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27-12-2018

27-12-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - मैं तुम्हें फिर से राजयोग सिखलाकर राजाओं का राजा बनाता हूँ, इस 'फिर से' शब्द में ही सारा चक्र समाया हुआ है''

प्रश्नः-

बाप भी प्रबल है तो माया भी? दोनों की प्रबलता क्या है?

उत्तर:-

बाप तुम्हें पतित से पावन बनाते, पावन बनाने में बाप प्रबल है इसलिए बाप को पतित-पावन सर्वशक्तिमान कहा जाता है। माया फिर पतित बनाने में प्रबल है। सच्ची कमाई में गृहचारी ऐसी बैठती है जो फायदे के बदले घाटा हो जाता है, विकारों के पीछे माया तवाई बना देती है इसलिए बाबा कहते - बच्चे, देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करो।

गीत:-

हमें उन राहों पर चलना है........  

ओम् शान्ति।

तुम बच्चों को किन राहों पर चलना है? जरूर राह बताने वाला होगा। मनुष्य रांग रास्ते पर चलते हैं तब तो दु:खी होते हैं। अभी कितने दु:खी हैं क्योंकि उनकी मत पर नहीं चलते। सब उल्टी मत पर चलते आये हैं, जब से उल्टी मत देने वाले रावण का राज्य शुरू हुआ है। बाप समझाते हैं तुम इस समय रावण की मत पर हो, तब हरेक का ऐसा बुरा हाल हुआ है। सब अपने को पतित कहते भी हैं। गांधी बापू जी भी कहते थे - पतित-पावन आओ, गोया हम पतित हैं। परन्तु कोई भी समझते नहीं कि हम पतित कैसे बने हैं? चाहते हैं भारत में राम राज्य हो परन्तु कौन बनायेगा? गीता में बाप ने सब बातें समझाई हैं, परन्तु गीता के भगवान् का ही नाम उल्टा लगा दिया है। बाप समझाते हैं तुमने क्या कर दिया है। क्राइस्ट के बाइबिल में पोप का नाम डाल दें तो कितना नुकसान हो जाए। यह भी ड्रामा है। बाप बड़े से बड़ी भूल समझाते हैं। यह आदि, मध्य, अन्त का ज्ञान गीता में है। बाप समझाते हैं मैं तुमको फिर से राजाओं का राजा बनाता हूँ। तुमने 84 जन्म कैसे लिये - यह तुम नहीं जानते हो, हम बताते हैं। यह कोई भी शास्त्र में नहीं है। शास्त्र तो अनेक हैं। भिन्न-भिन्न मतें हैं। गीता माना गीता। जिसने गीता गाई है उसने ही राय दी है। कहते हैं मैं तुमको राजयोग सिखाने फिर से आया हूँ। तुम पर माया का परछाया पड़ गया है। अभी फिर से मैं आया हूँ। गीता में भी कहते हैं हे भगवान् फिर से गीता सुनाने आओ अर्थात् फिर से गीता की नॉलेज दो। गीता में ही यह बात है कि आसुरी सृष्टि का विनाश और दैवी सृष्टि की स्थापना फिर से होती है। फिर जरूर कहेंगे। गुरूनानक फिर से आयेगा अपने समय पर, चित्र भी दिखाते हैं। कृष्ण भी फिर से वही मोर मुकुट वाला होगा। तो यह सब राज़ गीता में हैं। परन्तु भगवान् को बदल दिया है। हम ऐसे नहीं कहते कि गीता को नहीं मानते परन्तु उसमें जो यह उल्टा नाम मनुष्यों ने डाल दिया है, उसको बाप आ करके सीधा करके समझाते हैं। यह भी समझाते हैं हर एक आत्मा में अपना-अपना पार्ट नूंधा हुआ है। सब एक समान नहीं हो सकते। जैसे मनुष्य माना मनुष्य, वैसे आत्मा माना आत्मा। परन्तु हर एक आत्मा में अपना पार्ट भरा हुआ है। यह बातें समझाने वाला बड़ा बुद्धिवान चाहिए। बाप जानते हैं कौन समझा सकते हैं, कौन सर्विस करने में समझदार हैं, किसकी लाइन क्लीयर है। देही-अभिमानी रहते हैं। सब तो परिपूर्ण, देही-अभिमानी नहीं बने हैं। यह तो अन्त में रिजल्ट होगी। इम्तहान के दिन जब नज़दीक होते हैं तो मालूम पड़ जाता है कौन-कौन पास होंगे। टीचर्स भी समझ सकते हैं और बच्चे भी समझते हैं कि यह सबसे तीखा है। वहाँ तो ठगी आदि भी हो सकती है। यहाँ तो यह बात हो न सके। यह तो ड्रामा में नूंध है। कल्प पहले वाले ही निकलेंगे। हमें पता चलता है सर्विस की रफ्तार से। इस सच्ची कमाई में घाटा और लाभ, गृहचारी आदि आती है। चलते-चलते टांग टूट पड़ती है। गन्धर्वी विवाह करने बाद फिर माया एकदम तवाई बना देती है। माया भी बड़ी प्रबल है। बाबा प्रबल है पावन बनाने में, इसलिए उनको सर्वशक्तिमान पतित-पावन कहा जाता है और फिर माया प्रबल है पतित बनाने में। सतयुग में तो माया होती नहीं। वह है ही वाइसलेस वर्ल्ड, अभी है एकदम विशश वर्ल्ड। कितनी जबरदस्त प्रबलता है। चलते-चलते माया एकदम नाक से पकड़ तवाई बना देती है, फारकती दिला देती है, इतनी प्रबल है। भल सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा को कहते हैं परन्तु माया भी कम नहीं है। आधाकल्प उनका राज्य चलता है। यह कोई थोड़ेही जानते हैं। दिन और रात आधा-आधा होता है, ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात। फिर भी सतयुग को लाखों वर्ष, कलियुग को कितने वर्ष दे देते हैं। अभी बाप समझाते हैं तो समझ में आता है। यह तो बिल्कुल राइट है। बाप बैठ पढ़ाते हैं। कलियुग में मनुष्य थोड़ेही गीता का राजयोग सिखाए राजाओं का राजा बनायेंगे। ऐसे तो कोई है नहीं, जिसकी बुद्धि में हो कि हम राजयोग सीख राजाओं का राजा बनेंगे। वो गीता पाठशालायें तो अनेक हैं परन्तु कोई राजयोग सीख राजाओं का राजा वा रानी बन नहीं सकते। कोई भी एम ऑबजेक्ट राजाई पाने का नहीं है। यहाँ तो कहते हो हम बेहद के बाप से भविष्य सुख की राजाई पाने के लिए पढ़ते हैं। पहले-पहले तो अल्फ पर समझाना है। गीता पर ही सारा मदार है। मनुष्यों को कैसे पता पड़े सृष्टि चक्र कैसे फिरता है, हम कहाँ से आये हैं, फिर कहाँ जाना है। कोई को पता नहीं है। कौन देश से आया, कौन देश है जाना। गीत भी है ना, सिर्फ तोते मुआफ़िक गाते रहते हैं। बुद्धि जो आत्मा में है वह नहीं जानती कि हम जिसको हे परमपिता परमात्मा कहते हैं वह कौन है। उनको न देख सकते हैं, न जान सकते हैं। आत्मा का तो फ़र्ज है ना - बाप को जानना, देखना। अभी तुम समझ गये हो, हम आत्मा हैं परमपिता परमात्मा बाप हमको पढ़ाते हैं। बुद्धि कहती है बाप आकर पढ़ाते हैं। जैसे किसकी आत्मा को बुलाते हैं तो समझते हैं ना उनकी आत्मा आई है। तो तुम समझते हो हम आत्मा हैं, हमारा वह बाप है। बाप से जरूर वर्सा मिलना चाहिए। हम दु:खी क्यों हुए हैं, मनुष्य तो कह देते बाप ही सुख दु:ख देने वाला है। भगवान् को गाली देते रहते हैं। वह हैं आसुरी सन्तान। जैसे कल्प पहले कहा है वैसे कहते हैं। तुम अभी प्रैक्टिकल में ईश्वरीय सन्तान बने हो। आगे तुम आसुरी औलाद थे। अब बाप कहते हैं निरन्तर मुझे याद करो। किसको भी यह दो अक्षर समझाना बहुत सहज है। तुम भगवान् के बच्चे हो। भगवान् ने स्वर्ग रचा, अब नर्क बना है फिर स्वर्ग बाप ही रचेंगे। बाप हमको राजयोग सिखला रहे हैं, स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। अच्छा, शिव को नहीं जानते हो। प्रजापिता ब्रह्मा को भी रचने वाला वह बाप है। तो जरूर बाप ब्रह्मा द्वारा ही सिखायेंगे। अभी शूद्र वर्ण है। हम ब्राह्मण से देवता क्षत्रिय बनेंगे। नहीं तो विराट रूप क्यों बनाया है, चित्र ठीक है। परन्तु समझ नहीं सकते।

शूद्रों को ब्राह्मण कौन बनायेंगे? जरूर प्रजापिता ब्रह्मा चाहिए। उनको कैसे एडाप्ट किया। जैसे तुम कहते हो यह मेरी स्त्री, उनको 'मेरी' कैसे बनाया? एडाप्ट किया। बाप कहते हैं मुझे भी मात-पिता कहते हो, मैं बाप तो हूँ। मेरी कहाँ से लाऊं। तो इनमें प्रवेश कर इनका नाम ब्रह्मा रखता हूँ। स्त्री एडाप्ट की जाती है, जैसे लौकिक बाप स्त्री को एडाप्ट कर कुख वंशावली रचते हैं, बाबा ने फिर इनमें प्रवेश कर इनको एडाप्ट कर इनके मुख द्वारा मुखवंशावली बनाई है। तुम कहते हो हम ब्राह्मण-ब्राह्मणियां हैं। जरूर इनका ही नाम ब्रह्मा है। ब्रह्मा किसका बच्चा? शिवबाबा का। इनको किसने एडाप्ट किया? बेहद के बाप ने। दृष्टान्त बड़ा अच्छा है परन्तु जिसकी बुद्धि में बैठा होगा वह समझा सकेंगे। बुद्धि में नहीं होगा तो उनको समझाने आयेगा ही नहीं। लौकिक और पारलौकिक बाप तो है ना। वह भी स्त्री को एडाप्ट कर मेरी कहते हैं। यह फिर इनमें प्रवेश कर एडाप्ट करते हैं। खुद कहते हैं मुझ निराकार को इनका आधार लेना पड़ता है, तो नाम भी बदली करता हूँ। एक ही टाइम कितनों के नाम रखे। नाम की लिस्ट भी तुम्हारे पास होनी चाहिए। प्रदर्शनी में नाम की लिस्ट भी दिखानी चाहिए। बाबा ने कैसे एक ही समय नाम रखे। बाबा ने हमको अपना बनाया तो नाम बदलाया, उनको भृगु ऋषि कहते हैं। जन्म पत्री तो भगवान् के पास ही है। वन्डरफुल नाम हैं। अब सभी तो हैं नहीं। कोई तो आश्चर्यवत् भागन्ती हो गये। आज हैं, कल हैं नहीं। नम्बरवन दुश्मन है काम। यह काम विकार बहुत तंग करता है। उस पर जीत पानी है। गृहस्थ व्यवहार में इकट्ठे रहकर उन पर जीत पानी है - यह है प्रतिज्ञा। अपनी वृत्ति देखनी है, कर्मेन्द्रियों से विकर्म नहीं करना है। तूफान तो सबको आते हैं। इसमें डरना नहीं है।

बाबा से बहुत बच्चे पूछते हैं यह धंधा करें वा नहीं करें? बाबा लिखते हैं मैं कोई तुम्हारे धन्धे आदि को देखने आया हूँ क्या? मैं तो टीचर हूँ, पढ़ाने के लिए। धन्धे की बात हमसे क्यों पूछते हो? मैं तो राजयोग सिखाता हूँ। रुद्र यज्ञ भी गाया हुआ है, कृष्ण यज्ञ नहीं। बाप कहते हैं लक्ष्मी-नारायण में यह सृष्टि चक्र का ज्ञान ही नहीं। अगर यह मालूम हो कि 16 कला से फिर 14 कला बनना है तो उसी समय ही राजाई का नशा उड़ जाए। वहाँ तो है ही सद्गति। सद्गति दाता तो एक है। वही आकर युक्ति बताते हैं, दूसरा कोई बतला न सके। पहले-पहले यह बात उठाओ कि किसने कहा है - काम महाशत्रु है? यह भी गाते हैं विशश वर्ल्ड और वाइसलेस वर्ल्ड। भारत में ही रावण को जलाते रहते हैं। सतयुग में थोड़ेही जलायेंगे। अगर यह कहते हैं कि अनादि है, सतयुग में भी था फिर तो सब जगह दु:ख ही दु:ख होगा। फिर स्वर्ग कैसे कहेंगे? यह बातें समझानी है। हरेक की रफ्तार अपनी है। पता लग जाता है - कौन अच्छी रफ्तार वाला है? सम्पूर्ण तो कोई बने नहीं हैं। बाकी हाँ, सतो, रजो, तमो तो होते ही हैं। बुद्धि हर एक की अलग-अलग है। जो श्रीमत पर नहीं चलते हैं - वह हैं तमोप्रधान बुद्धि। अपने को इन्श्योर नहीं करेंगे तो भविष्य 21 जन्मों के लिए कैसे मिलेगा। मरना तो है ही। तो क्यों न इन्श्योर कर देना चाहिए। सब कुछ उनका है। तो परवरिश भी वह करेंगे। भल कोई सब कुछ देते हैं, परन्तु सर्विस नहीं करते, जो दिया वह खाते रहते हैं। तो बाकी जमा क्या होगा। कुछ भी नहीं। सर्विस का सबूत चाहिए। देखा जाता है - कौन पण्डे बन आते हैं? नये बी.के. भी आपस में सेन्टर चलाते हैं, उनको भी आफरीन दी जाती है। यह नॉलेज तो बड़ी सहज है। वानप्रस्थ अवस्था वालों को जाकर समझाओ - वानप्रस्थ अवस्था कब होती है? बाप ही गाइड बन सबको ले जायेंगे। तुम जानते हो बाप ही कालों का काल है। हम तो खुशी से बाबा के साथ इकट्ठे जाना चाहते हैं।

पहले-पहले तो मुख्य बात यह उठाओ - गीता का भगवान् कौन है, जिसने रचना रची? लक्ष्मी-नारायण को राजयोग किसने सिखाया? उनकी भी राजधानी स्थापन हो रही है। और कोई राजधानी स्थापन करने आते नहीं। बाप ही राजधानी स्थापन करने आते हैं। सब पतितों को पावन बनाते हैं। यह है विशश वर्ल्ड, वह है वाइसलेस वर्ल्ड। दोनों में नम्बरवार मर्तबे हैं। जो श्रीमत पर चलने वाले होंगे, उनकी बुद्धि में ही यह बातें बैठ सकती हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बुद्धि की लाइन सदा क्लीयर रहे इसके लिए देही-अभिमानी रहना है। सच्ची कमाई में माया किसी प्रकार से घाटा न डाल दे - यह सम्भाल करनी है।

2) कर्मेन्द्रियों से कोई भी विकर्म नहीं करना है। इन्श्योर करने के बाद सर्विस भी जरूर करनी है।

वरदान:-

योग की धूप में आंसुओं की टंकी को सुखाकर रोना प्रूफ बनने वाले सुख स्वरूप भव

कई बच्चे कहते हैं कि फलाना दु:ख देता है इसलिए रोना आता है। लेकिन वह देते हैं आप लेते क्यों हो? उनका काम है देना, आप लो ही नहीं। परमात्मा के बच्चे कभी रो नहीं सकते। रोना बन्द। न आंखों का रोना, न मन का रोना। जहाँ खुशी होगी वहाँ रोना नहीं होगा। खुशी वा प्यार के आंसू को रोना नहीं कहा जाता। तो योग की धूप में आंसुओं की टंकी को सुखा दो, विघ्नों को खेल समझो तो सुख स्वरूप बन जायेंगे।

स्लोगन:-

साक्षी रहकर पार्ट बजाने का अभ्यास हो तो टेन्शन से परे स्वत: अटेन्शन में रहेंगे।

27-12-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - मैं तुम्हें फिर से राजयोग सिखलाकर राजाओं का राजा बनाता हूँ, इस 'फिर से' शब्द में ही सारा चक्र समाया हुआ है''

प्रश्नः-

बाप भी प्रबल है तो माया भी? दोनों की प्रबलता क्या है?

उत्तर:-

बाप तुम्हें पतित से पावन बनाते, पावन बनाने में बाप प्रबल है इसलिए बाप को पतित-पावन सर्वशक्तिमान कहा जाता है। माया फिर पतित बनाने में प्रबल है। सच्ची कमाई में गृहचारी ऐसी बैठती है जो फायदे के बदले घाटा हो जाता है, विकारों के पीछे माया तवाई बना देती है इसलिए बाबा कहते - बच्चे, देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करो।

गीत:-

हमें उन राहों पर चलना है........  

ओम् शान्ति।

तुम बच्चों को किन राहों पर चलना है? जरूर राह बताने वाला होगा। मनुष्य रांग रास्ते पर चलते हैं तब तो दु:खी होते हैं। अभी कितने दु:खी हैं क्योंकि उनकी मत पर नहीं चलते। सब उल्टी मत पर चलते आये हैं, जब से उल्टी मत देने वाले रावण का राज्य शुरू हुआ है। बाप समझाते हैं तुम इस समय रावण की मत पर हो, तब हरेक का ऐसा बुरा हाल हुआ है। सब अपने को पतित कहते भी हैं। गांधी बापू जी भी कहते थे - पतित-पावन आओ, गोया हम पतित हैं। परन्तु कोई भी समझते नहीं कि हम पतित कैसे बने हैं? चाहते हैं भारत में राम राज्य हो परन्तु कौन बनायेगा? गीता में बाप ने सब बातें समझाई हैं, परन्तु गीता के भगवान् का ही नाम उल्टा लगा दिया है। बाप समझाते हैं तुमने क्या कर दिया है। क्राइस्ट के बाइबिल में पोप का नाम डाल दें तो कितना नुकसान हो जाए। यह भी ड्रामा है। बाप बड़े से बड़ी भूल समझाते हैं। यह आदि, मध्य, अन्त का ज्ञान गीता में है। बाप समझाते हैं मैं तुमको फिर से राजाओं का राजा बनाता हूँ। तुमने 84 जन्म कैसे लिये - यह तुम नहीं जानते हो, हम बताते हैं। यह कोई भी शास्त्र में नहीं है। शास्त्र तो अनेक हैं। भिन्न-भिन्न मतें हैं। गीता माना गीता। जिसने गीता गाई है उसने ही राय दी है। कहते हैं मैं तुमको राजयोग सिखाने फिर से आया हूँ। तुम पर माया का परछाया पड़ गया है। अभी फिर से मैं आया हूँ। गीता में भी कहते हैं हे भगवान् फिर से गीता सुनाने आओ अर्थात् फिर से गीता की नॉलेज दो। गीता में ही यह बात है कि आसुरी सृष्टि का विनाश और दैवी सृष्टि की स्थापना फिर से होती है। फिर जरूर कहेंगे। गुरूनानक फिर से आयेगा अपने समय पर, चित्र भी दिखाते हैं। कृष्ण भी फिर से वही मोर मुकुट वाला होगा। तो यह सब राज़ गीता में हैं। परन्तु भगवान् को बदल दिया है। हम ऐसे नहीं कहते कि गीता को नहीं मानते परन्तु उसमें जो यह उल्टा नाम मनुष्यों ने डाल दिया है, उसको बाप आ करके सीधा करके समझाते हैं। यह भी समझाते हैं हर एक आत्मा में अपना-अपना पार्ट नूंधा हुआ है। सब एक समान नहीं हो सकते। जैसे मनुष्य माना मनुष्य, वैसे आत्मा माना आत्मा। परन्तु हर एक आत्मा में अपना पार्ट भरा हुआ है। यह बातें समझाने वाला बड़ा बुद्धिवान चाहिए। बाप जानते हैं कौन समझा सकते हैं, कौन सर्विस करने में समझदार हैं, किसकी लाइन क्लीयर है। देही-अभिमानी रहते हैं। सब तो परिपूर्ण, देही-अभिमानी नहीं बने हैं। यह तो अन्त में रिजल्ट होगी। इम्तहान के दिन जब नज़दीक होते हैं तो मालूम पड़ जाता है कौन-कौन पास होंगे। टीचर्स भी समझ सकते हैं और बच्चे भी समझते हैं कि यह सबसे तीखा है। वहाँ तो ठगी आदि भी हो सकती है। यहाँ तो यह बात हो न सके। यह तो ड्रामा में नूंध है। कल्प पहले वाले ही निकलेंगे। हमें पता चलता है सर्विस की रफ्तार से। इस सच्ची कमाई में घाटा और लाभ, गृहचारी आदि आती है। चलते-चलते टांग टूट पड़ती है। गन्धर्वी विवाह करने बाद फिर माया एकदम तवाई बना देती है। माया भी बड़ी प्रबल है। बाबा प्रबल है पावन बनाने में, इसलिए उनको सर्वशक्तिमान पतित-पावन कहा जाता है और फिर माया प्रबल है पतित बनाने में। सतयुग में तो माया होती नहीं। वह है ही वाइसलेस वर्ल्ड, अभी है एकदम विशश वर्ल्ड। कितनी जबरदस्त प्रबलता है। चलते-चलते माया एकदम नाक से पकड़ तवाई बना देती है, फारकती दिला देती है, इतनी प्रबल है। भल सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा को कहते हैं परन्तु माया भी कम नहीं है। आधाकल्प उनका राज्य चलता है। यह कोई थोड़ेही जानते हैं। दिन और रात आधा-आधा होता है, ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात। फिर भी सतयुग को लाखों वर्ष, कलियुग को कितने वर्ष दे देते हैं। अभी बाप समझाते हैं तो समझ में आता है। यह तो बिल्कुल राइट है। बाप बैठ पढ़ाते हैं। कलियुग में मनुष्य थोड़ेही गीता का राजयोग सिखाए राजाओं का राजा बनायेंगे। ऐसे तो कोई है नहीं, जिसकी बुद्धि में हो कि हम राजयोग सीख राजाओं का राजा बनेंगे। वो गीता पाठशालायें तो अनेक हैं परन्तु कोई राजयोग सीख राजाओं का राजा वा रानी बन नहीं सकते। कोई भी एम ऑबजेक्ट राजाई पाने का नहीं है। यहाँ तो कहते हो हम बेहद के बाप से भविष्य सुख की राजाई पाने के लिए पढ़ते हैं। पहले-पहले तो अल्फ पर समझाना है। गीता पर ही सारा मदार है। मनुष्यों को कैसे पता पड़े सृष्टि चक्र कैसे फिरता है, हम कहाँ से आये हैं, फिर कहाँ जाना है। कोई को पता नहीं है। कौन देश से आया, कौन देश है जाना। गीत भी है ना, सिर्फ तोते मुआफ़िक गाते रहते हैं। बुद्धि जो आत्मा में है वह नहीं जानती कि हम जिसको हे परमपिता परमात्मा कहते हैं वह कौन है। उनको न देख सकते हैं, न जान सकते हैं। आत्मा का तो फ़र्ज है ना - बाप को जानना, देखना। अभी तुम समझ गये हो, हम आत्मा हैं परमपिता परमात्मा बाप हमको पढ़ाते हैं। बुद्धि कहती है बाप आकर पढ़ाते हैं। जैसे किसकी आत्मा को बुलाते हैं तो समझते हैं ना उनकी आत्मा आई है। तो तुम समझते हो हम आत्मा हैं, हमारा वह बाप है। बाप से जरूर वर्सा मिलना चाहिए। हम दु:खी क्यों हुए हैं, मनुष्य तो कह देते बाप ही सुख दु:ख देने वाला है। भगवान् को गाली देते रहते हैं। वह हैं आसुरी सन्तान। जैसे कल्प पहले कहा है वैसे कहते हैं। तुम अभी प्रैक्टिकल में ईश्वरीय सन्तान बने हो। आगे तुम आसुरी औलाद थे। अब बाप कहते हैं निरन्तर मुझे याद करो। किसको भी यह दो अक्षर समझाना बहुत सहज है। तुम भगवान् के बच्चे हो। भगवान् ने स्वर्ग रचा, अब नर्क बना है फिर स्वर्ग बाप ही रचेंगे। बाप हमको राजयोग सिखला रहे हैं, स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। अच्छा, शिव को नहीं जानते हो। प्रजापिता ब्रह्मा को भी रचने वाला वह बाप है। तो जरूर बाप ब्रह्मा द्वारा ही सिखायेंगे। अभी शूद्र वर्ण है। हम ब्राह्मण से देवता क्षत्रिय बनेंगे। नहीं तो विराट रूप क्यों बनाया है, चित्र ठीक है। परन्तु समझ नहीं सकते।

शूद्रों को ब्राह्मण कौन बनायेंगे? जरूर प्रजापिता ब्रह्मा चाहिए। उनको कैसे एडाप्ट किया। जैसे तुम कहते हो यह मेरी स्त्री, उनको 'मेरी' कैसे बनाया? एडाप्ट किया। बाप कहते हैं मुझे भी मात-पिता कहते हो, मैं बाप तो हूँ। मेरी कहाँ से लाऊं। तो इनमें प्रवेश कर इनका नाम ब्रह्मा रखता हूँ। स्त्री एडाप्ट की जाती है, जैसे लौकिक बाप स्त्री को एडाप्ट कर कुख वंशावली रचते हैं, बाबा ने फिर इनमें प्रवेश कर इनको एडाप्ट कर इनके मुख द्वारा मुखवंशावली बनाई है। तुम कहते हो हम ब्राह्मण-ब्राह्मणियां हैं। जरूर इनका ही नाम ब्रह्मा है। ब्रह्मा किसका बच्चा? शिवबाबा का। इनको किसने एडाप्ट किया? बेहद के बाप ने। दृष्टान्त बड़ा अच्छा है परन्तु जिसकी बुद्धि में बैठा होगा वह समझा सकेंगे। बुद्धि में नहीं होगा तो उनको समझाने आयेगा ही नहीं। लौकिक और पारलौकिक बाप तो है ना। वह भी स्त्री को एडाप्ट कर मेरी कहते हैं। यह फिर इनमें प्रवेश कर एडाप्ट करते हैं। खुद कहते हैं मुझ निराकार को इनका आधार लेना पड़ता है, तो नाम भी बदली करता हूँ। एक ही टाइम कितनों के नाम रखे। नाम की लिस्ट भी तुम्हारे पास होनी चाहिए। प्रदर्शनी में नाम की लिस्ट भी दिखानी चाहिए। बाबा ने कैसे एक ही समय नाम रखे। बाबा ने हमको अपना बनाया तो नाम बदलाया, उनको भृगु ऋषि कहते हैं। जन्म पत्री तो भगवान् के पास ही है। वन्डरफुल नाम हैं। अब सभी तो हैं नहीं। कोई तो आश्चर्यवत् भागन्ती हो गये। आज हैं, कल हैं नहीं। नम्बरवन दुश्मन है काम। यह काम विकार बहुत तंग करता है। उस पर जीत पानी है। गृहस्थ व्यवहार में इकट्ठे रहकर उन पर जीत पानी है - यह है प्रतिज्ञा। अपनी वृत्ति देखनी है, कर्मेन्द्रियों से विकर्म नहीं करना है। तूफान तो सबको आते हैं। इसमें डरना नहीं है।

बाबा से बहुत बच्चे पूछते हैं यह धंधा करें वा नहीं करें? बाबा लिखते हैं मैं कोई तुम्हारे धन्धे आदि को देखने आया हूँ क्या? मैं तो टीचर हूँ, पढ़ाने के लिए। धन्धे की बात हमसे क्यों पूछते हो? मैं तो राजयोग सिखाता हूँ। रुद्र यज्ञ भी गाया हुआ है, कृष्ण यज्ञ नहीं। बाप कहते हैं लक्ष्मी-नारायण में यह सृष्टि चक्र का ज्ञान ही नहीं। अगर यह मालूम हो कि 16 कला से फिर 14 कला बनना है तो उसी समय ही राजाई का नशा उड़ जाए। वहाँ तो है ही सद्गति। सद्गति दाता तो एक है। वही आकर युक्ति बताते हैं, दूसरा कोई बतला न सके। पहले-पहले यह बात उठाओ कि किसने कहा है - काम महाशत्रु है? यह भी गाते हैं विशश वर्ल्ड और वाइसलेस वर्ल्ड। भारत में ही रावण को जलाते रहते हैं। सतयुग में थोड़ेही जलायेंगे। अगर यह कहते हैं कि अनादि है, सतयुग में भी था फिर तो सब जगह दु:ख ही दु:ख होगा। फिर स्वर्ग कैसे कहेंगे? यह बातें समझानी है। हरेक की रफ्तार अपनी है। पता लग जाता है - कौन अच्छी रफ्तार वाला है? सम्पूर्ण तो कोई बने नहीं हैं। बाकी हाँ, सतो, रजो, तमो तो होते ही हैं। बुद्धि हर एक की अलग-अलग है। जो श्रीमत पर नहीं चलते हैं - वह हैं तमोप्रधान बुद्धि। अपने को इन्श्योर नहीं करेंगे तो भविष्य 21 जन्मों के लिए कैसे मिलेगा। मरना तो है ही। तो क्यों न इन्श्योर कर देना चाहिए। सब कुछ उनका है। तो परवरिश भी वह करेंगे। भल कोई सब कुछ देते हैं, परन्तु सर्विस नहीं करते, जो दिया वह खाते रहते हैं। तो बाकी जमा क्या होगा। कुछ भी नहीं। सर्विस का सबूत चाहिए। देखा जाता है - कौन पण्डे बन आते हैं? नये बी.के. भी आपस में सेन्टर चलाते हैं, उनको भी आफरीन दी जाती है। यह नॉलेज तो बड़ी सहज है। वानप्रस्थ अवस्था वालों को जाकर समझाओ - वानप्रस्थ अवस्था कब होती है? बाप ही गाइड बन सबको ले जायेंगे। तुम जानते हो बाप ही कालों का काल है। हम तो खुशी से बाबा के साथ इकट्ठे जाना चाहते हैं।

पहले-पहले तो मुख्य बात यह उठाओ - गीता का भगवान् कौन है, जिसने रचना रची? लक्ष्मी-नारायण को राजयोग किसने सिखाया? उनकी भी राजधानी स्थापन हो रही है। और कोई राजधानी स्थापन करने आते नहीं। बाप ही राजधानी स्थापन करने आते हैं। सब पतितों को पावन बनाते हैं। यह है विशश वर्ल्ड, वह है वाइसलेस वर्ल्ड। दोनों में नम्बरवार मर्तबे हैं। जो श्रीमत पर चलने वाले होंगे, उनकी बुद्धि में ही यह बातें बैठ सकती हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बुद्धि की लाइन सदा क्लीयर रहे इसके लिए देही-अभिमानी रहना है। सच्ची कमाई में माया किसी प्रकार से घाटा न डाल दे - यह सम्भाल करनी है।

2) कर्मेन्द्रियों से कोई भी विकर्म नहीं करना है। इन्श्योर करने के बाद सर्विस भी जरूर करनी है।

वरदान:-

योग की धूप में आंसुओं की टंकी को सुखाकर रोना प्रूफ बनने वाले सुख स्वरूप भव

कई बच्चे कहते हैं कि फलाना दु:ख देता है इसलिए रोना आता है। लेकिन वह देते हैं आप लेते क्यों हो? उनका काम है देना, आप लो ही नहीं। परमात्मा के बच्चे कभी रो नहीं सकते। रोना बन्द। न आंखों का रोना, न मन का रोना। जहाँ खुशी होगी वहाँ रोना नहीं होगा। खुशी वा प्यार के आंसू को रोना नहीं कहा जाता। तो योग की धूप में आंसुओं की टंकी को सुखा दो, विघ्नों को खेल समझो तो सुख स्वरूप बन जायेंगे।

स्लोगन:-

साक्षी रहकर पार्ट बजाने का अभ्यास हो तो टेन्शन से परे स्वत: अटेन्शन में रहेंगे।