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25-06-2018

25-06-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - इस समय तुम सबकी वानप्रस्थ अवस्था है, तुम्हें वाणी से परे अब वापिस घर चलना है, इसलिए बाप को याद करो"

प्रश्नः-

21 जन्म सुख मिलने का आधार क्या है?

उत्तर:-

63 जन्मों की भक्ति। जिन्होंने पहले-पहले सतोप्रधान भक्ति की है अर्थात् जो पुराने अनेक जन्म के भक्त हैं वही अब ज्ञान लेते हैं, उन्हें ही 21 जन्मों का सुख प्राप्त होता है। अभी तुम्हारा भक्ति का पार्ट पूरा हुआ। भगवान तुम्हें भक्ति का फल देने आये हैं। भक्त, भगवान् नहीं हो सकते।

गीत:-

माता ओ माता तू है सबकी भाग्य विधाता....  

ओम् शान्ति।

बच्चों ने माता की महिमा सुनी। अब माता को तो भगवान् नहीं कहा जा सकता क्योंकि भगवान् को तो पिता कहा जाता है - परमपिता। अब पिता है तो माता भी जरूर है। माता को बहुत मानने वाले हैं। माता है तो पिता भी है। माता अपने को भगवान् कह न सके। यह प्वाइन्ट धारण करने की है। जगत अम्बा की कितनी महिमा है! ऐसे नहीं कहेंगे कि भगवान् वा बाप सर्वव्यापी है। नहीं, जब मात-पिता कहा जाता है तो बच्चे भी हैं। अगर सर्वव्यापी है, फिर तो सब भगवान् हैं। फिर तो भगवती भी हो नहीं सकती। सर्वव्यापी के ज्ञान में भगवती तो रही नहीं। सभी भगवान् हैं तो आत्मा ही पिता हो गई। माता तो रही नहीं। यह बड़ी अच्छी समझाने की बात है। तुम जानते हो - कोई भी आत्मा अपने को भगवान् कह नहीं सकती। भक्त कहें - हम भगवान् हैं तो फिर माता सिद्ध हो नहीं सकती। और फिर भक्त तो पुनर्जन्म लेते हैं। भगवान् तो पुनर्जन्म ले नहीं सकता। ऐसे तो नहीं भगवान् को अपना शरीर है। तो इस सर्वव्यापी की बात पर अच्छी रीति समझाना है। भक्तों के लिए भगवान चाहिए ना। अनेक भक्त हैं, ब्रदर्स और सिस्टर्स - सभी भक्त हैं। आत्मा कहती है - इस समय मैं भक्ति कल्ट में हूँ। फिर आत्मा कहेगी अब मुझे बाप मिला है, तो मैं ज्ञान में हूँ। आत्मा ही ज्ञान सुनती है। भक्त तो पुनर्जन्म लेते हैं, भगवान् तो पुनर्जन्म ले नहीं सकते। यह इनका शरीर नहीं है। यह तो सभी जानते हैं - पांच तत्वों का शरीर लेकर भगवान् को जन्म नहीं लेना है, वह तो परकाया प्रवेश करते हैं। यह ब्रह्मा-विष्णु-शंकर भी सूक्ष्मवतन वासी हैं। तो हर एक बात अच्छी रीति बुद्धि में बिठानी है। आत्मा कहती हैं मैं एक पुराना शरीर छोड़ दूसरे में प्रवेश करती हूँ। पुराना शरीर छोटा है वा बड़ा है, एक छोड़ दूसरा लेती हूँ। यहाँ तो अचानक भी छोटे वा बड़े का शरीर छूट जाता है। परन्तु वहाँ तो पूरी आयु होने पर समझते हैं अब पुराना शरीर छोड़ नया लेना है। तो यह ज्ञान आत्मा में है ना। आत्मा पुनर्जन्म लेती है। परमात्मा के लिए तो नहीं कहेंगे। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को भी परमात्मा नहीं कहेंगे। वे भी सूक्ष्मवतन वासी हैं। बाबा तो मूलवतन वासी हैं। और कोई नहीं समझते कि परमात्मा मूलवतन, निर्वाणधाम में रहने वाले हैं। निर्वाणधाम अर्थात् वह वाणी से परे धाम है इसलिए वानप्रस्थ नाम पड़ा है। वाणी से परे अवस्था में जाने के लिए 60 वर्ष की उम्र के बाद जब बूढ़े होते हैं तो वानप्रस्थ लेते हैं। यहाँ तो तुम छोटे-बड़े सब समझते हो कि हम वानप्रस्थी हैं। आत्मा कहती है - मुझे वाणी से परे स्थान में जाना है। आत्मा को मेल कहा जाता है। जब शरीर में आती है तब आत्मा कहती है - इस समय मुझे मेल अथवा फीमेल का तन मिला है। तो आत्मा को अब वानप्रस्थ में जाने का पुरुषार्थ करना है। आत्मा को मेल कहा जाता है। मातायें कभी वानप्रस्थ नहीं लेती। परन्तु यहाँ बाप समझाते हैं - आत्मा तो मेल है। तुम सभी आत्माओं की वानप्रस्थ अवस्था है। अब सबको वापिस जाना है। मैं तुम सबको वापिस ले जाने के लिए आया हूँ इसलिए अब मुझे याद करो तो मेरे धाम में आ जायेंगे। यह कोई मनुष्य कह न सके। सुप्रीम रूह बाप ही कहते हैं। सन्यासी-उदासी ऐसे बच्चे-बच्चे कह बात कर नहीं सकेंगे। बाप का ज्ञान किसमें है नहीं। पूछो भगवान् कहाँ है? तो कहेंगे सर्वव्यापी है। गोया भगवान् का ज्ञान कोई में है नहीं इसलिए भक्ति करते हैं भगवान् से मिलने के लिए। परन्तु कैसे और कब मिलेंगे? यह किसको पता नहीं है। बाप कहते हैं कोटों में कोई मुझे पहचानते हैं। मनुष्य तो सरसों मिसल अथाह हैं। इनमें कोई जो सिकीलधे हैं वही आकर मुझे पहचानेंगे और बाप से अपना वर्सा लेंगे। तुम समझा सकते हो कि इस समय सभी भक्त हैं। चाहते हैं कि हम भगवान् से भक्ति का फल लेवें। अगर तुम सब भगवान् हो तो फिर भक्त तो कोई हो न सके। अगर तुम भगवान् हो तो बाकी तुमको क्या चाहिए? भक्तों को फिर मिलना है भगवान् से। अपने को भगवान् कहना - यह तो एक इन्सल्ट है, इससे बड़ी इन्सल्ट कोई होती नहीं। अल्लाह से तो हम बहिश्त का वर्सा लेना चाहते हैं। तुम कहते हो - हम अल्लाह हैं! अब तुम ही जज करो। तुमको कोई कहे - हम अल्लाह हैं, यह कैसे हो सकता? अल्लाह तो सबसे बड़ा है। यह बहुत समझने की बातें हैं। कभी भी कोई अपने को अल्लाह वा भगवान् कह न सके। बाप सबका एक होगा। ऐसे बहुत कहते हैं परमात्मा सर्वव्यापी है। अरे, तुम भगवान हो, हम तो नहीं मानते। हम तो भक्त हैं। आशिक हैं उस माशुक के। एक परमात्मा को ही पतित पावन कहा जाता है।

तुम समझा सकते हो कि तुम्हारे बड़े तो कहते रहे रचयिता और रचना बेअन्त है। तुम फिर अपने को रचयिता कैसे कहते हो? बीज बेअन्त हो नहीं सकता। झाड़ को बेअन्त कहते हैं। इतने पत्ते आदि गिन नहीं सकते। एक बीज से कितनी टाल-टालियां, पत्ते आदि निकलते हैं। तुम हो चैतन्य, बोलते-चालते हो। सबसे बड़ी महिमा मनुष्य की होती है। बाप कहते हैं मैं आकर बच्चों को सारे ड्रामा का राज़ समझाता हूँ। यह बना-बनाया ड्रामा है ना। ड्रामा के ऊपर चलते रहना है। तुम बाप के बच्चे स्वदर्शन चक्रधारी बनते हो, परमपिता परमात्मा द्वारा क्योंकि वह भी स्वदर्शन चक्रधारी है। तुम आत्माओं को बैठ आप समान बनाते हैं। तुम सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त को जानते हो। तुम नई दुनिया के लिए, नये धर्म की स्थापना के लिए नई बातें सुनते हो - परमपिता परमात्मा से, जो सृष्टि को भी पावन बनाते हैं। तुमको भी नया बनाते हैं। नई सृष्टि में फिर नया जमाना स्वर्ग का होगा, अभी तो नर्क का जमाना है। तुम नर्क के जमाने में हो। अभी परमपिता परमात्मा ही आकर तुमको स्वदर्शन चक्रधारी बनाते हैं। यह हरेक बातें नई हैं, धारण करने लायक हैं। परन्तु धारणा सभी को नहीं होती। धारणा होने से खुशी का नशा रहता है। गृहस्थ व्यवहार में रहते इसी नशे में रहना है। स्त्री अथवा पुरुष - हरेक को स्वदर्शन चक्रधारी यहाँ ही बनना है। बाकी भुजायें तो हर एक को दो ही हैं। मनुष्य जो 84 जन्म लेते हैं, उनको 4 भुजायें तो हो नहीं सकती। तुम ऐसे कभी नहीं सुनेंगे कि शंकर को 100 या 1000 भुजायें हैं। ब्रह्मा को भुजायें दिखाई हैं। चार भुजा वाले ब्रह्मा के पास गया, हजार भुजा वाले पास गया। ब्रह्मा की सन्तान वृद्धि को पाते रहते हैं। तो कितनी भुजायें हो जायेंगी? प्रजापिता है ना। सृष्टि रची है तो बरोबर बाहें हैं। बाकी मनुष्य कोई 4-6 भुजा वाले होते नहीं हैं। सूक्ष्म वतन में तो कुछ है नहीं। यह सब बाप बैठ समझाते हैं। कहते हैं इसने (दादा ने) भी बहुत शास्त्र पढ़े, गुरू किये हैं। वह है भक्ति मार्ग। तुम्हारा भक्ति का पार्ट पूरा हुआ। तुम आलराउन्डर हो। शुरू से लेकर तुमने सबसे जास्ती भक्ति की है। भक्त तो इस समय बहुत हैं। तुम तो थोड़े बच्चे हो। बाबा कहते हैं - मैं तुमको साक्षात्कार कराता हूँ। कई भक्त याद करते हैं, उनको भी साक्षात्कार कराता हूँ। तुमने ही सतोप्रधान भक्ति की है, तो जरूर तुमने ही जास्ती जन्म लिये हैं। 63 जन्म तुमने भक्ति की है। उसकी एवज़ 21 जन्म तुमको सुख मिलता है। कितनी समझने की बातें हैं इसलिए नये जो आते हैं उनसे फार्म भराया जाता है। फार्म बड़ा अच्छा है - तुम्हारा गुरू कौन? गुरू किया तो जरूर भक्त ठहरा ना। तुम्हीं भगवान् हो तो गुरू क्यों किया? भगवान्, भगवान् को गुरू कैसे बनायेगा! भक्त भगवान् से मिलने लिए गुरू करेंगे। तुम भगवान् खुद ही हो। बाकी गुरू से क्या बनेंगे? बड़ा युक्ति से, रमजबाजी से समझाना है। रोज़ नई-नई बातें समझाते हैं। मल्ल युद्ध में बड़ा युक्ति से लड़ते हैं। कहाँ से फलाने को अंगूरी लगाऊं, तीर मारूँ।

मनुष्यों ने आदि देव ब्रह्मा को महावीर कह मुंझा दिया है। कोई महावीर को हनूमान कहते, क्योंकि हनूमान ने महावीरता दिखाई है। कहाँ वह महावीर फिर उनका नाम पवन पूत रखा है। आदि देव तो ब्रह्मा है, और मनुष्य है। जगत अम्बा भी मनुष्य है। इतनी भुजायें आदि कहाँ है! माता को इतनी भुजायें हों तो हमको भी होनी चाहिए। वन्डरफुल बातें हैं! ऐसे नहीं, सभी धारण कर ज्ञान के उस नशे में रहते हैं। नम्बरवार हैं। उन सतसंगों में कोई ऐसी बात नहीं रहती। यह तो स्कूल है। नम्बरवार बच्चे हैं। कोई को माया का तूफान आया और यह गिरा इसलिए ब्राह्मणों की माला नहीं बन सकती है। फाइनल जब बनेंगे तो उसको रूद्र माला कहेंगे। तुम रूद्र शिवबाबा की सन्तान हो। रूद्र यज्ञ रचते हैं तो रूद्र का चित्र बड़ा बनाते हैं। बाकी छोटे-छोटे सालीग्राम बनाकर पूजा करते हैं। बाप बैठ गुह्य बातें सुनाते हैं। जो सर्विसएबुल बच्चे होंगे उनको अच्छी रीति धारणा होगी और समझा सकेंगे। यह तो बड़ा सहज है। हम आत्मा हैं। कहते हैं ब्रदरहुड हैं। आत्मायें सब भाई-भाई हैं। भाई-भाई कह फिर आपस में लड़ते हैं। जब कहते हो ब्रदरहुड है, फिर फादरहुड कैसे कहते हो? सब ईश्वर कैसे कहते हो? सब भगवान् भाई-भाई कैसे हो सकते हैं? वह तो सब आत्माओं का बेहद का बाप है। कितनी सहज बातें हैं।

तुम जानते हो ब्रह्मा द्वारा नई दुनिया की स्थापना होती है। फिर आहिस्ते-आहिस्ते बढ़ती है। एक से दो, दो से चार होते हैं। ऐसे वृद्धि को पाते रहते हैं। बरोबर प्रजापिता ब्रह्मा है तो जरूर नई सृष्टि रचता होगा ना। जगतपिता, वह है रचने वाला। तुमको रचा है। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा नई प्रजा की रचना रचते हैं अर्थात् पुरानी को नया बनाते हैं। मनुष्य फिर समझते हैं सागर में पीपल के पत्ते पर आया। अच्छा, उसको फिर किसने रचा? यह बाप बैठ समझाते हैं कि नई प्रजा कैसे रचते हैं? वहाँ स्वर्ग में गर्भ में जैसे कि क्षीरसागर में आराम से बैठे हैं। उस समय कोई ज्ञान नहीं रहता। शास्त्रों में तो कैसी बातें लिख दी हैं! प्रलय भी बड़ी और छोटी दिखाते हैं। वह कहते हैं प्रलय होती है। बाप कहते हैं प्रलय कभी होती नहीं। मैं आता हूँ ब्रह्मा द्वारा भारत को पतित से पावन बनाने। पतित दुनिया में मुझे आना पड़ता है। तुम जानते हो कल्प-कल्प हम बच्चे बाप द्वारा भारत को पतित से पावन बनाते हैं। एक-एक को भूं-भूँ करते हैं। सब विकारी पतित हैं। बाप है पतित-पावन, उन द्वारा हम भी खुदाई खिदमदगार बनते हैं। हम भी पावन बनते हैं और बनाते हैं। अच्छा!

मात-पिता बापदादा का मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस बने बनाये ड्रामा पर चलते रहना है। ज्ञान का सिमरण कर स्वदर्शन चक्रधारी बनना है। सदा खुशी में रहना है।

2) भक्तों को भगवान् का सत्य परिचय देना है। भटकने से छुड़ाना है। ब्रह्मा की मददगार भुजा बन खुदाई खिदमतगार बनना है।

वरदान:-

अखण्ड स्मृति द्वारा विघ्नों को विदाई देने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान भव

संगमयुग विघ्नों को विदाई देने का युग है, जिसको आधाकल्प के लिए विदाई दे चुके उसको फिर आने न दो। सदा याद रखो हम विजयी रत्न हैं, मास्टर सर्वशक्तिमान हैं - यह स्मृति अखण्ड रहे तो शक्तिशाली आत्मा के सामने माया का विघ्न आ नहीं सकता। विघ्न आया फिर मिटाया तो अखण्ड अटल नहीं कहेंगे, इसलिए सदा शब्द पर अटेन्शन दो। सदा याद में रहने से सदा निर्विघ्न रहेंगे और विजय का नगाड़ा बजता रहेगा।

स्लोगन:-

ईश्वरीय सेवा में खुद को आफर करना ही बापदादा की आफरीन लेना है।