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22-09-2018

22-09-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - संगदोष से तुम्हें बहुत सम्भाल करनी है क्योंकि संगदोष में आने से ही उल्टे कर्म होते हैं, बाप की याद भूल जाती है''

प्रश्नः-

किस फ़ज़ीलत (मैनर्स) के आधार पर तुम बच्चे अपनी अवस्था को आगे बढ़ा सकते हो?

उत्तर:-

अगर कभी कोई भूल हो जाती है तो बाप से क्षमा मांगने की भी फ़ज़ीलत चाहिए। बाप को कहना चाहिए आई एम सॉरी। इसमें जरा भी देह-अभिमान न आये, इससे अवस्था आगे बढ़ती रहेगी। चढ़ती कला का आधार है - बाप से सच्ची दिल। कभी भी अपने को मिया मिट्ठू नहीं समझना है। भूलें हर एक से हो सकती हैं क्योंकि अभी तक कोई परिपूर्ण नहीं बने हैं।

गीत:-

हमें उन राहों पर चलना है........  

ओम् शान्ति।

कुछ तो कहना पड़ता है, उस हिसाब से ओम् शान्ति कहना अच्छा है। आत्मा को अपना स्वधर्म बताना होता है। बाप भी कहते हैं हम शान्त हैं। शान्ति देश के रहने वाले हैं। तुम भी असुल आत्मा हो। तुम्हारा स्वधर्म शान्त है। सारी दुनिया शान्ति-शान्ति करती रहती है परन्तु शान्ति किसको कहा जाता है, यह कोई नहीं जानते। समझते हैं कि यह लड़ना-झगड़ना जो चलता है वह शान्त हो जाए। परन्तु वह शान्ति तो कोई काम की नहीं। घर में स्त्री-पुरुष होते हैं, कोई तो झगड़ते हैं, कोई झगड़ते नहीं हैं। वह कोई शान्ति हुई क्या? शान्ति और चीज़ है। शान्ति तो आत्मा का स्वधर्म है। वैसे ही बाप का भी स्वधर्म है शान्त। आत्माओं का बाप कौन है? परमपिता परमात्मा। उनका धर्म क्या है? उनका भी धर्म है शान्त। परमपिता परमात्मा शान्त देश में रहने वाला है। हम भी शान्त देश में रहने वाले हैं। कोई भी आये तो बोलो - तुम्हारा स्वधर्म तो शान्त है ना। तुम असुल वहाँ के रहने वाले हो, यहाँ आये हो पार्ट बजाने। शरीर द्वारा पार्ट तो बजाना ही है। शान्ति के लिए वास्तव में जंगल आदि में जाने की भी दरकार नहीं है। आत्मा को अपने स्वधर्म का पता है। आत्मा थक जाती है तो रात को अशरीरी हो शान्त हो जाती है। रात को कितना सन्नाटा रहता है। सुबह होने से आवाज़ शुरू हो जाता है। वह हुई हद की रात और दिन। अभी तो है बेहद का दिन और रात। आत्मा 84 जन्मों का पार्ट बजाकर थक जाती है, इसलिए कहते हैं अब वापिस शान्तिधाम जाना है। बाप भी कहते हैं शान्तिधाम और सुखधाम को याद करो। सुखधाम में बैठ थोड़ेही याद किया जाता है। याद किया जाता है दु:खधाम में, अशान्तिधाम में। तो अब बाप कहते हैं - बच्चे, अब नाटक पूरा हुआ है, तुमको घर चलना है, फिर तुम्हारे लिए शान्ति भी है, तो सुख भी है।

बाप कहते हैं मैं पण्डा हूँ, तुमको वापिस सच्ची यात्रा पर ले जाने आया हूँ। शान्तिधाम का पण्डा एक बनता है वा उनके बच्चे बनते हैं। एक से तो काम नहीं होगा। कितनी बड़ी सेना है। सभी का मुख है शान्तिधाम तरफ। वह है परे ते परे धाम। बद्रीनाथ, अमरनाथ जाना कोई दूर नहीं। वहाँ जाना तो बड़ा सहज है। अच्छा, बताओ मूलवतन-सूक्ष्मवतन जाना सहज है या अमरनाथ बद्रीनाथ जाना सहज है? सूक्ष्मवतन-मूलवतन नज़दीक है या अमरनाथ, बद्रीनाथ नजदीक है? देखने में तो मूलवतन-सूक्ष्मवतन परे ते परे है। परन्तु वहाँ जाने में देरी नहीं लगती है, सेकण्ड की बात है। तुम सिर्फ बुद्धि से याद करो। वह जिस्मानी यात्रायें तो कोई नई बात नहीं। आधाकल्प वह यात्रा करते आये हो। यह रूहानी यात्रा तुमको एक ही बाप आकर कराते हैं। तुम हो सिकीलधे बच्चे। तुमको तो रास्ता बताना है। तुम मन्दिरों में जाकर समझाओ यह देवी-देवतायें कब राज्य करते थे, इनको ऐसा पूज्य किसने बनाया? तुम जानते हो हम पूज्य थे, फिर पुजारी बने हैं। तो पुजारी का दर्जा कम हुआ ना। पूज्य ऊंच हैं। बाप पूज्य बनाते हैं। तुम पूज्य देवी-देवता थे फिर पुजारी बनें, अब पूजा को छोड़ फिर पूज्य बनना है। माया के भी बहुत विघ्न पड़ते हैं। अबलाओं पर कितने अत्याचार होते हैं। और यात्राओं पर जाने अथवा मन्दिरों में, सतसंगों में जाने के लिए कोई रोकते नहीं। यहाँ पुजारी से पूज्य बनने में माया कितना हैरान करती है। घड़ी-घड़ी गिर पड़ते हैं। बहुत करके गिरते हैं काम के खड्डे में। बाप कहते हैं मूत पलीती मत बनो, इनसे सम्भलना है। सबसे गंदा है काम चिता पर चढ़ना, विषय सागर में गोता खाना। बाप कहते हैं - बच्चे, काम महाशत्रु है, इसलिए कभी भी विकार में जाने का संकल्प भी नहीं करना, इससे ही गंदे बन पड़ते हैं। ऐसे मत समझो यहाँ जो आते हैं तो उनकी बुद्धि विष से निकल जाती है। कोई-कोई ऐसे भी हैं जो एक-दो को देखते हैं तो अन्दर तूफान चलता है गन्दा बनने लिए। बाप कहते हैं कभी गंदा नहीं बनना, कोई का पीछा नहीं करना है। कभी विकार में गिरने का पुरुषार्थ नहीं करो। बाप इससे बचाते रहते हैं। सम्भलने और गिरने की कितनी चटा-भेटी चलती है। माया कितना तूफान मचाती है। कितना अच्छा व़फादार, आज्ञाकारी, सर्विसएबुल बच्चा था, माया ने ऐसी चमाट मारी जो एकदम ख़त्म हो गये, मर गये, यह ड्रामा। गन्दा माया बनाती है। आधा-कल्प दु:ख देने वाली माया है, बाप नहीं। मुफ्त में दोष धरते हैं कि ईश्वर ही दु:ख, सुख देते हैं। ईश्वर को बाप नहीं समझते। परमात्मा कभी किसको दु:ख कैसे देंगे। परमात्मा दु:ख दे तो बाकी मनुष्य तो एक-दो में बड़ा ही दु:ख देंगे। बाप समझाते हैं तुम ही अपने लिए ऐसे कर्म बनाते हो। संगदोष में भी उल्टे कर्म कर लेते हो। बाप को भूल जाते हो। साधारण है ना। तो बच्चे भूल जाते हैं। बाप तो शिक्षा अच्छी ही देंगे, परन्तु उसको भूल जाते हैं। बाप समझाते हैं योग पूरा नहीं है। ऐसे मत समझो भाषण करने वाले हैं। पण्डित की एक कथा है ना, औरों को कहा राम-राम कहने से नदी पार हो जायेंगे। खुद पार हो न सका। बोला बोट (नाव) ले आओ तो चलें। जो खुद कहता था, वह कर नहीं सका। सिर्फ कहना नहीं है परन्तु करना है। कथनी, करनी, रहनी सब समान हो, इसलिए बाप को मत भूलो। बाबा अभुल बनाते हैं। बाप कहते हैं कोई भी भूल हो जाए तो आकर माफी मांगो - आई एम सॉरी। समझो, शिवबाबा कहते हैं यह तुम्हारी भूल है। अच्छा, बाबा हम क्षमा चाहते हैं। यह भी अच्छे-अच्छे बच्चों में फ़ज़ीलत नहीं रहती है। इतनी बड़ी भूल की, माफी तो मांगे। अपने को बहुत मिया मिट्ठू समझते हैं। पाप करते हैं तो क्षमा लेनी चाहिए। नहीं तो उसकी वृद्धि होती रहती है। बाप के साथ बुद्धियोग बड़ा अच्छा चाहिए। भल भाषण तो बहुत अच्छा-अच्छा करते हैं परन्तु सम्पूर्ण कोई बना नहीं है। अन्त तक गिरते सम्भलते रहेंगे। कहते हैं - बाबा, हमसे यह भूल हो गई, आप क्षमा करना। रहमदिल क्षमा करो। भक्ति मार्ग में सारा दिन क्षमा-क्षमा करते रहते हैं। बाप को कहते हैं क्षमा करो। धर्मराज द्वारा फिर दण्ड नहीं दिलाना, इसलिए ख़बरदारी बहुत चाहिए। ऐसे मत समझो कि हम 16 कला सम्पूर्ण बन गये हैं, नहीं। बहुत बच्चे लिखते हैं बाबा अशुद्ध स्वप्न बहुत आते हैं। बाबा की याद ही नहीं ठहरती है। मिया-मिट्ठू नहीं बनना है। अन्त में 16 कला सम्पूर्ण बनेंगे। अभी तो ग्रहण लगा हुआ है। तुम्हारी वह अवस्था आनी है। यहाँ बैठे बैठे उड़ते रहेंगे। आत्मा को खींच होती है क्योंकि कल्प की थकी हुई है तो आतुरवेला (जल्दी) होती है - जल्दी-जल्दी जाऊं। परन्तु लायक भी बनना पड़े ना। कोई तो यहाँ ही घूमने-फिरने, जेवर पहनने आदि में खुश हो जाते हैं, फिर दु:खी होते हैं, तो कहते हैं नाहेक बाबा को छोड़ा। अच्छा, फिर हिम्मत करो, कुछ सीखो। अपकार करने वालों पर भी उपकार करना है। परन्तु ऐसे भी नहीं और ही माथा खराब कर दे। माया गिराती है, बाप उठाते हैं। मंज़िल है ऊंची और यह है सारी बुद्धियोग की यात्रा। पुरुषार्थ में टाइम लगता है। लक्ष्य तो बहुत सहज है। एक सेकेण्ड में तुम जीवनमुक्ति के अधिकारी बन जाते हो। एक बार बाबा कहा फिर भूलते क्यों हो? निश्चय है बाबा से स्वर्ग का वर्सा लेते हैं फिर गिरते क्यों हो? याद कर सम्भलते क्यों नहीं हो? अच्छे-अच्छे बच्चे भूल जाते हैं। फिर और ही डिस-सर्विस होती है। सर्विस भी गुप्त है तो डिससर्विस भी गुप्त है। दुनिया को क्या पता? किसमें कोई भी भूत प्रवेश होगा वा अशुद्ध सोल का प्रवेश है तो वह भी नुकसान कर देते हैं। मायावी सोल प्रवेश कर लेती है। भल ज्ञान है परन्तु परिपूर्ण कोई नहीं है। कोई न कोई ख़ामी रहती है तो डर होना चाहिए। हमको बाबा की श्रीमत पर चलना है। अगर श्रीमत पर न चले, कोई भ्रष्ट काम किया तो पद भी भ्रष्ट होगा और सज़ायें भी बहुत खायेंगे। कर्मों का फल यहाँ भी बड़ा कड़ा भोगना पड़ता है इसलिए कर्मातीत अवस्था का पुरुषार्थ करना है।

बाबा के साथ बड़ा सच्चा रहना है। सबका शिवबाबा से कनेक्शन है। सेन्टर्स सब शिवबाबा के हैं। तुम्हारा सेन्टर फिर कहाँ से आया? तुम शिवबाबा के हो। विश्व-विद्यालय बाप का है ना। ईश्वरीय विश्व-विद्यालय। मेरा यह सेन्टर है - यह ख्याल आया और मरा। ऐसे मेरा-मेरा करते कितने गिर पड़ते हैं। सब कुछ शिवबाबा का है। तुम कहते हो - बाबा, यह तन-मन-धन सब आपका है। तो बाबा भी कहते हैं - स्वर्ग की राजाई सारी तुम्हारी है। कितना एवज़ा मिलता है। तुम क्या देते हो? मरने से पहले करनीघोर को देते हैं ना। जीते जी दान करते हैं। देखते हैं - बस, होपलेस केस है तो दान-पुण्य कराते हैं। बाप भी कहते हैं - बच्चे, जीते जी कर लो, यह तो पुराना तन है। तुम आत्मायें मेरी हो। यह शरीर पार्ट बजाते-बजाते अब पुराना हो गया है। अब फिर मेरे बनो तो तुम्हारी आत्मा और शरीर दोनों शुद्ध बनेंगे। दोनों इकट्ठे साफ होते जाते हैं। आत्मा जो अपवित्र बनी है, उनको शुद्ध बनाना है। मेरे साथ योग लगाने से ही शुद्ध बनेंगे। योग रखेंगे तो चढ़ती कला होगी, योग नहीं रखेंगे तो गिरती कला हो जायेगी। सर्विस का शौक चाहिए। पूछना नहीं है सर्विस पर जायें। बाबा समझते हैं शौक नहीं है। मन्सा-वाचा-कर्मणा सर्विस का शौक चाहिए। मन्सा नहीं तो वाचा वा कर्मणा कोई न कोई सर्विस में लग जाना चाहिए तो उज़ूरा मिलेगा। आपेही जो करे सो देवता, कहने से करे सो मनुष्य, कहने से भी न करे तो कोई काम का नहीं। जितना सर्विस करेंगे उतना फल मिलना है।

शिवबाबा पूछते हैं - बच्चे, मेरे को हाथ हैं? इस तन में शिवबाबा बैठे हैं ना। चिट्ठी लिखते हैं ना। बैल पर सारा दिन थोड़ेही सवारी करेंगे। बैल जब थक जाते हैं तो उनकी आंखों में पानी आ जाता है। यहाँ तो आंसू आने की बात नहीं। इनको तो सर्विस करनी ही है। बच्चों को समझाते हैं मामेकम् याद करो। यह शिवबाबा कहते हैं, इनकी आत्मा भी सुनती है। यह तो बिल्कुल सहज है। बेहद का बाप है ही स्वर्ग का रचयिता। बाबा आते हैं स्वर्ग की स्थापना, नर्क का विनाश कराने। महाभारत लड़ाई भी सामने खड़ी है। यादव, कौरव, पाण्डव भी हैं। तुम जानते हो अब खेल पूरा होता है। बाबा लेने आया है। सिर पर विकर्मों का बोझा बहुत है। याद नहीं करेंगे तो महारानी-महाराजा नहीं बन सकेंगे। है ही यह राजयोग, न कि प्रजा योग। योग पूरा नहीं लगाते हैं तो प्रजा बन पड़ते हैं। कहते हैं - बाबा, हम पूरा वर्सा लेंगे। तो सर्विस का शौक चाहिए। लिखकर पूछ सकते हो - अगर इस समय हमारा शरीर छूट जाये तो हम क्या बनेंगे? परिपूर्ण तो अन्त में बनेंगे। अभी तुम अपूर्ण हो। अपनी अवस्था की जांच करनी है - हम कितना बाबा की सर्विस पर हैं? कितना आज्ञाकारी, व़फादार हैं? कितना सर्विस के लिए तड़फते हैं कि कोई को जाकर जीयदान करें? बिचारे बहुत दु:खी हैं। यह एक ही सतगुरू है - शान्तिधाम-सुखधाम ले जाने आये हैं। वह गुरू लोग अपने को जगत पिता, जगत शिक्षक कह न सकें, सिर्फ जगत गुरू कहलाते हैं। यह तो जगत का बाप, टीचर, गुरू एक ही है। तुम जानते हो बाप आया है तो बाप से पूरा वर्सा लो। देह-अभिमान अच्छा नहीं है। देही-अभिमानी बन बाप को याद करो फिर तुम्हारी निरोगी काया बन जायेगी। वहाँ तो पवित्रता, सुख, शान्ति, सम्पत्ति है। अथाह सम्पत्ति है। यहाँ तो देखो, पेट के लिए मारामारी है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) रूहानी पण्डा बन सच्ची यात्रा करनी और करानी है। बुद्धियोग की बहुत सम्भाल करनी है। अपने ऊपर बहुत ख़बरदारी रखनी है।

2) बाप के साथ सच्चा रहना है। कर्मातीत बनने का पुरुषार्थ करना है। जीते जी सब बाप के हवाले कर सफल कर लेना है।

वरदान:-

स्वयं को संगमयुगी समझ व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करने वाली समर्थ आत्मा भव

यह संगमयुग समर्थ युग है। तो सदा यह स्मृति रखो कि हम समर्थ युग के वासी, समर्थ बाप के बच्चे, समर्थ आत्मायें हैं, तो व्यर्थ समाप्त हो जायेगा। कलियुग है व्यर्थ, जब कलियुग का किनारा कर चुके, संगमयुगी बन गये तो व्यर्थ से किनारा हो ही गया। यदि सिर्फ समय की भी याद रहे तो समय के प्रमाण कर्म स्वत: चलेंगे। आधाकल्प व्यर्थ सोचा, व्यर्थ किया, लेकिन अब जैसा समय, जैसा बाप वैसे बच्चे।

स्लोगन:-

जो सदा ईश्वरीय विधान पर चलते हैं वही ब्रह्मा बाप समान मास्टर विधाता बनते हैं।