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22/10/17

22/10/17 मधुबन "अव्यक्त-बापदादा" ओम् शान्ति 18-02-83


"सदा उमंग-उत्साह में रहने की युक्तियाँ"

आज सर्व बच्चों के दिलाराम बाप, बच्चों के दिल की आवाज, दिल की मीठी-मीठी बातों का रेसपाण्ड देने के लिए बच्चों के बीच आये हैं। अमृतवेले से लेकर बापदादा चारों ओर के बच्चों के भिन्न-भिन्न राज़ भरे हुए साज़ सुनते रहते हैं। सारे दिन में कितने बच्चों के और कितने प्रकार के साज़ सुनते होंगे। हरेक बच्चे के भी समय-समय के भिन्न-भिन्न साज़ होते हैं। सबसे ज्यादा नैचुरल साज़ कौन सुनता है? नैचुरल वस्तु सदा प्रिय लगती है। तो सब बच्चों के भिन्न-भिन्न साज़ सुनते हुए बापदादा बच्चों को सार में मुख्य बातें सुनाते हैं।
सभी बच्चे यथाशक्ति लगन में मगन अवस्था में स्थित होने के लिए वा मगन स्वरूप के अनुभवी मूर्त बनने के लिए अटेन्शन बहुत अच्छा रखते चल रहे हैं। सबकी दिल का एक ही उमंग-उत्साह है कि मैं बाप समान समीप रत्न बन सदा सपूत बच्चे का सबूत दूँ। यह उमंग-उत्साह सर्व के उड़ती कला का आधार है। यह उमंग कई प्रकार के आने वाले विघ्नों को समाप्त कर सम्पन्न बनने में बहुत सहयोग देता है। यह उमंग का शुद्ध और दृढ़ संकल्प विजयी बनाने में विशेष शक्तिशाली शस्त्र बन जाता है इसलिए सदा दिल में उमंग-उत्साह को वा इस उड़ती कला के साधन को कायम रखना। कभी उमंग-उत्साह को कम नहीं करना। उमंग है - मुझे बाप समान सर्व शक्तियों, सर्व गुणों, सर्व ज्ञान के खजानों से सम्पन्न होना ही है - क्योंकि कल्प पहले भी मैं श्रेष्ठ आत्मा बना था। एक कल्प की तकदीर नहीं लेकिन अनेक बार के तकदीर की लकीर भाग्य विधाता द्वारा खींची हुई है। इसी उमंग के आधार पर उत्साह स्वत: होता है। उत्साह क्या होता? 'वाह मेरा भाग्य'। जो भी बापदादा ने भिन्न-भिन्न टाइटिल दिये हैं, उसी स्मृति स्वरूप में रहने से उत्साह अर्थात् खुशी स्वत: ही और सदा ही रहती है। सबसे बड़े ते बड़े उत्साह की बात है कि अनेक जन्म आपने बाप को ढूंढा लेकिन इस समय बापदादा ने आप लोगों को ढूंढा। भिन्न-भिन्न पर्दों के अन्दर छिपे हुए थे। उन पर्दों के अन्दर से भी ढूंढ लिया ना? बिछुड़कर कितने दूर चले गये। भारत देश को छोड़कर कहाँ चले गये! धर्म, कर्म, देश, रीति-रसम, कितने पर्दों के अन्दर आ गये। तो सदा इसी उत्साह और खुशी में रहते हो ना! बाप ने अपना बनाया या आपने बाप को अपना बनाया? पहले मैसेज तो बाप ने भेजा ना! चाहे पहचानने में कोई ने कितना समय, कोई ने कितना समय लगाया। तो सदा उमंग और उत्साह में रहने वाली आत्माओं को एक बल एक भरोसे में रहने वाले बच्चों को, हिम्मते बच्चे मददे बाप का सदा ही अनुभव होता रहता है। ''होना ही है'' यह हिम्मत। इसी हिम्मत से मदद के पात्र स्वत: ही बन जाते हैं। और इसी हिम्मत के संकल्प के आगे माया हिम्मतहीन बन जाती है। पता नहीं, होगा या नहीं होगा, मैं कर सकूंगा या नहीं, यह संकल्प करना, माया का आह्वान करना है। जब आह्वान किया तो माया क्यों नहीं आयेगी। यह संकल्प आना अर्थात् माया को रास्ता देना। जब आप रास्ता ही खोल देते हो तो क्यों नहीं आयेगी। आधाकल्प की प्रीत रखने वाली रास्ता मिलते कैसे नहीं आयेगी इसलिए सदा उमंग-उत्साह में रहने वाली हिम्मतवान आत्मा बनो। विधाता और वरदाता बाप के सम्बन्ध से बालक सो मालिक बन गए। सर्व खजानों के मालिक, जिस खजाने में अप्राप्त कोई वस्तु नहीं। ऐसे मालिक उमंग-उत्साह में नहीं रहेंगे तो कौन रहेगा। यह स्लोगन सदा मस्तक में स्मृति रूप में रहे - 'हम ही थे, हम ही हैं और हम ही रहेंगे।' याद है ना। इसी स्मृति ने यहाँ तक लाया है। सदा इसी स्मृति भव। अच्छा !
आज तो डबल विदेशी, सबसे ज्यादा में ज्यादा दूरदेशवासी, दूर से आने वाले बच्चों से विशेष मिलने के लिए आये हैं। वैसे तो भारत के बच्चे भी सदा अधिकारी हैं ही। फिर भी चान्सलर बन चान्स देते हैं इसलिए भारत में महादानी बनने की रीति-रसम अब तक भी चलती है। सबने अपने-अपने रूप से विश्व सेवा के महायज्ञ में सहयोग दिया। हरेक ने बहुत लगन से अच्छे ते अच्छा पार्ट बजाया। सर्व के एक संकल्प द्वारा विश्व की अनेक आत्माओं को बाप के समीप आने का सन्देश मिला। अभी इसी सन्देश द्वारा जगी हुई ज्योति अनेकों को जगाती रहेगी। डबल विदेशी बच्चों ने अपने दृढ़ संकल्प को साकार में लाया। भारतवासी बच्चों ने भी अनेक नाम फैलाने वाले, सन्देश पहुँचाने वाले विशेष आत्माओं को समीप लाया। कलमधारियों को भी स्नेह ओर सम्पर्क में समीप लाया। कलम की शक्ति और मुख की शक्ति दोनों ही मिलकर सन्देश की ज्योति जगाते रहेंगे। इसके लिए डबल विदेशी बच्चों को और देश में समीप रहने वाले बच्चों को, दोनों को बधाई। डबल विदेशी बच्चों ने पावरफुल आवाज़ फैलाने के निमित्त बनी हुई विशेष आत्माओं को लाया उसके लिए भी विशेष बधाई हो। बाप तो सदा बच्चों के सेवाधारी हैं। पहले बच्चे। बाप तो बैकबोन है ना। सामने मैदान पर तो बच्चे ही आते हैं। मेहनत बच्चों की मुहब्बत बाप की। अच्छा।
ऐसे सदा उमंग-उत्साह में रहने वाले, सदा बापदादा की मदद के पात्र, हिम्मतवान बच्चे, सदा सेवा की लगन में मगन रहने वाले, सदा स्वंय को प्राप्त हुई शक्तियों द्वारा सर्व आत्माओं को शक्तियों की प्राप्ति कराने वाले, ऐसे बाप के सदा अधिकारी वा बालक सो मालिक बच्चों को बापदादा का विशेष स्नेह सम्पन्न यादप्यार और नमस्ते।
जानकी दादी से:- बाप समान भव की वरदानी हो ना। डबल सेवा करती हो। बच्ची की मंसा सेवा की सफलता बहुत अच्छी दिखाई दे रही है। सफलता स्वरूप का प्रत्यक्ष सबूत हो। सभी बाप के साथ-साथ बच्ची के भी गुण गाते हैं। बाप साथ-साथ चक्कर लगाते हैं ना। चक्रवर्ती राजा हो। प्रकृतिजीत का अच्छा ही प्रत्यक्ष पार्ट बजा रही हो। अब तो संकल्प द्वारा भी सेवा का पार्ट अच्छा चल रहा है। प्रैक्टिकल सबूत अच्छा है। अभी तो बहुत बड़े-बड़े आयेंगे। विदेश का आवाज़ देश वालों तक पहुँचेगा। सभी विदेशी बच्चों ने सर्विस के उमंग-उत्साह का अच्छा ही प्रैक्टिकल सबूत दिखाया है इसीलिए सभी के तरफ से आपको बहुत-बहुत बधाई हो। अच्छा माइक लाया, याद का स्वरूप बनकर सेवा की है, इसलिए सफलता है। अच्छा बगीचा तैयार किया है। अल्लाह अपने बगीचे को देख रहे हैं।
जयन्ती बहन से:- जन्म से लकी और लवली तो हो ही। जन्म ही लक से हुआ है। जहाँ भी जायेंगी वह स्थान भी लकी हो जायेगा। देखो लण्डन की धरती लकी हो गई ना। जहाँ भी चक्कर लगाती हो तो क्या सौगात देकर आती हो? जो भाग्य विधाता द्वारा भाग्य मिला है वह भाग्य बाँटकर आती हो। सभी आपको किस नज़र से देखते हैं, मालूम है? भाग्य का सितारा हो। जहाँ सितारा चमकता है वहाँ जगमग हो जाता है। ऐसे अनुभव करती हो ना। कदम बच्ची का और मदद बाप की। फालो फादर तो हो ही लेकिन फालो साथी (जानकी दादी को) भी ठीक किया है। यह भी समान बनने की रेस अच्छी कर रही है। अच्छा !
गायत्री बहन (न्यूयार्क):- गायत्री भी कम नहीं, बहुत अच्छा सर्विस का साधन अपनाया है। जो भी निमित्त बन करके आत्मायें मधुबन तक पहुँचाई, तो निमित्त बनने वालों को भी बापदादा और परिवार की शुभ स्नेह के पुष्प की वर्षा होती रहती है। जितना ही शैली अच्छी आत्मा है, उतना ही यह जो बच्चा आया (राबर्ट मूलरी) यह भी बहुत अच्छा सेवा के क्षेत्र में सहयोगी आत्मा है। सच्ची दिल पर साहेब राजी। साफ दिल वाला है इसलिए बाप के स्नेह को, बाप की शक्ति को सहज कैच कर सका। उमंग-उत्साह और संकल्प बहुत अच्छा है। सेवा में अच्छा जम्प लगायेगा। बापदादा भी निमित्त बने हुए बच्चों को देख हर्षित होते हैं। उनको कहना कि सेवा में उड़ती कला वाले फरिश्ते स्वरूप हो और ऐसे ही अनुभव करते रहना। अच्छा - सभी के सहयोग से सफलता मधुबन तक दिखाई दे रही है। नाम किसका भी नहीं ले रहे हैं। लेकिन सब समझना कि हमें बाबा कह रहे हैं। कोई भी कम नहीं है। समझो पहले हम सेवा में आगे हैं। छोटे बड़े सभी ने तन-मन-धन-समय संकल्प सब कुछ सेवा में लगाया है।
मुरली भाई और रजनी बहन से: - बापदादा के स्नेह की डोर ने खींच लाया ना। सदा अभी क्या याद रहता है? श्वासों श्वांस सेकण्ड-सेकण्ड क्या याद रहता? सदा दिल से बाबा ही निकलता है ना। मन की खुशी, याद के अनुभव द्वारा अनुभव की। अभी एकाग्र हो जो सोचेंगे वह सब आगे बढ़ने का साधन हो जायेगा। सिर्फ एक बल एक भरोसे से एकाग्र हो करके सोचो। निश्चय में एक बल और एक भरोसा, तो जो कुछ होगा वह अच्छा ही होगा। बापदादा सदा साथ हैं और सदा रहेंगे। बहादुर हो ना। बाप दादा बच्चे की हिम्मत और निश्चय को देखके निश्चय और हिम्मत पर बधाई दे रहे हैं। बेफिकर बादशाह के बच्चे बादशाह हो ना। ड्रामा की भावी ने समीप रत्न तो बना ही दिया है। साथ भी बहुत अच्छा मिला है। साकार का साथ भी शक्तिशाली है। आत्मा का साथ तो है ही बाप। डबल लिफ्ट है इसलिए बेफिकर बादशाह। समय पर पुण्यात्मा बन पुण्य का कार्य किया है। इसलिए बापदादा के सहयोग के सदा पात्र हो। कितने पुण्य के अधिकारी बने। पुण्य-स्थान के निमित्त बने। किसी भी रीति से बच्चे का भाग्य बना ही दिया ना। पुण्य की पूँजी इक्टठी है। मुरलीधर का मुरली, मास्टर मुरली है। बाप का हाथ सदा हाथ में है। सदा याद करते और शक्ति लेते रहो।
बाप का खजाना सो आपका, अधिकारी समझकर चलो। बापदादा तो घर का बालक सो घर का मालिक समझते हैं। परमार्थ और व्यवहार दोनों साथ-साथ हों। व्यवहार में भी साथ रहे। अच्छा।
यू.के. ग्रुप से:- सभी अपने को स्वराज्य अधिकारी सो विश्व राज्य अधिकारी समझते हो? वैसे भी लण्डन राजधानी है ना। तो राजधानी में रहते हुए अपना राज्य सदा याद रहता है ना। रानी का महल देखते अपने महल याद आते हैं। आपके महल कितने सुन्दर होंगे, जानते हो ना। ऐसा आपका राज्य है जो अब तक कोई ऐसा राज्य न हुआ है, न होगा। ऐसा नशा है? भल अभी तो सब विनाश हो जायेगा। लेकिन आप तो भारत में आ जायेंगे ना। यह तो पक्का है ना। जहाँ भी ब्राहमण आत्माओं ने इतनी सेवा की है वह पिकनिक स्थान जरूर रहेंगे। आदमशुमारी कम होगी, इतने विस्तार की आवश्यकता नहीं होगी। अच्छा - अपना घर, अपना राज्य, अपना बाप, अपना कर्तव्य सब याद रहे।
प्रश्न: - सदा आगे बढ़ने का साधन क्या है?
उत्तर:- नॉलेज और सेवा। जो बच्चे नॉलेज को अच्छी रीति धारण करते हैं और सेवा की सदा रूचि बनी रहती है वह आगे बढ़ते रहते हैं। हजार भुजा वाला बाप आपके साथ है, इसलिए साथी को सदा साथ रखते आगे बढ़ते रहो।
प्रश्न:- प्रवृत्ति में जो सदा समर्पित होकर रहते हैं - उनके द्वारा कौन सी सेवा स्वत: हो जाती है?
उत्तर:- ऐसी आत्माओं के श्रेष्ठ सहयोग से सेवा का वृक्ष फलीभूत हो जाता है। सबका सहयोग ही वृक्ष का पानी बन जाता है। जैसे वृक्ष को पानी मिले तो वृक्ष से फल कितना अच्छा निकलता है, ऐसे श्रेष्ठ सहयोगी आत्माओं के सहयोग से वृक्ष फलीभूत हो जाता है। तो ऐसे बापदादा के दिलतख्तनशीन सेवा की धुन में सदा रहने वाले, प्रवृत्ति में भी समर्पित रहने वाले बच्चे हो ना। अच्छा। ओम् शान्ति।

वरदान:

यथार्थ विधि द्वारा व्यर्थ को समाप्त कर नम्बरवन लेने वाले परमात्म सिद्धि स्वरूप भव!

जैसे रोशनी से अंधकार स्वत: खत्म हो जाता है। ऐसे समय, संकल्प, श्वांस को सफल करने से व्यर्थ स्वत: समाप्त हो जाता है, क्योंकि सफल करने का अर्थ है श्रेष्ठ तरफ लगाना। तो श्रेष्ठ तरफ लगाने वाले व्यर्थ पर विन कर नम्बरवन ले लेते हैं। उन्हें व्यर्थ को स्टॉप करने की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। यही परमात्म सिद्धि है। वह रिद्धि सिद्धि वाले अल्पकाल का चमत्कार दिखाते हैं और आप यथार्थ विधि द्वारा परमात्म सिद्धि को प्राप्त करते हो।

स्लोगन:

अपकारी पर भी उपकार करने वाला ही ज्ञानी तू आत्मा है।