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11-03-18

11-03-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 09-05-83 मधुबन


“ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार - स्मृति, वृत्ति, और दृष्टि की स्वच्छता (पवित्रता)”

आज बापदादा सभी ब्राह्मण बच्चों के श्रेष्ठ कर्म की रेखा देख रहे हैं। जिस कर्म की रेखा द्वारा ही वर्तमान और भविष्य तकदीर की लकीर खींची जा रही है। सभी ब्राह्मणों की कर्म रेखा वा कर्म कहानी वा कर्मों का खाता देख रहे थे। वैसे भाग्य विधाता बाप के, कर्मों की गुह्य गति के ज्ञाता बाप के डायरेक्ट वर्से के अधिकारी बच्चे हैं। साथ-साथ स्वयं विधाता बापदादा ने सभी बच्चों को गोल्डन चांस दिया है कि विधाता के बच्चे हो इसलिए जो जितना भाग्य बनाना चाहे, जितना सर्व प्राप्ति सवरूप बनना चाहे, हरेक को सम्पूर्ण अधिकार है। अधिकार देने में नम्बर नहीं है, फ्रीडम है अर्थात् सम्पूर्ण स्वतंत्रता है। और साथ-साथ ड्रामा अनुसार वरदानी समय का भी सहयोग है। वह भी सभी को समान है। फिर भी इतना गोल्डन चांस मिलते, बेहद की प्राप्ति को भी नम्बरवार की हद में ला देते हैं। बाप भी बेहद का, वर्सा भी बेहद का, अधिकार भी बेहद का लेकिन लेने वाले नम्बरवार बन जाते हैं - ऐसा क्यों? इसके संक्षेप में दो कारण हैं। एक बुद्धि में स्वच्छता नहीं, क्लीयर नहीं। दूसरा - हर कदम में सावधान नहीं अर्थात् केयरफुल नहीं। इन दो कारणों से नम्बरवार बन जाते हैं। मुख्य बात स्वच्छता की है। इसको ही पवित्रता वा पहले विकार पर जीत कहा जाता है। जब ब्राह्मण जीवन अपनाई तो ब्राह्मण जीवन का मुख्य आधार कहो, नवीनता कहो, अलौकिकता कहो, जीवन का श्रृंगार कहो, वह है ही पवित्रता। ब्राह्मण जीवन की चैलेन्ज ही है काम-जीत। यही असम्भव से सम्भव कर दिखाने की, श्रेष्ठ ज्ञान और श्रेष्ठ ज्ञान दाता की निशानी है। जैसे नामधारी ब्राह्मणों की निशानी चोटी और जनेऊ है वैसे सच्चे ब्राह्मणों की निशानी पवित्रता और मर्यादायें हैं। जन्म की वा जीवन की निशानी वह तो सदा कायम रखनी होती है ना। पवित्रता की पहली आधारमूर्त प्वाइंट है "स्मृति की पवित्रता"। मैं सिर्फ आत्मा नहीं लेकिन मैं शुद्ध पवित्र आत्मा हूँ। आत्मा शब्द तो सभी कहते हैं लेकिन ब्राह्मण आत्मा सदा यही कहेगी कि मैं शुद्ध पवित्र आत्मा हूँ। श्रेष्ठ आत्मा हूँ। पूज्य आत्मा हूँ। विशेष आत्मा हूँ। यह स्मृति की ही पवित्रता आधार मूर्त है। तो पहला आधार मज़बूत किया है? यह आक्यूपेशन सदा स्मृति में रहता है? जैसा आक्यूपेशन वैसा कर्म स्वत: होता है। पहले स्मृति की स्वच्छता चाहिए। उसके बाद वृत्ति और दृष्टि। जब स्मृति में पवित्रता आ गई कि मैं पूज्य आत्मा हूँ तो पूज्य आत्मा का विशेष गायन क्या है? सम्पूर्ण निर्विकारी, सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण। यही पूज्य आत्मा की क्वालिफिकेशन है। वह स्वत: ही स्वयं को और सर्व को किस दृष्टि से देखेंगे? चाहे अलौकिक परिवार में, चाहे लौकिक परिवार कहो वा लौकिक स्मृति में रहने वाली आत्मायें कहो, सभी के प्रति परम पूज्य आत्मायें हैं वा पूज्य बनाना है यही दृष्टि में रहे। पूज्य आत्माओं अर्थात् अलौकिक परिवार की आत्माओं के प्रति अगर कोई भी अपवित्र दृष्टि जाती है तो यह स्मृति का फाउन्डेशन कमज़ोर है। और यह महा-महा-महापाप है। किसी भी पूज्य आत्मा प्रति अपवित्रता अर्थात् दैहिक दृष्टि जाती है कि यह सेवाधारी बहुत अच्छे हैं, यह शिक्षक बहुत अच्छी है। लेकिन अच्छाई क्या है? अच्छाई है ऊंची स्मृति और ऊंची दृष्टि की। अगर वह ऊंचाई नहीं तो अच्छाई कौन सी है। यह भी सुनहरी मृगमाया का रूप है, यह सर्विस नहीं है, सहयोग नहीं है लेकिन स्वयं को और सर्व को वियोगी बनाने का आधार है। यह बात बार-बार अटेन्शन रखो।
बाप द्वारा निमित्त बने हुए शिक्षक वा सेवा के सहयोगी बनी हुई आत्मायें चाहे बहन हो या भाई हो, लेकिन सेवाधारी आत्माओं की सेवा के मुख्य लक्षण त्याग और तपस्या है, इसी लक्षण के आधार पर सदा त्यागी और तपस्वी की दृष्टि से देखो न कि दैहिक दृष्टि से। श्रेष्ठ परिवार है तो सदा श्रेष्ठ दृष्टि रखो क्योंकि यह महापाप कभी प्राप्ति स्वरूप का अनुभव करा नहीं सकता। सदा ही कोई न कोई कर्म में, संकल्प में, सम्बन्ध-सम्पर्क में डिफेक्ट वा इफेक्ट इसी उतराई और चढ़ाई में चलता रहेगा। कभी भी परफेक्ट स्थिति का अनुभव नहीं कर सकेगा इसलिए सदा याद रखो पूज्य आत्मा के बदले पाप आत्मा तो नहीं बन गये। इसी एक विकार से और विकार स्वत: ही पैदा हो जाते हैं। कामना पूरी न हुई तो क्रोध साथी पहले आयेगा इसलिए इस बात को हल्का नहीं समझो, इसमें अलबेले मत बनो। बाहर से शुभ सम्बन्ध है, सेवा का सम्बन्ध है - इस रॉयल रूप के पाप को बढ़ाओ मत। चाहे कोई भी दोषी हो इस पाप के, लेकिन दूसरे को दोषी बनाए स्वयं को अलबेले मत बनाओ। "मैं दोषी हूँ" जब तक यह सावधानी नहीं रखेंगे तब तक महापाप से मुक्त नहीं हो सकेंगे। किसी भी प्रकार का, मन्सा संकल्प का, बोल का वा सम्पर्क-सम्बन्ध का विशेष झुकाव होना यह लगाव की निशानी है। और कुछ नहीं करते हैं, सिर्फ बात करते हैं, यह बातों का झुकाव भी लगाव की परसेन्टेज़ है। चाहे सेवा के सहयोग की तरफ भी विशेष झुकाव है, यह भी लगाव है। और जब कोई भी इशारा मिलता है तो इशारे को इशारे से खत्म कर देना चाहिए। अगर जिद्द करते हो और सिद्ध करते हो, स्पष्टीकरण देने की कोशिश करते हो, इससे समझो स्पष्टीकरण अपने पाप की करते हो। बात की नहीं करते हो, पाप की लकीर और लम्बी करते जाते हो इसलिए जब हैं ही विश्व परिवर्तन के कार्य में तो स्व-परिवर्तन कर लेना, यही समझदारी का काम है। अगर कुछ नहीं है तो नहीं कर दो ना अर्थात् स्व परिवर्तन कर बात का नाम-निशान खत्म कर दो। यह क्यों, ऐसा क्यों यह तो चलता ही है। यह वायुमण्डल की अग्नि में तेल डालना है। आग को भड़काना है। बात को बढ़ाना है। इसीलिए फुलस्टाप लगाना चाहिए। है वा नहीं है, इस बहस में नहीं जाओ। लेकिन संकल्प, बोल और सम्पर्क में परिवर्तन लाओ। यह है विधि इस पाप से बचने की। समझा! ब्राह्मण परिवार में यह संस्कार नाम-निशान मात्र न रहे। अच्छा - फिर सुनायेंगे कि क्रोध महाभूत क्या है।
यही विशेष अटेन्शन देने की बातें हैं। जो भी आये हो विशेष बल भरने आये हो। किसी भी कमज़ोर संस्कार को सदा के लिए समाप्त करने आये हो। तो कमज़ोर संस्कार का समाप्ति समारोह करके जाना। यह समारोह मनायेंगे ना। है भी विशेष पुरानों का ग्रुप। आप लोग जब समारोह मनायेंगे तब नये भी उमंग-उत्साह में आयेंगे। ऐसे नहीं कि हर वर्ष यह समारोह मनाना पड़े। एक बार का यह समारोह और फिर सम्पन्न समारोह! सदाकाल के लिए समाप्ति का समारोह मनायेंगे ना। इसमें मातायें भी आ जाती, अधरकुमार भी आ जाते। ऐसे नहीं सिर्फ पाण्डव मनायेंगे। कुमारियाँ भी मनायेंगी, टीचर भी मनायेंगी। अधरकुमारियाँ भी मनायेंगी। सब मिलकर यह समारोह मनावें। ठीक है ना। कुमारियाँ शक्तियाँ है ना! तो शक्ति रूप का समारोह मनायेंगे ना। अच्छा।
सदा स्वयं प्रति शुभचिन्तक, सदा स्व-परिवर्तन के कार्य में पहले मैं, इस पाठ में नम्बरवन आने वाले, सदा संकल्प, बोल और सम्पर्क में सर्व प्रति बेहद के स्मृति स्वरूप, सदा स्वच्छता और सावधानी में रहने वाले, ऐसे पवित्र पूज्य आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
कुमारों प्रति अव्यक्त बापदादा के मधुर महावाक्य:-
सदा अपने को हर कदम में साक्षी और सदा बाप के साथी - ऐसे अनुभव करते हो? जो सदा साक्षी होगा वह सदा ही कर्म करते, हर कदम उठाते कर्म के बन्धन से न्यारे और बाप के प्यारे तो ऐसे साक्षीपन अनुभव करते हो? कोई भी कर्मेन्द्रियाँ अपने बन्धन में नहीं बाँधे, इसको कहा जाता है साक्षी। ऐसे साक्षी हो? कोई भी कर्म अपने बन्धन में बाँधता है तो उसको साक्षी नहीं कहेंगे। फँसने वाला कहेंगे। न्यारा नहीं कहेंगे। कभी ऑख भी धोखा न दे। शारीरिक सम्बन्ध में आना अर्थात् ऑख का धोखा खाना। तो कोई भी कर्मेन्द्रिय धोखा न दे। साक्षी रहें और सदा बाप के साथी रहें। हर बात में बाप याद आवे। महान आत्मायें भी नहीं, निमित्त आत्मायें भी नहीं लेकिन बाबा ही याद आये। कोई भी बात आती है तो पहले बाप याद आता या निमित्त आत्मायें याद आती? सदा एक बाप दूसरा न कोई, आत्मायें सहयोगी हैं लेकिन साथी नहीं हैं। साथी तो बाप है। सहयोगी को अपना साथी समझना, यह रांग है। तो सदा सेवा के साथी लेकिन सेवा में साथी बाप है। निमित्त सहयोग देते हैं, ऐसा सदा स्मृति स्वरूप हो! किसी देहधारी को साथी बनाया तो उड़ती कला का अनुभव नहीं हो सकता इसलिए हर बात में बाबा-बाबा याद रहे। कुमार डबल लाइट हैं, संस्कार-स्वभाव का भी बोझ नहीं। व्यर्थ संकल्प का भी बोझ नहीं। इसको कहा जाता है हल्का। जितने हल्के होंगे उतना सहज उड़ती कला का अनुभव करेंगे। अगर ज़रा भी मेहनत करनी पड़ती है तो जरूर कोई बोझ है। तो बाबा-बाबा का आधार ले उड़ते रहो। यही अविनाशी आधार है।
रूहानी यूथ ग्रुप शान्तिकारी, कल्याणकारी ग्रुप है। सदा विश्व में शान्ति स्थापना के कार्य में निमित्त है, वह अशान्ति फैलाने वाले और आप शान्ति फैलाने वाले। ऐसे अपने को समझते हो? यूथ ग्रुप में राजनीतिक लोगों की भी उम्मीदें हैं और बापदादा की भी उम्मीदें हैं। उम्मीदें पूरी करने वाले हो ना। बच्चे सदा बाप की उम्मीदें पूरी करने वाले होंगे। तो सफलता के सितारे बन गवर्मेन्ट तक यह आवाज बुलन्द करना कि हम विजयी रत्न हैं। अभी देखेंगे कि कौन सा ग्रुप और कहाँ यह पहले झण्डा लहराते हैं। कभी भी अपनी शक्तियों को मिसयूज़ नहीं करना। सदा यह याद रखो कि हमारे ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेवारी है। एक कमजोर बनता है तो एक के पीछे एक का सम्बन्ध है। हम जिम्मेवार हैं, यह स्मृति सदा रहे। जो कर्म आप करेंगे आपको देख सब करेंगे इसलिए साधारण कर्म नहीं, सदा श्रेष्ठ कर्म करने वाले, सदा अचल रहने वाले। अच्छा।
विदाई के समय - सभी बच्चों प्रति गुडमार्निंग
सर्व चारों ओर की श्रेष्ठ आत्माओं को वा विशेष आत्माओं को बापदादा मधुबन वरदान भूमि में सम्मुख देखते हुए याद प्यार दे रहे हैं और सभी से गुडमार्निंग कर रहे हैं। गुडमार्निंग अर्थात् सारा दिन ऐसा ही शुभ और श्रेष्ठ रहे। सारा दिन याद प्यार की पालना में रहें। यह याद प्यार ही श्रेष्ठ पालना है। इसी पालना में सदा रहो और यही ईश्वरीय याद और प्यार सभी आत्माओं को देते हुए उन्हों की भी श्रेष्ठ पालना करो। याद प्यार पालना का झूला है। जिस झूले में पालना होती है। और गुडमार्निंग शक्तिशाली अमृत कहो, वा औषधि कहो, वा श्रेष्ठ भोजन कहो, जो भी कहो। ऐसे शक्तिशाली बनाने की गुडमार्निंग है और पालना का याद प्यार झूला है। इसी झूले में सदा रहे और इसी शक्ति में सदा रहे। ऐसे सदा इसी स्वरूप में रहने की सर्व बच्चों को गुडमार्निंग। अच्छा।

वरदान:

आगे पीछे सोच समझकर हर कार्य करने वाले ज्ञानी तू आत्मा त्रिकालदर्शी भव!

जो बच्चे त्रिकालदर्शी अर्थात् तीनों कालों का ज्ञान बुद्धि में रख, आगे पीछे सोच समझकर कर्म करते हैं उन्हें हर कर्म में सफलता मिलती है। ऐसे नहीं बहुत बिजी था इसलिए जो काम सामने आया वह करना शुरू कर दिया, नहीं। कोई भी कर्म करने के पहले यह आदत पड़ जाए कि पहले तीनों काल सोचना है। त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित होकर कर्म करो तो कोई भी कार्य व्यर्थ वा साधारण नहीं होगा।

स्लोगन:

अपने सन्तुष्ट और खुशनुम: जीवन से सेवा करो तब कहेंगे सच्चे सेवाधारी।