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07-05-2018

07-05-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - चलते-फिरते विचार सागर मंथन करो, यह ज्ञान मंथन ही बुद्धि का भोजन है, विचार कर सर्विस की नई-नई युक्तियां निकालो"

प्रश्नः

ज्ञान अमृत धारण करने वा कराने की शक्ति किन बच्चों में आती है?

उत्तर:-

जो बाप का बनते ही पवित्रता की पक्की प्रतिज्ञा करते हैं। बाबा कहते-बच्चे, याद रखना अगर इतना सुनते भी पवित्र नहीं बनेंगे तो बुद्धि का ताला बन्द हो जायेगा। एक कान से सुनेंगे, दूसरे से निकल जायेगा। बाप का बने हो तो गन्दगी को निकाल दो। उल्टा कर्म किया तो गला घुट जायेगा, ज्ञान सुना नहीं सकेंगे इसलिए सावधान!

गीत:-

तूने रात गँवाई....  

ओम् शान्ति।

अब बाप बैठ बच्चों से पूछते हैं कि - बच्चे, बेहद के बाप को अच्छी रीति से जाना है? पूछना पड़ता है, नहीं तो पूछने का कायदा नहीं है। सब जानते हैं वह हमारा मात-पिता है। मात-पिता मिले तो हो गये आस्तिक। मात-पिता जिससे सुख घनेरे मिलते हैं। सतयुग में तो है ही प्रालब्ध। वहाँ आस्तिक वा नास्तिक का तो सवाल ही नहीं उठता। आस्तिक-नास्तिक, जानना, न जानना संगम पर होता है। बच्चे अब जानते हैं - जो कल नास्तिक थे, बाप और बाप की रचना को नहीं जानते थे, वही अब आस्तिक बने हैं। बाप को और अपने 84 जन्मों को जान गये हैं। कल नहीं जानते थे, आज जानते हैं। कल और आज कहा जाता है ना। आज पुरानी दुनिया है, कल नई दुनिया होगी। आज रात है, कल दिन होगा। वास्तव में भारतवासियों को तो अपने बाप को जानना चाहिए। भारत में ही सोमनाथ का मन्दिर है। शिव जयन्ती मनाई जाती है परन्तु यह कोई नहीं जानते कि शिवबाबा कब आया था! सोमनाथ जो नाम पड़ा है उसने कब आकर ज्ञान अमृत पिलाया था? अब तुम बच्चे जानते हो, हम बाबा द्वारा आस्तिक बने हैं। बाप ने अपना परिचय बैठ दिया है। बने बनाये ड्रामा अनुसार परिचय मिलता भी है संगम पर। बच्चे जानते हैं आज नर्क है, कल स्वर्ग होगा। कल माना दूसरा जन्म हमारा सतयुग में होगा। हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। आज है मृत्युलोक, कल अमरलोक होगा। दुनिया बदल रही है। कलियुग से सतयुग बन रहा है। सो तो बाप ही बनायेंगे। बाप है पतित-पावन। दुनिया में संगम का कोई को पता ही नहीं है। अब तुम कितनी रोशनी में आ गये हो! तुमने अब भक्ति मार्ग छोड़ दिया है। आज भक्ति है, कल नहीं होगी। ऐसे नहीं आज भक्ति है, कल फिर ज्ञान होगा। नहीं, भक्ति तो आधाकल्प चलती है। ज्ञान एक ही बार मिलता है और सद्गति हो जाती है। बाप एक ही बार आकर सबकी सद्गति करते हैं इसलिए गाया हुआ है - पतित-पावन, सद्गति दाता। उनका जन्म भी भारत में होता है। परन्तु भारतवासी जानते नहीं हैं कि यह निराकार शिवबाबा का मन्दिर है। कहाँ ज्योति का मन्दिर है। ब्रह्म समाजी ज्योति जगाते हैं। समझते हैं परमपिता परमात्मा ज्योति स्वरूप हैं। अनेक प्रकार की मतें हैं। जिसने जो बात समझाई उनको मान फालो कर लेते। अभी तुम रचयिता और रचना को जान गये हो। रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझकर फिर दूसरों को भी समझाना है। परमपिता परमात्मा सत है, चैतन्य है, ज्ञान का सागर है। हरेक एक्टर की महिमा अलग-अलग होती है। परमात्मा सर्वव्यापी कहने से अलग-अलग महिमा हो न सके। हरेक आत्मा में अलग-अलग पार्ट भरा हुआ है। सर्वव्यापी है तो परमपिता परमात्मा का पार्ट सभी के अन्दर बजे। कितना अन्धियारा है! तब बाप ही आकर समझाते हैं।

बच्चे जानते हैं बरोबर ऊंचे ते ऊंचा पार्ट है परमात्मा का। उस एक को ही सब भक्त याद करते हैं। भक्त सब पतित हैं। पतित किसको कहा जाता है - यह मनुष्य नहीं जानते हैं। सन्यासी समझते हैं कि इन विकारों से हम नर्कवासी बने हैं इसलिए घरबार छोड़ने से हम जाकर ब्रह्म में लीन होंगे। बाप समझाते हैं यह है कलियुग। सब विषय सागर में गोते खाते हैं इसलिए इनको वेश्यालय कहा जाता है। मैं आकर शिवालय बनाता हूँ। सतयुग में एक धर्म था, वही देवी-देवता 84 जन्म भोग अब अपने को देवी-देवता नहीं कह-लाते। जो पूज्य देवी-देवतायें थे, सो गिरते-गिरते, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्ण में आते पतित पुजारी बने हैं। सबसे जास्ती भारत पावन था सो अब पतित बना है। सन्यासियों को भी सम्पूर्ण पावन नहीं कह सकते क्योंकि पतित दुनिया में बैठे हैं। घरबार छोड़ कोई सतयुग में नहीं जा सकता। तुमको तो इस दुनिया को भूल सतयुग में जाना है। स्वर्ग में जाने लिए हू-ब-हू कल्प पहले मुआफिक पुरुषार्थ कर रहे हैं। भारत ही पूज्य से पुजारी बना है फिर पूज्य बनेगा। यह नॉलेज समझेंगे वह जो सिकीलधे होंगे। जो देवी-देवता धर्म के नहीं होंगे तो बुद्धि में बैठेगा नहीं। भारतवासी 84 जन्म लेते हैं। और कोई धर्म वाला 84 जन्म नहीं ले सकता। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं, सब इकट्ठे नहीं आयेंगे। बच्चों को चक्र का राज़ भी बतलाया। सिजरा कैसे बनता है। सिजरा आत्माओं का भी होता है। उनको फिर रूहानी कहेंगे। बच्चे जानते हैं हम ब्रह्माण्ड में रहते हैं। पहला नम्बर है शिवबाबा, फिर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर फिर है लक्ष्मी-नारायण, उनका घराना। नम्बरवार तो है ना। इस समय तुम्हारी बुद्धि में सारा झाड़ है। वहाँ यह ज्ञान नहीं है - कौन-कौन आयेंगे, क्या-क्या होगा। परन्तु वहाँ अज्ञान भी नहीं कहेंगे। वह है प्रालब्ध जो इस ज्ञान से पाते हो। अभी है चढ़ती कला, पीछे है गिरती कला। 1250 वर्ष में दो कला कम हो जाती हैं। थोड़े-थोड़े होकर गिरते हैं। तुम अब सब हिसाब निकाल सकते हो। पहले है थुर फिर फाउन्डेशन निकलता है। अब तुम बीज और झाड़ को अच्छी तरह जान चुके हो। अब तुम बाप द्वारा नास्तिक से आस्तिक बन गये हो। बाबा ने समझाया है फादर शोज़ सन। टीचर शोज़ स्टूडेन्ट। पहले गुरू शोज़ फालोअर्स। फालोअर्स शोज़ गुरू। यहाँ तो तीनों ही एक बाप है। वह है रचयिता। जरूर नई दुनिया रचेंगे। स्वर्ग में लक्ष्मी-नारायण राज्य करते थे। उन्होंने यह वर्सा कहाँ से लिया? किसने ऐसा कर्म सिखलाया जो इतना ऊंच पद पाया? अब बाप कहते हैं - तुमको ऐसे कर्म सिखलाता हूँ जो तुम सो देवी-देवता बनेंगे। स्वर्ग में तुम बहुत मालामाल थे। बाप से ही वर्सा लिया था। तो जरूर बाप ने ही आकर भारत को स्वर्ग बनाया है। बाप कहते हैं बच्चे चलते-फिरते ऐसे विचार सागर मंथन करो। यह बुद्धि के लिए फूड (खाना) है। बाबा की दिल है यह गोला बहुत बड़ा-बड़ा बनाना चाहिए। चक्र पर किसको भी समझाना बहुत अच्छा होगा। अब विचार करना चाहिए - मनुष्यों को कैसे समझायें? समझाना है - अब है संगम, दुनिया बदल रही है। यहाँ अनेक धर्म हैं, वहाँ एक धर्म है जो बाप ने स्थापन किया है। भारत का प्राचीन योग बहुत मशहूर है। तुम जानते हो हम फिर से राजयोग भगवान द्वारा सीख रहे हैं। भगवान ही बेहद की हिस्ट्री-जॉग्राफी बतायेंगे। मनुष्य, मनुष्य को बता न सके। यह बाबा कहते हैं मैं कुछ भी नहीं जानता था। बाबा अपनी महिमा नहीं करते हैं कि ऐसा था, वैसा था। बाप कहते हैं यह भक्ति के कर्मकान्ड अब मत करो। अब भक्ति पूरी होनी है। रात के बाद दिन आयेगा।

अभी तुम बच्चे हो संगम पर। संगम पर ही नॉलेज मिलती है। बाप कैसे पहले सूक्ष्मवतन की रचना करते हैं फिर प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा नई सृष्टि रचते हैं। इनका ही मनुष्य सृष्टि सिजरा है। इसको ही आदि देव, आदि देवी कहा जाता है। एडम ईव भी कहते हैं। अब मात-पिता है तो सृष्टि कैसे रची, एडम को आदि देव ब्रह्मा कहेंगे। परन्तु वह क्रियेटर नहीं है। ऐसे नहीं समझते परमपिता परमात्मा ने एडम द्वारा कराया। जरूर गॉड ही स्वर्ग का रचयिता है। वह है निराकार बाबा। हम आत्मायें भी निराकार हैं। यह शरीर लेकर पुन-र्जन्म में आती हैं पार्ट बजाने। निराकार बाप को भक्ति में याद करते हैं, वह परमधाम में रहते हैं। वह पतित-पावन है। पतित दुनिया में आकर बच्चों को पढ़ाए पावन दुनिया में ले जाते हैं इसलिए बाप भी है, टीचर भी है। बेहद की हिस्ट्री-जॉग्राफी पढ़ाते हैं। अब तुम मास्टर नॉलेजफुल बन रहे हो। अब बाप कहते हैं - बच्चे, याद रखना, पवित्र नहीं रहेंगे तो कितना भी सुनेंगे, एक कान से सुनेंगे दूसरे से निकल जायेगा। पहले पवित्रता की प्रतिज्ञा करो, नहीं तो पापों का बोझ कटेगा नहीं। पावन नहीं बनते हो तो और ही ज़ोर से गिरते हो। बाप कहते हैं याद रखना - अब पावन न बने तो बहुत सजा खानी पड़ेगी। अज्ञान काल में इतनी सजा नहीं मिलती है। परन्तु मेरे पास आकर प्रतिज्ञा कर फिर पवित्र नहीं बने और छिपकर इन्द्र-सभा में आते रहेंगे तो बहुत दण्ड खाना पड़ेगा और ही पत्थर बुद्धि बन पड़ेंगे। फिर साधारण प्रजा में चले जायेंगे। मर्तबा भी नम्बरवार है ना। ऊंचे ते ऊंचे भी बनते हैं तो नीचे ते नीच भी बनते हैं। यहाँ तो सबको दु:ख है। अचानक मौत हो जाती है। वास्तव में काल आना चाहिए पूरी आयु में। बरोबर भारत में कायदे अनुसार आयु पूरी होती थी। बुढ़े होते थे तो साक्षात्कार होता था कि अब फिर बच्चा बनेंगे। यहाँ तुम जानते हो शरीर छोड़ बाप के पास जायेंगे। यह पुराना चोला उतारना है। बाप को घड़ी-घड़ी याद करना है। बाबा, बस, हम आये कि आये। योगबल से आत्मा को पवित्र बनाते हैं। इसके लिए एक ही उपाय है - बाप से योग लगाना। फिर तुम सतोप्रधान पवित्र बन जायेंगे। योग लगाते-लगाते अन्त में योग सिद्ध होना है।

बाबा कहते हैं यह मेरा रथ है। लैण्ड लेडी कहो या लैण्ड लॉर्ड कहो - यह बड़ा विचित्र है। कैसे शिवबाबा आते हैं, कहते हैं यह लैण्ड लैडी भी है तो प्रजापिता भी है। मुझ निराकार को शरीर जरूर चाहिए। हरेक को अपना-अपना रथ है। मैं कैसे रथी बनूँ। मुझे तो आना पड़ता है पतित दुनिया में। कृष्ण तो पावन था। ड्रामा में यह रथ मुकरर है। मैं आता भी हूँ भारत में। ऐसे नहीं, एक कल्प भारत में, दूसरा कल्प जर्मनी में आऊंगा। बाप समझाते हैं तुम तो कर्मयोगी हो। कर्म करना पड़ता है। आगे पुरुष कमाते थे, मातायें घर सम्भालती थी। मातायें इतना पढ़ती नहीं थी। यह तो अब पढ़ाई शुरू हुई है। मातायें भी धन्धाधोरी करती हैं। अब तुम बच्चों को अविनाशी कमाई करनी है। हरेक को बेहद के बाप से वर्सा लेना है। जो करेगा सो अपना पद पायेगा। इस पढ़ाई का पद 21 जन्म चलता है। यह पढ़ाई बाप बिगर कोई पढ़ा न सके। पतित-पावन भी गॉड फादर है। वही राजयोग सिखलाकर स्वर्ग में जाने के लायक बनाते हैं। अब 84 जन्म पूरे हुए। अब हम घर जा रहे हैं। यह भी याद रहे तो तुम प्रफुल्लित रहेंगे। बाबा अपना अनुभव बताते हैं - कोशिश करते हैं याद रखने की परन्तु फिर भूल जाते हैं इसलिए बाबा कहते हैं रात को जागकर प्रैक्टिस करो फिर अवस्था स्थाई जम जायेगी इसलिए कहा जाता है - हे नींद को जीतने वाले बच्चे, कमाई करो। हाथ, पाँव, मुख से कुछ करना वा बोलना नहीं है। आगे तो माला फेरते राम-राम जपते थे। माला का राज़ अभी तुम समझते हो। विजय माला और रूद्र माला। अब तुम सब पुरुषार्थी हो। इसको माला नहीं कहेंगे। रात को जागने से तुमको बहुत मज़ा आयेगा। रात को 9 से 12 बजे का समय गन्दा होता है। 2 बजे से है अमृतवेला। यहाँ तो एकदम गन्दगी को निकाल दो। इतना सुनते भी अगर पवित्र नहीं बनेंगे तो बुद्धि का ताला बन्द हो जायेगा फिर किसको ज्ञान भी सुना नहीं सकेंगे। जैसे वृन्दावन में कुछ रास लीला का बना हुआ है। यह है ज्ञान डान्स की बात। यहाँ से सुनकर, देखकर बाहर जाकर उल्टा बोलते हैं तो गला घुट जाता है इसलिए सावधान रहना है। पवित्र जरूर बनना है तब योग लगा सकेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कर्मयोगी बनकर रहना है। कर्म करते भी बाप को याद कर सतोप्रधान बनने का पुरुषार्थ करना है।

2) अपनी हर चलन से बाप, टीचर, गुरू का शो करना है। "हम घर जा रहे हैं" - इस स्मृति से सदा प्रफुल्लित रहना है।

वरदान:-

कर्मयोगी बन हर कार्य को कुशलता और सफलता पूर्वक करने वाले चिंतामुक्त भव

कई बच्चों को कमाने की, परिवार को पालने की चिंता रहती है लेकिन चिंता वाला कभी कमाई में सफल नहीं हो सकता। चिंता को छोड़कर कर्मयोगी बन काम करो तो जहाँ योग है वहाँ कोई भी कार्य कुशलता और सफलता पूर्वक सम्पन्न होगा। अगर चिंता से कमाया हुआ पैसा आयेगा भी तो चिंता ही पैदा करेगा, और योगयुक्त बन खुशी-खुशी से कमाया हुआ पैसा खुशी दिलायेगा क्योंकि जैसा बीज होगा वैसा ही फल निकलेगा।

स्लोगन:-

सदा गुण रूपी मोती ग्रहण करने वाले होलीहंस बनो, कंकड़ पत्थर लेने वाले नहीं।