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08/10/17

08/10/17 मधुबन "अव्यक्त-बापदादा" ओम् शान्ति 26-01-83


"दाता के बच्चे बन सर्व को सहयोग दो"

आज बापदादा अपने सेवाधारी साथियों से मिलने आये हैं, जैसे बापदादा ऊंचे ते ऊंचे स्थान पर स्थित हो बेहद की सेवा अर्थ निमित्त हैं, ऐसे ही आप सभी भी ऊंचे ते ऊंचे साकार स्थान पर स्थित हो बेहद की सेवा प्रति निमित्त हो। जिस स्थान के तरफ अनेक आत्माओं की नज़र है। जैसे बाप के यथार्थ स्थान को न जानते हुए भी फिर भी सबकी नजर ऊंचे तरफ जाती है, ऐसे ही साकार में सर्व आत्माओं की नजर इस महान स्थान पर ही जा रही है और जायेगी। 'कहाँ पर है' अभी तक इसी खोज में हैं। समझते हैं कि कोई श्रेष्ठ ठिकाना मिले। लेकिन यही वह स्थान है, इसकी पहचान के लिए चारों ओर परिचय देने की सेवा सभी कर रहे हैं। यह बेहद का विशेष कार्य ही इसी सेवा को प्रसिद्ध करेगा कि मिलना है वा पाना है तो यहाँ से। यही अपना श्रेष्ठ ठिकाना है। विश्व के इसी श्रेष्ठ कोने से ही सदाकाल का जीयदान मिलना है। इस बेहद के कार्य द्वारा यह एडवरटाइज विशाल रूप में होनी है, जैसे धरती के अन्दर कोई छिपी हुई वा दबी हुई चीजें अचानक मिल जाती हैं तो खुशी-खुशी से सब तरफ प्रचार करते हैं। ऐसे ही यह आध्यात्मिक खजानों की प्राप्ति का स्थान जो अभी गुप्त है, इसको अनुभव के नेत्र द्वारा देख ऐसे ही समझेंगे जैसे गँवाया हुआ, खोया हुआ गुप्त खजाने का स्थान फिर से मिल गया है। धीरे-धीरे सबके मन से, मुख से यही बोल निकलेंगे कि ऐसे कोने में इतना श्रेष्ठ प्राप्ति का स्थान। इसको तो खूब प्रसिद्ध करो। तो विचित्र बाप, विचित्र लीला और विचित्र स्थान, यही देख-देख हर्षित होंगे। वन्डरफुल बात है, वन्डरफुल कार्य है यही सबके मुख से सुनते रहेंगे। ऐसे सदाकाल की अनुभूति कराने के लिए क्या-क्या तैयारियाँ की हैं।

हाल तो तैयार कर रहे हैं, हाल के साथ चाल भी ठीक है? हाल के साथ चाल भी देखेंगे ना। तो हाल और चाल दोनों ही विशाल और बेहद है ना। जैसे मजदूरों से लेकर बड़े-बड़े इन्जीनियर्स, दोनों के सहयोग और संगठन से हाल की सुन्दर रूप रेखा तैयार हुई है, अगर मजदूर न होते तो इन्जीनियर भी क्या करते। वे कागज पर प्लैन बना सकते हैं, लेकिन प्रैक्टिकल स्वरूप तो बिना मजदूरों के हो नहीं सकता। तो जैसे स्थूल सहयोग के आधार पर सर्व की अंगुली लगने से हाल तैयार हो गया है। वैसे हाल के साथ वन्डरफुल चाल दिखाने के लिए ऐसा विशेष स्वरूप प्रत्यक्ष रूप में दिखाओ। सिर्फ बुद्धि में संकल्प किया, यह नहीं। लेकिन जैसे इन्जीनियर के बुद्धि की मदद और मजदूरों के कर्म की मदद से कार्य सम्पन्न हुआ। इसी रीति मन के श्रेष्ठ संकल्प साथ-साथ हर कर्म द्वारा भी विचित्र चाल का अनुभव हो। प्रत्यक्ष स्वरूप हर कर्म द्वारा ही दिखाई देता है। तो ऐसे चलने और करने को संकल्प, वाणी हाथ वा पाँव द्वारा संगठित रूप में विचित्र स्वरूप से दिखाने का दृढ़ संकल्प किया है? ऐसी चाल का नक्शा तैयार किया है? सिर्फ 3 हजार की सभा नहीं लेकिन 3 हजार में सदा त्रिमूर्ति दिखाई दे। यह सब ब्रह्मा के समान कर्मयोगी, विष्णु के समान प्रेम और शक्ति से पालना करने वाले, शंकर के समान तपस्वी वायुमण्डल बनाने वाले हैं, ऐसा अनुभव हर एक द्वारा हो। ऐसा स्वंय में सर्व शक्तियों का स्टाक जमा किया है? यह भी भण्डारा भरपूर किया है? यह स्टाक चेक किया है? वा सभी ऐसे बिजी हो गये हो जो चेक करने की फुर्सत ही नहीं?

सेवा की अविनाशी सफलता के लिए स्वयं के किस विशेष परिवर्तन की आहुति डालेंगे? ऐसा अपने आप से प्लैन बनाया है? सबसे बड़े ते बड़ी देन है - दाता के बच्चे बन सर्व को सहयोग देना। बिगड़े हुए कार्य को, बिगड़े हुए संस्कारों को, बिगड़े हुए मूड को शुभ भावना से ठीक करने में सदा सर्व के सहयोगी बनना - यह है बड़े ते बड़ी विशेष देन। इसने यह कहा, यह किया, यह देखते, सुनते, समझते हुए भी अपने सहयोग के स्टाक द्वारा परिवर्तन कर देना, जैसे कोई खाली स्थान होता है तो आलराउन्ड सेवाधारी समय प्रमाण जगह भर देते हैं। ऐसे अगर किसी भी द्वारा कोई शक्ति की कमी अनुभव भी हो तो अपने सहयोग से जगह भर दो, जिससे दूसरे की कमी का भी अन्य कोई को अनुभव न हो। इसको कहा जाता है - दाता के बच्चे बन समय प्रमाण उसे सहयोग की देन देना। यह नहीं सोचना है, इसने यह किया, ऐसा किया, लेकिन क्या होना चाहिए वह करते रहो। कोई की कमी न देखना, लेकिन आगे बढ़ते रहना। अच्छे ते अच्छा क्या हो सकता है, वह भी सिर्फ सोचना नहीं है लेकिन करना है। इसको ही विचित्र चाल का प्रत्यक्ष स्वरूप कहा जायेगा। सदा अच्छे ते अच्छा हो रहा है और सदा अच्छे ते अच्छा करते रहना है - इसी समर्थ संकल्प को साथ रखना। सिर्फ वर्णन नहीं करना लेकिन निवारण करते नव निर्माण के कर्तव्य की सफलता को प्रत्यक्ष रूप में देखते और दिखाते रहना। ऐसी तैयारी भी हो रही है ना क्योंकि सभी की जिम्मेवारी होते हुए भी विशेष मधुबन निवासियों की जिम्मेवारी है। डबल जिम्मेवारी ली है ना। जैसे हाल का उद्घाटन कराया तो चाल का भी उद्घाटन हो गया है? वह भी रिर्हसल हुई वा नहीं। दोनों का मेल हो जायेगा तब ही सफलता का नगाड़ा चारों ओर तक पहुँचेगा। जितना ऊंचा स्थान होता है उतनी लाइट चारों ओर ज्यादा फैलती है। यह तो सबसे ऊंचा स्थान है तो यहाँ से निकला हुआ आवाज चारों ओर तक पहुंचे उसके लिए लाइट माइट हाउस बनना है। अच्छा -

सदा स्वंय को हर गुण, हर शक्ति सम्पन्न साक्षात् बाप स्वरूप बन सर्व को साक्षात्कार कराने वाले, सदा विचित्र स्थिति में स्थित हो साकार चित्र द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करने वाले, ऊंचे ते ऊंची स्थिति द्वारा ऊंचे ते ऊंचे स्थान को, ऊंचे ते ऊंचे प्राप्तियों के भण्डार को प्रत्यक्ष करने वाले, सर्व के मन से मिल गया, पा लिया का गीत निकलने की सदा शुभभावना, शुभकामना रखने वाले - ऐसे सर्व श्रेष्ठ बेहद सेवाधारियों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

मधुबन निवासियों के साथ:- वरदान भूमि पर रहने वालों को सदा सन्तुष्ट रहने का वरदान मिला हुआ है ना। जो जितना अपने को सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न अनुभव करेंगे वह सदा सन्तुष्ट होंगे। अगर जरा भी कमी की महसूसता हुई तो जहाँ कमी है वहाँ असन्तुष्टता है। तो सर्व प्राप्ति है ना। संकल्प की सिद्धि तो फिर भी हो रही है ना। थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि अपना राज्य तो है नहीं। जितनी औरों के आगे प्राबलम आती है उतना यहाँ नहीं। यहाँ प्राबलम तो खेल हो गई है फिर भी समय पर बहुत सहयोग मिलता रहा है क्योंकि हिम्मत रखी है। जहाँ हिम्मत है वहाँ सहयोग प्राप्त हो ही जाता है। अपने मन मे कोई हलचल नहीं होनी चाहिए। मन सदैव हल्का रहने से सर्व के पास भी आपके लिए हल्कापन रहेगा। थोडा बहुत हिसाब-किताब तो होता ही है लेकिन उस हिसाब-किताब को भी ऐसे ही पार करो जैसे कोई बड़ी बात नहीं। छोटी बात को बड़ा नहीं करो। छोटा करना वा बड़ा करना यह अपनी बुद्धि के ऊपर है। अभी बेहद की सेवा का समय है तो बुद्धि भी बेहद की रखो। वातावरण शक्तिशाली बनाना है, यह हरेक आत्मा स्वयं को जिम्मेवार समझे। जबकि एक दो के स्वभाव संस्कार को जान गये हो, तो नॉलेजफुल कभी किसी भी स्वभाव-संस्कार से टक्कर नहीं खा सकते। जैसे किसको पता है कि यहाँ खड्डा है वा पहाड़ है तो जानने वाला कब टकरायेगा नहीं। किनारा कर लेगा। तो स्वयं को सदा सेफ रखना है। जब एक टक्कर नहीं खायेगा तो दूसरा स्वयं ही बच जायेगा। किनारा करो अर्थात् अपने को सेफ रखो और वायुमण्डल को सेफ रखो। काम से किनारा नहीं करना है। अपनी सेफ्टी की शक्ति से दूसरे को भी सेफ करना, यह है किनारा करना। ऐसी शक्ति तो आ गई है ना।

साकार रूप में फालो करने के हिसाब से सबको मधुबन ही दिखाई देता है क्योंकि ऊंचा स्थान है। मधुबन वाले तो सदा झूले में झूलते रहते। यहाँ तो सब झूले हैं। स्थूल प्राप्ति भी बहुत है तो सूक्ष्म प्राप्ति भी बहुत है, सदा झूले में होंगे तो कब भूलें नहीं होंगी। प्राप्ति के झूले से उतरते हैं तो भूलें अपनी भी दूसरे की भी दिखाई देंगी। झूले में बैठने से धरनी को छोड़ना पड़ता है। तो मधुबन वाले तो सर्व प्राप्ति के झूले में सदा झूलते रहते। सिर्फ प्राप्ति के आधार पर जीवन न हो। प्राप्ति आपके आगे भल आवे लेकिन आप प्राप्ति को स्वीकार नहीं कर लो। अगर इच्छा रखी तो सर्व प्राप्ति होते भी कमी महसूस होगी। सदा अपने को खाली समझेंगे। तो ऐसा भाग्य है जो बिना मेहनत के प्राप्ति स्वयं आती है। तो इस भाग्य को सदा स्मृति में रखो। जितना स्वयं निष्काम बनेंगे उतना प्राप्ति आपके आगे स्वत: ही आयेगी। अच्छा।

सेवाधारियों से:- सेवाधारी का अर्थ ही है प्रत्यक्षफल खाने वाले। सेवा की और खुशी की अनुभूति की तो यह प्रत्यक्षफल खाया ना। सेवाधारी बनना - यह तो बड़े ते बड़े भाग्य की निशानी है। जन्म-जन्म के लिए अपने को राज्य अधिकारी बनने का सहज साधन है इसलिए सेवा करना अर्थात् भाग्य का सितारा चमकना। तो ऐसे समझते हुए सेवा कर रहे हो ना! सेवा लगती है या प्राप्ति लगती है? नाम सेवा है लेकिन यह सेवा करना नहीं है, मिलना है। कितना मिलता है? करते कुछ भी नहीं हो और मिलता सब कुछ है। करने में सब सुख के साधन मिलते हैं। कोई मुश्किल नहीं करना पड़ता है, कितना भी हार्ड वर्क हो लेकिन सैलवेशन भी साथ-साथ मिलती है तो वह हार्ड वर्क नहीं लगता, खेल लगता है इसलिए सेवाधारी बनना अर्थात् प्राप्तियों के मालिक बनना। सारे दिन में कितनी प्राप्ति करते हो? एक एक दिन की, एक एक घण्टे की प्राप्ति का अगर हिसाब लगाओ तो कितना अनगिनत है, इसलिए सेवाधारी बनना भाग्य की निशानी है। सेवा का चान्स मिला अर्थात् प्राप्तियों के भण्डार भरपूर हो गये। स्थूल प्राप्ति भी है और सूक्ष्म भी। कहीं भी कोई सेवा करो तो स्थूल साधन इतने नहीं मिलते जितने मधुबन में मिलते हैं। यहाँ सेवा के साथ-साथ पहले तो अपने आत्मा की, शरीर की पालना, डबल होती है। तो सेवा करते खुशी होती है या थकावट होती है? सेवा करते सदैव यह चेक करो कि डबल सेवा कर रहा हूँ! मंसा द्वारा वायुमण्डल श्रेष्ठ बनाने की और कर्म द्वारा स्थूल सेवा। तो एक सेवा नहीं करनी है। लेकिन एक ही समय पर डबल सेवाधारी बन करके अपना डबल कमाई का चांस लेना है।

सभी सन्तुष्ट हो? सभी अपने-अपने कार्य में अच्छी तरह से निर्विघ्न हो? कोई भी कार्य में कोई खिट-खिट तो नहीं है? कभी आपस में खिट-खिट तो नहीं करते हो? कभी तेरा मेरा, मैंने किया तुमने किया - यह भावना तो नहीं आती है? क्योंकि अगर किया और यह संकल्प में भी आया - कि मैंने किया, तो जो भी किया वह सारा खत्म हो गया। मेरा-पन आना माना सारे किये हुए कार्य पर पानी डाल देना। ऐसे तो नहीं करते हो? सेवाधारी अर्थात् करावनहार बाप निमित्त बनाए करा रहे हैं। करावनहार को नही भूलें। जहाँ मैं पन आया वहाँ माया भी आई। निमित्त हूँ, निमार्ण हूँ तो माया आ नहीं सकती। संकल्प या स्वप्न में भी माया आती है तो सिद्ध होता है कि कहाँ मैं-पन का दरवाजा खुला है। मैं-पन का दरवाजा बन्द रहे तो कभी भी माया आ नहीं सकती। अच्छा!

वरदान:

अपने हल्केपन की स्थिति द्वारा हर कार्य को लाइट बनाने वाले बाप समान न्यारे-प्यारे भव!

मन-बुद्धि और संस्कार - आत्मा की जो सूक्ष्म शक्तियां हैं, तीनों में लाइट अनुभव करना, यही बाप समान न्यारे-प्यारे बनना है क्योंकि समय प्रमाण बाहर का तमोप्रधान वातावरण, मनुष्यात्माओं की वृत्तियों में भारी पन होगा। जितना बाहर का वातावरण भारी होगा उतना आप बच्चों के संकल्प, कर्म, संबंध लाइट होते जायेंगे और लाइटनेस के कारण सारा कार्य लाइट चलता रहेगा। कारोबार का प्रभाव आप पर नहीं पड़ेगा, यही स्थिति बाप समान स्थिति है।

स्लोगन:

इसी अलौकिक नशे मे रहो “वाह रे मैं” तो मन और तन से नेचुरल डांस होती रहेगी।