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27-07-2018

27-07-2018 प्रात:मुरलीओम् शान्ति"बापदादा"' मधुबन


''मीठे बच्चे - इस ज्ञान में गम्भीरता का गुण धारण करना बहुत जरूरी है, कभी भी अपना अभिमान नहीं आना चाहिए, माताओं का रिगार्ड रखो''

प्रश्न:

सभी बच्चों के प्रति बाप की आश क्या है? वह आश पूरी कब कर सकेंगे?

उत्तर:

बाप की आश है - बच्चे ऐसा पुरुषार्थ करें जो नर से नारायण बनकर दिखायें। इसमें ही बाप का शो होगा। ऐसा शो निकालो जो बाप का भी गायन हो तो बच्चों का भी गायन हो। बाबा कहे - बच्चे, अगर तुम नर से नारायण बनेंगे तो तुम्हारा भी मन्दिर बनेगा और हमारा भी बनेगा। ऐसा पूज्य बनने लिए फॉलो फादर। अपने आपसे प्रण करो - हम पूरा ही फॉलो करेंगे।

गीत:-

जिस दिन से मिले हम तुम........   

ओम् शान्ति।

बच्चे महसूस करते हैं - बच्चों को भासना आती है। तो जरूर हम नई दुनिया के लिए सब नई बातें सुनते हैं। यह हमारी प्रीत नई लगती है। और कोई की भी प्रीत सम्मुख परमपिता परमात्मा साथ होती ही नहीं। तो यह नई बात है ना। तुम जानते हो बाबा पतित-पावन है। पुरानी दुनिया को पतित, नई दुनिया को पावन कहेंगे। तो तुम्हारी प्रीत नई दुनिया से लगेगी। तुम यह जानते हो हमारी प्रीत अब नई दुनिया स्वर्ग से है। उसको शिवालय कहा जाता है, इनको वेश्यालय कहा जाता है। बरोबर यहाँ विकारी मनुष्य हैं। सतयुग में निर्विकारी हैं तो शिवालय कहेंगे ना। शिवबाबा ही ऐसी निर्विकारी दुनिया स्थापन करते हैं। और जानते हो बरोबर इस पुरानी दुनिया में देवताओं के चित्र हैं जो देवतायें नई दुनिया में रहने वाले हैं। भारतवासी तो सब भूल गये वह तो हिन्दुस्तान कह देते हैं। हिन्दुस्तान हमारा प्यारा, हाँ, जरूर प्यारा था। परन्तु वास्तव में हिन्दुस्तान नाम है नहीं। भारतखण्ड कहा जाता है। तो बच्चे जानते हैं बरोबर यह नई बातें लगती हैं। ऐसी बातें कब नहीं सुनी। यह ज्ञान सारी दुनिया से निराला है। भारतवासियों के मन्दिर भी बहुत हैं। क्रिश्चियन की एक ही चर्च होगी। फिर करके अलग-अलग चर्च बनायेंगे। सतयुग में तो कोई मन्दिर नहीं होता क्योंकि चैतन्य देवताओं का राज्य चलता है। देवतायें शिवालय नई दुनिया में राज्य करते थे। तुम जानते हो अब हम नई दुनिया में जा रहे हैं। यह भी ख्याल कभी नहीं करना कि बाबा ने यह नया मकान बनाया है। वास्तव में पुरानी दुनिया में यह भी पुराना ही है। हमारी प्रीत अब नई दुनिया से लगी है। आत्माओं की परमात्मा साथ प्रीत लगी है, जो सम्मुख बैठे हैं। मनुष्य समझते हैं - ब्रह्माकुमार-कुमारियों की ब्रह्मा से प्रीत लगी है। तुम जानते हो हमारी प्रीत एक शिवबाबा से है। दूसरा न कोई। भल तुम्हारा नाम बी.के. है परन्तु ब्रह्मा से प्रीत नहीं है। यह ब्रह्मा तो देहधारी है ना। जन्म-मरण में आते हैं। तुमको देह से संबंध नहीं जोड़ना है। वह गुरू लोग तो अपना नाम रख देते हैं - सच्चिदानंद। परन्तु सत-चित-आनंद स्वरूप तो एक परमात्मा को ही कहा जाता है। आत्मा सत-चित-आनंद रूप, शान्त रूप, ज्ञान रूप थी। अब तुम फिर से इस संगम पर बनते हो। जैसे बाप की महिमा है ज्ञान का सागर, शान्ति का सागर........ तुम भी सत-चित-आनंद रूप हो। बीज और झाड़ को याद करने से सारा ज्ञान आ जाता है। बरोबर 5 युग हैं। अभी है संगमयुग। इस संगमयुग को दुनिया नहीं जानती। करके मालूम भी हो परन्तु डिटेल में नहीं जानती कि सतयुग में कौन राज्य करते थे? कैसे राज्य लिया? तुम अब राज्य ले रहे हो। पुनर्जन्म लेते चक्र में तो जरूर आना पड़े। सदैव स्वर्ग में कोई रह न सके। स्वर्ग और नर्क की पहचान अभी मिली है। अभी कलियुग है फिर सतयुग जरूर होगा। तो जरूर संगम पर ही परमपिता परमात्मा आया होगा। उनकी महिमा ही अलग है। ऐसे थोड़ेही कि एक की महिमा दूसरे कोई की हो सकती। हर एक का कर्तव्य अपना, संस्कार अपने, एक न मिले दूसरे से। हर एक आत्मा में अपना-अपना पार्ट है। तुम बच्चों को समझाया गया है - आत्मा 84 जन्म लेती है। तुम नई बातें सुनते हो। दुनिया समझती है गीता का भगवान् कृष्ण था। अब बाप कहते हैं कृष्ण गीता का भगवान् नहीं था। भगवानुवाच - मैं राजयोग सिखाए तुमको राजाओं का राजा अर्थात् नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनाता हूँ। बाबा पूछते भी हैं तुम सूर्यवंशी नारायण बनेंगे या चन्द्रवंशी राम बनेंगे? कहते हैं बाबा एम ऑब्जेक्ट तो सूर्यवंशी बनने की हैं। नम्बरवार तो होते हैं ना। बैरिस्टर कोई बहुत अच्छा, कोई हल्का होता है। कोई सर्जन तो लाखों रूपया कमाते, कोई बहुत थोड़ा कमाते। पढ़ाई पर मदार रहता है। तुम्हारे में भी कोई तो बहुत कमाई वाले बनेंगे, तख्त पर बैठेंगे। यह बड़ा बेहद का ईश्वरीय कॉलेज है। उन कॉलेजों में हद होती है। इतने पास होंगे, यह है बेहद का कालेज। तो तुम नई बातें सुनते हो। अभी तुम समझ रहे हो - तुम अबलाओं को बल देने वाला वह परमपिता परमात्मा ही है। जानते हो परमात्मा बाप से हमको कितना बल मिलता है। हम वारियर्स (सेना) हैं। युद्ध के मैदान में खड़े हैं। नई बात है ना। गीता में पाण्डवों और कौरवों की लड़ाई दिखाई है परन्तु लड़ाई की तो बात है नहीं। हर एक बात नई है। कृष्ण भगवान् नहीं, वह तो नई दुनिया का अल्फ़ है। अल्फ़ से लेकर सब नई बातें हैं। नई दुनिया का अल्फ़ है लक्ष्मी-नारायण फिर उनके पीछे उनके बच्चे। तो लक्ष्मी-नारायण हैं सतयुगी मनुष्य सृष्टि के अल्फ़। यहाँ मनुष्य सृष्टि का रचयिता अल्फ़ ब्रह्मा है। पहले-पहले है परमपिता परमात्मा अल्फ़। पीछे ब्रह्मा को अल्फ़ बनाते हैं। फिर लक्ष्मी-नारायण को अल्फ़ बनाते हैं। यहाँ तुम ब्राह्मण कुल के हो। ब्राह्मण कुल का बड़ा ब्रह्मा ही गाया जाता है। ब्राह्मण तो भल वह भी हैं परन्तु ब्रह्माकुमार-कुमारियां नाम कभी नहीं सुना है। गीता में भी यह नाम नहीं है। तो नई बात है ना। भारत को हिन्दुस्तान कहने कारण हिन्दु धर्म कह देते हैं। अपने प्राचीन धर्म की पहचान नहीं है। जैसेकि देवता धर्म है ही नहीं। अपने धर्म को न जानने कारण कहते हैं सब धर्म एक ही हैं। भल सब धर्म यहाँ रह सकते हैं, जिसको चाहे सो रहे, फ्री है। सभी धर्मों को मान देते हैं। कोई भी धर्म वाला आकर रह सकता है। बाहर में देखो वह दूसरे धर्म वालों को निकालते रहते हैं। सीलॉन, बर्मा आदि से इन्डियन को निकालते रहते हैं। भारत तो वास्तव में प्राचीन देवी-देवता धर्म वाला है। परन्तु वह तो कहते कोई भी आकर रहे। सब इकट्ठे तो रह न सकें। जहाँ-तहाँ धर्मों की बहुत खिटपिट है। कहते हैं भारत सभी धर्मों को एशलम देगा, इसलिए भारत की महिमा है। अब तुम सभी नई बातें सुनते हो। इस समय भारत में देवी-देवता धर्म का कोई है नहीं। हम उस नई दुनिया के लिए पुरुषार्थ कर रहे हैं। शिवबाबा स्वर्ग रचते हैं। यूँ तो ब्रह्मा की सन्तान सब हैं परन्तु ब्राह्मण ख़ास गाये हुए हैं। उनको कब रचा? जरूर संगम पर रचा। वर्ण भी अच्छी रीति दिखाने हैं। हम ब्राह्मण चोटी फिर देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बनते हैं। तो यह ज्ञान बड़ा गुह्य रमणीक है। मुश्किल किसकी बुद्धि में बैठता है।



तुम बच्चे इस ज्ञान को अच्छी रीति धारण करो, कभी भी ब्राह्मणी से रूठना नहीं। रूठ करके पढ़ाई को नहीं छोड़ना है। नहीं तो रसातल में चले जायेंगे। बाप आया है सुनाने तो सुनना चाहिए। भक्ति मार्ग में कितना नियम होता है गीता सुनने का, वह पूरे नेम से सुनते हैं। मन्दिर में भी नेम पूर्वक जाते हैं। रोज़ पक्का नेम रखते हैं। तुम्हारा नेम तो बड़ा कड़ा है। एक घड़ी आधी घड़ी........ फिर बढ़ाते रहना है। बाबा को याद करने से बुद्धि का ताला खुलेगा। विचार सागर मंथन कोई शिवबाबा नहीं करते हैं, उनको दरकार ही नहीं विचार सागर मंथन की। तुमको दरकार रहती है - किसको कैसे समझायें? तो कभी भी रूठना नहीं चाहिए। एक दो का रिगॉर्ड रखना चाहिए। कई बच्चों को महारथियों का रिगॉर्ड रखना आता नहीं। ब्राह्मणियां जो हैं वह फिर भी मुख्य हैं। 10-12 को आपसमान तो बनाती हैं ना। तो उनका रिगॉर्ड रखना पड़े। तुम जैसेकि शिवबाबा के एजेन्ट हो। सभी एजेन्ट्स एक जैसे तो नहीं होते हैं। नम्बरवार होते हैं फिर भी एजेन्ट्स तो हैं ना। कोई तो बहुत अच्छी रीति धारणा करते हैं। रात-दिन सर्विस में तत्पर रहते हैं। शिवबाबा भी यहाँ सर्विस पर आये हैं ना। बाबा कहते हैं मैं डबल काम करता हूँ। भक्तों की भी सर्विस करता हूँ। तुम जानते हो सारी दुनिया में साक्षात्कार कराने का कर्तव्य कौन करते हैं? भल ड्रामा में सब पहले से नूँध है। उसी समय साक्षात्कार होता है। समझते हैं गॉड फादर ने दिव्य दृष्टि से साक्षात्कार कराया, जहाँ-तहाँ साक्षात्कार होते हैं। यह साक्षात्कार भी ड्रामा में नूँध है, इसमें बड़ी विशालबुद्धि चाहिए। यह हैं नई बातें। सृष्टि का चक्र बुद्धि में फिरना चाहिए। कोई-कोई का यह स्वदर्शन चक्र अच्छा तीखा फिरता है, कोई का कम। तुम स्वदर्शन चक्रधारी हो। सर्विस के लिए बुद्धि चलती रहेगी नम्बरवार। कोई का तो स्वदर्शन चक्र फिरता ही नहीं। हवा तो लगती है परन्तु कोई का बहुत तीखा फिरता है, कोई का बहुत कम फिरता है। कोई का तो बिल्कुल फिरता ही नहीं। स्वदर्शन चक्र नहीं फिरेगा तो बाकी क्या पद पायेंगे? तो यह नई बात हुई ना। बाप समझाते रहते हैं वर्सा लेना है तो अभी लो। नहीं तो फिर पछतायेंगे, रोयेंगे। टीचर का शो करना है ना। यह कितना बड़ा कॉलेज है। अच्छी रीति पढ़ते हैं तो पद भी अच्छा पाते हैं। प्रण करना चाहिए - हम पूरा फॉलो करेंगे। फॉलो मदर-फादर। ऐसे भी नहीं है बैरिस्टर का बच्चा बैरिस्टर ही बनेगा। नहीं। कोई डाक्टर बनेगा, कोई इन्जीनियर, कोई तो शैतान डाकू भी निकल पड़ते हैं। बाप कहते हैं मेरा शो निकालने तुम नर से नारायण बनकर दिखाओ। मेरा भी गायन होगा, तुम्हारा भी गायन होगा। तुम भी देवता बनेंगे। हमारा मन्दिर बनेगा तो तुम्हारा भी बनेगा। मुख्य मन्दिर होना चाहिए एक शिवबाबा का। फिर उनके साथ ब्रह्मा और बच्चे। देलवाड़ा मन्दिर में वैराइटी है ना। यही बड़े ते बड़ा यादगार है। तुम चैतन्य में बैठे हो। शक्ति की शेर पर सवारी, महारथी की हाथी पर सवारी दिखाते हैं। गज को ग्राह ने हप किया। बाप की याद नहीं रहती है तो माया ग्राह हप कर लेता है। अच्छे-अच्छे महारथियों को भी माया ग्राह खा लेती है। इसमें बड़ी गम्भीरता चाहिए और अभिमान नहीं आना चाहिए - मैं यह करता हूँ। जितना हो सके हर बात में माताओं को आगे रखना है। माता का रिगॉर्ड रखना है। सब चाबी माता के हाथ में होनी चाहिए। माता द्वारा समाचार आना चाहिए। हाँ, कहाँ-कहाँ कन्या अथवा माता से कुमार होशियार होते हैं। उनको फिर राय लिखनी है। हुक्म सरकार का राज्य रानी का है। पहले रानी, फिर राजा। पहले माता गुरू चाहिए। पुरुष को गुरू बनने का कायदा नहीं। माता को आगे करना है। लॉ ऐसे कहता है। भल कहाँ पुरुष भी निमित्त बनते हैं, जो माताओं को ज्ञान में ले आते हैं परन्तु मैजॉरिटी माताओं की है। अहंकार नहीं होना चाहिए - मैं सब जानता हूँ, मैं होशियार हूँ। होशियार माताओं को बनाना है। माता द्वारा सेन्टर आदि चलाना है। अन्त में सन्यासी आदि को भी माताओं के ही बाण लगने हैं। तो कायदेसिर चलना है। परमपिता परमात्मा की निंदा करने वाले ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। बाबा सावधान सबको करते हैं। बहुत मीठा बनना है। कोई की बात पसन्द नहीं आती है तो एक कान से सुन दूसरे से निकाल दो। क्रोध बहुत नुकसान करता है। कोई-कोई लिखते हैं - काम से क्रोध को क्यों नहीं तीखा रखें। परन्तु नहीं। काम तो आदि-मध्य-अन्त दु:ख को प्राप्त कराता है। पतित पावन एक ही बाप गाया हुआ है। सन्यासी पावन नहीं बना सकते। तो तुम नई बातें सुनते हो ऊंच ते ऊंच भगवान् बैठ तुमको पढ़ाते हैं। उनको ही श्री श्री कहा जाता है। फिर मनुष्य सृष्टि में श्री लक्ष्मी, श्री नारायण, श्री राम, श्री सीता को कहते हैं। अच्छा, उन्हों को ऐसा श्रेष्ठ किसने बनाया? श्री श्री शिवबाबा ने। अच्छा!



मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

आपस में एकमत होकर रहना है। एक दो को रिगॉर्ड देना है। रूठकर कभी भी पढ़ाई नहीं छोड़नी है।

क्रोध बहुत नुकसान-कारक है इसलिए जो बात पसन्द नहीं आती है, उसे एक कान से सुन दूसरे से निकाल देना है। क्रोध नहीं करना है। बहुत-बहुत मीठा बनना है।

वरदान:

बाह्यमुखता के रसों की आकर्षण के बन्धन से मुक्त रहने वाले जीवनमुक्त भव

बाह्यमुखता अर्थात् व्यक्ति के भाव-स्वभाव और व्यक्त भाव के वायब्रेशन, संकल्प, बोल और संबंध, सम्पर्क द्वारा एक दो को व्यर्थ की तरफ उकसाने वाले, सदा किसी न किसी प्रकार के व्यर्थ चिन्तन में रहने वाले, आन्तरिक सुख, शान्ति और शक्ति से दूर.....यह बाह्यमुखता के रस भी बाहर से बहुत आकर्षित करते हैं, इसलिए पहले इसको कैंची लगाओ। यह रस ही सूक्ष्म बंधन बन सफलता की मंजिल से दूर कर देते हैं, जब इन बंधनों से मुक्त बनो तब कहेंगे जीवनमुक्त।

स्लोगन:

जो अच्छे बुरे कर्म करने वालों के प्रभाव के बन्धन से मुक्त साक्षी व रहमदिल है वही तपस्वी है।