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19-04-2018

19-04-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - देह सहित देह के सब सम्बन्धों के ट्रस्टी बनो, सबकी सम्भाल करते हुए किसी में भी ममत्व नहीं रखो"

प्रश्नः-

इस ड्रामा में माया कौन सी भूलें जब करा देती है तब बाप अभुल बनाने आते हैं?

उत्तर:-

पहली भूल यह की जो ब्रह्म तत्व को ही परमात्मा समझ लिया। तत्व से योग लगाना यह तो मिथ्या है, इससे विकर्म विनाश हो नहीं सकते। 2- हिन्दुस्तान में रहने के कारण देवी-देवता धर्म के बदले अपना हिन्दू धर्म कह देना यह भी बड़ी भूल है। इस भूल के कारण धर्म की ताकत नहीं रही है। अब बाप आये हैं तुम्हें अभुल बनाने।

गीत:- कौन आया मेरे मन के द्वारे...  

ओम् शान्ति।

यह कौन आया बच्चों के पास? बच्चों के पास मात-पिता ही तो आयेंगे। जिसके लिए गायन है, तुम मात-पिता हम बालक तेरे। अब तुम बालक की हैसियत में बैठे हो ना। परमपिता परमात्मा बैठ बच्चों को समझाते हैं कि मैं निराकार हूँ। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर भी ऐसे नहीं कह सकते। यह तो निराकार परमपिता परमात्मा ही कह सकते हैं इस शरीर द्वारा। यह तो जानते हो मेरा कोई स्थूल वा सूक्ष्म शरीर नहीं है। यह आत्मा ही शरीर द्वारा बोल रही है। निराकार परमपिता परमात्मा बैठ बच्चों को पढ़ा रहे हैं। नया कोई सुने तो कहेंगे यह कैसे हो सकता है! हाँ, शिव भगवानुवाच ब्रह्मा के शरीर द्वारा। शिवबाबा को अपना शरीर तो है नहीं। तो इतने सब बी.के. कहाँ से आये? वह ब्राह्मण लोग कोई अपने को ब्रह्माकुमार नहीं कहलाते हैं। तुम क्यों कहते हो हम बी.के. हैं? तुम सिद्ध कर बता सकते हो इस ब्रह्मा का बाप है परमपिता परमात्मा शिव। उनके यह तीन बच्चे ब्रह्मा, विष्णु, शंकर हैं। तो शिवबाबा इस ब्रह्मा मुख से मुख वंशावली रचकर उनको मनुष्य से देवता बनाते हैं। इस दुनिया में मनुष्य तो ढेर हैं। अनेक प्रकार के भिन्न-भिन्न धर्म, जातियाँ हैं। गुजराती, पंजाबी, यू.पी., क्रिश्चियन, बौद्धी, महाराष्ट्रियन आदि कितनी जातियों के नाम हैं। सतयुग में इतने धर्म, जाति होते ही नहीं। न अनेक भाषायें, न अनेक धर्म होते हैं। कहते भी हैं एक राज्य हो। सतयुग में है ही देवी-देवता धर्म। बाप कहते हैं मैं आकर एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करता हूँ। गाया भी जाता है मनुष्य से देवता किये करत न लागी वार। देवतायें तो होते हैं सतयुग में, त्रेता में भी नहीं होते। त्रेता में है क्षत्रिय वर्ण। शास्त्रों में भी लिखा हुआ है ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण निकले। और ब्राह्मणों को पढ़ाकर फिर देवता और क्षत्रिय धर्म की स्थापना करते हैं। बाकी सब जो भी अनेक धर्म हैं, सबका विनाश होना है। बाप समझाते हैं मीठे बच्चे - मैं तुम आत्माओं का सच्चा-सच्चा बाप हूँ। मैं कभी बदलता नहीं हूँ। मेरे को सदैव बाप की हैसियत से याद करते हो। भक्त भगवान को याद करते हैं क्योंकि यह शिक्षा सिवाए भगवान के और कोई दे न सके। अभी तो अनेक धर्म हैं। तुम लिस्ट नहीं निकाल सकते हो। कितने मनुष्य हैं, बाप आकर मनुष्य से देवता बनाते हैं। सो भी सबको तो नहीं बनायेंगे। यह समझने की बातें हैं। बाप कहते हैं मेरे सिवाए कोई यह समझानी दे न सके। बाप बैठ तुम बच्चों को सतयुग के लिए पढ़ाते हैं। कहते हैं बच्चे अभी जितना पुरुषार्थ कर स्वर्ग में ऊंच पद पाना हो सो पा लो। हर एक मनुष्य अपनी आजीविका के लिए कितना पुरुषार्थ करते हैं! मेहतर भी कोई अच्छा पढ़े तो ऊंच पद पा सकते हैं। यहाँ भी बाप कहते हैं अबलाओं-गणिकाओं को भी पुरुषार्थ से विश्व का सूर्यवंशी राज्य मिल सकता है।

बाबा ने समझाया है इस समय हरेक द्रोपदी पुकारती है - बाबा रक्षा करो, फिर दिखाते हैं कृष्ण ऊपर में बैठा है। साड़ियाँ द्रोपदी को मिलती जाती हैं, रक्षा हो जाती है। अब ऐसी बातें तो हैं नहीं। यह इस समय की बातें हैं। बाप कहते हैं तुमको 21 जन्म नंगन होने से बचाते हैं। तुम्हारे वस्त्र कोई उतार नहीं सकते। यह है प्रवृत्ति मार्ग, दोनों को पवित्र बनना है। आधाकल्प से विकारों में हिरे हुए हैं तो यह आदत मिटती नहीं है। बाप आकर तुम्हें नंगन होने से बचाते हैं, इसमें बड़ी मेहनत लगती है। पवित्रता में रहते फिर माया वार कर लेती है। अबलाओं पर तो विष के कारण बहुत अत्याचार होते हैं और बच्चों में मोह भी रहता है, इसमें तो पूरा नष्टोमोहा बनना चाहिए। पहले-पहले जब भट्ठी बनी तो बहुत हिम्मत रख भागे। देखा मार मिलती है, हंगामा करते हैं तो झट त्याग कर लिया। सन्यासी भी भागते हैं। पहले तो उन्हों को याद सताती है। नष्टोमोहा होने में मेहनत लगती है क्योंकि उन्हों के पास प्राप्ति की एम आबजेक्ट कुछ भी नहीं है। कुछ भी ताकत मिलती नहीं। तुमको तो ताकत मिलती है। उनको पवित्रता की ताकत कहाँ से मिले? पवित्रता का सागर तो एक परमपिता परमात्मा है, उनसे ही वर्सा मिलता है। वह बाप से तो योग लगाते नहीं। ब्रह्म से योग लगाते हैं तो पूरा पवित्र बन नहीं सकते। ब्रह्म अथवा तत्व से योग लगाना मिथ्या हो जाता है। देखो यह प्वाइंट्स अच्छी रीति धारण करनी है। भूलें तो बहुत की हैं। हिन्दुस्तान में रहने वाले हिन्दू धर्म कह देते हैं। यह भी भूल है। ब्रह्म अथवा तत्व को परमात्मा कहना यह भी भूल है। ड्रामा में भी नूँध है। बाप आकर समझाते हैं यह यह भूलें माया कराती है। बाबा आकर फिर अभुल बनाते हैं। सतयुग में एक ही धर्म, एक ही भाषा थी। ऐसे नहीं वृन्दावन में रहने वालों को वृन्दावनी कहेंगे। वहाँ धर्म ही एक है। बाप कहते हैं मैं आता हूँ तुमको फिर से सो देवता बनाता हूँ। तुम स्वर्ग के मालिक बन जाते हो। बाप रचता ही है स्वर्ग फिर हम नर्क के मालिक क्यों हैं! नई दुनिया में जरूर हम स्वर्ग के मालिक होंगे। उस समय बाकी सब आत्मायें परमधाम में होंगी। यह बातें अब तुम्हारी बुद्धि में हैं। जितना-जितना योग होगा उतना धारणा अच्छी होगी। कहाँ भी ममत्व नहीं होना चाहिए। अपने को ट्रस्टी समझ पालना करो। बाप की अमानत है। देह सहित देह के सब सम्बन्धों के हम ट्रस्टी हैं। परीक्षायें भी आती हैं। कोई बीमार हुआ, दु:ख हुआ तो सम्भालना पड़े। यह है ही दु:ख की दुनिया। शिवबाबा को तो कोई दु:ख नहीं होगा। वह तो ट्रस्टी है। कोई को कुछ हुआ कहेंगे अपना हिसाब-किताब चुक्तू कर जाकर दूसरा शरीर लिया, इसमें हमारा क्या जाता है। इतने सब मनुष्य शरीर छोड़ेंगे, शिवबाबा को दु:ख होगा क्या! और ही खुशी होती है। यह पुराना छी-छी शरीर छुड़ाए बच्चों को वापिस ले जाऊंगा। दु:ख की बात ही नहीं। अ़फसोस की कोई बात ही नहीं। हम उठते-बैठते मीठे-मीठे बाप को याद करते हैं। परमधाम में जाने के लिए हम तैयारी कर रहे हैं। बाबा को याद करते-करते शरीर छूट जायेगा। ऐसे बहुत सन्यासियों का होता है। बैठे-बैठे अपने को समझते हैं बस हम ब्रह्म में चले जाते हैं, जाकर लीन होंगे। ऐसे बैठे-बैठे शरीर छोड़ देते हैं। बाबा अपने अनुभव से बताते हैं। प्राणायाम चढ़ाते-चढ़ाते गुम हो जाते हैं। ऐसे नहीं कि वह आत्मा ब्रह्म में चली जायेगी। आत्मा तो एक शरीर छोड़ फौरन दूसरा लेती है। बाकी कोई निर्वाण में जाता नहीं है, न ज्योति-ज्योत समाते हैं। सबको पार्ट बजाना है जरूर।

बाप कहते हैं मैं आता ही हूँ जब सभी एक्टर्स मौजूद रहते हैं क्योंकि मैं हूँ सब सजनियों का साजन। मेरे पिछाड़ी सब सजनियाँ वापस आ जायेंगी। मैं आया हूँ सबको वापिस ले चलने। अब नाटक पूरा होता है। अब जितना जो पुरुषार्थ करेंगे। सद्गति दाता एक ही बाप है। अभी बाप आया है, समझा रहा है - मैं कब और कैसे आता हूँ। फिर तुम सब आत्माओं को ले जाता हूँ। छी-छी से गुल-गुल बनाता हूँ। गुल-गुल ही बलि चढ़ेंगे। दिखाते हैं कृष्ण ने भगाया। परन्तु किसके लिए भगाया? कृष्ण की तो बात है नहीं। यह तो बाबा ने छुड़ाया है। सहज राजयोग सिखलाकर स्वर्ग के महाराजा महारानी बनाने। तुमको साक्षात्कार भी हुआ है भविष्य प्रिन्स प्रिन्सेज बनने का। तुम जानते हो बरोबर हम मोर-मुकुटधारी प्रिन्स प्रिन्सेज बनेंगे। अब तुम हो ब्राह्मण। गाया जाता है प्रजापिता ब्रह्मा। तो उनके बच्चे ब्रह्माकुमार कुमारियाँ बनते हो। यह बातें समझने और समझाने की हैं। राजधानी स्थापन हो रही है। तो सभी को पुरुषार्थ करना चाहिए - अच्छी रीति से। कोई तकलीफ नहीं देते हैं, सिर्फ कहते हैं हे आत्मा मुझ बाप को याद करो और वर्से को याद करो। विश्व का मालिक बनने के लिए इतना तो याद करेंगे। देही-अभिमानी बनो। देह-अभिमान आने से ही माया घूँसा लगाती है। एक नाटक भी बना हुआ है। माया ऐसे करती है, भगवान ऐसे करता है। तो प्रैक्टिकल में देखते हो कितने बाप का बनकर फिर मुख मोड़ लेते हैं! जाकर निंदा करते हैं। आश्चर्यवत सुनन्ती, कथन्ती, भागन्ती हो जाते हैं। सत बाप, सत टीचर, सतगुरू की निंदा करते हैं। उनको देख मनुष्य कहते हैं ईश्वर को कैसे फारकती देते होंगे। तो ऐसे निंदक ऊंच ते ऊंच ठौर नहीं पा सकते हैं। यह है अभी की बात।

कई बच्चों को नष्टोमोहा बनने में बड़ी मेहनत लगती है। बहुतों का मोह निकलता ही नहीं है। बाबा तो कहते हैं बच्चों को भी सम्भालो। उन्हों को भी शिवबाबा याद कराते रहो। जो अच्छे होंगे वह शिवबाबा को याद करते रहेंगे। बाप समझाते हैं गवर्मेन्ट भी प्युरिटी चाहती है। तो उनको समझाना चाहिए हम भारत को पवित्रता में लाने के लिए पवित्रता की प्रतिज्ञा करते हैं। हम भारत को स्वर्ग जरूर बनायेंगे। कन्यायें, माता पिता का भी उद्धार कर सकती हैं। बाप को तो गरीब-निवाज़ कहा जाता है। साहूकारों का तो सारा धन माल मिट्टी में मिल जायेगा। साहूकारों के लिए बड़ी ताकत चाहिए क्योंकि ज्वाइंट स्टॉक होते हैं ना। फिर अपनी चीज़ सरेन्डर कैसे कर सकते हैं! बाप तो गरीब-निवाज़ ही गाया हुआ है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार :-

1) एम आब्जेक्ट को बुद्धि में रख पवित्र बनने के लिए पूरा नष्टोमोहा बनना है। पुराने शरीरों से ममत्व निकाल देना है।

2) उठते-बैठते बाप की याद में रहना है। किसी भी बात का अ़फसोस नहीं करना है। कभी भी बाप की निंदा कराने वाला कोई कर्म नहीं करना है।

वरदान:-

विजय के उमंग-उत्साह द्वारा नाउम्मींदी को उम्मीदों में परिवर्तन करने वाले निश्चयबुद्धि भव |

अगर निश्चय अटूट है तो विजय सदा है ही, विजय का उमंग-उत्साह सदा रहे, नाउम्मींदी के संस्कार न हों। कोई भी मुश्किल कार्य इतना सहज अनुभव हो जैसे कोई बड़ी बात ही नहीं है क्योंकि अनेक बार कार्य कर चुके हैं, कोई नई बात नहीं कर रहे हैं, इसलिए नाउम्मीदीं का नामनिशान भी न रहे, कोई भी स्वभाव-संस्कार में यह संकल्प न आये कि पता नहीं यह परिवर्तन होगा या नहीं, हैं ही सदा के विजयी।

स्लोगन:-

शक्तिशाली बनना है तो सदा खजानों की स्मृति और सिमरण में रहो।