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11-04-2018

11-04-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - अब स्वीट होम चलना है इसलिए पुरानी दुनिया के कर्मों की लेन-देन वा हिसाब-किताब चुक्तू करो, योगबल से विकर्माजीत बनो।"

प्रश्नः-

तुम बच्चे लाइट हाउस बनकर बाप से योग क्यों लगाते हो?

उत्तर:-

क्योंकि तुम्हें सबको इस नर्क रूपी खारी चैनल से पार ले जाना है। तुम मुक्तिधाम और जीवन मुक्तिधाम में जाने के लिए योग में बैठ हरेक को सर्चलाइट देते हो। तुम रूहानी पण्डे भी हो, तुम्हें सबको स्वीट होम का रास्ता बताना है। सबको ज्ञान और योग के पंख देने हैं।

गीत:-

प्रीतम आन मिलो....  

ओम् शान्ति।

बच्चों को समझाया गया है जब रात अन्धेरी हो जाती है तब ही प्रीतमाओं का प्रीतम आते हैं अर्थात् सजनियों के साजन आते हैं। सजनी क्यों कहा जाता है? क्योंकि आत्मा जब शरीर के साथ है तो सजनी है। सजनियाँ अपने अशरीरी साजन को याद करती हैं।

बाप कहते हैं - बच्चे, तुम जानते हो परमपिता परमात्मा परमधाम से आकर इस शरीर में प्रवेश कर पढ़ाते हैं! गुह्य बातें सुनाते हैं। बाप ने समझाया है - बच्चे, अपने को अशरीरी समझो। मैं आत्मा हूँ, यह मेरा शरीर है। आत्मा को यह निश्चय हुआ कि अब घोर अन्धियारा है अर्थात् दुनिया तमोप्रधान है। यह दुनिया अब विनाश होनी है। बाप आये हैं हमको ले चलने, अशरीरी हो चलने से सन्नाटा हो जायेगा। आत्मा जब अशरीरी बनती है तो घर में सन्नाटा हो जाता है ना। रात को आत्मा है तो शरीर में, परन्तु आत्मा थक करके अशरीरी बन जाती है। शरीर का भान नहीं रहता तो इसको नींद कहा जाता है। तुम बच्चों को यहाँ बैठे अपने को अशरीरी समझना है, तो शान्ति का सन्नाटा हो जायेगा। समझेंगे, जैसे कि यहाँ अशरीरी बैठे हुए हैं। घर से एक आदमी चला जाता है तो कितना सन्नाटा हो जाता है! तो जब इतनी सब आत्मायें चली जायेंगी, सबके शरीर खत्म हो जायेंगे तो कितना सन्नाटा हो जायेगा! करोड़ों मनुष्य मरेंगे। यह तो बेहद का घर है ना। सब आत्मायें वापिस जायेंगी।

तुम जानते हो बाप है ज्ञान का सागर। अगर सर्वव्यापी कहें तो हरेक ज्ञान सागर पतित-पावन हो जाये, परन्तु ऐसे तो है नहीं। बाप बैठ बच्चों से बात करते हैं कि जैसे मैं परम आत्मा स्टार हूँ, तुम भी ऐसे स्टार हो। सिर्फ मैं जन्म-मरण में नहीं आता हूँ। तुमको जन्म-मरण में आकर पार्ट बजाना है, 84 जन्मों का। जैसे तुम आत्मा हो, मैं भी आत्मा हूँ। परन्तु महिमा सबकी अपनी-अपनी है। प्रेजीडेंट, प्राइम-मिनिस्टर सबका अलग-अलग पार्ट है। ऐसे मेरा पार्ट भी अलग है। मैं नॉलेजफुल हूँ, अभी बच्चों को नॉलेज देता हूँ। तुम जानते हो कि हम जाते हैं बाबा के घर। बाबा आया हुआ है लेने लिए। बाबा हमारा गाइड, लिबरेटर दु:ख से छुड़ाने वाला है। तुम हो पाण्डव सेना। तुम जानते हो हम यात्रा पर हैं, हमारा पण्डा स्वयं परमपिता परमात्मा है। तुम भी रास्ता बताते हो। तो तुम ब्राह्मण रूहानी पण्डे ठहरे। वे ब्राह्मण जिस्मानी पण्डे हैं। सभी को कहना है - चलेंगे यात्रा पर? मित्र-सम्बन्धी आदि सबको बोलो - चलेंगे रूहानी यात्रा पर? जैसे कोई यात्रा पर जाते हैं तो अपने नजदीक बिरादरी वाले को कहते हैं, ऐसे तुमको भी बाप कहते हैं यात्रा पर चलेंगे? यह रूहानी यात्रा रूहानी पण्डे ही सिखा सकते हैं। स्वीट होम का रास्ता वही जानते हैं। जिस्मानी पण्डा रूहानी बन सकता लेकिन रूहानी पण्डा फिर जिस्मानी पण्डा बन न सके। बाप थोड़ेही तुमको कहेंगे कि जिस्मानी यात्रा पर जाओ। पण्डे तब बन सकेंगे जब देखकर आये हो। ऐसा तो कोई है नहीं जो स्वीट होम देखकर आया हो और वहाँ ले जाये। स्वीट होम को वह जानते ही नहीं। आत्मा के पंख टूटे हुए हैं। जब तक बाप न आये तब तक पंख मिल न सकें। मलहम पट्टी कोई कर न सके। योग से ही पंख मिलेंगे। भागना सबको है। कोई योगबल से विकर्माजीत बनते हैं, कोई फिर सजायें खाकर हिसाब-किताब चुक्तू करते हैं। दु:ख का सारा हिसाब-किताब चुक्तू होता है। यह सब ड्रामा में नूँध है, अपने विकर्मों का साक्षात्कार गर्भ में होता है फिर सजायें भोग बाहर निकलते हैं। अभी तो बेशुमार मनुष्य मरते हैं। सबको अपना हिसाब-किताब चुक्तू करना है। पुरानी दुनिया के कर्मों की लेन-देन का हिसाब-किताब खलास कर अभी तुम नई दुनिया के लिए हिसाब-किताब जमा करते हो।

बाप कहते हैं तुम याद में रहो तो विकर्म विनाश होंगे। फिर स्वदर्शन चक्र फिराने से तुम्हारी बहुत मिलकियत जमा होगी। योग से हेल्थ, ज्ञान से वेल्थ मिलती है। जितना बाप को याद करेंगे उतना निरोगी काया मिलेगी। दुनिया इन बातों को नहीं जानती। वह तो विष्णु को स्वदर्शन चक्रधारी समझते हैं। शंख, पा, गदा, पदम आदि उनको देते हैं। अब उनको शंख थोड़ेही बजाना है। यह तो है तुम्हारे पास। तुम शंख बजाते हो। कहते हो मनमनाभव, मध्याजी भव। कितना सहज है। तुम लाइट हाउस हो। सबको रास्ता बताते हो मुक्तिधाम का, फिर आयेंगे जीवनमुक्तिधाम में। योग लगाते हो। नर्क, खारी चैनल से पार ले जाने लिए सर्चलाइट देते हो। मुक्तिधाम जाना है। फिर सर्चलाईट देते हो, यहाँ जीवनमुक्ति में आना है। यह बेहद का ड्रामा है जो जूँ मिसल चलता रहता है। हम एक्टर हैं, हमारा इस ड्रामा में 84 जन्मों का पार्ट है। भगवान ने आकर सहज राजयोग सिखाया है, यह कोई नहीं जानते। भगवान को आना ही है कल्प के संगमयुग पर। तुम अभी जानते हो कल्प पहले भी संगमयुग पर मिले थे और मिलते रहेंगे। ढेर बच्चे मिलेंगे। कोई-कोई बच्चे फिर कुसंग में आकर पढ़ाई को छोड़ देते हैं। चलते-चलते कोई से दिल लग गई तो पढ़ाई का नशा टूट जाता है। ब्रह्मचर्य में पढ़ाई का नशा अच्छा रहता है। कोई विरले शादी के बाद भी पढ़ाई का कोर्स उठाते हैं। फिर कोई तो अच्छी रीति पास कर लेते हैं, कोई को फिर टाइम लगता है क्योंकि विकार में जाने से फिर धारणा नहीं होती। चाहे राज-विद्या, चाहे रूहानी विद्या की धारणा आत्मा करती है। बैरिस्टरी के संस्कार आत्मा में होते हैं तो आत्मा वह संस्कार ले जाती है। फिर जन्म ले बैरिस्टरी ही पढ़ने लग पड़ेगी। तुमको तो वहाँ बैरिस्टरी, इन्जीनियरी आदि पढ़ने की दरकार नहीं। ऑटोमेटिकली तुम्हारी बुद्धि सतोप्रधान रहती है। तुम जानते हो जैसे कल्प पहले महल बनाये थे ऐसे ही हम जाकर महल बनाने लग पड़ेंगे। ड्रामा वही करायेगा जो कल्प पहले कराया था। कोई मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। बाकी भाषा तो सीखनी पड़े। वहाँ स्कूलों आदि में भी विमानों में जायेंगे। बहुत बड़े-बड़े घर होते हैं। समझो जितनी एरिया में आबू है उतनी एरिया में एक घर होगा। फिर आबू रोड जितनी एरिया में दूसरा महल होगा। जमीन तो बहुत रहती है। प्रजा को भी बड़ी जमीदारी, बड़े-बड़े महल होंगे। अभी भी देखो बम्बई में कितने मनुष्य हैं फिर बम्बई होगी नहीं। कराची होगी नहीं। सब मीठे पानी पर होंगे। नदियाँ भी सब कायदे-अनुसार होंगी। मज़ाल है कोई नदी उथल खाये। सब तत्व आदि ऑर्डर में रहेंगे। तुम प्रकृति पर विजय पाते हो। 5 तत्वों पर तुम्हारा राज्य चलता है। कभी गुस्तागी (चंचलता) नहीं करेंगे।

तो बाप की श्रीमत पर चलना पड़े। बाप कहते हैं काम महाशत्रु है, इनको जीतो, नहीं तो वर्सा नहीं मिलेगा। इस समय फेल हुए तो कल्प-कल्प फेल हो जायेंगे फिर चान्स नहीं मिलेगा। उस पढ़ाई में फेल होते हैं तो दुबारा पढ़ते हैं। यहाँ फिर यह चान्स नहीं। कल्प-कल्प का चान्स है। प्राप्ति बहुत ऊंच है। समझाना चाहिए - सन्यासी लोग कहते हैं दोनों को पवित्र रहना इम्पासिबुल है। बोलो - नहीं, पॉसिबुल है। सन्यासियों के लिए इम्पॉसिबुल क्यों है? क्योंकि उनका हठयोग है, घरबार छोड़कर जाते हैं। फिर भी वही शंकराचार्य आयेंगे। भारत पतित होने लगता है तो सन्यासी आकर थमाते हैं। इसकी सेवा का उनको फल मिलता है जो गवर्मेन्ट के भी गुरू बन जाते हैं। तुम बच्चों का तो सबसे बड़ा मान है। तुम्हारी जो आमदनी होती है वह कोई की हो न सके। जो गरीब हैं एक पैसा देते हैं उन्हें भी महल मिल जाते हैं। प्रत्यक्ष फल का साक्षात्कार दिव्य दृष्टि से होता है। दिव्य दृष्टि दाता आकर तुमको पढ़ाते हैं। नहीं तो एम ऑबजेक्ट का मालूम कैसे पड़े इसलिए माताओं को साक्षात्कार कराता हूँ। मीरा ने कितनी तपस्या की, परन्तु वह कोई वैकुण्ठ की मालिक बन न सके। बाप कहते हैं साक्षात्कार मैं कराता हूँ। एक सेकेण्ड में दिव्य दृष्टि मिलने से वैकुण्ठ में जाए डांस करते हो, इसमें कोई तपस्या आदि की बात नहीं। भक्ति मार्ग में तो बहुत नौधा भक्ति करने के बाद साक्षात्कार होता है। दिव्य दृष्टि की चाबी मेरे हाथ में है। कोई को मैं देता नहीं। भक्ति मार्ग में वहाँ बैठे साक्षात्कार कराता हूँ। तुम बच्चों को तो विश्व का मालिक बनाता हूँ। दुनिया में तो अनेक प्रकार के मनुष्य हैं। कोई धन में मस्त, कोई साइन्स में मस्त, कोई किसमें मस्त.. परन्तु तुम्हारे आगे सब वर्थ नॉट ए पेनी हैं। सबका धन मिट्टी में मिल जाता है। सब खाक हो जायेगा। किसकी दबी रही धूल में... चोर भी बहुत लूटते हैं। हर एक अपने हमजिन्स को प्यार करते हैं। दूसरे को देखते ही गर्म हो जाते हैं। दिन-प्रतिदिन तुम देखेंगे कि कितनों को मारते रहेंगे, चाहते हैं कि हर एक अपने बर्थ प्लेस में चले जायें, तो अपने देश से निकालते रहते हैं। अब तुम बच्चे बाप को याद करने से वर्सा लेते हो। जानते हो हम अशरीरी आत्मा हैं, 84 जन्मों का अब पार्ट पूरा किया। कितने करोड़ आत्मायें हैं, सभी की जीवन कहानी तो नहीं बतायेंगे ना। मुख्य की ही बतायेंगे। मुख्य हो तुम, तुम्हारा मन्दिर बना हुआ है। जगत अम्बा, जगतपिता के बच्चे तो बहुत होंगे। वैकुण्ठ का भी यादगार है। इनका चैतन्य मन्दिर वास्तव में सतयुग है। जड़ मन्दिर में स्वर्ग के सब एक्टर्स नहीं आ सकेंगे। यह है मॉडल रूप में मन्दिर, यादगार। लक्ष्मी-नारायण का मन्दिर कितना छोटा है। सतयुग में तो चैतन्य मन्दिर कितना बड़ा होगा! कितने बाग बगीचे होंगे! मुगल गार्डन तो उनके आगे कुछ भी नहीं है। वहाँ के फल आदि इतने अच्छे होंगे जो बात मत पूछो! रात-दिन का फ़र्क होता है। जैसे झाड़ पुराना होता है तो फल देते-देते खत्म हो जाता है। कहा जाता है अब झाड़ सड़ गया है। यहाँ की हर चीज़ खत्म होनी है। वहाँ के आम बड़े-बड़े फर्स्टक्लास होंगे। हम अब राजधानी स्थापन करते हैं श्रीमत पर। तो श्रीमत पर चलना पड़े ना। पवित्र भी बनना पड़े। मुश्किल तो कोई बात नहीं है। एक जन्म पवित्र रहने से 21 जन्म स्वर्ग की राजाई करेंगे। फिर भी ऐसा कौन होगा जो पवित्र नहीं बनेगा। श्रीमत पर नहीं चलेगा।

तुम जानते हो भारत सचखण्ड था। यहाँ सच्ची बादशाही थी। अभी यह है झूठ खण्ड। हर बात में झूठ बोलते रहते हैं। कह देते हैं फलाना ज्योति-ज्योत समाया अथवा निर्वाणधाम गया। अब तुम जानते हो निर्वाणधाम तो रहने का स्थान है। तुम हरेक बात यथार्थ बताते हो। बाप को ट्रूथ कहते हैं। वह सचखण्ड स्थापन करते हैं। भक्त जन्म बाई जन्म भगवान को याद करते हैं परन्तु उनको भगवान का पता नहीं है। वह प्रीतम अब तुम बच्चों को राज्य-भाग्य देकर खुद छिप जाते हैं। तब कहते हैं - तुम्हारी गत-मत तुम ही जानो। तो जरूर कोई भी नहीं जानते हैं। हे प्रभु तुम्हारी गत-मत तुम ही जानो.. और न जाने कोई। श्रीमत से क्या होगा? गति सद्गति.. वह तुम ही जानो। अब तुम बच्चों को बाप श्रीमत देते हैं - अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो। टीचर यह प्रतिज्ञा करायेंगे क्या? मैं तुमको बैरिस्टरी की गद्दी पर बिठाऊंगा। वह तो खुद पढ़कर बैरिस्टरी की गद्दी पर बैठेंगे। बाप भी कहते हैं जितना याद करेंगे तो योग से सब पापों से मुक्त होंगे। याद करने से तुम्हारी आत्मा जैसे मेरे पास आ रही है। अपने पास चार्ट रखना है। कोई का चार्ट आधे घण्टे का होगा, कोई का सवा घण्टे का होगा। कोई का तो 5 मिनट भी नहीं। कोई का तो बहुत अच्छा चार्ट है। यह भी तुमको साक्षात्कार होगा। स्कूल में टीचर अथवा स्टूडेन्ट खुद भी समझते हैं कितने नम्बर में आयेंगे। यहाँ तो नम्बरवार बिठा नहीं सकते। फंक हो जायेंगे इसलिए अभी माला नहीं बन सकती। माया अच्छे-अच्छे को भी नीचे-ऊपर कर देती है। श्रीमत पर नहीं चलेंगे तो माया घूँसा मार देगी। इसमें है मेहनत। हम अब जाते हैं परमधाम। 84 जन्म पूरे हुए। बाबा आये हैं लेने लिए। तो बाप को याद करना है, औरों को भी मंत्र देना है। मंत्र कोई जपना नहीं है। गुरू लोग तो किसम-किसम के मंत्र देते हैं। बाप कहते हैं प्रीतम को याद करो। प्रीतम आया है प्रीतमाओं के पास। सारी दुनिया की आत्मायें प्रीतमायें हैं, जो उनको याद करती हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कुसंग में आकर कभी भी पढ़ाई नहीं छोड़नी है। किसी भी देहधारी से दिल नहीं लगानी है।

2) पापों से मुक्त होने की विधि ‘याद' है, इसलिए याद का चार्ट जरूर रखना है। याद में रहने की अपने आप से प्रतिज्ञा करनी है।

वरदान:-

सर्व सम्बन्धों से बाप को अपना बनाकर एकरस रहने वाले नष्टोमोहा, स्मृति स्वरूप भव|

नष्टोमोहा, स्मृति स्वरूप बनने के लिए सर्व संबंधों से बाप को अपना बनाओ। किसी भी दैहिक संबंध में बुद्धि का लगाव न हो। अगर कहीं भी लगाव होगा तो बुद्धि भटकेगी। बैठेंगे बाप को याद करने और याद वही आयेगा जिसमें मोह होगा। किसका मोह पैसे में होता है, किसका जेवर में, किसका किसी संबंध में..जहाँ भी होगा वहाँ बुद्धि जायेगी। अगर बार-बार बुद्धि जाती है तो एकरस नहीं रह सकते।

स्लोगन:-

प्रकृति को दासी बना दो तो उदासी दूर भाग जायेगी।