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20/09/17

20/09/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - इस समय सभी की तकदीर बिगड़ी हुई है, क्योंकि सब पतित हैं, तुम्हें अब श्रीमत पर सबकी तकदीर जगानी है, पावन बनने की युक्ति बतानी है''

प्रश्न:

सबसे खराब चाल कौन सी है, जिससे बहुत नुकसान होता है?

उत्तर:

एक दो को पत्थर मारना अर्थात् कडुवे बोल बोलकर जख्मी कर देना - यह है सबसे खराब चाल़ इससे बहुत नुकसान होता है। तुम बच्चों को अब रूप-बसन्त बनना है। अच्छे मैनर्स धारण करने हैं। तुम्हारे मुख से सदैव अविनाशी ज्ञान रत्न निकलने चाहिए। आत्मा को भी याद से रूपवान बनाना है और बाप, जो ज्ञान रत्न देते हैं, उनका दान करना है। बहुत मीठे बोल बोलने हैं। कड़ुवे बोल बोलने वाले से किनारा कर लेना है।

गीत:-

भोलेनाथ से निराला...  

ओम् शान्ति।

बाप हमेशा भोले होते हैं। एक होता है हद का बाप, दूसरा होता है बेहद का बाप। बाप तो होते ही हैं - एक लौकिक और दूसरा पारलौकिक। लौकिक बाप को तो सब जानते ही हैं। तुम ब्राह्मण लौकिक बाप और पारलौकिक बाप दोनों को जानते हो। लौकिक बाप भी भोले ही हैं। बच्चे पैदा कर, उनकी सम्भाल कर, मेहनत कर फिर सब बच्चे को दे देते हैं। झूठ आदि बोल करके कमाते हैं कि पिछाड़ी में पुत्र पोत्रे के लिए छोड़ जायें। बाप का बच्चों पर बहुत प्यार होता है। छोटेपन में ही बच्चा बाबा-बाबा कहने लग पड़ता है। बाबुल अक्षर बहुत मीठा है। अब तुम बच्चों ने बेहद के बाप को भी जाना है। बेहद के बाप ने तो कमाल की है। कितनी बेहद की नॉलेज सुनाते हैं। लौकिक बाप तो समझा न सकें। भल धन आदि देते हैं परन्तु बिगड़ी को तो वह बना न सकें। बिगड़ी को बनाने वाला भगवान भोलानाथ ही है। वह कल्प-कल्प सर्व की बिगड़ी को बनाने वाला... सर्व को गति सद्गति देने वाला है। लौकिक बाप टीचर गुरू हमको बेहद का मालिक नहीं बना सकते। बेहद बाप को जानना और रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानना, यह और कोई जानते ही नहीं। तुम्हारे में भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार बच्चों की बुद्धि में है कि यह बेहद का चक्र कैसे फिरता है? बच्चे जानते हैं यह बना बनाया ड्रामा है। वही हमें पुरूषार्थ कराते हैं। हम पुरूषार्थ जरूर करेंगे। कल्प-कल्प जैसे श्रीमत पर पुरूषार्थ किया था, वैसे हर एक कर रहे हैं - अपनी बिगड़ी को बनाने। देखते हैं कि बहनें और भाई सब बिगड़ी को बनाने के पुरूषार्थ में लगे हुए हैं। भारतवासी पुकारते भी हैं कि हे बिगड़ी को बनाने वाले, हे पतित-पावन आओ। रावण ने बिगाड़ा है, जिससे ही धर्म भ्रष्ट, कर्म भ्रष्ट बन पड़े हैं। अब तुम बच्चों ने यह सब बाप द्वारा जाना है। मनुष्य सृष्टि जिसका नाम कल्प वृक्ष है, यह बहुत नामीग्रामी है। जिसका राज़ भी बुद्धि में बैठ गया है। मनुष्य लोग जब तुम्हारे चित्र देखते हैं तो कहते हैं कि यह तो कल्पना है - जो 5 हजार वर्ष का कल्प वृक्ष बनाया है। हम तो इस पर बहुत अच्छी रीति समझाते हैं। कल्प वृक्ष जिसका बनेन ट्री के साथ भी मुकाबला करते हैं। समझाते हैं आदि सनातन देवी-देवता धर्म था, अब वह प्राय:लोप है। ड्रामा प्लैन अनुसार और सब धर्म हैं। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी जो मुख्य स्वर्ग की गाई जाती है, उनको फिर से रिपीट होना है। अच्छी हिस्ट्री-जॉग्राफी है ही स्वर्ग की। सब कहते भी हैं - हमको रामराज्य चाहिए, जिसमें दु:ख का नाम-निशान न हो। अब तो रावण राज्य है परन्तु यह कोई नहीं समझते कि हम ही रावण हैं। यह बातें तुम बच्चों की बुद्धि में हैं। मनुष्यों को तो कुछ भी पता नहीं। बिगड़ी को बनाने वाला कैसे आते हैं, कैसे बिगड़ी को बनाते हैं! पतित को कहेंगे बिगड़े हुए। हमारी बुद्धि अथवा तकदीर कैसे बिगड़ी हुई थी। यह अब तुम्हारी बुद्धि में है। उन्हों की रसम-रिवाज ही रावण की है। तुम्हारी रसम-रिवाज है राम की। राम कोई वह त्रेता वाला नही। उसने गीता नहीं सुनाई थी। आजकल विलायत में भी रामायण आदि सुनाते हैं। कोई-कोई तो गेरू कफनी पहन कुटियाओं में जाकर रहते हैं। अब तुम बच्चों को कोई कुटिया आदि में नहीं रहना है। कुटिया में कब पाठशाला होती है क्या? वहाँ तो फकीर लोग रहते हैं। तुम्हारी तो पढ़ाई है। परन्तु यह है नई गवर्मेन्ट इसलिए कोई समझ न सके कि तुम कौन हो। एक मिनिस्टर को समझाओ तो दूसरा कहेंगे तुम बूद्धू हो। यह है बिल्कुल नई बातें। बाबा समझाते रहते हैं। करेक्शन भी करते जाओ। ब्रह्माकुमार कुमारियों के आगे प्रजापिता ब्रह्मा जरूर लिखना चाहिए। प्रजापिता कहने से बाप सिद्ध हो जाता है। हम प्रश्न ही पूछते हैं कि प्रजापिता ब्रह्मा से क्या सम्बन्ध है? क्योंकि ब्रह्मा नाम तो बहुतों के हैं। कोई फीमेल का नाम भी ब्रह्मा है। प्रजापिता नाम तो किसका होता नहीं, इसलिए प्रजापिता अक्षर बहुत जरूरी है। प्रजापिता आदि देव कहते हैं। परन्तु आदि देव का अर्थ नहीं समझते। प्रजापिता तो जरूर यहाँ ही होगा ना। आदि देव फिर वह ब्रह्मा (सूक्ष्म) हो जाता है। आदि अर्थात् शुरूआत का। प्रजापिता ब्रह्मा को फिर बेटी है सरस्वती। सूक्ष्मवतन में तो बेटी हो न सके। रचयिता तो यहाँ है ना। इन गुह्य बातों को विशालबुद्धि वाले ही धारण कर सकते हैं। धारणा के साथ मैनर्स भी चाहिए। जो कोई भी देख खुश हो। तुम्हारा बोल जो निकलता है उनको रत्न कहा जाता है। बाप रूप-बसन्त है। आत्मा को रूपवान बनाते हैं। अब तो आत्मा काली कुरूप है, उनको योग से रूपवान बनाना है।
तुम बच्चे अभी रूप-बसन्त बनते हो। मुख से सदैव अविनाशी ज्ञान रत्न निकलते हैं। बच्चों के मैनर्स बहुत मीठे होने चाहिए। मुख से हमेशा रत्न ही निकलने चाहिए। बहुत हैं जो पत्थर ही मारते हैं। बाप ज्ञान रत्न देते हैं। तुम बच्चों का भी यही धन्धा है। एक दो को पत्थर मारना - यह तो बड़ी खराब चाल है। अपना नुकसान कर देते हैं। बाप है ज्ञान का सागर। उसका रूप भी समझाया है कि कितना सूक्ष्म है। वह तो लिंग कह देते हैं। पहले तो बाप का परिचय देना है। भल वह ज्योर्तिलिंगम ही समझें। डीप बात बाद में समझानी होती है। फिर पूछना होता है आत्मा का रूप क्या है? यह तो सब कहते हैं भृकुटी के बीच में चमकती है। तो जरूर छोटी ही होगी। बड़ा लिंग तो यहाँ बैठ भी न सके। गोला निकल आये। पहले तो बाप और बच्चे का सम्बन्ध बुद्धि में बिठाना चाहिए। वह तो है बेहद का बाप। अब ब्रह्मा कहाँ से आता है? बाप आकर इनको एडाप्ट करते हैं अर्थात् इसमें प्रवेश करते हैं। तुम्हारी एडाप्शन अलग है, इनकी अलग है। बाप इसमें प्रवेश करते हैं। बाप कहते हैं यह मेरी स्त्री है, मैंने एडाप्ट किया है। मैं इनमें प्रवेश हो कहता हूँ तुम हमारी मुख वंशावली हो। मैंने तुमको ब्रह्मा मुख से रचा है। मुझे तो अपना मुख है नहीं। शिव कैसे कहेंगे मेरी मुख वंशावली। कितना अच्छी रीति समझाया जाता है। बाप कहते हैं तुम सब आत्मायें मेरे बच्चे हो। भाई-बहन हो। बुद्धि में यह आना चाहिए। बाप स्वर्ग रचने वाला है। तो हमको स्वर्ग की राजाई क्यों नहीं मिलनी चाहिए। स्वर्ग में तो सब नहीं जा सकते। बाप कहते हैं सर्व की सद्गति करता हूँ। तुम मुक्ति में जाकर फिर पार्ट बजाने आते हो नम्बरवार। मुक्ति सबको मिलती है। माया के दु:ख से सब छूट सकते हैं। फिर नम्बरवार आना होगा पार्ट बजाने। जीवनमुक्ति में पहले-पहले तुम जाते हो, क्योंकि तुम राजयोग सीखते हो ना। जिन्होंने कल्प पहले आकर सीखा है वही आकर सीखेंगे - ड्रामा अनुसार। ड्रामा सामने खड़ा है ना। अभी तो अनेक धर्म हैं। सतयुग में एक धर्म था। सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी धर्म किसने स्थापन किया? यह कोई नहीं जानते। तुम जानते हो परमपिता परमात्मा ही ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय धर्म स्थापन करते हैं। बिगड़ी को सुधारने वाला बरोबर एक बाप ही है। सतयुग में तो बुलायेंगे नहीं कि बिगड़ी को बनाने वाले आओ। यहाँ तकदीर बिगड़ी हुई है। राहू की दशा बैठी हुई है। ऊंच ते ऊंच ब्रहस्पति की दशा थी। अब आकर राहू की दशा बैठी है। सारे विश्व पर राहू का ग्रहण लगा हुआ है। सारी दुनिया काली बन गई है। गोल्डन एजेड वर्ल्ड को ग्रहण लगते-लगते कला कम होते-होते आखरीन आइरन एजेड वर्ल्ड बन जाता है। अब बाप कहते हैं कि दे दान तो छूटे ग्रहण। योगबल से माया रावण को जीतना है। विकारों का दान दिया जाता है तो ग्रहण छूट जाता है। हम सर्वगुण सम्पन्न... बन जाते हैं। बेहद की बात हुई ना। अभी आत्मा में कोई कला नहीं रही है इसलिए शरीर भी ऐसे तमोप्रधान मिलते हैं। जैसे सोने में कैरेट होती है ना। 14 कैरेट 18 कैरेट, अभी तो मनुष्यों में कोई कैरेट नहीं रही है। कुछ भी अक्ल नहीं है। बाप कहते हैं मैंने तुमको कितना समझदार बनाया था। तुमको स्वर्ग में भेजा था फिर तुम 84 जन्म लेते-लेते क्या बन पड़े हो। अनेक बार यह चक्र लगाया है। कल्प-कल्प राज्य लेते हो फिर गँवाते हो। पुनर्जन्म लेने से वृद्धि तो सबकी होती रहती है। बच्चों को बुद्धि में बहुत नशा चढ़ना चाहिए। अब राजधानी स्थापन हो रही है। फूलों का बगीचा स्थापन होता है संगम पर। संगम को तुम ब्राह्मण ही जानते हो। यहाँ तुम बच्चों को रत्न मिलते हैं। फिर बाहर जाने से पत्थर मारने लग पड़ते हैं। माया जख्मी कर देती है। उनको कहेंगे पाप आत्मा। बाप कहते हैं अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान करो। एक दो को तुम पत्थर मारते-मारते एकदम पत्थरबुद्धि बन पड़े हो। अब तुम्हारी बुद्धि लोहा से सोना जैसी बन रही है। फिर तुम पत्थर क्यों मारते हो! अगर कोई उल्टी बातें सुनाये तो समझो यह हमारा दुश्मन है। ऐसे का संग कभी नहीं करना, न सुनना। निंदा आदि एक दो की तो बहुत सुनायेंगे। कोई-कोई में निंदा करने की आदत होती है। तो वह कब अच्छी बात नहीं सुनायेंगे, जिससे कल्याण हो। बाबा हमेशा समझाते हैं कि ज्ञान रत्न दान करते रहो। बाबा जो सुनाते हैं वह औरों को सुनाओ। सर्विस का उजूरा तो बच्चों को मिलना ही है। आपेही अपना कल्याण करना है। किसकी ग्लानी नहीं करनी है। तुम बच्चों पर बड़ी रेसपान्सिबिलिटी है। बाप काँटों से फूल बनाने आये हैं तो बच्चों का भी यही धन्धा है। बाप यह धन्धा सिखलाते हैं। तो यह मनुष्य को देवता, काँटों को फूल बनाने की फैक्ट्री हुई ना। तुम्हारा ज्ञान मटेरियल है जिससे तुम मनुष्य से देवता बनते हो। तो वह हुनर सीखना चाहिए ना। बिगड़ी को बनाते रहो। पत्थर-बुद्धि को पारसबुद्धि बनाओ।
यह तुम्हारी गॉडली मिशनरी है। जैसे क्रिश्चियन की मशीनरी है। वह औरों को क्रिश्चियन बनाते हैं। तुम्हारी ईश्वरीय मिशनरी है पतितों को पावन बनाने की। पतित-पावन गाते हैं तो जरूर आया होगा। मिशनरी जारी की होगी, तब तो पतित से पावन बनें। रावण की मशीनरी है पावन को पतित बनाना। राम की मशीनरी है पतितों को पावन बनाना। मुख्य है ही योग। बापदादा जिससे स्वर्ग की बादशाही का वर्सा मिलता है उनको याद भला क्यों नहीं करेंगे। सारा कल्प तो देहधारी को याद किया है। अब याद करना है - विदेही को, विचित्र को। जिनका कोई चित्र नहीं, उनको आना जरूर पड़ता है। गाया भी जाता है ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण देवता क्षत्रिय धर्म की स्थापना। यह तो सीधी बात है। ब्राह्मणों का दूसरा कोई है भी नहीं। तुम जानते हो शिवबाबा हमारा टीचर भी है, सतगुरू भी है। सतगुरू तो एक ही है। ब्रह्मा का भी वह गुरू हो गया। विष्णु का गुरू नहीं कहेंगे। ब्रह्मा का गुरू बन उनको विष्णु देवता बनाया है। शंकर का भी गुरू कैसे हो सकता। शंकर तो पतित बनता ही नहीं। उनको गुरू की क्या दरकार है। ब्रह्मा तो 84 जन्म लेते हैं। विष्णु वा शंकर के 84 जन्म नहीं कहेंगे। कितनी अच्छी धारण करने और कराने की बातें हैं। जो धारण करते और कराते हैं वही ऊंच पद पाते हैं। धारणा नहीं करेंगे तो पद भी कम हो जायेगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) निंदा करने वाले का संग कभी भी नहीं करना है। न ग्लानी करनी है, न सुननी है। बुद्धि को पारस बनाने के लिए मुख से ज्ञान रत्नों का दान करना है।

2) ज्ञान मटेरियल से मनुष्यों को देवता, काँटों को फूल बनाने की सेवा करनी है। अपना और सर्व का कल्याण करने का ही धन्धा करना है।

वरदान:

सर्व आत्माओं के अशुभ भाव और भावना का परिवर्तन करने वाले विश्व परिवर्तक भव!

जैसे गुलाब का पुष्प बदबू की खाद से खुशबू धारण कर खुशबूदार गुलाब बन जाता है। ऐसे आप विश्व परिवर्तक श्रेष्ठ आत्मायें अशुभ, व्यर्थ, साधारण भावना और भाव को श्रेष्ठता में, अशुभ भाव आर भावना को शुभ भाव और भावना में परिवर्तन करो, तब ब्रह्मा बाप समान अव्यक्त फरिश्ता बनने के लक्षण सहज और स्वत: आयेंगे। इसी से माला का दाना, दाने के समीप आयेगा।

स्लोगन:

अनुभवी स्वरूप बनो तो चेहरे से खुशनसीबी की झलक दिखाई देगी।