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14-01-18

14-01-18 प्रात:मुरलीओम् शान्ति''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 19-04-83 मधुबन


संगमयुग का प्रभु फल खाने से सर्व प्राप्तियाँ

आज बापदादा अपने सर्व स्नेही बच्चों को स्नेह का रिटर्न देने, मिलन मनाने, स्नेह का प्रत्यक्षफल, स्नेह की भावना का श्रेष्ठ फल देने के लिए बच्चों के संगठन में आये हैं। भक्ति में भी स्नेह और भावना भक्त-आत्मा के रूप में रही। तो भक्त रूप में भक्ति थी लेकिन शक्ति नहीं थी। स्नेह था लेकिन पहचान वा सम्बन्ध श्रेष्ठ नहीं था। भावना थी लेकिन अल्पकाल की कामना भरी भावना थी। अभी भी स्नेह और भावना है लेकिन समीप सम्बन्ध के आधार पर स्नेह है। अधिकारीपन के शक्ति की, अनुभव के अथॉरिटी की श्रेष्ठ भावना है। भिखारीपन की भावना बदल, सम्बन्ध बदल अधिकारीपन का निश्चय और नशा चढ़ गया। ऐसे सदा श्रेष्ठ आत्माओं को प्रत्यक्षफल प्राप्त हुआ है। सभी प्रत्यक्षफल के अनुभवी आत्मायें हो? प्रत्यक्षफल खाकर देखा है? और फल तो सतयुग में भी मिलेंगे और अब कलियुग के भी बहुत फल खाये। लेकिन संगमयुग का प्रभु फल, प्रत्यक्ष फल अगर अब नहीं खाया तो सारे कल्प में नहीं खा सकते। बापदादा सभी बच्चों से पूछते हैं - प्रभु फल, अविनाशी फल, सर्व शक्तियां, सर्वगुण, सर्व सम्बन्ध के स्नेह के रस वाला फल खाया है? सभी ने खाया है या कोई रह गया है? यह ईश्वरीय जादू का फल है। जिस फल खाने से लोहे से पारस से भी ज्यादा हीरा बन जाते हो। इस फल से जो संकल्प करो वह प्राप्त कर सकते हो। अविनाशी फल, अविनाशी प्राप्ति। ऐसे प्रत्यक्ष फल खाने वाले सदा ही माया के रोग से तन्दरूस्त रहते हैं। दु:ख, अशान्ति से, सर्व विघ्नों से सदा दूर रहने का अमर फल मिल गया है! बाप का बनना और ऐसे श्रेष्ठ फल प्राप्त होना।

आज बापदादा आये हुए विशेष पाण्डव सेना को देख हर्षित तो हो ही रहे हैं। साथ-साथ ब्रह्मा बाप के हमजिन्स से सदा पार्टी की जाती, पिकनिक मनाई जाती। तो आज इस प्रभु फल की पिकनिक मना रहे हैं। लक्ष्मी-नारायण भी ऐसी पिकनिक नहीं करेंगे। ब्रह्मा बाप और ब्राह्मणों की यह अलौकिक पिकनिक है। ब्रह्मा बाप हमजिन्स को देख हर्षित होते हैं। लेकिन हमजिन्स ही बनना। हर कदम में फालो फादर करने वाले समान साथी अर्थात् हमजिन्स। ऐसे हमजिन्स हो ना वा अभी सोच रहे हो क्या करें, कैसे करें। सोचने वाले हो वा समान बनाने वाले हो? सेकण्ड में सौदा करने वाले हो वा अभी भी सोचने का समय चाहिए? सौदा करके आये हो वा सौदा करने आये हो? परमीशन किसको मिली है, सभी ने फार्म भरे थे? वा छोटी-छोटी ब्राह्मणियों को बातें बताके पहुँच गये हो? ऐसे बहुत मीठी-मीठी बातें बताते हैं। बापदादा के पास सभी के मन के सफाई की और चतुराई की दोनों बातें पहुँचती हैं। नियम प्रमाण सौदा करके आना है। लेकिन मधुबन में कई सौदा करने वाले भी आ जाते हैं। करके आने वाले के बजाए यहाँ आकर सौदा करते हैं इसलिए बापदादा क्वान्टिटी में क्वालिटी को देख रहे हैं। क्वान्टिटी की विशेषता अपनी है, क्वालिटी की विशेषता अपनी है। चाहिए दोनों ही। गुलदस्ते में वैरायटी रंग रूप वाले फूलों से सजावट होती है। पत्ते भी नहीं होंगे तो गुलदस्ता नहीं शोभेगा। तो बापदादा के घर के श्रृंगार तो सभी हुए, सभी के मुख से बाबा शब्द तो निकलता ही है। बच्चे घर का श्रृंगार होते हैं। अभी भी देखो यह ओम् शान्ति भवन का हाल आप सबके आने से सज गया है ना। तो घर के श्रृंगार, बाप के श्रृंगार सदा चमकते रहो। क्वान्टिटी से क्वालिटी में परिवर्तन हो जाओ। समझा - आज तो सिर्फ मिलने का दिन था फिर भी ब्रह्मा बाप को हमजिन्स पसन्द आ गये, इसलिए पिकनिक की। अच्छा।

सदा प्रभु फल खाने के अधिकारी, सदा ब्रह्मा बाप समान सेकण्ड में सौदा करने वाले, हर कर्म में कर्म योगी, ब्रह्मा बाप को फालो करने वाले, ऐसे बाप समान विशेष आत्माओं को, चारों ओर के क्वालिटी और क्वान्टिटी वाले बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ अव्यक्त बापदादा की मुलाकत (अधरकुमारों से)

1- सदा अपने को विश्व के अन्दर कोटो में से कोई हम हैं - ऐसे अनुभव करते हो? जब भी यह बात सुनते हो - कोटों से कोई, कोई में भी कोई तो वह स्वयं को समझते हो? जब हूबहू पार्ट रिपीट होता है तो उस रिपीट हुए पार्ट में हर कल्प आप लोग ही विशेष होंगे ना! ऐसे अटल विश्वास रहे। सदा निश्चय बुद्धि सभी बातों में निश्चिन्त रहते हैं। निश्चय की निशानी है निश्चिन्त। चिन्तायें सारी मिट गई। बाप ने चिंताओं की चिता से बचा लिया ना! चिंताओं की चिता से उठाकर दिलतख्त पर बिठा दिया। बाप से लगन लगी और लगन के आधार पर लगन की अग्नि में चिन्तायें सब ऐसे समाप्त हो गई जैसे थी ही नहीं। एक सेकेण्ड में समाप्त हो गई ना! ऐसे अपने को शुभचिन्तक आत्मायें अनुभव करते हो! कभी चिंता तो नहीं रहती! न तन की चिंता, न मन में कोई व्यर्थ चिंता और न धन की चिंता क्योंकि दाल रोटी तो खाना है और बाप के गुण गाना है। दाल रोटी तो मिलनी ही है। तो न धन की चिंता, न मन की परेशानी और न तन के कर्मभोग की भी चिंता क्योंकि जानते हैं यह अन्तिम जन्म और अन्त का समय है, इसमें सब चुक्तु होना है इसलिए सदा शुभचिन्तक। क्या होगा! कोई चिंता नहीं। ज्ञान की शक्ति से सब जान गये। जब सब कुछ जान गये तो क्या होगा, यह क्वेश्चन खत्म - क्योंकि ज्ञान है जो होगा वह अच्छे ते अच्छा होगा। तो सदा शुभचिन्तक, सदा चिन्ताओं से परे निश्चय बुद्धि, निश्चिन्त आत्मायें, यही तो जीवन है। अगर जीवन में निश्चिन्त नहीं तो वह जीवन ही क्या है! ऐसी श्रेष्ठ जीवन अनुभव कर रहे हो? परिवार की भी चिन्ता तो नहीं है? हरेक आत्मा अपना हिसाब किताब चुक्तु भी कर रही है और बना भी रही है, इसमें हम क्या चिंता करें। कोई चिंता नहीं। पहले चिता पर जल रहे थे, अभी बाप ने अमृत डाल जलती चिता से मरजीवा बना दिया। जिंदा कर दिया। जैसे कहते हैं मरे हुए को जिंदा कर दिया। तो बाप ने अमृत पिलाया और अमर बना दिया। मरे हुए मुर्दे के समान थे और अब देखो क्या बन गये! मुर्दे से महान बन गये। पहले कोई जान नहीं थी तो मुर्दे समान ही कहेंगे ना। भाषा भी क्या बोलते थे, अज्ञानी लोग भाषा में बोलते हैं - मर जाओ ना। या कहेंगे हम मर जाएं तो बहुत अच्छा। अब तो मरजीवा हो गये, विशेष आत्मायें बन गये। यही खुशी है ना। जलती हुई चिता से अमर हो गये - यह कोई कम बात है! पहले सुनते थे भगवान मुर्दे को भी जिंदा करता है, लेकिन कैसे करता, यह नहीं समझते थे। अभी समझते हो हम ही जिंदा हो गये तो सदा नशे और खुशी में रहो।

टीचर्स के साथ:- सेवाधारियों की विशेषता क्या है? सेवाधारी अर्थात् आंख खुले और सदा बाप के साथ बाप के समान स्थिति का अनुभव करे। अमृतवेले के महत्व को जानने वाले विशेष सेवाधारी। विशेष सेवाधारी की महिमा ह़ै जो विशेष वरदान के समय को जानें और विशेष वरदानों का अनुभव करें। अगर अनुभव नहीं तो साधारण सेवाधारी हुए, विशेष नहीं। विशेष सेवाधारी बनना है तो यह विशेष अधिकार लेकर विशेष बन सकते हो। जिसको अमृतवेले का, संकल्प का, समय का और सेवा का महत्व है ऐसे सर्व महत्व को जानने वाले विशेष सेवाधारी होते हैं। तो इस महत्व को जान महान बनना है। इसी महत्व को जान स्वयं भी महान बनो और औरों को भी महत्व बतलाकर, अनुभव कराकर महान बनाओ। अच्छा - ओम् शान्ति।

अव्यक्त महावाक्य पर्सनल

सफल करो और सफलता मूर्त बनो

जैसे ब्रह्मा बाप ने निश्चय के आधार पर, रूहानी नशे के आधार पर निश्चित भावी के ज्ञाता बन सेकेण्ड में सब कुछ सफल कर दिया; अपने लिए नहीं रखा, सफल किया। जिसका प्रत्यक्ष सबूत देखा कि अन्तिम दिन तक तन से पत्र-व्यवहार द्वारा सेवा की, मुख से महावाक्य उच्चारण किये। अन्तिम दिन भी समय, संकल्प, शरीर को सफल किया। तो सफल करने का अर्थ ही है-श्रेष्ठ तरफ लगाना। ऐसे जो सफल करते हैं उन्हें सफलता स्वत: प्राप्त होती है। सफलता प्राप्त करने का विशेष आधार ही है-हर सेकेण्ड, हर श्वांस, हर खजाने को सफल करना। संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क जिसमें भी सफलता अनुभव करने चाहते हो तो स्व के प्रति चाहे अन्य आत्माओं के प्रति सफल करते जाओ। व्यर्थ न जाने दो तो ऑटोमेटिकली सफलता के खुशी की अनुभूति करते रहेंगे क्योंकि सफल करना अर्थात् वर्तमान के लिए सफलता मूर्त बनना और भविष्य के लिए जमा करना।

सेवा में सफलता प्राप्त करने के लिए समर्पण भाव और बेफिक्र स्थिति चाहिए। सेवा में जरा भी मेरेपन का भाव मिक्स न हो। कोई भी बात का फिक्र न हो क्योंकि फिक्र करने वाला समय भी गंवाता, इनर्जी भी व्यर्थ जाती और काम भी गंवा देता है। वह जिस काम के लिए फिक्र करता वह काम ही बिगड़ जाता है। दूसरा - सदा सफलता मूर्त बनने का साधन है-एक बल एक भरोसा। निश्चय सदा ही निश्चिंत बनाता है और निश्चिंत स्थिति वाला जो भी कार्य करेगा उसमें सफल जरूर होगा। जैसे ब्रह्मा बाप ने दृढ़ संकल्प से हर कार्य में सफलता प्राप्त की, दृढ़ता सफलता का आधार बना। ऐसे फालो फादर करो। हर खजाने को, गुणों को, शक्तियों को कार्य में लगाओ तो बढ़ते जायेंगे। बचत की विधि, जमा करने की विधि को अपनाओ तो व्यर्थ का खाता स्वत: ही परिवर्तन हो सफल हो जायेगा। बाप द्वारा जो भी खजाने मिले हैं उनका दान करो, कभी भी स्वप्न में भी गलती से प्रभू देन को अपना नहीं समझना। मेरा यह गुण है, मेरी शक्ति है-यह मेरापन आना अर्थात् खजानों को गंवाना। अपने ईश्वरीय संस्कारों को भी सफल करो तो व्यर्थ संस्कार स्वत: ही चले जायेंगे। ईश्वरीय संस्कारों को बुद्धि के लॉकर में नहीं रखो। कार्य में लगाओ, सफल करो। सफल करना माना बचाना या बढ़ाना। मंसा से सफल करो, वाणी से सफल करो, सम्बन्ध-सम्पर्क से, कर्म से, अपने श्रेष्ठ संग से, अपने अति शक्तिशाली वृत्ति से सफल करो। सफल करना ही सफलता की चाबी है। आपके पास समय और संकल्प रूपी जो श्रेष्ठ खजाने हैं, इन्हें ''कम खर्च बाला नशीन'' की विधि द्वारा सफल करो। संकल्प का खर्च कम हो लेकिन प्राप्ति ज्यादा हो। जो साधारण व्यक्ति दो चार मिनट संकल्प चलाने के बाद, सोचने के बाद सफलता या प्राप्ति कर सकता है वह आप एक दो सेकेण्ड में कर सकते हो। ऐसे ही वाणी और कर्म, कम खर्चा और सफलता ज्यादा हो तब ही कमाल गाई जायेगी। तो आपके पास जो भी प्रापर्टी है, समय, संकल्प, श्वांस, तन-मन-धन सब सफल करो, व्यर्थ नहीं गंवाओ, न आइवेल के लिए सम्भालकर रखो। ज्ञान धन, शक्तियों का धन, गुणों का धन हर समय मैं पन से न्यारे बन सफल करो तो जमा होता जायेगा। सफल करना अर्थात् पदमगुणा सफलता का अनुभव करना।

इस ब्राह्मण जीवन में -

* जो समय को सफल करते हैं वह समय की सफलता के फलस्वरूप राज्य-भाग्य का फुल समय राज्य-अधिकारी बनते हैं।

* जो श्वांस सफल करते हैं, वह अनेक जन्म सदा स्वस्थ रहते हैं। कभी चलते-चलते श्वांस बन्द नहीं होगा, हार्ट फेल नहीं होगा।

* जो ज्ञान का खजाना सफल करते हैं, वह ऐसा समझदार बन जाते हैं जो भविष्य में अनेक वजीरों की राय नहीं लेनी पड़ती, स्वयं ही समझदार बन राज्य-भाग्य चलाते हैं।

* जो सर्व शक्तियों का खजाना सफल करते हैं अर्थात् उन्हें कार्य में लगाते हैं वह सर्व शक्ति सम्पन्न बन जाते हैं। उनके भविष्य राज्य में कोई शक्ति की कमी नहीं होती। सर्व शक्तियां स्वत: ही अखण्ड, अटल, निर्विघ्न कार्य की सफलता का अनुभव कराती हैं।

* जो सर्व गुणों का खजाना सफल करते हैं, वह ऐसे गुणमूर्त बनते हैं जो आज लास्ट समय में भी उनके जड़ चित्र का गायन ‘सर्व गुण सम्पन्न देवता' के रूप में होता है।

* जो स्थूल धन का खजाना सफल करते हैं वह 21 जन्मों के लिए मालामाल रहते हैं। तो सफल करो और सफलता मूर्त बनो। अच्छा।

वरदान:

मेरे को तेरे में परिवर्तन कर सदा हल्का रहने वाले डबल लाइट फरिश्ता भव!

चलते-फिरते सदा यही स्मृति में रहे कि हम हैं ही फरिश्ते। फरिश्तों का स्वरूप क्या, बोल क्या, कर्म क्या...वह सदा स्मृति में रहें क्योंकि जब बाप के बन गये, सब कुछ मेरा सो तेरा कर दिया तो हल्के (फरिश्ते) बन गये। इस लक्ष्य को सदा सम्पन्न करने के लिए एक ही शब्द याद रहे - सब बाप का है, मेरा कुछ नहीं। जहाँ मेरा आये वहाँ तेरा कह दो, फिर कोई बोझ फील नहीं होगा, सदा उड़ती कला में उड़ते रहेंगे।

स्लोगन:

बाप के ऊपर बलिहार जाने का हार पहन लो तो माया से हार नहीं होगी।