसपर पर भ्राता गांधी, सेंट पिटर्सबर्ग में भारत के कॉन्सील को राखी बांधी गई.

26 अगस्त (अहमदाबाद) मुख्यमंत्रीजी को राखी बांधी. भ्राता नरेंद्र मोदीजी को ब्र.कु. सरला बहनजीने राखी बांधी .

25 अगस्त (बेंगलौर) विश्वकी सबसे बड़ी राखी. ब्राहमाकुमारीज् द्वारा आयोजित वि·ा की सबसे बडी राखी का लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड दर्ज किया गया.

Top Stories प्रमुख समाचार : मार्च  2014 


 

4 अप्रैल (आसनमोल) आध्यात्मिक प्रदर्शनी का आयोजन.

3 अप्रैल (ग्वालियर) महिला दिवस पर कार्यक्रम सम्पन्न.

2 अप्रैल (ग्वालियर) विचार दिवस समारोह.

1 अप्रैल (आबूरोड) बर्फानी बाबा के साथ बेटी बचाओ जनसंवर्धन का संदेश.

31 मार्च (भोपाल) शिवनी बहन का कार्यक्रम.

30 मार्च (बेलापूर) शान्तियात्रा का आयोजन

29 मार्च (भिलाई ) ओमशान्ति चौक का लोकार्पण.

28 मार्च (मार्गो:गोवा ) दादाजीने किया उदघाटन.

27 मार्च (भिलाई) शिवदर्शन यात्रा का आयोजन

26 मार्च (सायन:मुंबई) शांती उद्यान में महिला दिवस

25 मार्च (गुलबर्गा) 47 फिट शिवलिंग का भव्य आयोजन.

24 मार्च (नेपाल) फ्यूचर ऑफ पावर.

23 मार्च (शांतीवन) रेडिओ मधुबन ने मनाया महिला दिवस.

22 मार्च (बार्शी) महिला दिवस मनाया गया

21 मार्च (मनीपाल:कर्ना.) 35 फिट महाशिवलिंग.

20 मार्च (विलेपार्ले:मुंबई) टीवी तथा फिल्म कलाकरोंने मनाई शिवरात्री.

19 मार्च (चेंबुर:मुंबई) 40 फिट शिवलिंग दर्शन.


18 मार्च (मुंबई) नारी सुरक्षा, हमारी सुरक्षा.

17 मार्च (बैंगलौर) शिवजयंती महोत्सव.

16 मार्च (बार्शी) शिवजयंती महोत्सव

15 मार्च (चेन्नई) बारा ज्योतिलिंगम् दर्शन.

14 मार्च (बेलापूर:मुंबई) शिवजयंती महोत्सव.


13 मार्च (अजमेर) भव्य शिवलिंग का निर्माण.

12 मार्च (केशोद) शिवजयंती महोत्सव.

11 मार्च (मालाड:लिबर्टी गार्डन) गीतकार श्रवणकुमार पहुंचे शिवरात्रीपर

10 मार्च (कोरबा) शिव शंकर झाँकि.

09 मार्च (ग्वालियर) शिवजयंती महोत्सव.

08 मार्च (नासिक) डो. भटकर सेवाकेंद्रपर.

07 मार्च (मालाड:दिडोंशी) सड़क निर्माण में ब्र.कु. योगदान.

06 मार्च (ग्वालीयर:दिनलयाल नगर) शिवपार्वती झाँकि

05 मार्च (बाणेर) अमरनाथ की भव्य गुफाये

04 मार्च (बेलगाम) विश्व की सबसे बडी पतंग

03 मार्च (शांतीवन) शिव ध्वज लहराया

02 मार्च (हातीना:गुज) महिला सम्मेलनसंपन्न.

01 मार्च (गुडगांव) ओआरसी में प्रशासक डायलाग.

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कोच्चि: केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री, माननीय। मुरलीधरन ने ब्रह्म कुमारियों का नया मलयालम चैनल लॉन्च किया - मलयाली को समर्पित राजयोग टीवी मलयालम। यह एक पूर्ण चैनल है जो हमारी ज़रूरत की हर चीज़ वितरित करता है। भारतीय दर्शन विज्ञान और अध्यात्म का सामंजस्य है। यह चैनल ब्रह्म कुमारियों की मानवता की समग्र दृष्टि का प्रमाण है। मंत्री ने अपने…

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मध्यप्रदेश के राज्य कैबिनेट मंत्री ने आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र प्रदान किया मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश सरकार ने आपदा प्रबंधन में ब्रह्मा कुमारिस संगठन के प्रयासों की सराहना की। मध्य प्रदेश सरकार में पशुपालन और मत्स्यपालन मंत्री और प्रभारी मंत्री श्री लखन सिंह यादव, मुरैना जिला कलेक्टर, प्रियंका दास के साथ, प्रशासन की ओर से इस…

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