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03/09/17

03/09/17 मधुबन "अव्यक्त-बापदादा" ओम् शान्ति 24-10-81


"सच्चे आशिक की निशानी"

आज बाप कहाँ आये हैं और किन्हों से मिलने आये हैं, जानते हो? किस रूप से विशेष मिलने आये हैं? जैसे बाप का रूप वैसे बच्चों का रूप। तो आज किस रूप से बाप मिलने आये हैं, जानते हो? लोगों ने यह जो गलती कर दी है कि परमात्मा के अनेक रूप हैं, यह गलती है वा राइट है? इस समय बाप अनेक सम्बन्धों के अनेक रूपों से मिलते हैं। तो एक के अनेक रूप, सम्बन्ध के आधार से वा कर्तव्य के आधार से प्रैक्टिकल में हैं ना। तो भक्त भी राइट हैं ना। आज किस रूप में बाप मिलने आये हैं और कहाँ मिल रहे हैं? आज की मुरली में (सवेरे) वह सम्बन्ध सुना है। तो बाप कौन हुआ और आप कौन हुए? आज रूहानी माशूक रूहानी आशिकों से मिलन मनाने आये हैं। कहाँ मिलने आये हैं? सबसे ज्यादा मिलने का प्रिय स्थान कौन-सा है? रूहानी माशूक आप आशिकों को आदि के समय में कहाँ पर ले जाते थे, याद है ना? (सागर पर) तो आज भी सर्व खजानों और गुणों से सम्पन्न, सागर के कण्ठे पर, साथ में ऊंची स्थिति की पहाड़ी पर, शीतलता की चांदनी में रूहानी माशूक, रूहानी आशिकों से मिल रहे हैं। सागर है सम्पन्नता का और पहाड़ी है ऊंची स्थिति की। सदा शीतल स्वरूप है चांदनी। तीनों ही साथ में हैं। आज रूहानी आशिकों को देख रूहानी माशूक हर्षित हो रहे हैं और कौन-सा गीत गाते हैं? (हरेक अपना-अपना गीत सुना रहे हैं) वैसे तो एक ही गीत सुन सकते हैं लेकिन बाप सभी का गीत सुन सकते हैं। आशिक अपना गीत गा रहे हैं और माशूक गीत का रेसपान्ड कर रहे हैं। जो भी गीत गाओ सब ठीक है। हर एक के स्नेह के बोल बाप स्नेह से ही सुनते हैं। आशिकों को माशूक को याद करना सहज है ना? सहज और निरन्तर याद का सम्बन्ध और स्वरूप यह रूहानी आशिक और माशूक का है। याद करना नहीं पड़ता लेकिन याद भुलाते भी भूल नहीं सकती।
आज हर एक आशिक के स्नेह को देख क्या देखा? आशिक अनेक और माशूक एक। लेकिन अनेक अनुभव यही कहते हैं कि मेरा माशूक क्योंकि स्नेह का सागर रूहानी माशूक है! तो सागर बेहद है इसलिए जितने भी, जितना भी स्नेह लें फिर भी सागर अखुट और सम्पन्न है इसलिए मुझे कम, तुम्हें ज्यादा यह बातें नहीं। लेने वाले जितना लें। स्नेह के भण्डार भरपूर हैं। लेने वाले लेने में नम्बरवार हो जाते हैं लेकिन देने वाला सबको नम्बरवन देता है। लेने वाले समाने में नम्बरवार हो जाते हैं। प्यार करना सबको आता है लेकिन तोड़ निभाने में नम्बर हो जाते हैं। “मेरा माशूक” सब कहते हैं लेकिन मेरा कहते भी क्या करते हैं? जानते हो क्या करते हैं? आज तो रूहरिहान करने आये हैं, मुरली चलाने नहीं आये हैं। तो बताओ क्या करते हैं? मेरा भी कहते लेकिन कभी-कभी कहाँ फेरा भी लगाकर आते हैं। फिर फेरा लगाने के बाद जब थक जाते हैं तब फिर कहते हैं “मेरा माशूक”। और कई आशिक नाज़ भी बहुत करते हैं। क्या नाज़ करते हैं? (दीदी - दादी को) नाज़-नखरे तो साकार में आपके आगे ही बहुत दिखाते हैं ना। इतना नाज़ दिखाते हैं - हम तो ऐसे करेंगे, हम तो ऐसे चलेंगे, आपका काम है हमें बदलना। हम तो ऐसे ही हैं। बाप की बातें बाप को सुनाने का नाज़ रखते हैं। एक बोल तो अच्छी तरह से याद करते हैं - “जैसी भी हूँ, कैसी भी हूँ लेकिन आपकी हूँ” माशूक भी कहते - हो तो हमारी लेकिन जोड़ी तो ठीक बनो ना! अगर समान जोड़ी नहीं होगी तो दृश्य देखने वाले क्या कहेंगे? माशूक सजा-सजाया और आशिक बिना श्रृंगारी हुई, शोभेगी? तो आप स्वयं ही सोचो - वह चमकीली ड्रेस वाले और आशिक काली ड्रेस वाली वा दागों वाली ड्रेस पहने हुए, तो अच्छा लगेगा? क्या समझते हो? फिर कहते क्या हैं? हमारे दागों को मिटाना तो आपका काम है। लेकिन जब माशूक ड्रेस ही परिवर्तन कर देते हैं, तो वह क्यों नहीं पहनते! दाग मिटाने में भी समय क्यों गंवायें! माशूक का बनना अर्थात् सबका परिवर्तन होना। तो पुरानी काली, अनेक दागों वाली ड्रेस की स्मृति क्यों लाते हो अर्थात् बार-बार धारण क्यों करते हो? चमकीली ड्रेस वाले चमकते हुए श्रृंगारधारी बन माशूक के साथ चमकीली दुनिया में क्यों नहीं रहते! वहाँ कोई दाग लग ही नहीं सकता।
तो हे आशिकों, सदा माशूक समान सम्पन्न और सदा चमकीले स्वरूप में अर्थात् सम्पूर्ण स्वरूप में स्थित रहो। माशूक को और भी एक बात की मेहनत करनी पड़ती है। जानते हो किस बात की मेहनत करनी पड़ती है? वह भी रमणीक बात है। जो वायदा किया है माशूक ने आशिकों के साथ, कि “साथ ले जायेंगे”। तो क्या करते हैं? माशूक है बहुत हल्का और आशिक इतने भारी बन जाते, जो माशूक को ले जाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। तो यह भी जोड़ी अच्छी लगेगी? माशूक कहते हैं हल्के बन जाओ। तो क्या करते हैं? हल्के होने का साधन जो एक्सरसाइज है, वह करते नहीं। तो हल्के कैसे बनें? रूहानी एक्सरसाइज तो जानते हो ना! अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी अव्यक्त फरिश्ता, अभी-अभी साकारी कर्मयोगी। अभी-अभी विश्व सेवाधारी। सेकेण्ड में स्वरूप बन जाना - यह है रूहानी एक्सरसाइज। और कौन-सा बोझ अपने ऊपर रखते हैं? वेस्ट की वेट बहुत है इसलिए हल्के नहीं हो सकते। कोई समय के वेस्ट के वेट में हैं, कोई संकल्पों के और कोई शक्तियों को वेस्ट करते हैं। कोई सम्बन्ध और सम्पर्क वेस्ट अर्थात् व्यर्थ बना लेते हैं। ऐसे भिन्न-भिन्न प्रकार के वेट बढ़ने के कारण माशूक समान डबल लाइट बन नहीं सकते। सच्चे आशिक की निशानी है - “माशूक के समान” अर्थात् माशूक जो है, जैसा है वैसे समान बनना। तो सभी कौन हो? आशिक तो हो ही लेकिन माशूक समान आशिक हो? समानता ही समीपता लाती है! समानता नही तो समीप भी नहीं हो सकते। गायन भी करते हैं 16 हजार पटरानियां थीं। 16 हजार में भी नम्बर तो होंगे ना! एक माशूक के इतने आशिक दिखाये तो हैं लेकिन अर्थ नहीं समझते हैं। रूहानियत को भूल गये हैं। तो आज रूहानी माशूक, आशिकों को कहते हैं- “समान बनो” अर्थात् समीप बनो। अच्छा।
चांदनी में बैठे हो ना? शीतल स्वरूप में रहना अर्थात् चांदनी में बैठना। सदा ही चांदनी रात में रहो। चांदनी रात में ड्रेस भी स्वत: चमकीली हो जायेगी। जहाँ देखेंगे वहाँ चमकते हुए दिखाई देंगे। और सदा सागर के कण्ठे पर रहो अर्थात् सदा सागर समान सम्पन्न स्थिति में रहो। समझा कहाँ रहना है? माशूक को यही किनारा प्रिय है। अच्छा।
सदा माशूक समान, साथ से साथ, हाथ में हाथ अर्थात स्नेही और सहयोगी, साथ अर्थात् स्नेह, हाथ अर्थात् सहयोग, ऐसे मेरा तो एक माशूक दूसरा न कोई, ऐसी स्थिति में सदा सहज रहने वाले, ऐसे सच्चे आशिकों को रूहानी माशूक का याद-प्यार और नमस्ते।
आज देहली और गुजरात आया है। दिल्ली वाले यह तो नहीं समझते हैं कि हमारे यहाँ जमुना का किनारा है, सागर तो है नहीं। संगम पर सागर है और भविष्य में नदी का किनारा है। संगम में खेला भी सागर के किनारे पर है ना। तो संगम पर है सागर का किनारा और भविष्य की बातें हैं जमुना का किनारा। तो देहली और गुजरात का क्या सम्बन्ध है? देहली है जमुना का किनारा और गुजरात है गरबा करने वाले। तो किनारे पर रास मशहूर है ना, जमुना किनारे पर। इसीलिए दिल्ली और गुजरात दोनों आ गये हैं। अच्छा - विदेश भी आया है। विदेश वाले जैसे अभी निमंत्रण देते हैं ना, आओ चक्कर लगाने आओ। दीदी आवे, दादी आवे, फलाने आवें, तो जैसे अभी चक्कर लगाने जाते हो - थोड़े टाइम के लिए, ऐसे ही भविष्य में भी चक्कर लगाने जायेंगे। सेकेण्ड में पहुँचेंगे। देरी नहीं लगेगी क्योंकि एक्सीडेंट तो होगा नहीं इसलिए स्पीड की कोई लिमिट की आवश्यकता नहीं। एक ही दिन में सारा चक्कर लगा सकते हो। सारा वर्ल्ड एक दिन में घूम सकते हो। यह एटम एनर्जी आपके काम में आनी है। रिफाइन करने में लगे हुए हैं ना। यह आप लोगों को कोई दु:ख नहीं देगी। सबसे ज्यादा सेवा कौन-सा तत्व करेगा? सूर्य। सूर्य की किरणें भिन्न-भिन्न प्रकार की कमाल दिखायेंगी। यह सब आपके लिए तैयारियां हो रही हैं। गैस जलाने की, कोयले जलाने की, लकड़ी जलाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। सबसे छूट जायेंगे। अच्छा - बहुत रंगत देखते जायेंगे। वह मेहनत करेंगे और आप फल खायेंगे। फिर यह वायर्स (तारें) वगैरा लगाने की भी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। बिना मेहनत के नैचुरल नेचर द्वारा नैचुरल प्राप्ति हो जायेगी। लेकिन इसके लिए, नेचर के सुख लेने के लिए भी अपनी आरिज्नल नेचर को बनाओ, तब नेचर द्वारा सर्व सुखों को प्राप्त कर सकेंगे। नैचुरल नेचर अर्थात् अनदि संस्कार। सुनते हुए भी अच्छा लगता है तो जब प्रालब्ध में होंगे तो कितना अच्छा लगेगा! जैसे यहाँ पंछी उड़ते हैं, वैसे वहाँ विमान उड़ेंगे। कितने होंगे? जैसे यहाँ पंछियों का संगठन लाइन में जाता है, वैसे विमानों के संगठन जायेंगे। ऐसे नहीं एक जायेगा तो दूसरा नहीं जा सकेगा। ऐसे भिन्न-भिन्न डिज़ाइन में जायेंगे। राज्य फैमिली अपनी डिज़ाइन में जायेगी, साहूकार अपनी डिज़ाइन में जायेंगे। जहाँ चाहो वहाँ उतार लो। अभी प्रकृतिजीत बनो तो प्रकृति दासी बनेगी। अभी प्रकृतिजीत कम तो प्रकृति दासी भी कम होगी! समझा - अच्छा।
मधुबन निवासियों से:-
मधुबन निवासी कौन हैं? मधुबन निवासियों को कौन सा टाइटल देंगे? नया कोई टाइटल सुनाओ? इस समय कौन सी चीज़ मधुबन में लगाई है? फोटोस्टेट मशीन लगाई है ना। तो मधुबन निवासी फोटो स्टेट कापी है। जैसे बाप वैसे बच्चे। उस मशीन में हूबहू होता है ना। मशीन की यही विशेषता है ना, जो ज़रा भी फर्क नहीं आता। तो मधुबन निवासी फोटो कापी हो। मधुबन है मशीन और मधुबन निवासी हैं फोटो। तो आपके हर कर्म विधाता की कर्म रेखायें बतायें। कर्म द्वारा ही भाग्य की लकीर खींचते हो तो आप सबका हर कर्म श्रेष्ठ भाग्य की कर्म की लकीर खींचने वाला हो। जैसे बापदादा का हर कर्म स्व के प्रति और अनेकों के प्रति भाग्य की लकीर खीचने वाला रहा, ऐसे ही बाप समान। मधुबन में इतने साधन, इतना सहयोग, इतना श्रेष्ठ संग प्राप्त है, अप्राप्त नहीं कोई वस्तु... मधुबन के भण्डारे में, तो सर्व प्राप्तिवान क्या हो गये? सम्पूर्ण हो गये ना। किस बात की कमी है? अगर कमी है तो स्व के धारणा की। मधुबन वालों का सदा एक निज़ी संस्कार इमर्ज रूप में होना चाहिए। वह कौन सा, कर्म में सफलता पाने के लिए ब्रह्मा बाप का निज़ी संस्कार कौन सा था, जो आप सबका भी वही संस्कार हो? हाँ जी के साथ-साथ “पहले आप”, “पहले मैं” नहीं, पहले आप। जैसे ब्रह्मा बाप ने पहले जगत-अम्बा को किया ना। कोई भी स्थान में पहले बच्चे, हर बात में बच्चों को अपने से आगे रखा। जगत-अम्बा को अपने आगे रखा। “पहले आप” वाला ही “हाँ जी” कर सकता है इसलिए मुख्य बात है “पहले आप” लेकिन शुभ भावना से। कहने मात्र नहीं, लेकिन शुभचिन्तक की भावना से। शुभ भावना और श्रेष्ठ कामना के आधार से ‘पहले आप' करने वाला स्वयं ही पहले हो जाता है। पहले आप कहना ही पहला नम्बर होना है। जैसे बाप ने जगदम्बा को पहले किया, बच्चों को पहले किया लेकिन फिर भी नम्बरवन गया ना। इसमें कोई स्वार्थ नहीं रखा, नि:स्वार्थ “पहले आप” कहा, करके दिखाया। ऐसे ही पहले आप का पाठ पक्का हो। इसने किया अर्थात् मैंने किया। इसने क्यों किया, मैं ही करूँ, मैं क्यों नहीं करूँ, मैं नहीं कर सकता हूँ क्या! यह भाव नहीं। उसने किया तो भी बाप की सेवा, मैंने किया तो भी बाप की सेवा। यहाँ कोई को अपना-अपना धन्धा तो नहीं है ना। एक ही बाप का धंधा है। ईश्वरीय सेवा पर हो। लिखते भी हो गाडली सर्विस, मेरी सर्विस तो नहीं लिखते हो ना। जैसे बाप एक है, सेवा भी एक है, ऐसे ही इसने किया, मैंने किया वह भी एक। जो जितना करता, उसे और आगे बढ़ाओ। मैं आगे बढ़ूं, नहीं। दूसरों को आगे बढ़ाकर आगे बढ़ो। सबको साथ लेकर जाना है ना। बाप के साथ सब जायेंगे अर्थात् आपस में भी तो साथ-साथ होंगे ना। जब यही भावना हरेक में आ जायेगी तो ब्रह्मा बाप की फोटो स्टेट कापी हो जायेंगे।
मधुबन निवासियों को देखा अर्थात् ब्रह्मा को देखा क्योंकि कापी तो वही है ना। फिर ऐसा कोई नहीं कहेगा कि हमने तो ब्रह्मा बाप को देखा ही नहीं। आपके कर्म, आपकी स्थिति ब्रह्मा बाप को स्पष्ट दिखायें। यह है मधुबन निवासियों की विशेषता क्योंकि मधुबन निवासियों को सब फालो करते हैं। तो मधुबन वाले एक-एक मास्टर ब्रह्मा हो। अभी देखो ब्रह्मा बाप का फोटो किसी को भी दो तो प्यार से सम्भाल लेते हैं, सबसे बढ़िया सौगात इसी को मानते हैं तो आप सब भी ब्रह्मा बाप की फोटो हो जाओ। ब्रह्मा बाप समान हो जाओ तो आप भी अमूल्य सौगात हो जायेंगे। अच्छा।

वरदान:

दिल की तपस्या द्वारा सन्तुष्टता का सर्टीफिकेट प्राप्त करने वाले सर्व की दुआओं के अधिकारी भव

तपस्या के चार्ट में अपने को सर्टीफिकेट देने वाले तो बहुत हैं लेकिन सर्व की सन्तुष्टता का सर्टीफिकेट तभी प्राप्त होता है जब दिल की तपस्या हो, सर्व के प्रति दिल का प्यार हो, निमित्त भाव और शुभ भाव हो। ऐसे बच्चे सर्व की दुआओं के अधिकारी बन जाते हैं। कम से कम 95 परसेन्ट आत्मायें सन्तुष्टता का सर्टीफिकेट दें, सबके मुख से निकले कि हाँ यह नम्बरवन है, ऐसा सबके दिल से दुआओं का सर्टीफिकेट प्राप्त करने वाले ही बाप समान बनते हैं।

स्लोगन:

समय को अमूल्य समझकर सफल करो तो समय पर धोखा नहीं खायेंगे।