Articles

08-07-18

08-07-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 19-12-83 मधुबन


परमात्म प्यार - नि:स्वार्थ प्यार

आज स्नेह के सागर बाप अपने स्नेही बच्चों को देख रहे हैं। स्नेही सब बच्चे हैं फिर भी नम्बरवार हैं। एक हैं स्नेह करने वाले। दूसरे हैं स्नेह निभाने वाले। तीसरे हैं सदा स्नेह स्वरूप बन स्नेह के सागर में समाए हुए, जिसको लवलीन बच्चे कहते। लवली और लवलीन दोनों में अन्तर है। बाप का बनना अर्थात् स्नेही, लवलीन बनना। सारे कल्प में कभी भी और किस द्वारा भी यह ईश्वरीय स्नेह, परमात्म प्यार प्राप्त हो नहीं सकता। परमात्म प्यार अर्थात् नि:स्वार्थ प्यार। परमात्म प्यार इस श्रेष्ठ ब्राह्मण जन्म का आधार है। परमात्म प्यार जन्म-जन्म की पुकार का प्रत्यक्ष फल है। परमात्म प्यार नये जीवन का जीयदान है। परमात्म प्यार नहीं तो जीवन नीरस, सूखे गन्ने के मुआफिक है। परमात्म प्यार बाप के समीप लाने का साधन है। परमात्म प्यार सदा बापदादा के साथ अर्थात् परमात्मा को साथी अनुभव कराता है। परमात्म प्यार मेहनत से छुड़ाए सहज और सदा के योगी, योगयुक्त स्थिति का अनुभव कराता है। परमात्म प्यार सहज ही तीन मंजिल पार करा देता है।

1. देहभान की विस्मृति। 2. देह के सर्व सम्बन्धों की विस्मृति। 3. देह की, देह के दुनिया की अल्पकाल की प्राप्ति के आकर्षणमय पदार्थों का आकर्षण सहज समाप्त हो जाता है। त्याग करना नहीं पड़ता लेकिन श्रेष्ठ सर्व प्राप्ति का भाग्य स्वत: ही त्याग करा देता है। तो आप प्रभु प्रेमी बच्चों ने त्याग किया वा भाग्य लिया? क्या त्याग किया? अनेक चत्तियां लगा हुआ वस्त्र, जड़जड़ीभूत पुरानी अन्तिम जन्म की देह का त्याग, यह त्याग है? जिसे स्वयं भी चलाने में मजबूर हो, उसके बदले फरिश्ता स्वरूप लाइट का आकार जिसमें कोई व्याधि नहीं, कोई पुराने संस्कार स्वभाव का अंश नहीं, कोई देह का रिश्ता नहीं, कोई मन की चंचलता नहीं, कोई बुद्धि के भटकने की आदत नहीं - ऐसा फरिश्ता स्वरूप, प्रकाशमय काया प्राप्त होने के बाद पुराना छोड़ना, यह छोड़ना हुआ? लिया क्या और दिया क्या? त्याग है वा भाग्य है? ऐसे ही देह के स्वार्थी सम्बन्ध, सुख-शान्ति का चैन छीनने वाले विनाशी सम्बन्धी, अभी भाई है अभी स्वार्थवश दुश्मन हो जाते, दु:ख और धोखा देने वाले हो जाते, मोह की रस्सियों में बांधने वाले, ऐसे अनेक सम्बन्ध छोड़ एक में सर्व सुखदाई सम्बन्ध प्राप्त करते तो क्या त्याग किया? सदा लेने वाले सम्बन्ध छोड़े, क्योंकि सभी आत्मायें लेती ही हैं, देती नहीं। एक बाप ही दातापन का प्यार देने वाला है, लेने की कोई कामना नहीं। चाहे कितनी भी धर्मात्मा, महात्मा, पुण्य आत्मा हो, गुप्त दानी हो, फिर भी लेता है, दाता नहीं है। स्नेह भी शुभ लेने की कामना वाला होगा। बाप तो सम्पन्न सागर है इसलिए वह दाता है, परमात्म प्यार ही दातापन का प्यार है, इसलिए उनको देना नहीं, लेना है। ऐसे ही विनाशी पदार्थ विषय भोग अर्थात् विष भरे भोग हैं। मेरे-मेरे की जाल में फँसाने वाले विनाशी पदार्थ भोग-भोग क्या बन गये? पिंजड़े के पंछी बन गये ना। ऐसे पदार्थ, जिसने कखपति बना दिया, उसके बदले सर्वश्रेष्ठ पदार्थ देते जो पदमापद्मपति बनाने वाले हैं। तो पदम पाकर, कख छोड़ना, क्या यह त्याग हुआ! परमात्म प्यार भाग्य देने वाला है। त्याग स्वत: ही हुआ पड़ा है। ऐसे सहज सदा के त्यागी ही श्रेष्ठ भाग्यवान बनते हैं।

कभी-कभी बाप के आगे कई लाडले ही कहें, लाड-प्यार दिखाते हैं कि हमने इतना त्याग किया, इतना छोड़ा फिर भी ऐसे क्यों! बापदादा मुस्कराते हुए बच्चों को पूछते हैं कि छोड़ा क्या और पाया क्या? इसकी लिस्ट निकालो। कौन सा तरफ भारी है - छोड़ने का वा पाने का? आज नहीं तो कल जो छोड़ना ही है, मजबूरी से भी छोड़ना ही पड़ेगा, अगर पहले से ही समझदार बन प्राप्त कर फिर छोड़ा तो वह छोड़ना हुआ क्या! भाग्य के वर्णन के आगे त्याग कौड़ी है, भाग्य हीरा है। ऐसे समझते हो ना! वा बहुत त्याग किया है? बहुत छोड़ा है? छोड़ने वाले हो या लेने वाले हो? कभी भी स्वप्न में भी ऐसा संकल्प किया तो क्या होगा? अपने भाग्य की रेखा, मैंने किया, मैंने छोड़ा, इससे लकीर को मिटाने के निमित्त बन जाते इसलिए स्वप्न में भी कब ऐसा संकल्प नहीं करना।

प्रभु प्यार सदा समर्पण भाव स्वत: ही अनुभव कराता है। समर्पण भाव बाप समान बनाता। परमात्म प्यार बाप के सर्व खजानों की चाबी है क्योंकि प्यार व स्नेह अधिकारी आत्मा बनाता है। विनाशी स्नेह, देह का स्नेह राज्य भाग्य गंवाता है। अनेक राजाओं ने विनाशी स्नेह के पीछे राज्य भाग्य गंवाया। विनाशी स्नेह भी राज्य भाग्य से श्रेष्ठ माना गया है। परमात्म प्यार, गंवाया हुआ राज्य भाग्य सदाकाल के लिए प्राप्त कराता है। डबल राज्य अधिकारी बनाता है। स्वराज्य और विश्व का राज्य पाते। ऐसे परमात्म प्यार प्राप्त करने वाली विशेष आत्मायें हो। तो प्यार करने वाले नहीं लेकिन प्यार में सदा समाये हुए लवलीन आत्माएं बनो। समाये हुए समान हैं - ऐसे अनुभव करते हो ना!

नये-नये आये हैं तो नये आगे जाने के लिए सिर्फ एक ही बात का ध्यान रखो। सदा प्रभु प्यार के प्यासे नहीं लेकिन प्रभु प्यार के ही पात्र बनो। पात्र बनना ही सुपात्र बनना है। सहज है ना। तो ऐसे आगे बढ़ो। अच्छा!

ऐसे पात्र सो सुपात्र बच्चों को, प्रभु प्रेम की अधिकारी आत्माओं को, प्रभु प्यार द्वारा सर्वश्रेष्ठ भाग्य प्राप्त करने वाली भाग्यवान आत्माओं को, सदा स्नेह के सागर में समाये हुए बाप समान बच्चों को, सर्व प्राप्तियों के भण्डार सम्पन्न आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

अब समय प्रमाण सकाश देने की सेवा करो (अव्यक्त महावाक्य)

समय प्रमाण अब चारों ओर सकाश देने का, वायब्रेशन देने का, मन्सा द्वारा वायुमण्डल बनाने का कार्य करना है। अब इसी सेवा की आवश्यकता है क्योंकि समय बहुत नाज़ुक आना है इसलिए अपनी उड़ती कला द्वारा फरिश्ता बन चारों ओर चक्कर लगाओ और जिसको शान्ति चाहिए, खुशी चाहिए, सन्तुष्टता चाहिए, फरिश्ते रूप में उन्हें अनुभूति कराओ। वह अनुभव करें कि इन फरिश्तों द्वारा शान्ति, शक्ति, खुशी मिल गई। अन्त:वाहक अर्थात् अन्तिम स्थिति, पावरफुल स्थिति ही आपका अन्तिम वाहन है। अपना यह रूप सामने इमर्ज कर फरिश्ते रूप में चक्कर लगाओ, सकाश दो, तब गीत गायेंगे कि शक्तियां आ गई.... फिर शक्तियों द्वारा सर्व-शक्तिवान स्वत: ही सिद्ध हो जायेगा।

जैसे साकार रूप को देखा, कोई भी ऐसी लहर का समय जब आता था तो दिन-रात सकाश देने, निर्बल आत्माओं में बल भरने का विशेष अटेन्शन रहता था, रात-रात को भी समय निकाल आत्माओं में सकाश भरने की सर्विस चलती थी। तो अभी आप सबको लाइट माइट हाउस बनकर यह सकाश देने की सर्विस खास करनी है जो चारों ओर लाइट माइट का प्रभाव फैल जाए। इस देह की दुनिया में कुछ भी होता रहे, लेकिन आप फरिश्ते ऊपर से साक्षी हो सब पार्ट देखते सकाश देते रहो क्योंकि आप सब बेहद विश्व कल्याण के प्रति निमित्त हो, तो साक्षी हो सब खेल देखते सकाश अर्थात् सहयोग देने की सेवा करो। सीट से उतर कर सकाश नहीं देना। ऊंची स्टेज पर स्थित होकर देना तो किसी भी प्रकार के वातावरण का सेक नहीं आयेगा।

जैसे बाप अव्यक्त वतन, एक स्थान पर बैठे चारों ओर के विश्व के बच्चों की पालना कर रहे हैं, ऐसे आप बच्चे भी एक स्थान पर बैठे कर बाप समान बेहद की सेवा करो। फालो फादर करो। बेहद में सकाश दो। बेहद की सेवा में अपने को बिजी रखो तो बेहद का वैराग्य स्वत: ही आयेगा। यह सकाश देने की सेवा निरन्तर कर सकते हो, इसमें तबियत की बात, समय की बात.. सब सहज हो जाती है। दिन रात इस बेहद की सेवा में लग सकते हो। जब बेहद को सकाश देंगे तो नजदीक वाले भी ऑटोमेटिक सकाश लेते रहेंगे। इस बेहद की सकाश देने से वायुमण्डल ऑटोमेटिक बनेगा।

आप ब्राह्मण आदि रत्न विशेष तना हो। तना से सबको सकाश पहुंचती है। तो कमजोरों को बल दो। अपने पुरुषार्थ का समय दूसरों को सहयोग देने में लगाओ। दूसरों को सहयोग देना अर्थात् अपना जमा करना। अभी ऐसी लहर फैलाओ - देना है, देना है, देना ही देना है। सैलवेशन लेना नहीं है, सैलवेशन देना है। देने में लेना समाया हुआ है। अगर अभी से स्व कल्याण का श्रेष्ठ प्लैन नहीं बनायेंगे तो विश्व सेवा में सकाश नहीं मिल सकेगी इसलिए अभी सकाश द्वारा सबकी बुद्धियों को परिवर्तन करने की सेवा करो। फिर देखो सफलता आपके सामने स्वयं झुकेगी। मन्सा-वाचा की शक्ति से विघ्नों का पर्दा हटा दो तो अन्दर कल्याण का दृश्य दिखाई देगा।

ज्ञान के मनन के साथ शुभ भावना, शुभ कामना के संकल्प, सकाश देने का अभ्यास, यह मन के मौन का या ट्रैफिक कन्ट्रोल का बीच-बीच में दिन मुकरर करो। अगर किसको छुट्टी नहीं भी मिलती हो, सप्ताह में एक दिन तो छुट्टी मिलती है तो उसी प्रमाण अपने-अपने स्थान के प्रोग्राम फिक्स करो। लेकिन विशेष एकान्तवासी और खजानों के एकानामी का प्रोग्राम अवश्य बनाओ क्योंकि अभी चारों ओर मन का दु:ख और अशान्ति, मन की परेशानियां बहुत तीव्रगति से बढ़ रही हैं। बापदादा को विश्व की आत्माओं के ऊपर रहम आता है। तो जितना तीव्रगति से दु:ख ही लहर बढ़ रही है उतना ही आप सुख दाता के बच्चे अपने मन्सा शक्ति से, मन्सा सेवा व सकाश की सेवा से, वृत्ति से चारों ओर सुख की अंचली का अनुभव कराओ। हे देव आत्मायें, पूज्य आत्मायें अपने भक्तों को सकाश दो।

साइन्स वाले भी सोचते हैं ऐसी इन्वेन्शन निकालें जो दु:ख समाप्त हो जाए, साधन सुख के साथ दु:ख भी देता है, सोचते जरूर हैं कि दु:ख न हो, सिर्फ सुख की प्राप्ति हो लेकिन स्वयं की आत्मा में अविनाशी सुख का अनुभव नहीं है तो दूसरों को कैसे दे सकते हैं। आप सबके पास तो सुख का, शान्ति का, नि:स्वार्थ सच्चे प्यार का स्टॉक जमा है, तो उसका दान दो। स्पेशल अटेन्शन रखो कि हमें चारों ओर पावरफुल याद के वायब्रेशन फैलाने हैं। जैसे ऊंची टावर होती है, वह सकाश देती है, उससे लाइट माइट फैलाते हैं, ऐसे ऊंची स्टेज पर रह रोज़ कम से कम 4 घण्टे ऐसे समझो हम ऊंचे ते ऊंचे स्थान पर बैठे विश्व को लाइट और माइट दे रहा हूँ। बापदादा बच्चों से चाहते हैं कि अभी फास्ट सेवा शुरू करें। जो हुआ वह बहुत अच्छा। अब समय प्रमाण औरों को ज्यादा वाणी का चांस दो। अभी औरों को माइक बनाओ, आप माइट बनकर सकाश दो। तो आपकी सकाश और उन्हों की वाणी, यह डबल काम करेगी।

पार्टियों के साथ

प्रश्न:- महा-तपस्या कौन सी है? जिस तपस्या का बल विश्व को परिवर्तन कर सकता है?

उत्तर:- एक बाप दूसरा न कोई यह है महा-तपस्या। ऐसी स्थिति में स्थित रहने वाले महातपस्वी हुए। तपस्या का बल श्रेष्ठ बल गाया जाता है। जो इस तपस्या में रहते - एक बाप दूसरा न कोई, उनमें बहुत बल है। इस तपस्या का बल विश्व परिवर्तन कर लेता है। हठ योगी एक टांग पर खड़े होकर तपस्या करते हैं लेकिन आप बच्चे एक टांग पर नहीं, एक की स्मृति में रहते हो, बस एक ही एक। ऐसी तपस्या विश्व परिवर्तन कर देगी। तो ऐसे विश्व कल्याणकारी अर्थात् महान तपस्वी बनो। अच्छा।

वरदान:-

समर्थ संकल्पों द्वारा जमा का खाता बढ़ाने वाले होलीहंस भव

जैसे हंस कंकड़ और रत्न को अलग करते हैं, ऐसे आप होलीहंस अर्थात् समर्थ और व्यर्थ को परखने वाले। जैसे हंस कभी कंकड़ को चुग नहीं सकते, अलग करके रख देते, छोड़ देते, ग्रहण नहीं करते। ऐसे आप होलीहंस व्यर्थ को छोड़ समर्थ संकल्पों को धारण करते हो। व्यर्थ तो बहुत समय सुना, बोला किया लेकिन उसके परिणाम में सब कुछ गंवाया। अब गंवाने वाले नहीं, जमा का खाता बढ़ाने वाले हो।

स्लोगन:-

स्वयं को ईश्वरीय मार्यादाओं के कंगन में बांध लो तो सर्व बंधन समाप्त हो जायेंगे।