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27-10-2018

27-10-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - धीरज रखो अब तुम्हारे दु:ख के दिन पूरे हुए, सुख के दिन आ रहे हैं, निश्चय बुद्धि बच्चों की अवस्था धैर्यवत रहती है''

प्रश्नः-

किसी भी हालत में मुरझाइस न आये इसकी सहज विधि क्या है?

उत्तर:-

ब्रह्मा बाप का सैम्पुल सदा सामने रखो। इतने ढेर बच्चों का बाप, कोई सपूत बच्चे हैं तो कोई कपूत, कोई सर्विस करते, कोई डिससर्विस, फिर भी बाबा कभी मुरझाते नहीं, घबराते नहीं फिर तुम बच्चे क्यों मुरझा जाते हो? तुम्हें तो किसी भी हालत में मुरझाना नहीं है।

गीत:-

धीरज धर मनुआ........  

ओम् शान्ति।

धीरज धर मनुआ मनुष्य को नहीं कहा जाता। मन-बुद्धि आत्मा में हैं। यह आत्मा को कहा जाता है। आत्मा को सिवाए परमपिता परमात्मा के और कोई कह न सके कि धैर्य धरो क्योंकि अधीर्य को ही धैर्य दिया जाता है। अगर ईश्वर सर्वव्यापी है तो उसको अधीर्य कहा नहीं जा सकता। मनुष्य इस समय सब अधीर्य हैं, दु:खी हैं इसलिए धैर्य देने के लिए, सुख देने के लिए बाप आये हैं। कहते हैं अब धैर्य धरो। बाप के महावाक्य सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं हैं, वास्तव में सारी दुनिया के लिए हैं। सारी दुनिया आहिस्ते-आहिस्ते सुनती रहेगी। जो सुनते हैं वह आते रहते हैं। सबका सद्गति दाता, दु:ख हर्ता एक बाप ही है। यह है ही दु:ख की दुनिया। बच्चे समझते हैं अभी हमारे मुक्ति-जीवनमुक्ति के दिन वा कलियुग पतित दुनिया से छुटकारा पाने के दिन हैं। तुम्हारी बुद्धि में यह है, सो भी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। सबको यह धैर्य नहीं है कि अभी हम इस दु:ख की दुनिया से छुटकारा पाए अपने सुखधाम जायेंगे। तुम बच्चों को भी स्थाई निश्चय रहना चाहिए। हमारे सुख के दिन अब आ रहे हैं, अगर श्रीमत पर चलते रहेंगे तो। इसमें आशीर्वाद वा कृपा आदि की बात नहीं है। बाप बैठ पढ़ाते हैं, सहज स्वराज्य योग सिखलाते हैं। पढ़ाई को नॉलेज भी कहा जाता है। तुम बच्चों को श्रेष्ठ मत दे रहे हैं। पहले-पहले तो अटल निश्चय चाहिए, फिर कभी वह नीचे-ऊपर नहीं हो सकते। गाते हैं परवाह थी पार ब्रह्म में रहने वाले की, वह पा लिया तो बाकी क्या चाहिए। यह तो निश्चय है - उस बाप से स्वर्ग का वर्सा मिलना है। तो धैर्य पहले ही स्थाई मिल जाता है। यह है अविनाशी धैर्य। सर्टेन है हम श्रीमत पर श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ, श्रेष्ठाचारी राज्य भाग्य स्थापन कर रहे हैं, बिगर कोई लड़ाई-झगड़े। तो फिर मुरझाने की क्या दरकार। भल घर में 10-12 बच्चे हों। बाबा को तो देखो, हजारों-लाखों बच्चे हैं। कई बच्चे हंगामा भी मचाते हैं। कोई सपूत बच्चे हैं, कोई कपूत हैं, कोई सर्विस करते हैं, कोई तो डिस सर्विस भी करते हैं। फिर बाबा कभी घबराता है क्या? तो बच्चों को भी घबराना नहीं चाहिए। गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। एक तरफ है हठयोग कर्म सन्यास। तुम्हारा है बेहद का सन्यास। यह है राजयोग। तुम्हें गृहस्थ व्यवहार में रहते बाप से वर्सा पाना है। बहुत सहज है। अभी तो अपने सुखधाम के झाड़ दिखाई पड़ रहे हैं। परोक्ष-अपरोक्ष बुद्धि से जानते हैं। साक्षात्कार हो, न हो। पुरुषार्थ करते हैं भविष्य स्व-राजधानी के लिए। एम ऑब्जेक्ट सामने है ना। लक्ष्मी-नारायण का चित्र देख रहे हो ना। ऐसे नहीं कि हमको साक्षात्कार हो तो मानें। यह तो बुद्धि से समझने की बात है। इन आंखों से चित्र देख रहे हो ना। इन आंखों से फिर भी यही देखेंगे। राजयोग है ना। बुद्धि भी कहती है बरोबर चित्र रखे हैं फिर साक्षात्कार क्या करायें? श्रीकृष्ण सतयुग का मालिक है ना। शिव परमधाम में रहने वाला है। तुम लक्ष्मी-नारायण बन सकते हो, यह है तुम्हारी एम आबजेक्ट। तो आइने में देखो कि वह दैवीगुण हमारे में कहाँ तक आये हैं? बाप धैर्य तो बहुत अच्छा देते हैं।

अब पढ़ना है। राजाई के लिए ज्ञान चाहिए। वह बाप दे रहे हैं। आई.सी.एस. वालों को सबसे जास्ती नशा रहता है - हम बड़े से बड़ा ऑफीसर बनेंगे। यूँ तो धन्धे-व्यवहार में भी करोड़पति बन जाते हैं। बाबा फिर तुमको यह धन्धा सिखलाते हैं - सट्टा मट्टा का। तुम बाप को कौड़ियां देते हो, उनके एवज में 21 जन्मों के लिए बाबा तुमको स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। यह सौदागरी भी है तो पढ़ाई भी है। सिर्फ सौदागरी से काम नहीं, वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी का भी नॉलेज चाहिए ना। स्वदर्शन चक्रधारी भी बनना है। जितना पढ़ेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। स्वर्ग का मालिक तो प्रजा, नौकर-चाकर भी होगी। अभी भी सब कहते हैं ना - भारत हमारा देश है। परन्तु राजा और प्रजा में तो बहुत फ़र्क है। बाप कहते हैं जितना हो सके - ऊंच ते ऊंच पद पाओ, मात-पिता समान पुरुषार्थ करो। समझा जाता है सब तो गद्दी पर नहीं बैठेंगे। फिर भी रेस करानी पड़ती है। नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार ही राजाई पायेंगे। जिनका जो पुरुषार्थ कल्प पहले वाला है वह साक्षी हो देखते हैं। फिर किसी का पुरुषार्थ ठण्डा देखते हैं तो तीव्र बनाया जाता है। तुम्हारा तो पुरुषार्थ बहुत ठण्डा दिखाई पड़ता है। तुम्हारा ममत्व लगा हुआ है। ट्रस्टी बनाया फिर ममत्व क्यों? तुम श्रीमत पर चलो। पूछते हैं - बाबा, मकान बनाऊ? हाँ, क्यों नहीं बनाओ, भल आराम से बैठो। बाकी थोड़े रोज़ यह छी-छी दुनिया है, भल आराम करो, बच्चों आदि की शादी कराओ। बाप कोई पैसा नहीं लेते हैं। वह तो दाता है। शिवबाबा ने इस समय बच्चों के रहने लिए यह मकान बनाया है। अपने रहने लिए तो यह शरीर निमित्त बनाया है, जीव आत्माओं को तो जरूर रहने के लिए मकान चाहिए। तो तुम बच्चों के लिए बना रहे हैं। बाबा भी इस मकान में बैठे हैं ना। यह तुम जानते हो - हमारा वह है आत्माओं का बाप और यह है शरीर का बाप। तुमको एडाप्ट किया है। तुम हमारे बच्चे हो। मम्मा-बाबा कहते हो ना, इसको गोद लेना कहा जाता है। प्रजापिता ब्रह्मा को इतने बच्चे हैं तो जरूर गोद के ही बच्चे होंगे। तुम बच्चों को एडाप्ट करते हैं। सरस्वती भी बेटी है ना। यह है बड़ी गुह्य बातें समझने की। गीता-भागवत आदि तो तुम भी पढ़े हो, यह बाबा भी पढ़ा है। परन्तु अब तो श्रीमत मिलती है, ड्रामा अनुसार। जो कुछ कहा सो ड्रामा अनुसार। उसमें जरूर कल्याण ही होगा। नुकसान होता है, उसमें भी कल्याण ही है। हर बात में कल्याण है। शिवबाबा है ही कल्याणकारी। उनकी मत अच्छी है। अगर उस पर कोई शंका रही तो श्रीमत पर न चल अपनी मत पर चलते हैं, इससे धोखा खायेंगे। फिर शिवबाबा क्या करे। क़दम-क़दम पर राय पूछना है। सुप्रीम पण्डा तो बैठा है ना। बहुत बच्चे यह बात भूल जाते हैं क्योंकि योग में नहीं रहते हैं। योग अथवा याद को ही यात्रा कहा जाता है। याद नहीं करते तो समझें हम रेस्ट ले रहे हैं। यात्रा पर जाकर कोई रेस्ट लेते हैं। तुम भी अगर रेस्ट लेते हो, याद नहीं करते हो तो विकर्म भी विनाश नहीं होंगे और आगे भी नहीं बढ़ेंगे। याद नहीं करते तो नज़दीक नहीं जाते। आत्मा थक जाती है। बाप को भूल जाती है। बाप कहते हैं तुम यात्रा पर चल रहे हो। रात को तो तुम रेस्ट लेते ही हो। ऐसे नहीं कि रात को तुम नींद में हो तो यात्रा पर हो। नहीं, वह रेस्ट है। जब जागते हो तब यात्रा पर हो। नींद में कोई विकर्म विनाश नहीं होंगे। बाकी हाँ, दूसरे कोई विकर्म होते नहीं हैं। तो बाप सभी बातें समझाते हैं परन्तु कोई अमल में भी जब लाये। ढेर प्वाइन्ट बतलाते रहते हैं। बैरिस्टरी की प्वाइन्ट्स तब बुद्धि में आती हैं जब वह बैरिस्टरी पढ़ते हैं। डॉक्टरी वा इन्जीनियरिंग पढ़ते हैं फिर वह डॉक्टर अथवा इन्जीनियर आदि बनते हैं। जो जैसा कोर्स करते हैं, वैसा बनते हैं।

यहाँ तो एक ही कोर्स है। चलते चलो, तुम्हारे सिर पर जन्म-जन्मान्तर के पापों का बोझा बहुत है। उनको विनाश करने का उपाय एक ही है - बाप को याद करना। नहीं तो पद भ्रष्ट हो पड़ेंगे। माला बनी हुई है ना। 9 रत्नों का भी गायन है। यह कहाँ से आये, सो मनुष्य नहीं जानते हैं। 8 रत्न हैं जो रुद्र की माला बनते हैं। तो पुरुषार्थ अच्छा करना चाहिए। स्टूडेन्ट्स अच्छा पढ़ते हैं तो रजिस्टर से माँ-बाप को भी पता लगता है। यहाँ तो बाप ही टीचर भी हैं तो वही जाने। तुम पढ़ते ही हो बाप के पास। रजिस्टर का भी उनको पता पड़ता है। तुम भी अपने रजिस्टर को समझ सकते हो - कहाँ तक हमारे में गुण हैं, मैं औरों को कहाँ तक आप समान बनाता हूँ? इतनी ताकत है जो कोई सामने देखे उनको शरीर भुला दें? कहा जाता है हिम्मते मर्दा मददे खुदा। बाप बहुत मदद देते हैं। तुम भी मदद देते हो योग की। बाप को चाहिए ही पवित्रता की मदद। सारी पतित दुनिया को पावन बनाना है योगबल से। जितना-जितना जो योग की मदद देंगे उतना बाबा खुश होंगे। यह बाबा के लिए मदद है वा अपने लिए? तुम जितना पढ़ेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। जितना याद करेंगे उतना मुझे पवित्रता की मदद करेंगे। मैं आया हूँ पतित को पावन बनाने, पावन दुनिया के लिए। पतित और पावन यहाँ बनते हैं। वह तो है ही निराकारी दुनिया। गाते भी हैं पतित-पावन आओ। समझते नहीं कि पावन दुनिया किसको कहा जाता है। सीता को रावण की जेल से, दु:ख से छुड़ाया तो फिर सुख चाहिए। औरों को शान्ति बहुत मिलती है, सुख थोड़ा मिलता है। तुमको सुख भी बहुत मिलता है तो दु:ख भी बहुत मिलता है। पिछाड़ी में जो आत्मायें आती हैं थोड़ा पार्ट बजाए वापिस चली जाती हैं। एक-दो जन्म भी लेते हैं, थोड़ा समय आया यह गया। तुम्हारे तो 84 जन्मों की बात है। उनकी एक-दो जन्म की बात है। तुम 84 जन्मों को जानते हो, चक्र को जानने से चक्रवर्ती राजा बनते हो। वह थोड़ेही बन सकेंगे। उनके लिए यह ज्ञान नहीं है। यह ज्ञान तुम्हारे लिए है, जिन्होंने कल्प पहले भी ज्ञान लिया है। अब तुमको पुरुषार्थ करना है। पुरुषार्थ का समय अभी है और तुम्हारे लिए ही पुरुषार्थ की बात है। देवी-देवता धर्म बहुत सुख देने वाला है, इतना सुख और कोई दे न सके।

यह अनादि ड्रामा बना हुआ है। सभी को तो हीरो-हीरोइन का पार्ट नहीं मिल सकता। किस्म-किस्म के मनुष्य हैं। उनमें भी अच्छे-बुरे अनेक प्रकार के हैं। श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ देवी-देवता हैं। श्रेष्ठ उन्हों को ही कहा जाता है। वह तो सतयुग में ही होते हैं। उन्हों के चित्र भी हैं। परन्तु वह कैसे बने यह नहीं जानते हैं। कोई तो फिर कहते - कृष्ण हाज़िरा-हज़ूर है। भगवान् भी हाज़िरा-हज़ूर है। इन सब बातों को तुम बच्चे समझ गये हो। यह एम ऑब्जेक्ट बहुत अच्छी है - समझाने लिए। सबको निमंत्रण जरूर देना है। अखबार से सबको निमंत्रण मिल रहा है। अभी बाकी टाइम बहुत थोड़ा है। अब तक बच्चे यात्रा करते-करते थक जाते हैं तो बैठ जाते हैं। माया के तूफान सहन नहीं कर सकते हैं। युद्ध के मैदान में माया तो जरूर पकड़ेगी। रुसतम से रुसतम होकर लड़ेगी। ज़ोर से तूफान आयेंगे। फिर कहते हैं जब से ज्ञान में आया हूँ तो विघ्न बहुत पड़े हैं, धन्धे में भी घाटा हुआ है। बाबा कहते हैं ऐसे मत समझो - ज्ञान में आये हैं तब विघ्न पड़ते हैं। यह तो दुनिया में होता ही रहता है, इनसे डरना नहीं है। कभी चक्र की दशा, कभी राहू की, कभी किसकी दशा बैठती है। चलते-चलते फाँ हो जाते हैं। राहू की दशा कड़ी होती है। माया खा जाती है तो काले का काला बन जाते हैं। माया थप्पड़ लगाए एकदम काला मुँह कर देती है। माया की भी जीत होगी। सिर्फ बच्चों की जीत हो फिर तो झट राजधानी स्थापन हो जाए। उस्ताद को भूल जाते हैं तो माया थप्पड़ मारती है। ऐसे रूहानी साजन को सजनी भूल जाती है, यह भी वन्डर है ना! अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) योगबल से पतित दुनिया को पावन बनाने में बाप का मददगार बनना है। याद की यात्रा में रेस्ट नहीं लेनी है। ऐसी याद हो जो सामने वाला अपना शरीर भी भूल जाए।

2) श्रीमत में कभी भी शंका उठाकर अपनी मनमत नहीं चलानी है। हर बात में राय लेते उसमें अपना कल्याण समझकर चलना है।

वरदान:-

अपनी सूक्ष्म शक्तियों को स्थापना के कार्य में लगाने वाले मास्टर रचयिता भव

जैसे आपकी रचना साइंस वाले विस्तार को सार में समा रहे हैं। अति सूक्ष्म और शक्तिशाली विनाश के साधन बना रहे हैं। ऐसे आप मास्टर रचयिता बन अपनी सूक्ष्म शक्तियाँ स्थापना के कार्य में लगाओ। आपके पास सबसे महान शक्ति है - श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति, शुभ वृत्ति की शक्ति, स्नेह और सहयोग की दृष्टि। तो इस सूक्ष्म शक्तियों द्वारा अपनी वंशावली की आशाओं के दीपक जलाए उन्हें यथार्थ मंजिल पर पहुँचाओ।

स्लोगन:-

जहाँ स्वच्छता और मधुरता है वहाँ सेवा में सफलता है।