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27/12/17

27/12/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - 3 बाप का राज़ सबको कहानी मिसल सुनाओ, जब तक बेहद बाप को पहचानकर पावन नहीं बने हैं तब तक वर्सा मिल नही सकता''

प्रश्न:

बाबा बिल्कुल ही नया है, उसने तुमको अपना कौन सा नया परिचय दिया है?

उत्तर:

बाबा को मनुष्यों ने हजारों सूर्य से तेजोमय कहा लेकिन बाबा कहता मैं तो बिन्दी हूँ। तो नया बाबा हुआ ना। पहले अगर बिन्दी का साक्षात्कार होता तो कोई मानता ही नहीं इसलिए जैसी जिसकी भावना होती है उन्हें वैसा ही साक्षात्कार हो जाता है।

गीत:-

ओम् नमो शिवाए...  

ओम् शान्ति।

निराकार भगवानुवाच, सिर्फ भगवानुवाच कहने से कृष्ण का नाम याद आ जाता है क्योंकि आजकल भगवान सब हो पड़े हैं इसलिए निराकार शिव भगवानुवाच कहते हैं। गॉड फादर कहा जाता है। निराकार भगवानुवाच, किसके प्रति? निराकार बच्चों, रूहों प्रति। रूहानी भगवानुवाच वा ईश्वर वाच यह अक्षर शोभता नहीं है। निराकार भगवानुवाच शोभता है। अब घड़ी-घड़ी तो नहीं कहेंगे। यह है बहुत गुप्त। इनका चित्र निकल न सके। बिन्दी बनाकर भगवानुवाच लिखें तो कोई मानेंगे नहीं। भगवान के यथार्थ नाम, रूप, देश, काल को कोई जानते ही नहीं। अगर बाप को जान जायें तो रचना को भी जान जायें। परन्तु न जानना ही उन्हों का ड्रामा में नूँधा हुआ है, तब तो फिर बाप आकर अपनी पहचान दे। बाप कहते हैं जब मेरा पार्ट होता है पतितों को पावन बनाने का, तब ही आकर मैं अपनी पहचान देता हूँ। पुरानी दुनिया को नया बनाता हूँ। पुरानी दुनिया में रहने वाले मनुष्य नई दुनिया में रहने वाले मनुष्यों को पूजते हैं। तुम बच्चों को समझाना है। जबकि ऋषि-मुनि आदि सब कहते हैं हम रचता और रचना को नहीं जानते फिर तुमने कहाँ से जाना। अगर तुम बाप को, रचना को जानते हो तो हमको नॉलेज दो। कभी कोई को दे नहीं सकते। वर्सा दे न सकें। तुम बच्चों को बाप से वर्सा मिल रहा है। तुम जानते हो बेहद का बाप आया हुआ है, नई दुनिया का वर्सा अथवा सुख देने। तो जरूर दु:ख खत्म हो जायेगा। वह है सुखधाम, यह है दु:खधाम। अब इस दु:खधाम का विनाश होना है। नई दुनिया ही अब पुरानी हुई है, फिर नई बन जायेगी। नई दुनिया को सतयुग, पुरानी दुनिया को कलियुग कहा जाता है। नई दुनिया में जरूर मनुष्य थोड़े होने चाहिए। सतयुग में एक ही धर्म था। इस समय तो अनेक धर्म हैं, दु:ख भी है। सुख से दु:ख, दु:ख से फिर सुख होता है। यह खेल बना हुआ है। दु:ख कौन देते हैं, यह किसको पता ही नहीं है। रावण को माया कहा जाता है। धन को माया नहीं कहा जाता है। विकारी मनुष्य जानते हैं कि देवतायें निर्विकारी हैं। परन्तु उन्हों को विकारों का नशा चढ़ा हुआ है। देवताओं को है निर्विकारीपने का नशा। वहाँ अपवित्र कोई होते नहीं हैं। संगम पर ही तुम बच्चों को पवित्रता का राज़ समझाया जाता है। तुमको फिर औरों को समझाना है। बाप तो सारी दुनिया को बैठ समझायेगा नहीं। बच्चों को ही समझाना है परन्तु समझाने की बड़ी युक्ति चाहिए। सबको बताओ, भारत जो स्वर्ग नई दुनिया थी, वह अब पुरानी हो गई है। रचयिता तो बाप ही है। वह खुद कहते हैं मैं ब्रह्मा द्वारा नई दुनिया की स्थापना करता हूँ। बच्चों को एडाप्ट करता हूँ। ब्रह्मा का नाम ही प्रजापिता है। तो जरूर इतने बच्चों को एडाप्ट ही करेंगे। जैसे सन्यासी फालोअर्स को एडाप्ट करते हैं। पुरुष, स्त्री को एडाप्ट करते हैं कि तुम मेरी हो। यहाँ भी तुम कहते हो शिवबाबा मैं आपका हूँ। घर बैठे भी बहुतों को टच हो जाता है फिर क्या कहते हैं? कि भल बाबा हमने आपको देखा नहीं हैं क्योंकि बंधन में हूँ - आ नहीं सकती परन्तु मैं हूँ आपकी। पवित्र तो जरूर बनना पड़े। पतित मुक्ति-जीवनमुक्ति में जा नहीं सकते। पतित पुकारते हैं कि आओ आकर पावन बनाओ।
तुम बच्चों को समझाना चाहिए कि भारत स्वर्ग था। यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक थे, जरूर डिनायस्टी चली होगी। नई दुनिया में नया राज्य था, अब वह नहीं है। और अनेक धर्म हैं, देवता धर्म है नहीं। यह पुरानी दुनिया कब तक चलेगी? वह सतयुग को लाखों वर्ष कह देते हैं। महाभारी लड़ाई का भी गायन है। बीच में थोड़ी खिटपिट हुई थी तो कहते थे महाभारत लड़ाई का समय है। यादवों की लड़ाई भी दिखाते हैं कि मूसलों द्वारा अपना विनाश किया। कभी लिखते हैं पाण्डवों और कौरवों की युद्ध, कभी लिखते हैं असुर और देवताओं की। आसुरी दुनिया के बाद फौरन दैवी दुनिया है। वह पतित, यह पावन। पावन देवता कैसे लड़ेंगे? वह हैं सतयुग में, यह कलियुग में दोनों की लड़ाई कैसे हो सकती है। देवतायें अहिंसक, असुर हिंसक। देवतायें नर्क में कैसे आयेंगे। अभी तुम संगम पर हो, नई दुनिया स्थापन होती है। उसके लिए तुम पुरुषार्थ कर रहे हो। दो बाप का राज़ भी कहानी मिसल समझाना चाहिए। सतयुग में है एक बाप। बेहद के बाप को याद करते ही नहीं क्योंकि सुखधाम है। द्वापरयुग में हैं दो बाप। लौकिक बाप होते भी पारलौकिक बाप को याद करते हैं। आत्मा ही अपने बाप को याद करती है क्योंकि आत्मा ही दु:ख सहन करती है। पुण्य आत्मा, पाप आत्मा। आत्मा ही सुनती है। संस्कार आत्मा में हैं। जिनमें दैवी संस्कार नहीं हैं, वह दैवी संस्कार वालों का गायन करते हैं। गाया भी जाता है आपेही पूज्य आपेही पुजारी। पुजारी बनते हैं तो गाते हैं मुझ निर्गुण हारे में... उनमें गुण हैं हमारे में नहीं हैं। पूज्य सो पुजारी। तुम ही पूज्य सो देवता थे, फिर तुम ही पुजारी बने हो। 84 जन्म लिए हैं। आधाकल्प पूज्य आधाकल्प पुजारी। हिसाब समझाना पड़े। देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र.... इस समय हम ब्राह्मण हैं। बी.के. हैं। इस समय हमको 3 बाप हो जाते हैं। लौकिक बाप, निराकार पारलौकिक बाप, तीसरा फिर प्रजापिता ब्रह्मा। जिस द्वारा हम ब्राह्मणों को पढ़ाते हैं। प्रजापिता नाम तो सुना है ना। ब्रह्मा द्वारा रचते हैं। तुम भी ब्राह्मण हो। तुम भी बाप को याद करो। बाप कहते हैं मैं आया हूँ - तुमको वापिस ले जाने। निराकार बाप आत्माओं से बात करते हैं। तुम कहते भी हो हम एक शरीर छोड़ दूसरा लेते हैं। शरीर का नाम रूप बदल जाता है। आत्मा तो एक ही है। बाप का नाम भी एक ही शिव है। उनको शरीर तो है नहीं। यह प्वाइंट भी नोट करनी चाहिए। फिर जैसा आदमी वैसा ही समझाना है। हम बी.के. दादे से वर्सा ले रहे हैं। वही राजयोग और ज्ञान की नॉलेज देते हैं। मनुष्य से देवता बनना, यह भी नॉलेज है। नॉलेज मिलती है संगम पर। जिससे फिर नई दुनिया में वर्सा पाते हैं। पतित दुनिया में आकर पावन दुनिया स्थापन करते हैं। अभी बाप आया है घर ले जाने। ड्रामा अनुसार सबको घर जाना है फिर पहले सूर्यवंशी, फिर चन्द्रवंशी, फिर वैश्य, शूद्र वंशी बन जाते हैं। वह है निराकार आत्माओं का झाड़, यह है साकारी मनुष्यों का झाड़। ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र... इसमें सारा विराट रूप आ जाता है। ब्राह्मण वृद्धि को पाते रहते हैं। रूद्र माला और विष्णु की माला बनेगी। ब्रह्मा की माला नहीं कह सकते क्योंकि बदलते रहते हैं इसलिए रूद्र माला पूजी जाती है। यह हैं नई-नई बातें। यह बातें कोई की बुद्धि में जरा भी नहीं हैं। कल्प की आयु लाखों वर्ष कह देते हैं, इसलिए तुम्हारी बातें सबको नई लगती हैं। नई दुनिया के लिए नई चीज़ मिलती है। बाबा भी वास्तव में नया है। वह तो कहते हैं नाम-रूप से न्यारा है या तो कह देते हैं हजारों सूर्य से तेजोमय है। सो तो जरूर जैसी भावना होगी वैसा साक्षात्कार होगा। बिन्दी का साक्षात्कार हो तो कोई माने ही नहीं। यह सब बातें नई होने कारण मूँझते हैं। जो यहाँ के होंगे, उनकी ही सैपलिंग लगेगी। तुम बच्चों ने अब अच्छी तरह समझा है तो पारलौकिक बाप के लिए भी समझाना है। तुम आधाकल्प से उनको याद करते आये हो। सुख देने वाले को ही याद किया जाता है। रावण सबका दुश्मन है, तब तो उनको जलाते हैं। पूछो - रावण को जलाते कितना समय हुआ? बोलेंगे अनादि। उन्हों को यह मालूम ही नहीं रावण कब से आता है। सतयुग में तो रावण होता नहीं। भारत का सबसे पुराना दुश्मन रावण है। रूह को पतित बनाने वाला है। आत्मा का दुश्मन कौन? रावण। आत्मा के साथ शरीर भी है। तो दोनों का दुश्मन कौन हो गया? (रावण) रावण में आत्मा है? रावण क्या चीज़ है? बस विकार हैं। ऐसे नहीं कि रावण में भी आत्मा है। रावण 5 विकारों को कहा जाता है। आत्मा में ही 5 विकार हैं, जिसका पुतला बनाते हैं। तुम जानते हो अभी है दु:ख फिर सुख में जाना है तो जरूर बाप आकर ले जायेंगे। वही पतित-पावन है। जैसे दूसरी आत्मा आती है वैसे यह भी आते हैं। श्राध खिलाते हैं तो आत्मा को बुलाते हैं। ब्राह्मण को ही अपने बाप की आत्मा समझ सब कुछ करते हैं। समझते हैं वह आत्मा आती है। आत्मा बोलती है। हाँ इनका आना न्यारा है। यह है भगवान का रथ। भागीरथ कहते हैं। पानी की बात नहीं, यह है सारी ज्ञान की बात। बाप समझाते हैं मैं साधारण तन में प्रवेश करता हूँ, इनका नाम ब्रह्मा रखा है। इनको एडाप्ट नहीं करता हूँ। इनमें प्रवेश करता हूँ फिर तुमको एडाप्ट करता हूँ। तुम कहते हो शिवबाबा मैं आपका हूँ। तुम्हारा बुद्धियोग ऊपर चला जाता है क्योंकि बाबा खुद कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। इस यात्रा पर रहो। समझो, यह बाबा कहाँ जाता है तो याद शिवबाबा को करना है। शिवबाबा इस रथ में देहली गया, कानपुर गया... बुद्धि में शिवबाबा की याद रहे। नीचे नहीं रहना है, बुद्धि ऊपर रहे। आत्मा, परमात्मा बाप को याद करे। बाप कहते मेरा रहने का स्थान तो वहाँ ऊपर है। हमारे पिछाड़ी यहाँ नहीं भटकना है। तुम मुझे भी वहाँ याद करो। तुम आत्मायें भी बाप के साथ रहने वाली हो। ऐसे नहीं बाबा का स्थान अलग, तुम्हारा अलग है, नहीं। यह बातें बुद्धि में बिठानी है। एक-एक को अलग जैसे तुम कराची में समझाते थे वैसे अच्छा रहता है। इकट्ठे एक दो के वायब्रेशन ठहरने नहीं देते हैं। भक्ति भी एकान्त में करते हैं। यह पढ़ाई भी एकान्त में करनी है। पहले बाप का परिचय देना है। बाप पतित-पावन है, उन द्वारा हम पावन बन रहे हैं।
बाप कहते हैं - बच्चे यह अन्तिम जन्म पावन बनेंगे तो विश्व के मालिक बनेंगे। कितनी बड़ी कमाई है। बाप कहते हैं - धन्धा आदि भल करो सिर्फ मुझे याद करो, पावन बनो तो योगबल से तुम्हारी खाद निकल जायेगी। तुम सतोप्रधान बन जायेंगे, एकरस कर्मातीत अवस्था बन जायेगी। बुद्धि में ज्ञान का सिमरण करते रहो। मित्र-सम्बन्धियों को भी यह समझाते रहो। कल्प पहले भी तुमको ऐसे समझाया था। कोई नई बात नहीं है। कल्प-कल्प बाबा आकर हमको समझाते हैं हम फिर दुनिया वालों को समझाते हैं। भारत बरोबर स्वर्ग था फिर बनेगा। यह चक्र फिरता रहता है। सतयुग को लाखों वर्ष कैसे हो सकते हैं। इतनी आदमशुमारी कहाँ है फिर तो अनगिनत हो जायें। 4 युग हैं, हर एक युग की आयु 1250 वर्ष है। जैसे तुमने समझा है वैसे समझाते रहेंगे। झाड़ की वृद्धि होती रहेगी। कभी ग्रहचारी बैठती है फिर उतरती जाती है। बाप कहते हैं - समझाना बहुत सहज है। अल्फ बे। मूल बात है याद की यात्रा। मेहनत भी है। कल्प के बाद यह याद का धन्धा मिलता है, परन्तु है गुप्त। यह मुश्किल सबजेक्ट है। अल्फ को याद करना, अल्फ को ही भूले हो। भगवान को कोई जानते नहीं। गाया भी जाता है सतगुरू बिगर घोर अन्धियारा। सोझरे में एक ही सतगुरू ले जाते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) योगबल से आत्मा को सतोप्रधान बनाकर एकरस कर्मातीत अवस्था तक पहुँचना है। याद की गुप्त मेहनत करनी है, एकान्त में पढ़ाई करनी है।

2) बाप से मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा लेने के लिए इस अन्तिम जन्म में पवित्र जरूर बनना है।

वरदान:

सर्व विकारों के अंश का भी त्याग कर सम्पूर्ण पवित्र बनने वाले नम्बरवन विजयी भव!

सम्पूर्ण पवित्र वह है जिसमें अपवित्रता का अंश-मात्र भी न हो। पवित्रता ही ब्राह्मण जीवन की पर्सनैलिटी है। यह पर्सनैलिटी ही सेवा में सहज सफलता दिलाती है। लेकिन यदि एक भी विकार का अंश है तो दूसरे साथी भी उसके साथ जरूर होंगे। जैसे पवित्रता के साथ सुख-शान्ति है, ऐसे अपवित्रता के साथ पांचों विकारों का गहरा संबंध है, इसलिए एक भी विकार का अंश न रहे तब नम्बरवन विजयी बनेंगे।

स्लोगन:

हिम्मत का एक कदम रखो तो हजार गुणा मदद मिल जायेगी।