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25-03-18

25-03-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 01-06-83 मधुबन


"नये ज्ञान और ज्ञान दाता को अथॉरिटी से प्रत्यक्ष करो तब प्रत्यक्षता का नगाड़ा बजेगा" (मीटिंग में बापदादा की पधरामणी)

सभी ताज और तख्तधारी विशेष आत्माओं की सभा है ना। सभी अपने को ताज व तख्तधारी समझते हो ना! सभी बेहद की सेवा के जिम्मेवारी के ताजधारी हो ना। बेहद का ताज अर्थात् बेहद की स्मृति स्वरूप में स्थित हो। बेहद की जिम्मेवारी के ताजधारी। हर एक बेहद के ताजधारी बच्चे की लाइट और माइट की किरणें बेहद में फैली हुई हैं। हद से निकल बेहद के बादशाह बन गये ना। जब देह के हद की स्मृति से भी पार हो गये तो देह सहित देह के साथ सर्व हदों से पार हो गये। विशेष सेवा ही है हद से बेहद में ले जाना। ब्रह्मा बाप अव्यक्त क्यों बनें? हद से निकाल बेहद में ले जाने के लिए। ब्रह्मा बाप के स्नेह का प्रत्यक्ष स्वरूप है फालो ब्रह्मा फादर। ब्रह्मा बाप अपने राइट हैण्ड बच्चों को, अपनी विशेष भुजाओं को अव्यक्त वतन से, बेहद के सेवास्थान से बाहें पसार कर हाथ में हाथ मिलाने के लिए बुला रहे हैं। ब्रह्मा बाप का बच्चों से स्नेह है। तो ब्रह्मा बाप बुला रहे हैं कि बच्चे, बेहद में आ जाओ। यह आवाज सुनते हो? बस एक ही लहर ब्रह्मा बाप की सदा रहती है कि मेरे समान बेहद के ताजधारी बन चारों ओर प्रत्यक्षता की लाइट और माइट ऐसी फैलावें जो सर्व आत्माओं को निराशा से आशा की किरण दिखाई दे। सबकी अंगुली उस विशेष स्थान की ओर हो। जो आकाश से परे अंगुली कर ढ़ूंढ़ रहे हैं, उन्हों को यह अनुभव हो कि इस धरती पर, वरदान भूमि पर धरती के सितारे प्रत्यक्ष हो गये हैं। यह सूर्य, चन्द्रमा और तारामण्डल यहाँ अनुभव हो। जैसे साइन्स वाले साइन्स के आधार से आकाश के तारामण्डल का अनुभव कराते हैं। ऐसे यह धरती का चैतन्य तारामण्डल दूर वालों को भी अनुभव हो। इस शुभ आशा को पूर्ण करने वाले आप सभी निमित्त आत्मायें हो। ऐसे बेहद के प्लैन्स बनाये हैं ना। प्लैन्स तो यथा शक्ति बनाये। बापदादा अब समय प्रमाण बच्चों से कौन सी रही हुई सेवा चाहते हैं?

बापदादा आज रूह-रूहान कर रहे थे। क्या रूह-रूहान हुई? बाप बोले कि मेरे निमित्त बने हुए श्रेष्ठ बच्चे, सिकीलधे बच्चे कहो, मुरब्बी बच्चे कहो वा सदा बाप के साथी बच्चे कहो - ऐसे बच्चे वरदान भूमि पर इकट्ठे हुए हैं, सेवा के प्लैन्स बनाने के लिए, तो ब्रह्मा बाप बोले, कि जो मीटिंग में योजनायें निकाली वह तो बहुत अच्छी। लेकिन मुख्य एक सेवा अभी भी रही हुई है क्योंकि आप कितनी बड़ी अथॉरिटी वाले हो और कितने प्रकार की अथॉरिटी वाले हो, ज्ञान की अथॉरिटी, योगबल की अथॉरिटी, श्रेष्ठ धारणा स्वरूप की अथॉरिटी, डायरेक्ट बाप के वारिसपन की अथॉरिटी, विश्व परिवर्तन करने के निमित्त बनने की अथॉरिटी। कितनी अथॉरिटी है। जैसे एक शास्त्रों की अथॉरिटी वाले, थोड़ा बहुत त्याग कर पवित्र बनने की अथॉरिटी वाले, सिर्फ यह एक अथॉरिटी है, वह भी सत्यता की अथॉरिटी नहीं, भल महान आत्मायें हैं लेकिन परमात्मा बाप के सम्बन्ध में यथार्थ नॉलेज की अथॉरिटी नहीं - ऐसे एक अथॉरिटी वाले भी विश्व में सर्व आत्माओं को अपने तरफ आकर्षित कर झूठ को सत्य सिद्ध कर चलते आ रहे हैं। कितने समय से अपनी अथॉरिटी दिखाते आ रहे हैं। कितनी फलक से, अल्पकाल के प्राप्ति की झलक से अपना प्रभाव डालते हैं। तो जो सर्व अथॉरिटी वाली श्रेष्ठ आत्मायें हैं उन्हों को क्या करना है? बाकी क्या रहा हुआ है, जानते हो? समाप्ति के लिए कहाँ तक समय का अन्दाज लगा रहे हो? 1984 तक या 2000 तक? कहाँ तक अन्दाज लगा रहे हो? दो हजार पूरे होने हैं वा उसके पहले होना है? अपनी तैयारी के हिसाब से क्या समझते हो? कौन सी बात अभी रही हुई है? नई दुनिया के लिए धरनी तो बना रहे हो। लेकिन नई दुनिया का आधार - यह नई नॉलेज है। पहली महिमा क्या आती है? ज्ञान का सागर कहते हो ना। तो जो पहली महिमा है ज्ञान, उस नये ज्ञान को दुनिया के आगे प्रत्यक्ष किया है? जब तक "यह नया ज्ञान है" यह प्रत्यक्ष नहीं हुआ है तो ज्ञानदाता कैसे प्रत्यक्ष हो। पहले ज्ञान आता है फिर दाता आता है। तो ज्ञान दाता ऊंचे ते ऊंचा है या एक ही वह ज्ञान दाता है, यह सिद्ध कैसे होगा? इस नये ज्ञान से ही सिद्ध होगा। आत्मा क्या कहती और परमात्मा क्या कहता है, यह अन्तर जब तक मनुष्यों की बुद्धि में न आये तब तक जो भी तिनके के सहारे पकड़े हुऐ हैं वह कैसे छोड़ेंगे और एक का सहारा कैसे लेंगे! अभी तो छोटे-छोटे तिनकों के सहारे पर चल रहे हैं, वो ही अपना आधार समझ रहे हैं। जब तक उन्हों को ज्ञान द्वारा ज्ञानदाता का सहारा अनुभव नहीं हो तब तक इस हद के बन्धनों से मुक्त हो नहीं सकते। अभी तक धरनी बनाने की, वायुमण्डल परिवर्तन करने की सेवा हुई है। अच्छा कार्य है, परिवार का प्यार है, यह प्यार का गुण वायुमण्डल को परिवर्तन करने के निमित्त बना। धरनी तो बन गई और बनती जायेगी। लेकिन जो फाउन्डेशन है, नवीनता है, बीज है, वह है नया ज्ञान। नि:स्वार्थ प्यार है, रूहानी प्यार है यह तो अनुभव करते हैं लेकिन अभी प्यार के साथ-साथ ज्ञान की अथॉरिटी वाली आत्मायें हैं, सत्य ज्ञान की अथॉरिटी है, यह प्रत्यक्षता अभी रही हुई है। जो भी आते हैं वो समझें कि यह नया ज्ञान, नई बात है। जो कोई ने नहीं सुनाई वह यहाँ सुनी। यह वर्णन करें कि यह देने वाला अथॉरिटी है। पवित्रता है, शान्ति है, प्यार है, स्वच्छता है यह सब बातें तो फाउन्डेशन है, जिस फाउन्डेशन के आधार पर धरनी परिवर्तन हुई। यह भी 4 स्तम्भ है। पहले जो किसी की भी बुद्धि इस तरफ टिकती नहीं थी सो अभी इन 4 स्तम्भों के आधार द्वारा बुद्धि की आकर्षण होती है। यह परिवर्तन तो हुआ। लेकिन अभी जो मुख्य बात है - नया ज्ञान है, उसका आवाज बुलन्द हो। आज तक जिन बातों की सभी ने 'हाँ' की, उन बातों के लिए बी.के. आलमाइटी अथॉरिटी 'ना' सिद्ध करके बताती हैं। जो वे ना कहते आप हाँ कहते हो, तो हाँ और ना का रात दिन का अन्तर है ना। तो इस महान अन्तर को सिद्ध करने वाली महान आत्मायें हैं, यह नाम अब प्रत्यक्ष करो तब जयजयकार होगी। आत्मा का ज्ञान यथार्थ रूप में न भी है लेकिन फिर भी लोग सुन करके मिक्स कर देते हैं कि हाँ वहाँ भी ऐसे ही कहते हैं। लेकिन यह आवाज बुलन्द हो कि दुनिया सारी एक तरफ है और बी.के. दूसरे तरफ हैं। यह नया ज्ञान देने वाले अथॉरिटी हैं। यह अथॉरिटी प्रसिद्ध हो। इसी से ही शक्तिशाली आत्मायें आगे आयेंगी जो आपके तरफ से ढ़िढ़ोरा पिटवायेंगी। आपको ढ़िढ़ोंरा नहीं पीटना पड़ेगा लेकिन ऐसी आत्मायें सैटिस्फाय हो नई बात जान, नये उमंग में आकर ढ़िढ़ोंरा पीटेंगी। धर्म युद्ध भी तो अभी रही हुई है ना। अभी गुरूओं की गद्दी को कहाँ हिलाया है। अभी तो टाल टालियाँ आदि सब बहुत आराम से अपनी धुन में लगे हुए हैं। बीज कब प्रत्यक्ष रूप में आता है? मालूम है बीज ऊपर कब आता है? जब छोटी बड़ी टाल टालियाँ एकदम बिगर पत्तों की सूखी हुई डालियाँ रह जाती हैं तब बीज ऊपर प्रत्यक्ष होता है। तो उसका प्लेन बनाया है। जब अपनी स्टेज पर आते हैं तो अपने ओरीज्नल नॉलेज की प्रत्यक्षता तो होनी चाहिए ना। अगर वरदान भूमि में आकर भी सिर्फ कहें शान्ति बहुत अच्छी है, प्यार बहुत अच्छा है। सिर्फ यह थोड़ी बहुत झोली भरकर चले गये तो वरदान भूमि पर आकर विशेष क्या ले गये। नया ज्ञान भी तो सिद्ध करना है ना। इसी नये ज्ञान की अथॉरिटी द्वारा ही आलमाइटी अथॉरिटी सिद्ध होगा। देने वाला कौन! प्रेम और शान्ति मिलने से इतना जरूर समझते हैं कि इन्हों को बनाने वाला कोई श्रेष्ठ है। लेकिन स्वयं भगवान है, यह बहुत कोई विरला समझते। तो समझा, क्या रहा हुआ है। अब नई दुनिया के लिए नया ज्ञान चारों ओर फैलाओ, समझा। कोटों में कोई निकले लेकिन ऐसा आवाज निकले जो चारों ओर पेपर्स में यह धूम मच जाए कि यह बी.के. दुनिया से नया ज्ञान देते हैं। ज्ञान क्या देते हैं, उसका आधार क्या मानते हैं, उनको सिद्ध कैसे करते हैं, यह जब अखबारों में आये तब समझो ज्ञान दाता का नगाड़ा बजा। समझा? ज्ञान के प्रभाव में प्रभावित हों। ज्ञान के प्रभावशाली और प्रेम के प्रभावशाली में क्या अन्तर है? ब्राह्मणों में भी दो भाग देखे ना। ब्राह्मण तो बने हैं लेकिन कोई प्यार के आधार पर कोई ज्ञान और प्यार दोनों के आधार पर। तो दोनों में स्थिति का अन्तर है ना। जो प्यार को भी ज्ञान से समझते हैं वह निर्विघ्न चलेंगे। जो सिर्फ प्यार के आधार पर चलते वह शक्तिशाली आत्मा नहीं होंगे। ज्ञान का बल जरूर चाहिए। जिनका पढ़ाई से प्यार है, मुरली से प्यार है और जिनका सिर्फ परिवार से प्यार है, उन्हों में कितना अन्तर है! ब्राह्मण जीवन अच्छी लगी, पवित्रता अच्छी लगी, इसी आधार पर आने वाले और ज्ञान की शक्ति के आधार पर आने वाले, उनमें कितना अन्तर है। ज्ञान की मस्ती, अलौकिक, निराधार रहने वाली मस्ती है। वैसे प्रेम भी एक शक्ति है लेकिन प्रेम की शक्ति वाले आधार के बिना चल नहीं सकते। कोई न कोई आधार जरूर चाहिए। मनन शक्ति, ज्ञान की शक्ति वाले की होगी। जितनी मनन शक्ति होगी उतनी बुद्धि के एकाग्रता की शक्ति आटोमेटिकली आयेगी। और जहाँ बुद्धि की एकाग्रता है वहाँ परखने की और निर्णय करने की शक्ति स्वत: आती है। जहाँ ज्ञान का फाउन्डेशन नहीं होगा वहाँ परखने की शक्ति, निर्णय करने की शक्ति कमजोर होगी क्योंकि एकाग्रता नहीं। अच्छा ।

बापदादा तो सब सुनते रहते हैं। हंसी भी आती और स्नेह में बलिहार भी जाते। बच्चों की हिम्मत देख खुश भी होते हैं। ब्रह्मा बाप को ज्यादा आता है कि यह मेरे समान बेहद के मालिक बन जाऍ। बच्चों के लिए रुके हुए हैं ना और दिन रात बच्चों की सेवा में तत्पर रहते। वतन में तो दिनरात नहीं है लेकिन स्थूल दुनिया में तो है ना। एक एक बच्चे को विशेष आत्मा, सम्पूर्ण आत्मा, सम्पन्न आत्मा, समान आत्मा देखने चाहते। बाप ब्रह्मा को कहते हैं धैर्य धरो। लेकिन ब्रह्मा को उमंग बहुत होता है ना, इसलिए वह बाप से यही रूहरिहान करते कि बच्चे हाथ में हाथ दे मेरे समान बन जाऍ। ब्रह्मा बाप के साकार जीवन की आदि से लेकर क्या विशेषता देखी। कब नहीं लेंकिन अभी करना है। कब शब्द न सुनने के, न सुनाने के संस्कार रहे। अगर कोई बच्चा कहता था कि घण्टे के बाद करेंगे तो घण्टा लगाने दिया? कोई कहता था ट्रेन जाने में 5-10 मिनट हैं हम कैसे पहुँचेंगे तो रुकने दिया? गाड़ी रुक जायेगी लेकिन बच्चा पहुँच ही जायेगा। चलती हुई ट्रेन रुक जायेगी लेकिन बच्चे को पहुँचना ही है। यह प्रैक्टिकल देखा ना। तो ऐसे ही बच्चे भी किसी भी बात में स्व परिवर्तन में वा विश्व परिवर्तन में कब शब्द को बदलकर अब के प्रैक्टिकल जीवन में आ जाऍ, यही ब्रह्मा बाप का उमंग सदा रहता है। तो फालो फादर है ना! अच्छा।

(दो चार भाई बहनें बापदादा से छुट्टी लेने आये)

स्नेह का रेसपान्ड तो मिल गया ना। सच्ची दिल पर साहेब सदा राजी है। आदि से सच्ची लगन में रहने वाली आत्मायें हो इसलिए बाप भी सच्चों को सदा स्नेह का रेसपान्ड देता रहता है। सदा दिल में बाप ही समाया हुआ है इसलिए अच्छे तीव्र पुरुषार्थ में चल रहे हो। कर्मयोगी आत्मा हो ना। कर्म और योग कम्बाइण्ड है ना। सदा बैलेन्स रख, बाप की ब्लैसिंग को लेने वाले और सदा ब्लिसफुल जीवन में रहने वाले, ऐसी श्रेष्ठ आत्मा हो। बाप सदा हर बच्चे प्रति यही शुभ आश रखते हैं कि यह विजय माला के मणके हैं। अच्छा!

वरदान:

कमजोर संकल्पों की जाल को समाप्त कर परतंत्रता के बंधन से मुक्त होने वाले स्वतंत्र आत्मा भव!

परतंत्रता का बंधन अपने ही मन के व्यर्थ कमजोर संकल्पों की जाल है। यह जाल क्वेश्चन के रूप में होती है। जब क्वेश्चन उठता है - पता नहीं क्या होगा, ऐसे तो नहीं होगा.....तो जाल बन जाती है। लेकिन संगमयुगी ब्राह्मणों का एक ही समर्थ संकल्प हो कि जो होगा वह कल्याणकारी होगा, श्रेष्ठ वा अच्छे से अच्छा होगा - इस समर्थ सकल्प से जाल को समाप्त कर दो तो बन्धनमुक्त स्वतंत्र आत्मा बन जायेंगे।

स्लोगन:

ज्ञानी और योगी तू आत्मा का प्रैक्टिकल स्वरूप नम्रता और निर्भयता है।