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19-07-20

19-07-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 25-02-86 मधुबन


डबल विदेशी भाई-बहिनों के समर्पण समारोह पर अव्यक्त बापदादा के महावाक्य

आज बापदादा विशेष श्रेष्ठ दिन की विशेष स्नेह भरी मुबारक दे रहे हैं। आज कौन-सा समारोह मनाया? बाहर का दृश्य तो सुन्दर था ही। लेकिन सभी के उमंग-उत्साह और दृढ़ सकंल्प का, दिल का आवाज दिलाराम बाप के पास पहुंचा। तो आज के दिन को विशेष उमंग-उत्साह भरा दृढ़ संकल्प समारोह कहेंगे। जब से बाप के बने तब से सम्बन्ध है और रहेगा। लेकिन यह विशेष दिन विशेष रूप से मनाया इसको कहेंगे दृढ़ संकल्प किया। कुछ भी हो जाए चाहे माया के तूफान आयें, चाहे लोगों की भिन्न-भिन्न बातें आयें, चाहे प्रकृति का कोई भी हलचल का नज़ारा हो। चाहे लौकिक वा अलौकिक सम्बन्ध में किसी भी प्रकार के सरकमस्टांस हों, मन के सकंल्पों का बहुत जोर से तूफान भी हो तो भी एक बाप दूसरा न कोई। एक बल एक भरोसा ऐसा दृढ़ संकल्प किया वा सिर्फ स्टेज पर बैठे! डबल स्टेज पर बैठे थे या सिंगल स्टेज पर? एक थी यह स्थूल स्टेज, दूसरी थी दृढ़ संकल्प की स्टेज, दृढ़ता की स्टेज। तो डबल स्टेज पर बैठे थे ना? हार भी बहुत सुन्दर पहने। सिर्फ यह हार पहना वा सफलता का भी हार पहना? सफलता गले का हार है। यह दृढ़ता ही सफलता का आधार है। इस स्थूल हार के साथ सफलता का हार भी पड़ा हुआ था ना। बापदादा डबल दृश्य देखते हैं। सिर्फ साकार रूप का दृश्य नहीं देखते। लेकिन साकार दृश्य के साथ-साथ आत्मिक स्टेज मन के दृढ़ संकल्प और सफलता की श्रेष्ठ माला यह दोनों देख रहे थे। डबल माला डबल स्टेज देख रहे थे। सभी ने दृढ़ संकल्प किया। बहुत अच्छा। कुछ भी हो जाए लेकिन सम्बन्ध को निभाना है। परमात्म प्रीति की रीति सदा निभाते हुए सफलता को पाना है। निश्चित है सफलता गले का हार है। एक बाप दूसरा न कोई- यह है दृढ़ संकल्प। जब एक है तो एकरस स्थिति स्वत: और सहज है। सर्व सम्बन्धों की अविनाशी तार जोड़ी है ना। अगर एक भी सम्बन्ध कम होगा तो हलचल होगी इसलिए सर्व सम्बन्धों की डोर बांधी। कनेक्शन जोड़ा। संकल्प किया। सर्व सम्बन्ध हैं या सिर्फ मुख्य 3 सम्बन्ध हैं? सर्व सम्बन्ध हैं तो सर्व प्राप्तियां हैं। सर्व सम्बन्ध नहीं तो कोई न कोई प्राप्ति की कमी रह जाती है। सभी का समारोह हुआ ना। दृढ़ संकल्प करने से आगे पुरुषार्थ में भी विशेष रूप से लिफ्ट मिल जाती है। यह विधि भी विशेष उमंग-उत्साह बढ़ाती है। बापदादा भी सभी बच्चों को दृढ़ संकल्प करने के समारोह की बधाई देते हैं। और वरदान देते सदा अविनाशी भव। अमर भव।

आज एशिया का ग्रुप बैठा है। एशिया की विशेषता क्या है? विदेश सेवा का पहला ग्रुप जापान में गया, यह विशेषता हुई ना। साकार बाप की प्रेरणा प्रमाण विशेष विदेश सेवा का निमंत्रण और सेवा का आरम्भ जापान से हुआ। तो एशिया का नम्बर स्थापना में आगे हुआ ना। पहला विदेश का निमंत्रण था। और धर्म वाले निमंत्रण दे बुलावें इसका आरम्भ एशिया से हुआ। तो एशिया कितना लकी है! और दूसरी विशेषता - एशिया भारत के सबसे समीप है। जो समीप होता है उनको सिकीलधे कहते हैं। सिकीलधे बच्चे छिपे हुए हैं, हर स्थान पर कितने अच्छे-अच्छे रत्न निकले हैं। क्वान्टिटी भले कम है लेकिन क्वालिटी है। मेहनत का फल अच्छा है। इस तरह धीरे-धीरे अब संख्या बढ़ रही है। सब स्नेही हैं। सब लवली हैं। हर एक, एक दो से ज्यादा स्नेही हैं। यही ब्राह्मण परिवार की विशेषता है। हर एक यह अनुभव करता है कि मेरा सबसे ज्यादा स्नेह है और बाप का भी मेरे से ज्यादा स्नेह है। मेरे को ही बापदादा आगे बढ़ाता है इसलिए भक्ति मार्ग वालों ने भी बहुत अच्छा एक चित्र अर्थ से बनाया है। हर एक गोपी के साथ वल्लभ है। सिर्फ एक राधे के साथ वा सिर्फ 8 पटरानियों के साथ नहीं। हर एक गोपी के साथ गोपीवल्लभ है। जैसे दिलवाला मन्दिर में जाते हो तो नोट करते हो ना कि यह मेरा चित्र है अथवा मेरी कोठी है। तो इस रास मण्डल में भी आप सबका चित्र है? इसको कहते ही हैं महारास। इस महारास का बहुत बड़ा गायन है। बापदादा का हर एक से एक दो से ज्यादा प्यार है। बापदादा हरेक बच्चे के श्रेष्ठ भाग्य को देख हर्षित होते है। कोई भी है लेकिन कोटों में कोई है। पदमापदम भाग्यवान है। दुनिया के हिसाब से देखो तो इतने कोटों में से कोई हो ना। जापान तो कितना बड़ा है लेकिन बाप के बच्चे कितने हैं! तो कोटों में कोई हुए ना। बापदादा हर एक की विशेषता, भाग्य देखते हैं। कोटों में कोई सिकीलधे हैं। बाप के लिए सभी विशेष आत्मायें हैं। बाप किसको साधारण, किसको विशेष नहीं देखते। सब विशेष हैं। इस तरफ और ज्यादा वृद्धि होनी है क्योंकि इस पूरे साइड में डबल सेवा विशेष है। एक तो अनेक वैरायटी धर्म के हैं। और इस तरफ सिन्ध की निकली हुई आत्मायें भी बहुत हैं। उन्हों की सेवा भी अच्छी कर सकते हो। उन्हों को समीप लाया तो उन्हों के सहयोग से और धर्मों तक भी सहज पहुँच सकेंगे। डबल सेवा से डबल वृद्धि कर सकते हो। उन्हों में किसी न किसी रीति से उल्टे रूप में चाहे सुल्टे रूप में बीज पड़ा हुआ है। परिचय होने के कारण सहज सम्बन्ध में आ सकते हैं। बहुत सेवा कर सकते हो क्योंकि सर्व आत्माओं का परिवार है। ब्राह्मण सभी धर्मों में बिखर गये हैं। ऐसा कोई धर्म नहीं जिसमें ब्राह्मण न पहुँचे हों। अब सब धर्मों से निकल-निकलकर आ रहे हैं। और जो ब्राह्मण परिवार के हैं उन्हों से अपना-पन लगता है ना। जैसे कोई हिसाब-किताब से गये और फिर से अपने परिवार में पहुँच गये। कहाँ-कहाँ से पहुंच अपना सेवा का भाग्य लेने के निमित्त बन गये। यह कोई कम भाग्य नहीं। बहुत श्रेष्ठ भाग्य है। बड़े ते बड़े पुण्य आत्मायें बन जाते। महादानियों, महान सेवाधारियों की लिस्ट में आ जाते। तो निमित्त बनना भी एक विशेष गिफ्ट है। और डबल विदेशियों को यह गिफ्ट मिलती है। थोड़ा ही अनुभव किया और निमित्त बन जाते सेन्टर स्थापन करने के। तो यह भी लास्ट सो फास्ट जाने की विशेष गिफ्ट है। सेवा करने से मैजारिटी को यह स्मृति में रहता है कि जो हम निमित्त करेंगे अथवा चलेंगे, हमको देख और करेंगे। तो यह डबल अटेन्शन हो जाता है। डबल अटेन्शन होने के कारण डबल लिफ्ट हो जाती है। समझा- डबल विदेशियों को डबल लिफ्ट है। अभी सब तरफ धरनी अच्छी हो गई है। हल चलने के बाद धरनी ठीक हो जाती है ना। और फिर फल भी अच्छे और सहज निकलते हैं। अच्छा - एशिया के बड़े माइक का आवाज भारत में जल्दी पहुँचेगा इसलिए ऐसे माइक तैयार करो। अच्छा!

बड़ी दादियों से:- आप लोगों की महिमा भी क्या करें! जैसे बाप के लिए कहते हैं ना - सागर को स्याही बनायें, धरनी को कागज बनायें.....ऐसे ही आप सभी दादियों की महिमा है। अगर महिमा शुरू करें तो सारी रात-दिन एक सप्ताह का कोर्स हो जायेगा। अच्छे हैं, सबकी रास अच्छी है। सभी की राशि मिलती है और सभी रास करते भी अच्छी हैं। हाथ में हाथ मिलाना अर्थात् विचार मिलाना यही रास है। तो बापदादा दादियों की यही रास देखते रहते हैं। अष्ट रत्नों की यही रास है।

आप दादियाँ परिवार का विशेष श्रृंगार हो। अगर श्रृंगार न हो तो शोभा नहीं होती है। तो सभी उसी स्नेह से देखते हैं।

बृजइन्द्रा दादी से:- बचपन से लौकिक में, अलौकक में श्रृंगार करती रही तो श्रृंगार करते-करते श्रृंगार बन गई। ऐसे हैं ना! बापदादा महावीर महारथी बच्चों को सदा ही याद तो क्या करते लेकिन समाये हुए रहते हैं। जो समाया हुआ होता है उनको याद करने की भी जरूरत नहीं। बापदादा सदा ही हर विशेष रत्न को विश्व के आगे प्रत्यक्ष करते हैं। तो विश्व के आगे प्रत्यक्ष होने वाली विशेष रत्न हो। एकस्ट्रा सभी के खुशी की मदद है। आपकी खुशी को देखकर सबको खुशी की खुराक मिल जाती है इसलिए आप सबकी आयु बढ़ रही है क्योंकि सभी के स्नेह की आर्शीवाद मिलती रहती है। अभी तो बहुत कार्य करना है, इसलिए श्रृंगार हो परिवार का। सभी कितने प्यार से देखते हैं। जैसे कोई का छत्र उतर जाए तो माथा कैसे लगेगा। छत्र पहनने वाला अगर छत्र न पहने तो क्या लगेगा। तो आप सभी भी परिवार के छत्र हो।

निर्मलशान्ता दादी से:- अपना यादगार सदा ही मधुबन में देखती रहती हो। यादगार होते हैं याद करने के लिए। लेकिन आपकी याद यादगार बना देती है। चलते-फिरते सभी परिवार को निमित्त बने हुए आधार मूर्त याद आते रहते हैं। तो आधार मूर्त हो। स्थापना के कार्य के आधार मूर्त मजबूत होने के कारण यह वृद्धि की, उन्नति की बिल्डिंग कितनी मजबूत हो रही है। कारण? आधार मजबूत है। अच्छा!

डबल लाइट बनो (अव्यक्त मुरलियों से चुने हुए अनमोल रत्न)

डबल लाइट अर्थात् आत्मिक स्वरूप में स्थित होने से हल्कापन स्वत: हो जाता है। ऐसे डबल लाइट को ही फरिश्ता कहा जाता है। फरिश्ता कभी किसी भी बन्धन में नहीं बंधता। इस पुरानी दुनिया के, पुरानी देह के आकर्षण में नहीं आता क्योंकि है ही डबल लाइट।

डबल लाइट अर्थात् सदा उड़ती कला का अनुभव करने वाले क्योंकि जो हल्का होता है वह सदा ऊंचा उड़ता है, बोझ वाला नीचे जाता है। तो डबल लाइट आत्मायें अर्थात् कोई बोझ न हो क्योंकि कोई भी बोझ होगा तो ऊंची स्थिति में उड़ने नहीं देगा। डबल जिम्मेवारी होते भी डबल लाइट रहने से लौकिक जिम्मेवारी कभी थकायेगी नहीं क्योंकि ट्रस्टी हो। ट्रस्टी को क्या थकावट। अपनी गृहस्थी, अपनी प्रवृति समझेंगे तो बोझ है। अपना है ही नहीं तो बोझ किस बात का। बिल्कुल न्यारे और प्यारे। बालक सो मालिक।

सदा स्वयं को बाप के हवाले कर दो तो सदा हल्के रहेंगे। अपनी जिम्मेवारी बाप को दे दो अर्थात् अपना बोझ बाप को दे दो तो स्वयं हल्के हो जायेंगे। बुद्धि से सरेन्डर हो जाओ। अगर बुद्धि से सरेन्डर होंगे तो और कोई बात बुद्धि में नहीं आयेगी। बस सब कुछ बाप का है, सब कुछ बाप में है तो और कुछ रहा ही नहीं। डबल लाइट अर्थात् संस्कार स्वभाव का भी बोझ नहीं, व्यर्थ संकल्प का भी बोझ नहीं - इसको कहा जाता है हल्का। जितने हल्के होंगे उतना सहज उड़ती कला का अनुभव करेंगे। अगर योग में ज़रा भी मेहनत करनी पड़ती है तो जरूर कोई बोझ है। तो बाबा-बाबा का आधार ले उड़ते रहो।

सदा यही लक्ष्य याद रहे कि हमें बाप समान बनना है तो जैसे बाप लाइट है वैसे डबल लाइट। औरों को देखते हो तो कमजोर होते हो, सी फादर, फालो फादर करो। उड़ती कला का श्रेष्ठ साधन सिर्फ एक शब्द है -‘सब कुछ तेरा'। ‘मेरा' शब्द बदल ‘तेरा' कर दो। तेरा हूँ, तो आत्मा लाइट है। और जब सब कुछ तेरा है तो लाइट (हल्के) बन गये। जैसे शुरू-शुरू में अभ्यास करते थे - चल रहे हैं लेकिन स्थिति ऐसी जो दूसरे समझते कि यह कोई लाइट जा रही है। उनको शरीर दिखाई नहीं देता था, इसी अभ्यास से हर प्रकार के पेपर में पास हुए। तो अभी जबकि समय बहुत खराब आ रहा है तो डबल लाइट रहने का अभ्यास बढ़ाओ। दूसरों को सदैव आपका लाइट रूप दिखाई दे - यही सेफ्टी है। अन्दर आवें और लाइट का किला देखें।

जैसे लाइट के कनेक्शन से बड़ी-बड़ी मशीनरी चलती है। आप सभी हर कर्म करते कनेक्शन के आधार से स्वयं भी डबल लाइट बन चलते रहो। जहाँ डबल लाइट की स्थिति है वहाँ मेहनत और मुश्किल शब्द समाप्त हो जाता है। अपने पन को समाप्त कर ट्रस्टीपन का भाव और ईश्वरीय सेवा की भावना हो तो डबल लाइट बन जायेंगे। कोई भी आपके समीप सम्पर्क में आये तो महसूस करे कि यह रूहानी हैं, अलौकिक हैं। उनको आपका फरिश्ता रूप ही दिखाई दे। फरिश्ते सदा ऊंचे रहते हैं। फरिश्तों को चित्र रूप में भी दिखायेंगे तो पंख दिखायेंगे क्योंकि उड़ते पंछी हैं।

सदा खुशी में झूलने वाले सर्व के विघ्न हर्ता वा सर्व की मुश्किल को सहज करने वाले तब बनेंगे जब संकल्पों में दृढ़ता होगी और स्थिति में डबल लाइट होंगे। मेरा कुछ नहीं, सब कुछ बाप का है। जब बोझ अपने ऊपर रखते हो तब सब प्रकार के विघ्न आते हैं। मेरा नहीं तो निर्विघ्न। सदा अपने को डबल लाइट समझकर सेवा करते चलो। जितना सेवा में हल्कापन होगा उतना सहज उड़ेंगे उड़ायेंगे। डबल लाइट बन सेवा करना, याद में रहकर सेवा करना - यही सफलता का आधार है।

जिम्मेवारी को निभाना यह भी आवश्यक है लेकिन जितनी बड़ी जिम्मेवारी उतना ही डबल लाइट। जिम्मेवारी निभाते हुए जिम्मेवारी के बोझ से न्यारे रहो इसको कहते हैं बाप का प्यारा। घबराओ नहीं क्या करूँ, बहुत जिम्मेवारी है। यह करूँ, वा नहीं ...यह तो बड़ा मुश्किल है। यह महसूसता अर्थात् बोझ है! डबल लाइट अर्थात् इससे भी न्यारा। कोई भी जिम्मेवारी के कर्म के हलचल का बोझ न हो। सदा डबल लाइट स्थिति में रहने वाले निश्चय बुद्धि, निश्चिन्त होंगे। उड़ती कला में रहेंगे। उड़ती कला अर्थात् ऊंचे से ऊंची स्थिति। उनके बुद्धि रूपी पाँव धरनी पर नहीं। धरनी अर्थात् देह भान से ऊपर। जो देह भान की धरनी से ऊपर रहते वह सदा फरिश्ते हैं।

अब डबल लाइट बन दिव्य बुद्धि रूपी विमान द्वारा सबसे ऊंची चोटी की स्थिति में स्थित हो विश्व की सर्व आत्माओं के प्रति लाइट और माइट की शुभ भावना और श्रेष्ठ कामना के सहयोग की लहर फैलाओ। इस विमान में बापदादा की रिफाइन श्रेष्ठ मत का साधन हो। उसमें जरा भी मन-मत, परमत का किचड़ा न हो।

वरदान:-

हर सेकण्ड हर संकल्प के महत्व को जान पुण्य की पूंजी जमा करने वाले पदमापदमपति भव

आप पुण्य आत्माओं के संकल्प में इतनी विशेष शक्ति है जिस शक्ति द्वारा असम्भव को सम्भव कर सकते हो। जैसे आजकल यत्रों द्वारा रेगिस्तान को हरा भरा कर देते हैं, पहाड़ियों पर फूल उगा देते हैं ऐसे आप अपने श्रेष्ठ संकल्पों द्वारा नाउम्मींदवार को उम्मींदवार बना सकते हो। सिर्फ हर सेकण्ड हर संकल्प की वैल्यु को जान, संकल्प और सेकण्ड को यूज़ कर पुण्य की पूंजी जमा करो। आपके संकल्प की शक्ति इतनी श्रेष्ठ है जो एक संकल्प भी पदमापदमपति बना देता है।

स्लोगन:-

हर कर्म अधिकारी पन के निश्चय और नशे से करो तो मेहनत समाप्त हो जायेगी।

 

सूचनाः- आज मास का तीसरा रविवार है, सभी राजयोगी तपस्वी भाई बहिनें सायं 6.30 से 7.30 बजे तक, विशेष योग अभ्यास के समय भक्तों की पुकार सुनें और अपने ईष्ट देव रहमदिल, दाता स्वरूप में स्थित हो सबकी मनोकामनायें पूर्ण करने की सेवा करें।