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07-07-2018

07-07-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - अभी तुम बाप, टीचर, सतगुरू - तीनों के सम्मुख बैठे हो, बाप की यही कृपा है जो टीचर बन तुम्हें पढ़ा रहे हैं, सतगुरू बन साथ में ले जायेंगे''

प्रश्नः-

तुम बच्चों का बाप से कौन-सा वायदा है? तुम्हारा कर्तव्य क्या है?

उत्तर:-

बाप से वायदा है - बाबा, हम आपसे जो कुछ सुनते हैं वह दूसरों को भी अवश्य सुनायेंगे। आप समान बनायेंगे। हमारा कर्तव्य है - बाप समान सबको पढ़ाना क्योंकि अभी बुद्धि का ताला खुला है। जैसे हम वर्सा ले रहे हैं ऐसे रहमदिल बन दूसरों को भी वर्सा दिलाना है।

गीत:-

ले लो दुआयें माँ-बाप की........  

ओम् शान्ति।

अभी बच्चे माँ-बाप के सम्मुख बैठे हुए हैं अथवा बच्चे स्कूल में टीचर के पास बैठे हुए हैं। बच्चे जानते हैं हम सतगुरू के पास भी बैठे हैं ज्ञान सुनने के लिए। किससे सुनने? ज्ञान सागर तो बाप ही है। जानते हैं वह परमधाम से पधारा हुआ है हमको शिक्षा देने। तुम्हारी बुद्धि परमधाम, स्वीट होम तरफ लगी हुई है। भल पढ़ाते तो यहाँ ही हैं, मात-पिता सम्मुख बैठे हैं तो भी बुद्धियोग अथवा याद निर्वाणधाम तरफ ही है। हमको बाप के साथ घर जाना है। फिर विष्णु के घर आयेंगे। वह भी घर है, यह भी घर है। कृष्णपुरी ससुरघर जाना है। पहले तो बाप जो लायक बनाते हैं उनको याद करना है। माँ-बाप कन्या को लायक बनाते हैं ना। ससुर घर जायेगी तो माँ-बाप का शो करेगी कि बच्ची तो बड़ी अच्छी सुलक्षणी है। अभी तुम जानते हो हम परमपिता परमात्मा के सम्मुख बैठे हैं, पढ़ रहे हैं। बाप बच्चों पर बहुत मेहनत करते हैं। यह है उनकी कृपा। बच्चा बैरिस्टर बनता है तो कहेंगे माँ-बाप ने अच्छी रीति पालना की है। पढ़ाया है। मात-पिता क्रियेटर भी होते हैं, डायरेक्टर भी होते हैं। मेल बच्चों का मोह बाप में जाता है। बच्ची का मोह माँ के पास जाता है क्योंकि बच्चों को बाप से वर्सा मिलना है। कुमारी तो जाकर माँ बनती है। अभी यहाँ तुम ब्राह्मण कुल भूषण हो। ब्राह्मण तो गाये जाते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान तो बहुत हैं। उन ब्राह्मणों से भी तुम पूछ सकते हो - तुम मुख वंशावली हो तो ब्रह्मा की मुख सन्तान हो? कुख सन्तान तो लौकिक मात-पिता से जन्म लेते हैं। ब्रह्मा मुख से तुम कब पैदा हुए? बतला नहीं सकेंगे। तुम प्रैक्टिकल में जानते हो - हम ब्रह्मा मुख कमल से एडाप्ट हुए हैं। एडाप्ट किया है शिवबाबा ने। यहाँ तुम समझते हो - हम बाप-टीचर-गुरू तीनों के सम्मुख बैठे हुए हैं। बाप तो मैनर्स सिखलाते हैं - श्रीकृष्ण जैसे गुणवान, सर्वगुण सम्पन्न........ यहाँ ही बनना है, पुरुषार्थ करके। मनुष्य तो यह नहीं जानते कि राधे-कृष्ण अगले जन्म में कौन थे? यह सिर्फ तुम बच्चे ही जानते हो। जो पूज्य थे वो ही पुजारी बने फिर पूज्य बनते हैं। पुजारी भक्त को कहा जाता है। नर से नारायण वा बेगर से प्रिन्स बनाने का वर्सा बाप बिगर कोई दे न सके। तुमसे अगर कोई पूछे - तुम क्या कर रहे हो? तो तुम बोलो - हम गॉड फादर द्वारा पढ़ रहे हैं। एम आब्जेक्ट तो हरेक की बुद्धि में है ना। हम बाबा से बेहद का वर्सा ले रहे हैं। स्वर्ग का वर्सा है ही लक्ष्मी-नारायण वा प्रिन्स-प्रिन्सेज बनना। यहाँ इस कॉलेज में तुम प्रिन्स-प्रिन्सेज बनते हो। जानते हो भविष्य नये विश्व का प्रिन्स-प्रिन्सेज बनने लिए हम पढ़ रहे हैं। नये विश्व को सतयुग कहा जाता है। सतयुग में अथवा कलियुग में होंगे तो मनुष्य ही ना। नॉलेज भी मनुष्य को मिलती है। जानवर को तो नहीं देंगे। मनुष्य दैवी गुण वाले थे। अभी आसुरी गुणों वाले बने हैं फिर हम दैवीगुण वाले बनते हैं। यह तुम बच्चों की बुद्धि में है। यह तो सहज समझने की बात है। 84 जन्मों का चक्र भी भारत के लिए ही है। 84 जन्मों के चक्र का राज़ और किसकी बुद्धि में नहीं बैठेगा। स्वदर्शन चक्र तो कृष्ण को था। विष्णु, लक्ष्मी-नारायण का कम्बाइन्ड रूप है। छोटेपन में राधे-कृष्ण थे। परन्तु वो भी सिर्फ कृष्ण को देते हैं। राधे को कभी चक्र नहीं दिखाते। लक्ष्मी को भी नहीं, सिर्फ नारायण को दिखाते हैं वा विष्णु को देते हैं। उसमें लक्ष्मी आ जाती है। वास्तव में स्वदर्शन चक्रधारी तुम हो।

तुम जानते हो हम बड़ी वन्डरफुल पढ़ाई पढ़ रहे हैं गॉड फादर से। वो ही ज्ञान का सागर, मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, सत है, चैतन्य है। आत्मा को ही सत और चैतन्य कहा जाता है। शरीर को सत् और चैतन्य तो कह नहीं सकेंगे। बच्चे का शरीर 5 महीने तक जड़ होते भी गर्भ में वृद्धि को पाता रहता है। वृद्धि को तो हर चीज़ पाती ही है। परन्तु यह मनुष्य की आत्मा महान् है। मनुष्य की महिमा भी होती है तो मनुष्य की ग्लानी भी होती है। अखबार में छपा - इंगलैण्ड का प्राइम मिनिस्टर चर्च में गया तो साथ में बिल्ली को लेकर गया। देखो, बिल्ली का भी कितना मान होता है। वहाँ तुम भी बिना परमिट के नहीं जा सकते और बिल्ली को परमिट मिल जाती है। बहुत मनुष्य कहते हैं - कुत्ता भी भगवान् को याद करता है! बांग भरता है ना! वो भी गॉड सिर्फ कहते, जानते कुछ नहीं। तो मनुष्य और जानवर में क्या फ़र्क हुआ? तुम अब कितने ऊंच बनते हो। अभी तुम्हारी बहुत महिमा निकलेगी। प्रैक्टिकल में तुम्हारा जब प्रभाव निकलेगा तो कहेंगे - बस, ब्रह्माकुमारियों पास जाना है। ब्रह्माकुमार-कुमारियां शिव के पोत्रे और पोत्रियां हैं। बाबा तो एक है ना। मम्मा-बाबा एक हैं जिससे तुम रचे जाते हो। तुम जानते हो हम शिवबाबा के पोत्रे वा पोत्रियां हैं। इसमें बूढ़े वा जवान आदि की बात नहीं है। हम शिवबाबा के पोत्रे ब्रह्मा के पुत्र पोत्रे ठहरे। कितनी सहज बात है। यह ब्राह्मणों का कुल है ना। क्रियेटर तो बाप ही हुआ। तुम जानते हो हम शिवबाबा के बच्चे इस झाड़ के पहले-पहले फाउन्डर हैं। यह ब्रह्मा संगम पर थुर में बैठे हैं ना। हम ऊंच ते ऊंच शिवबाबा के पोत्रे हैं, उससे हम स्वर्ग का वर्सा पा रहे हैं। यह कभी भूलना नहीं चाहिए। देह सहित जो कुछ भी है सबको भूल अशरीरी बनना है। अभी हमको वापिस जाना है - डाडे के पास अथवा स्वीट होम जाना है। हम शिवबाबा के पोत्रे-पोत्रियां हैं। बाप भी तो जरूर चाहिए। बरोबर हम ब्रह्माकुमार कुमारियां हैं। शिव के पोत्रे हैं, डाडे का ही वर्सा मिलता है। विश्व की बादशाही को ही सच्चा स्वराज्य कहा जाता है। सारे विश्व का तुम मालिक बनते हो। कोई का डर नहीं। उसको अद्वेत राज्य कहा जाता है। वहाँ दूसरा कोई रहता नहीं। सर्वगुण सम्पन्न, अहिंसा परमो धर्म वाले बन जाते हैं। बाबा ने समझाया है - हिंसा दो प्रकार की होती है। एक वायोलेन्स की, दूसरी हिंसा है फिर काम कटारी चलाना। हम डबल अहिंसक हैं। सतयुग में हिंसा की बात नहीं होती। न जिस्मानी, न विकार की। अहिंसा परमो देवी-देवता धर्म कहते हैं। उसके हम भाती बनते हैं। ब्राह्मण से फिर हम देवता बनेंगे। हमारा मनुष्य नाम निकल जाता है। हम मनुष्य से देवता बनते हैं। जैसे बैरिस्टर, इन्जीनियर आदि बनते हैं। कैसे बने सो तो वह खुद ही जान सकते। तुम जानते हो इस पढ़ाई से देवता बनते हैं। बहुत सहज है। वैराइटी धर्मो का यह जो झाड़ है, उसके आदि-मध्य-अन्त का तुमको ज्ञान है, जो और कोई को नहीं है। तुम जानते हो हमारा बाप टीचर परमधाम से आये हैं - हमको पढ़ाने। परमधाम कितना ऊंच है। एरोप्लेन भी वहाँ जा न सके। बाबा बिगर पंख कैसे आकर पढ़ाते हैं, तो इतनी खुशी रहनी चाहिए। हमारा बाबा टीचर भी है। रहते हैं परमधाम में, वहाँ से आकर हमको पढ़ाते हैं। उनको तो बहुत ही सर्विस करनी है। भक्तों को भी राज़ी करने की सर्विस करनी होती है। भक्त मुझे नहीं जानते। उन्हों की मैं इतनी सर्विस करता हूँ, नौधा भक्ति वालों की भी दिल पूरी करता हूँ। जिसका भी साक्षात्कार बच्चों ने किया है। नौधा भक्ति में बैठते हैं - बस, कृष्ण दर्शन दो। आंखों से जारोज़ार आंसू बहाते रहते हैं। जब ऐसी तीव्र भक्ति करते हैं तब साक्षात्कार कराता हूँ। वह है भक्ति मार्ग। तो इस समय उन्हों को भी राज़ी करता हूँ। तुमको तो सम्मुख बैठ सुनाता हूँ, पढ़ाता हूँ। भगवानुवाच तो बरोबर है। इसमें कोई शक नहीं। गीता में भी लिखा हुआ है - हे बच्चे, तुमको नर से नारायण बनाने राजयोग सिखला रहा हूँ। परन्तु नाम कृष्ण का डाल दिया है। कृष्ण की आत्मा तो इस समय अन्तिम जन्म में है। वो बैठ पढ़ती है। कृष्ण भगवानुवाच नहीं है। बच्चे जानते हैं - बरोबर सूर्यवंशी चन्द्रवंशी राजधानी स्थापन हो रही है। हम पुरुषार्थ करके अवश्य वर्सा लेंगे। बाबा कितना रहमदिल है! आकर बच्चों को गोद लेते हैं। बच्चे कहते हैं - बाबा, आप वो ही हो, हम भी वही हैं, जो फिर से आकर मिले हैं। आप वही बाबा हैं, हम वही आपके बच्चे हैं। अब आप आये हो राज्य-भाग्य देने। बाबा फिर से हमको पढ़ा रहे हैं। हम शिव के पोत्रे-पोत्रियां हैं। प्रजापिता ब्रह्मा नाम भी बाला है। यह तो जानते हो - स्वर्ग का रचयिता परमपिता परमात्मा ही है, वर्सा उनसे मिलेगा। ब्रह्मा को भी उनसे मिला था। यह बाप तुम ब्राह्मणों से बात कर रहे हैं। कितना अच्छी रीति समझाते हैं। फिर भूल क्यों जाते हो? बाबा के घर में बैठे हैं। बाबा ही टीचर बन पढ़ाते हैं। हम राजयोग सीख रहे हैं। हम जायेंगे शान्तिधाम फिर आयेंगे सुखधाम। इस कलियुगी दुनिया का विनाश होना है। कल्प पहले मुआफिक तुमको साक्षी हो देखना पड़ता है। देखते चलो - कैसे इम्तहान पास किया, कैसे विनाश हुआ? फिर जहाँ जीत, वहाँ जन्म कैसे होता है? कैसे महल आदि बनायेंगे? बुद्धि में है - ऐसे नहीं, सोने की द्वारिका कोई नीचे पड़ी है, वह निकल आयेगी। कहते हैं - रावण की भी सोने की लंका थी। ऐसे तो कुछ है नहीं। सोने के महल तो देवताओं के होते हैं। अभी तो नहीं है। अभी तो भारत का बेड़ा ही गर्क हो गया है। अब तुम बच्चे सैलवेज करते हो नर्क रूपी विषय सागर से। बाकी स्टीम्बर आदि की कोई बात नहीं है। तुम सागर के बच्चे जल मर भस्म हो गये थे। काम चिता पर बैठ काले बन गये थे। तुम सुन्दर थे फिर सांवरे बन गये। भारत के तुम देवी-देवतायें कितने सुन्दर थे! तुम सब श्याम-सुन्दर हो। बच्चे जानते हैं - हम किसके आगे बैठे है? ऐसा कोई सतसंग नहीं होगा जहाँ गॉड फादर बैठ राजयोग सिखलाते हैं। निराकार बाप किसके तो शरीर में आये हैं ना। श्रीकृष्ण जैसा कैसे आयेगा। हाँ, उनकी आत्मा तो यहाँ ही है ना।

अभी तुम्हारी बुद्धि का ताला खुला है। जानते हो हम बाबा से विश्व के मालिक बनते हैं। वर्सा लेते हैं। तुम ही मम्मा-बाबा कहते हो तो तुम्हें पढ़ाई में फालो करना है इसलिए गाया जाता है - फालो फादर। सच्चा फादर चाहिए ना, आर्टीफिशल तो नहीं! गांधी को भी बापू जी कहते थे परन्तु वर्सा तो कुछ भी नहीं मिला। वो हुआ हद के बापू जी से हद का वर्सा। उनको बेहद का नहीं कहेगे। यह बेहद का बापू जी तो परमधाम से आये हैं। तुमको स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। तुम अब त्रिकालदर्शी बने हो और तुम ही वैकुण्ठ के मालिक बनते हो। बेहद के बाप में कितना लव रहना चाहिए! और संग तोड़ एक तुम संग जोडूँ। यह तुम्हारी प्रतिज्ञा बाप के साथ है। कितना प्यार से बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं! और कोई क्या जाने शिवबाबा कब आये? रक्षाबंधन कब हुआ? दैवीगुण धारण कैसे किये? गीता शास्त्र पढ़ते-सुनते हैं परन्तु समझते कुछ भी नहीं। तुम्हारा है ओरली। इसमें शास्त्रों आदि की बात नहीं। भगवान् बैठ सिखलाते है। संगम पर ही सिखाया था। अभी तुम सम्मुख सुनते हो तो नशा चढ़ता है। फिर वह नशा कम नहीं होना चाहिए। यह कोई मनुष्य नहीं पढ़ाते हैं। परमपिता परमात्मा जो ज्ञान का सागर है, वह पढ़ा रहे हैं। ब्रह्माकुमार-कुमारियां सब सुन रहे हैं। सुनकर फिर औरों को सुनाते हो। तुम्हारी एग्रीमेंट है - बाबा से सुनकर फिर सुनायेंगे जरूर। नहीं तो सुना किसलिए है! अब तुम बेहद बाप के बच्चे बने हो। बाप कहते है - मामेकम् याद करो। देह सहित देह के सभी सम्बन्ध आदि छोड़ो। बाप शिव, तुम हो सालिग्राम। बाप और बच्चे। बाप कहते हैं - हम निराकारी, तुम भी निराकारी थे। फिर यहाँ पार्ट बजाने आये हो। अब फिर जाना है वापिस। बाबा ब्रह्माण्ड का मालिक है। तुम भी ब्रह्माण्ड के मालिक थे। जिसको परमधाम, निर्वाणधाम, मूलवतन आदि कहते हैं। यह सब नाम हैं। मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूलवतन - यह सामने चक्र फिरता रहता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) पढ़ाई में मात-पिता को फालो करना है। खुशी में रहना है कि ऊंचे ते ऊंचे धाम से भगवान् हमें पढ़ाने आते हैं।

2) अब हमें वापस स्वीटहोम जाना है, इसलिए अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। देह सहित सब कुछ भूल जाना है।

वरदान:-

संगमयुग पर श्रेष्ठ मत द्वारा श्रेष्ठ गति को प्राप्त करने वाले प्रत्यक्ष फल के अधिकारी भव

संगमयुग पर श्रेष्ठ मत के आधार पर जो श्रेष्ठ कर्म करते हो उसका प्रत्यक्षफल अर्थात् सफलता अभी ही प्राप्त होती है, इसलिए कहते हैं जैसी मत वैसी गत। वो लोग समझते हैं मरने के बाद गति मिलेगी लेकिन आप बच्चों को इस अन्तिम मरजीवा जन्म में हर कर्म की सफलता का फल अर्थात् गति प्राप्त होने का वरदान मिला हुआ है। आप भविष्य की इंतजार में नहीं रहते। अभी-अभी करते और अभी-अभी प्राप्ति का अधिकार मिल जाता - इसको ही कहते हैं रचयिता का रचना से सच्चा प्यार।

स्लोगन:-

दृढ़ संकल्प से हर कदम में बाप को फालो करने वाले ही सम्पन्न बनते हैं।