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22-02-2019

22-02-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - सदा याद रखो कि हम ब्राह्मण चोटी हैं, पुरूषोत्तम बन रहे हैं तो हर्षित रहेंगे, अपने आप से बातें करना सीखो तो अपार खुशी रहेगी।''

प्रश्नः-

बाप की शरण में कौन आ सकते हैं? बाप शरण किसको देते हैं?

उत्तर:-

बाप की शरण में वही आ सकते हैं जो पूरा-पूरा नष्टोमोहा हो। जिनका बुद्धियोग सब तऱफ से टूटा हुआ हो। मित्र सम्बन्धियों आदि में बुद्धि की लागत न हो। बुद्धि में रहे मेरा तो एक बाबा दूसरा न कोई। ऐसे बच्चे ही सर्विस कर सकते हैं। बाप भी ऐसे बच्चों को ही शरण देते हैं।

ओम् शान्ति।

यह है रूहानी बाप, टीचर, गुरू। यह तो बच्चे अच्छी रीति समझ गये हैं दुनिया इन बातों को नहीं जानती। भल सन्यासी कहते हैं शिवोहम्। तो भी ऐसे नहीं कहेंगे कि हम बाप टीचर गुरू हैं। वह सिर्फ कहते हैं शिवोहम् तत् त्वम्। परमात्मा सर्वव्यापी है तो हरेक बाप टीचर गुरू हो जाये। ऐसे तो कोई समझते भी नहीं। मनुष्य अपने को भगवान, परमात्मा कहलायें यह तो बिल्कुल ही रांग है। बच्चों को जो बाप समझाते हैं वह तो बुद्धि में धारण होता है ना। उस पढ़ाई में कितनी सब्जेक्ट होती हैं, ऐसे नहीं सब सब्जेक्ट स्टूडेन्ट की बुद्धि में रहती हैं। यहाँ जो बाप पढ़ाते हैं वह एक सेकेण्ड में बच्चों की बुद्धि में आ जाता है। तुम रचयिता और रचना के आदि मध्य अन्त का ज्ञान सुनाते हो। तुम ही त्रिकालदर्शी वा स्वदर्शन चक्रधारी बनते हो। उस जिस्मानी पढ़ाई में सब्जेक्ट बिल्कुल अलग हैं। तुम सिद्ध कर समझाते हो, सर्व का सद्गति दाता वह एक ही बाप है। सभी आत्मायें परमात्मा को याद करती हैं। कहती हैं ओ गॉड फादर। तो ज़रूर बाप से वर्सा मिलता होगा। वह वर्सा खोने से दु:ख में आ जाते हैं। यह सुख दु:ख का खेल है। इस समय सभी पतित दु:खी हैं। पवित्र बनने से सुख ज़रूर मिलता है। सुख की दुनिया बाप स्थापन करते हैं। बच्चों को बुद्धि में यह रखना है कि हमको बाप समझाते हैं, नॉलेजफुल एक बाप ही है। सृष्टि के आदि मध्य अन्त का ज्ञान बाप ही देते हैं। और सभी धर्म जो स्थापन हुए हैं वह अपने समय पर आयेंगे। यह बातें और कोई की बुद्धि में नहीं हैं। तुम बच्चों के लिए बाप ने यह पढ़ाई बिल्कुल सहज रखी है। सिर्फ थोड़ा विस्तार से समझाते हैं। मुझ बाप को याद करो तो तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे। योग की महिमा बहुत है। प्राचीन योग भारत का गाया हुआ है। परन्तु योग से फायदा क्या हुआ था, यह किसको पता नहीं है। यह है गीता का वही योग जो निराकार भगवान सिखलाते हैं। बाकी जो भी सिखलाते हैं वह मनुष्य हैं, देवताओं के पास तो योग की बात ही नहीं। यह हठयोग आदि सब मनुष्य सिखलाते हैं। देवतायें न सीखते हैं, न सिखलाते हैं। दैवी दुनिया में योग की बात नहीं। योग से सब पावन बन जाते हैं। वह ज़रूर यहाँ बनेंगे। बाप आते ही हैं संगम पर नई दुनिया बनाने। अभी तुम पुरानी दुनिया से नई दुनिया में बदली हो रहे हो। यह किसको समझाना भी वन्डर है। हम ब्राह्मण चोटी हैं, सतयुग और कलियुग के बीच में हैं ब्राह्मण चोटी। इसको ही संगमयुग कहा जाता है, जिसमें तुम पुरूषोत्तम बन रहे हो। यह बच्चों की बुद्धि में रहे कि हम पुरूषोत्तम बनते हैं तो सदैव हर्षित रहेंगे। जितना सर्विस करेंगे उतना हर्षित रहेंगे। कमाई करनी और करानी है। जितना प्रदर्शनी में सर्विस करेंगे तो सुनने वालों को भी सुख मिलेगा। अपना और दूसरों का कल्याण होगा। छोटे सेन्टर पर भी मुख्य 5-6 चित्र ज़रूर चाहिए। उन पर समझाना सहज है। सारा दिन सर्विस ही सर्विस। मित्र सम्बन्धियों तऱफ कोई भी लागत नहीं होनी चाहिए। जो इन ऑखों से देख रहे हो उन सबका विनाश होना है। बाकी जो दिव्य दृष्टि से देखते हो उनकी स्थापना हो रही है। ऐसे अपने से बातें करो तो तुम पक्के हो जायेंगे। बेहद के बाप से मिलने की खुशी होनी चाहिए। कोई राजा के पास जन्म लेता है तो कितना फखुर में रहता है। तुम बच्चे स्वर्ग के मालिक बन रहे हो। हर एक अपने लिए मेहनत कर रहे हैं। बाप सिर्फ कहते हैं काम चिता पर बैठ तुम काले हो गये हो। अब ज्ञान चिता पर बैठो तो गोरे बन जायेंगे। बुद्धि में यही चिन्तन चलता रहे, भल ऑफिस में काम करते रहो, याद करते रहो। ऐसे नहीं फुर्सत नहीं है। जितनी फुर्सत मिले रूहानी कमाई करो। कितनी बड़ी कमाई है। हेल्थ वेल्थ दोनों एक साथ मिलती हैं। एक कहानी है अर्जुन और भील की। ऐसे गृहस्थ व्यवहार में रहकर ज्ञान-योग में अन्दर वालों से भी तीखे जा सकते हैं। सारा मदार याद पर है। यहाँ सब बैठ जायेंगे तो सर्विस कैसे करेंगे। रिफ्रेश होकर सर्विस में लग जाना है। सर्विस का ख्याल रखना चाहिए। बाबा तो प्रदर्शनी में जा न सके क्योंकि बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। बाबा की आत्मा और इनकी आत्मा इकट्ठी है। यह वन्डरफुल युगल है। इस युगल को तुम बच्चों के सिवाए कोई जान न सके। अपने को युगल भी समझते हैं फिर भी कहते हैं मैं एक ही बाबा का सिकीलधा बच्चा हूँ। इस लक्ष्मी-नारायण के चित्र को देखकर बहुत खुशी होती है। हमारा दूसरा जन्म यह है, हम गद्दी पर जरूर बैठेंगे। तुम भी राजयोग सीख रहे हो, एम आब्जेक्ट सामने खड़ी है। इन्हें तो खुशी है कि मैं बाबा का सिकीलधा बच्चा हूँ। फिर भी सदैव याद ठहरती नहीं। और-और तऱफ ख्यालात चले जाते हैं। ड्रामा का लॉ नहीं जो एकदम याद ठहर जाए और कोई ख्याल न आये। माया के तूफान याद नहीं करने देते। जानता हूँ हमारे लिए बहुत सहज है, क्योंकि बाबा की प्रवेशता है। बाबा का नम्बरवन सिकीलधा बच्चा हूँ। पहले नम्बर में राजकुमार बनूँगा फिर भी याद भूल जाती है। अनेक प्रकार के ख्यालात आ जाते हैं। यह है माया। जब इस बाबा को अनुभव हो तब तो तुम बच्चों को समझा सके। यह ख्यालात बन्द तब होंगे जब कर्मातीत अवस्था होगी। आत्मा सम्पूर्ण बन जाए फिर तो यह शरीर रह न सके। शिवबाबा तो सदैव प्योर ही प्योर है। पतित दुनिया और पतित शरीर में आकर पावन बनाने का पार्ट भी इनका ही है। ड्रामा में बंधायमान हैं। तुम पावन बन गये तो फिर नया शरीर चाहिए। शिवबाबा को अपना शरीर तो है नहीं। इस तन में इस आत्मा का महत्व है। उनका रखा क्या है! वह तो मुरली चलाकर चले जाते हैं। वह फ्री हैं। कभी कहाँ, कभी कहाँ चले जायेंगे। बच्चों को भी फील होता है कि यह शिवबाबा मुरली चला रहे हैं। तुम बच्चे समझते हो हम बाप को मदद करने के लिए इस गॉडली सर्विस पर खड़े हैं। बाप कहते हैं हम भी अपना स्वीट होम छोड़कर आये हैं। परमधाम अर्थात् परे ते परे धाम है मूलवतन। बाकी खेल सारा सृष्टि पर चलता है। तुम जानते हो यह वन्डरफुल खेल है। बाकी दुनिया एक है।

वो लोग चांद पर जाने की कोशिश करते हैं, यह तो साइन्स का बल है। साइलेन्स के बल से हम जब साइन्स पर जीत पाते हैं तब साइन्स भी सुखदाई बन जाती है। यहाँ साइन्स सुख भी देती है तो दु:ख भी देती है। वहाँ तो सुख ही सुख है। दु:ख का नाम नहीं। ऐसी बातें सारा दिन बुद्धि में रहनी चाहिए। बाबा को कितने ख्यालात रहते हैं। बाँधेलियाँ विष पर कितनी मारें खाती हैं। कोई तो मोह वश फिर फँस पड़ते हैं। निश्चयबुद्धि वाले झट कहेंगे हमको अमृत पीना है, इसमें नष्टोमोहा चाहिए। पुरानी दुनिया से दिल उठ जानी चाहिए। ऐसे ही सर्विसएबुल दिल पर चढ़ सकते हैं। उनको शरणागति दे सकते हैं। कन्या पति की शरण में जाती है, विष बिगर नहीं रखते। फिर बाप को शरण लेना पड़ता है। परन्तु एकदम नष्टोमोहा चाहिए। पतियों का पति मिला अब उनसे हम बुद्धियोग की सगाई करते हैं। बस मेरा तो एक दूसरा न कोई। जैसे कन्या की पति से प्रीत जुट जाती है, यह है आत्मा की प्रीत परमात्मा से। उनसे दु:ख मिलता है, इनसे सुख मिलता है। यह है संगम, इसको कोई जानता नहीं। तुमको कितनी खुशी होनी चाहिए। हमको खिवैया अथवा बागवान मिला है, जो हमको फूलों के बगीचे में ले जाते हैं। इस समय सभी मनुष्य काँटे मिसल बन पड़े हैं। सबसे बड़ा काँटा है काम का। पहले तुम निर्विकारी फूल थे, धीरे-धीरे कला कम हो गई अब तो बड़े काँटे हो गये हो। बाबा को बबुलनाथ भी कहते हैं। तुम जानते हो असली नाम शिव है। बबुलनाथ नाम रखते हैं क्योंकि काँटों को फूल बनाते हैं। भक्ति मार्ग में बहुत नाम रखते हैं। वास्तव में नाम एक ही शिव है। रूद्र ज्ञान यज्ञ वा शिव ज्ञान यज्ञ बात एक ही है। रूद्र यज्ञ से विनाश ज्वाला निकली और श्रीकृष्णपुरी अथवा आदि सनातन देवी देवता धर्म की स्थापना हुई। तुम इस यज्ञ द्वारा मनुष्य से देवता बनते हो। चित्र भी वन्डरफुल बनाते हैं। विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला। यह सब बातें तुम जानते हो कि ब्रह्मा सरस्वती ही लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। यह निश्चय है। लक्ष्मी-नारायण ही 84 जन्मों के बाद ब्रह्मा सरस्वती बनते हैं। मनुष्य तो ऐसी बातें सुनकर चक्रित होते होंगे। खुशी में भी आते होंगे। परन्तु माया कम नहीं है। काम महाशत्रु है। माया नाम रूप में फँसाए गिरा देती है। बाप को याद करने नहीं देती। फिर वह खुशी कम हो जाती है। इसमें खुश नहीं होना चाहिए कि हम बहुतों को समझाते हैं, पहले देखना है बाबा को कितना याद करता हूँ। रात को बाबा को याद करके सोता हूँ या भूल जाता हूँ। कोई बच्चे तो पक्के नेमी भी हैं।

तुम बच्चे बहुत लक्की हो। बाप के ऊपर तो बहुत बोझ हैं। परन्तु फिर भी रथ को रियायत मिल जाती है। ज्ञान और योग भी है, इसके बिगर लक्ष्मी-नारायण पद कैसे पायेंगे। खुशी तो रहती है, हम अकेला बाप का बच्चा हूँ और फिर मेरे ढेर बच्चे हैं, यह नशा भी रहता है तो माया विघ्न भी डालती है। बच्चों को भी माया के विघ्न आते होंगे। कर्मातीत अवस्था आगे चलकर आनी है। यह बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। कहते हैं मीठे-मीठे बच्चे.. बाप तो प्यार का सागर है। इनकी आत्मा इकट्ठी है। यह भी प्यार करते हैं। समझते हैं जैसा कर्म मैं करुँगा, मुझे देख और भी करेंगे। बहुत मीठा रहना है। बच्चे बड़े सयाने चाहिए। इन लक्ष्मी-नारायण में देखो कितनी सयानप है। सयानप से विश्व का राज्य लिया है। प्रदर्शनी द्वारा प्रजा तो बहुत बनती है। भारत बहुत बड़ा है, इतनी सर्विस करनी है। दूसरा याद में रहकर विकर्म भी विनाश करने हैं। यह है कड़ा फुरना (फिकर)। हम तमोप्रधान से सतोप्रधान कैसे बनें? इसमें मेहनत है। सर्विस के चांस बहुत हैं। ट्रेन में बैज पर सर्विस कर सकते हो। यह बाबा यह वर्सा। बरोबर 5 हज़ार वर्ष पहले भारत स्वर्ग था। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। फिर ज़रूर इनका राज्य आना चाहिए। हम बाबा की याद से पावन दुनिया का मालिक बन रहे हैं। ट्रेन में बहुत सर्विस हो सकती है। एक डिब्बे में सर्विस कर फिर दूसरे में जाना चाहिए। ऐसी सर्विस करने वाला ही दिल पर चढ़ेगा। बोलो, हम आपको खुशखबरी सुनाते हैं। तुम पूज्य देवता थे फिर 84 जन्म ले पुजारी बने। अब फिर पूज्य बनो। सीढ़ी अच्छी है, इनसे ही सतो रजो तमो स्टेज सिद्ध करनी है। स्कूल में पिछाड़ी में गैलप करने का शौक होता है। अब यहाँ भी समझाया जाता है जिन्हों ने टाइम वेस्ट किया है, उन्हों को गैलप कर सर्विस में लग जाना चाहिए। सर्विस की मार्जिन बहुत है। सर्विसएबुल बच्चियाँ बहुत निकलनी चाहिए, जिनको बाबा कहाँ भी भेज दे। मन्दिरों में सर्विस अच्छी होगी। देवता धर्म वाले झट समझेंगे। गंगा स्नान पर भी तुम समझा सकते हो, तो दिल पर लगेगा ज़रूर। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सदा हर्षित रहने के लिए रूहानी सर्विस करनी है, सच्ची कमाई करनी और करानी है। अपना और दूसरों का कल्याण करना है। ट्रेन में भी बैज पर सर्विस करनी है।

2) पुरानी दुनिया से दिल हटा लेनी है। नष्टोमोहा बनना है, एक बाप से सच्ची प्रीत रखनी है।

वरदान:-

कर्म और योग के बैलेन्स द्वारा ब्लैसिंग का अनुभव करने वाले कर्मयोगी भव

कर्मयोगी अर्थात् हर कर्म योगयुक्त हो। कर्मयोगी आत्मा सदा ही कर्म और योग का साथ अर्थात् बैलेन्स रखने वाली होगी। कर्म और योग का बैलेन्स होने से हर कर्म में बाप द्वारा तो ब्लैसिंग मिलती ही है लेकिन जिसके भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हैं उनसे भी दुआयें मिलती हैं। कोई अच्छा काम करता है तो दिल से उसके लिए दुआयें निकलती हैं कि बहुत अच्छा है। बहुत अच्छा मानना ही दुआयें हैं।

स्लोगन:-

सेकेण्ड में संकल्पों को स्टॉप करने का अभ्यास ही कर्मातीत अवस्था के समीप लायेगा।