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17-06-18

17-06-18 प्रात: मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज 12-12-83 मधुबन 


एकाग्रता से सर्व शक्तियों की प्राप्ति

आज सभी मिलन मनाने के एक ही शुद्ध संकल्प में स्थित हो ना! एक ही समय, एक ही संकल्प- यह एकाग्रता की शक्ति अति श्रेष्ठ है। यह संगठन की एक संकल्प के एकाग्रता की शक्ति जो चाहे वह कर सकती है। जहाँ एकाग्रता की शक्ति है वहाँ सर्व शक्तियां साथ हैं इसलिए एकाग्रत् ही सहज सफलता की चाबी है। एक श्रेष्ठ आत्मा की एकाग्रता की शक्ति भी कमाल कर दिखा सकती है, तो जहाँ अनेक श्रेष्ठ आत्माओं के एकाग्रता की शक्ति संगठित रूप में है, वह क्या नहीं कर सकती। जहाँ एकाग्रता होगी वहाँ श्रेष्ठता और स्पष्टता स्वत: होगी। किसी भी नवीनता की इन्वेन्शन के लिए एकाग्रता की आवश्यकता है। चाहे लौकिक दुनिया की इन्वेन्शन हो, चाहे आध्यात्मिक इन्वेन्शन हो। एकाग्रता अर्थात् एक ही संकल्प में टिक जाना। एक ही लगन में मगन हो जाना। एकाग्रता अनेक तरफ भटकाना सहज ही छुड़ा देती है। जितना समय एकाग्रता की स्थिति में स्थित होंगे उतना समय देह और देह की दुनिया सहज भूली हुई होगी क्योंकि उस समय के लिए संसार ही वह होता है, जिसमें ही मगन होते। ऐसे एकाग्रता की शक्ति के अनुभवी हो? एकाग्रता की शक्ति से किसी भी आत्मा का मैसेज उस आत्मा तक पहुँचा सकते हो। किसी भी आत्मा का आह्वान कर सकते हो। किसी भी आत्मा की आवाज को कैच कर सकते हो। किसी भी आत्मा को दूर बैठे सहयोग दे सकते हो। वह एकाग्रता जानते हो ना! सिवाए एक बाप के और कोई भी संकल्प न हो। एक बाप में सारे संसार की सर्व प्राप्तियों की अनुभूति हो। एक ही एक हो। पुरूषार्थ द्वारा एकाग्र बनना वह अलग स्टेज है। लेकिन एकाग्रता में स्थित हो जाना, वह स्थिति इतनी शक्तिशाली है। ऐसी श्रेष्ठ स्थिति का एक संकल्प भी बाप समान का बहुत अनुभव कराता है। अभी इस रूहानी शक्ति का प्रयोग करके देखो। इसमें एकान्त का साधन आवश्यक है। अभ्यास होने से लास्ट में चारों ओर हंगामा होते हुए भी आप सभी एक के अन्त में खो गये तो हंगामे के बीच भी एकान्त का अनुभव करेंगे। लेकिन ऐसा अभ्यास बहुत समय से चाहिए तब ही चारों ओर के अनेक प्रकार के हंगामे होते हुए भी आप अपने को एकान्तवासी अनुभव करेंगे। वर्तमान समय ऐसे गुप्त शक्तियों द्वारा अनुभवी-मूर्त बनना अति आवश्यक है। आप सभी अभी भी अपने को बहुत बिजी समझते हो लेकिन अभी फिर भी बहुत फ्रा हो। आगे चल और बिजी होते जायेंगेइसलिए ऐसे भिन्न-भिन्न प्रकार के स्व अभ्यास, स्व-साधना अभी कर सकते हो। चलते-फिरते स्व प्रति जितना भी समय मिले अभ्यास में सफल करते जाओ। दिन-प्रतिदिन वातावरण प्रमाण एमर्जेन्सी केसेज ज्यादा आयेंगे। अभी तो आराम से दवाई कर रहे हो। फिर तो एमर्जेन्सी केसेज में समय और शक्तियां थोड़े समय में ज्यादा केसेज करने पड़ेंगे। जब चैलेन्ज करते हो कि अविनाशी निरोगी बनने की एक ही विश्व की हॉस्पिटल है तो चारों ओर के रोगी कहाँ जायेंगे। एमर्जेन्सी केसेज की लाइन होगी। उस समय क्या करेंगे? अमर भव का वरदान तो देंगे ना। स्व अभ्यास के आक्सीजन द्वारा साहस का श्वास देना पड़ेगा। होपलेस केस अर्थात् चारो ओर के दिलशिकस्त के केसेज ज्यादा आयेंगे। ऐसी होपलेस आत्माओं को साहस दिलाना, यही श्वांस भरना है। तो फटाफट आक्सीजन देना पड़ेगा। उस स्व अभ्यास के आधार पर ऐसी आत्माओं को शक्तिशाली बना सकेंगे! इसलिए फुर्सत नहीं है, यह नहीं कहो। फुर्सत है तो अभी है फिर आगे नहीं होगी। जैसे लोगों को कहते हो फुर्सत मिलेगी नहीं, लेकिन फुर्सत करनी पड़ेगी। समय मिलेगा नहीं लेकिन समय निकालना है। ऐसे कहते हो ना! तो स्व अभ्यास के लिए भी समय मिले तो करेंगे, नहीं। समय निकालना पड़ेगा। स्थापना के आदिकाल से एक विशेष विधि चलती आ रही है। कौन सी? फुरी-फुरी तालाब (बूंदबूंद से तालाब) तो समय के लिए भी यही विधि है। जो समय मिले अभ्यास करते-करते सर्व अभ्यास स्वरूप सागर बन जायेंगे। सेकण्ड मिले, वह भी अभ्यास के लिए जमा करते जाओ, सेकण्ड-सेकण्ड करते कितना हो जायेगा! इकठ्ठा करो तो आधा घण्टा भी बन जायेगा। चलते-फिरते के अभ्यासी बनो। जैसे चात्रक एक-एक बूंद के प्यासे होते हैं। ऐसे स्व अभ्यासी चात्रक एक-एक सेकण्ड अभ्यास में लगावें तो अभ्यास स्वरूप बन ही जायेंगे। 

स्व अभ्यास में अलबेले मत बनो क्योंकि अन्त में विशेष शक्तियों के अभ्यास की आवश्यकता है। उसी प्रैक्टिकल पेपर्स द्वारा ही नम्बर मिलने हैं इसलिए फर्स्ट डिवीजन लेने के लिए स्व अभ्यास को फास्ट करो। उसमें भी एकाग्रता के शक्ति की विशेष प्रैक्टिस करते रहो। हंगामा हो और आप एकाग्र हो। साइलेन्स के स्थान और परिस्थिति में एकाग्र होना यह तो साधारण बात है, लेकिन चारों प्रकार की हलचल के बीच एक के अन्त में खो जाओ अर्थात् एकान्तवासी हो जाओ। एकान्तवासी हो एकाग्र स्थिति में स्थित हो जाओ - यह है महारथियों का महान पुरूषार्थ। नये-नये बच्चों के लिए तो बहुत सहज साधन है। एक ही बात याद करो और एक ही बात सभी को सुनाओ। तो एक बात याद करना वा सुनाना मुश्किल तो नहीं है ना। बहुत बातें तो भूल जाते हो लेकिन एक बात तो नहीं भूलेगी। एक ही की महिमा करते रहो, एक के ही गीत गाते रहो और एक का ही परिचय देते रहो। यह तो सहज है ना कि यह भी मुश्किल है। जहाँ एक है वहाँ एकरस स्थिति स्वत: बन जाती है। और चाहिए ही क्या! एकरस स्थिति ही चाहिए ना। तो बस एक शब्द याद रखो। एक का ग्त गाना है, एक को याद करना है, कितना सहज है? नये-नये बच्चों के लिए सहज शार्टकट रास्ता बता रहे हैं। तो जल्दी पहुँच जायेंगे। यही चाहते हो ना। आये पीछे हैं लेकिन जावें आगे, तो यही शार्टकट रास्ता है, इससे चलो तो आगे पहुंच जायेंगे। माताओं को तो सब बातों में सहज चाहिए ना क्योंकि बहुत थकी हुई हैं, जन्म-जन्म की, तो सहज चाहिए। कितने भटके हो! 63 जन्मों में कितने भटके हो! तो भटकी हुई आत्माओं को सहज मार्ग चाहिए। सहज मार्ग अपनाने से मंजिल पर पहुँच ही जायेंगे। समझा, अच्छा। 

नये भी बैठे हैं और महारथी भी बैठे हैं। दोनों सामने हैं। सबसे ज्यादा समीप गुजरात है ना। समीप के साथ सहयोगी भी गुजरात वाले हैं। सहयोग में गुजरात का नम्बर राजस्थान से आगे हैं। आबू राजस्थान है, वैसे राजस्थान नजदीक है ना। राजस्थान के राजे भी जागें तो कमाल करेंगे। अभी गुप्त हैं। फिर प्रत्यक्ष हो जायेंगे। गुजरात का जन्म कैसे हुआ, पता है? गुजरात को पहले सहयोग दिया गया। सहयोग के जल से बीज पड़ा हुआ है। तो फल भी सहयोग का ही निकलेगा ना। गुजरात को डायरेक्ट बापदादा के संकल्प के सहयोग का पानी मिला है इसलिए फल भी सहयोग का ही निकलता है। समझा! गुजरात वाले कितने भाग्यवान हो! गुजरात में बापदादा ने सेन्टर खोला है। गुजरात ने नहीं खोला है इसलिए न चाहते हुए भी सहज ही सहयोग का फल निकलता ही रहेगा। आपको मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। किसी भी कार्य में आपको मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। धरनी सहयोग के फल की है। अच्छा! 

सभी स्व अभ्यास के चात्रकों को, सदा एकान्तवासी, एकाग्रता की शक्तिशाली आत्माओं को, सदा स्व अभ्यास के शक्तियों द्वारा सर्व को दिलशिकस्त से सदा दिल खुश बनाने वाले, सदा सर्व शक्तियों को प्रैक्टिकल में लगाने वाले, ऐसी श्रेष्ठ स्व अभ्यासी, स्वराज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्माओं को, महावीरों को और नये-नये बच्चों को, सभी को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते। एक आते और एक जाते। आने जाने का मेला है। बापदादा तो सभी बच्चों को देख खुश होते हैं। नये हैं, चाहे पुराने हैं, भाषा जानते हैं वा नहीं जानते हैं, मुरली समझते हैं वा नहीं समझते हैं, लेकिन हैं तो बाप के। फिर भी प्यार से पहुँच जाते हैं। बाप किस बात का भूखा है? प्यार का। समझदारी का भूखा नहीं। बाप प्यार देखते हैं, दिल का प्यार है। जितना ही भोले- भाले हैं उतना ही सच्चा प्यार है, चतुराई का प्यार नहीं है इसलिए भोले भाले बच्चे सबसे प्रिय हैं। जैसे नॉलेजफुल का टाइटिल है वैसे भोलानाथ का भी टाइटिल है, दोनों का यादगार है, नये-नये बच्चे भावना वाले अच्छे हैं। अच्छा

पार्टियों के साथ अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात 

1. सदा अपने को डबल लाइट फरिश्ता समझते हो? फरिश्ता अर्थात् डबल लाइट। जितना-जितना हल्कापन होगा उतना स्वयं को फरिश्ता अनुभव करेंगे। फरिश्ता सदा चमकता रहेगा, चमकने के कारण सर्व को अपनी तरफ स्वत: आकर्षित करता है। ऐसे फरिश्ते जिसका देह और देह की दुनिया के साथ कोई रिश्ता नहीं। शरीर में रहते ही हैं सेवा के अर्थ, न कि रिश्ते के आधार पर। देह के रिश्ते के आधार पर नहीं रहते, सेवा के सम्बन्ध के हिसाब से रहते हो। सम्बन्ध समझकर प्रवृत्ति में नहीं रहना है, सेवा समझकर रहना है। घर वही है, परिवार वही है, लेकिन सेवा का सम्बन्ध है। कर्मबन्धन के वशीभूत होकर नहीं रहते। सेवा के सम्बन्ध में क्या, क्यूं नहीं होता। कैसी भी आत्मायें हैं, सेवा का सम्बन्ध प्यारा है। जहाँ देह है वहाँ विकार हैं। देह के सम्बन्ध से विकार आते हैं, देह का सम्बन्ध नहीं तो विकार नहीं। किसी भी आत्मा को सेवा के सम्बन्ध से देखो तो विकारों की उत्पत्ति नहीं होगी। ऐसे फरिश्ते होकर रहो। रिश्तेदार होकर नहीं। जहाँ सेवा का भाव रहता है वहाँ सदा शुभ भावना रहती है, और कोई भाव नहीं। इसको कहा जाता है अति न्यारा और अति प्यारा, कमल समान। सर्व पुरूषों से उत्तम फरिश्ता बनो तब देवता बनेंगे। 

2. सभी बेगमपुर के बादशाह, गमों से परे सुख के संसार का अनुभवी समझते हुए चलते हो? पहले दु:ख के संसार के अनुभवी थे, अभी दु:ख के संसार से निकल सुख के संसार के अनुभवी बन गये। अभी एक सुख का मंत्र मिलने से दु:ख समाप्त हो गया। सुखदाता की सुख स्वरूप आत्मायें हैं, सुख के सागर बाप के बच्चे हैं, यही मंत्र मिला है। जब मन बाप की तरफ लग गया तो दु:ख कहाँ से आया। जब मन को बाप के सिवाए और कहाँ लगाते हो तब मन का दु:ख होता। मनमनाभव हैं तो दु:ख नहीं हो सकता। तो मन बाप की तरफ है या और कहाँ हैं? उल्टे रास्ते पर लगता है तब दु:ख होता है। जब सीधा रास्ता है तो उल्टे पर क्यों जाते हो? जिस रास्ते पर जाने की मना है उस रास्ते पर कोई जाए तो गवर्मेन्ट भी दण्ड डालेगी ना। जब रास्ता बन्द कर दिया तो क्यों जाते हो? जब तन भी तेरा, मन भी तेरा, धन भी तेरा, मेरा है ही नहीं तो दु:ख कहाँ से आया। तेरा है तो दु:ख नहीं। मेरा है तो दु:ख है। तेरा-तेरा करते तेरा हो गया। 

3. सदा एकबल और एक भरोसा, इसी स्थिति में रहते हो? एक में भरोसा अर्थात् बल की प्राप्ति। ऐसे अनुभव करते हो? निश्चयबुद्धि विजयी, इसी को दूसरे शब्दों में कहा जाता है - एक बल, एक भरोसा। निश्चय बुद्धि की विजय न हो, यह हो नहीं सकता। अपने में ही जरा-सा संकल्प मात्र भी संशय आता कि यह होगा या नहीं होगा, तो विजय नहीं। अपने में, बाप में और ड्रामा में पूरा-पूरा निश्चय हो तो कभी विजय न मिले यह हो नहीं सकता। अगर विजय नहीं होती तो जरूर कोई न कोई प्वाइन्ट में निश्चय की कमी है। जब बाप में निश्चय है तो स्वयं में भी निश्चय है। मास्टर है ना। जब मास्टर सर्वशक्तिमान हैं तो ड्रामा की हर बात को भी निश्चयबुद्धि होकर देखेंगे। ऐसे निश्चय बुद्धि बच्चों के अन्दर सदा यही उमंग होगा कि मेरी विजय तो हुई पड़ी है। ऐसे विजयी ही विजय माला के मणके बनते हैं। विजय उनका वर्सा है। जन्म-सिद्ध अधिकार में यह वर्सा प्राप्त हो जाता है। माताओं से मुलाकात बापदादा भी माताओं को सदा ही नमस्कार करते हैं क्योंकि माताओं ने सदा सेवा में आगे कदम रखा है। बापदादा माताओं के गुण गाते हैं, कितनी श्रेष्ठ मातायें बन गई, जो बापदादा भी देख हर्षित होते हैं। बस सदा अपने इसी भाग्य को स्मृति में रख खुश रहो। मन में खुशी का गीत सदा बजता रहे और माताओं को काम ही क्या है! ब्राह्मण बन गये तो गाना और नाचना यही काम है। मन से नाचो, मन से गीत गाओ। एक-एक जगत माता अगर एक-एक दीपक जगाये तो कितने दीपक जग जायेंगे। जग की मातायें जग के दीपक जगा रही हो ना। दीपक जगते-जगते दीपमाला हो ही जायेगी। अच्छा। 

प्रश्न: सेवा का सहज साधन, सर्व को आकर्षित करने का सहज साधन वा पुरूषार्थ कौन सा है? 

उत्तर: हर्षितमुख चेहरा। जो सदा हर्षित रहता है वह स्वत: ही सर्व को आकर्षित करता है और सहज ही सेवा के निमित्त भी बन जाता है। हर्षितमुखता खुशी की निशानी है। खुशी का चेहरा देख स्वत: पूछेंगे क्या पाया, क्या मिला! तो सदा खुशी में रहो क्या थे, क्या बन गये, इससे ही सेवा होती रहेगी। 

प्रश्न: तिलक का अर्थ क्या है? किस तिलक को धारण करो तो सदा नशे और खुशी में रहेंगे? 

उत्तर: तिलक का अर्थ है स्मृति स्वरूप। तो सदा स्मृति रहे कि हम तख्तनशीन हैं। हम वह सिकीलधी आत्मायें हैं जो प्रभु तख्त के अधिकारी बनी हैं। इस तिलक को धारण करने से सदा खुशी और नशे में रहेंगे। वैसे भी कहा जाता है तख्त और बख्त। तख्तनशीन बनने का बख्त अर्थात् भाग्य मिला। तो सदा श्रेष्ठ तख्त और बख्त वाली आत्माएं हैं, यही नशा और खुशी सदा रहे।

वरदानः

याद और सेवा द्वारा सब चक्करों को समाप्त कर शमा पर फिदा होने वाले सच्चे परवाने भव

जो बच्चे याद और सेवा में सदा बिजी रहते हैं वह सभी चक्करों से सहज ही मुक्त हो जाते हैं। कोई भी चक्र रहा हुआ होगा तो चक्कर ही लगाते रहेंगे। कभी सम्बन्धों का चक्कर, कभी अपने स्वभाव संस्कार का चक्कर, ऐसे व्यर्थ के सभी चक्कर समाप्त तब होंगे जब बुद्धि में सिवाए शमा के और कुछ भी न हो। शमा पर फिदा होने वाले शमा के समान बन जाते हैं। ऐसे फिदा होने वाले अर्थात् समा जाने वाले ही सच्चे परवाने हैं।

स्लोगनः

जो सच्चे पारस बने हैं उनके संग में लोहे सदृश्य आत्मायें भी सोना बन जाती हैं।