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बायोडाटा - अल्फाबेटिकली [By Name]

Biodata

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22-01-2020

22-01-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप का पार्ट एक्यूरेट है, वह अपने समय पर आते हैं, ज़रा भी फ़र्क नहीं पड़ सकता, उनके आने का यादगार शिवरात्रि खूब धूमधाम से मनाओ”

प्रश्न:

किन बच्चों के विकर्म पूरे-पूरे विनाश नहीं हो पाते?

उत्तर:

जिनका योग ठीक नहीं है, बाप की याद नहीं रहती तो विकर्म विनाश नहीं हो पाते। योगयुक्त न होने से इतनी सद्गति नहीं होती, पाप रह जाते हैं फिर पद भी कम हो जाता है। योग नहीं तो नाम-रूप में फंसे रहते हैं, उनकी ही बातें याद आती रहती हैं, वह देही-अभिमानी रह नहीं सकते।

गीत:-

यह कौन आज आया सवेरे सवेरे......

ओम् शान्ति।

सवेरा कितने बजे होता है? बाबा सवेरे कितने बजे आते हैं? (कोई ने कहा 3 बजे, कोई ने कहा 4, कोई ने कहा संगम पर, कोई ने कहा 12 बजे) बाबा एक्यूरेट पूछते हैं। 12 को तो तुम सवेरा नहीं कह सकते हो। 12 बजकर एक सेकण्ड हुआ, एक मिनट हुआ तो ए.एम. अर्थात् सवेरा शुरू हुआ। यह बिल्कुल सवेरा है। ड्रामा में इनका पार्ट बिल्कुल एक्यूरेट है। सेकण्ड की भी देरी नहीं हो सकती, यह ड्रामा अनादि बना हुआ है। 12 बजकर एक सेकण्ड जब तक नहीं हुआ है तो ए.एम. नहीं कहेंगे, यह बेहद की बात है। बाप कहते हैं मैं आता हूँ सवेरे-सवेरे। विलायत वालों का ए.एम., पी.एम. एक्यूरेट चलता है। उन्हों की बुद्धि फिर भी अच्छी है। वह इतना सतोप्रधान भी नहीं बनते हैं, तो तमोप्रधान भी नहीं बनते हैं। भारतवासी ही 100 परसेन्ट सतोप्रधान फिर 100 परसेन्ट तमोप्रधान बनते हैं। तो बाप बड़ा एक्युरेट है। सवेरे अर्थात् 12 बजकर एक मिनट, सेकण्ड का हिसाब नहीं रखते। सेकण्ड पास होने में मालूम भी नहीं पड़ता। अब यह बातें तुम बच्चे ही समझते हो। दुनिया तो बिल्कुल घोर अन्धियारे में है। बाप को सभी भक्त दु:ख में याद करते हैं-पतित-पावन आओ। परन्तु वह कौन है? कब आते हैं? यह कुछ भी नहीं जानते। मनुष्य होते हुए एक्यूरेट कुछ नहीं जानते क्योंकि पतित तमोप्रधान हैं। काम भी कितना तमोप्रधान है। अभी बेहद का बाप ऑर्डीनेन्स निकालते हैं - बच्चे कामजीत जगतजीत बनो। अगर अभी पवित्र नहीं बनेंगे तो विनाश को पायेंगे। तुम पवित्र बनने से अविनाशी पद को पायेंगे। तुम राजयोग सीख रहे हो ना। स्लोगन में भी लिखते हैं”बी होली बी योगी।” वास्तव में लिखना चाहिए बी राजयोगी। योगी तो कॉमन अक्षर है। ब्रह्म से योग लगाते हैं, वह भी योगी ठहरे। बच्चा बाप से, स्त्री पुरूष से योग लगाती है परन्तु यह तुम्हारा है राजयोग। बाप राजयोग सिखलाते हैं इसलिए राजयोग लिखना ठीक है। बी होली एण्ड राजयोगी। दिन-प्रतिदिन करेक्शन तो होती रहती है। बाप भी कहते हैं आज तुमको गुह्य से गुह्य बातें सुनाता हूँ। अब शिव जयन्ती भी आने वाली है। शिव जयन्ती तो तुमको अच्छी रीति मनानी है। शिव जयन्ती पर तो बहुत अच्छी रीति सर्विस करनी है। जिनके पास प्रदर्शनी है, सभी अपने-अपने सेन्टर पर अथवा घर में शिव जयन्ती अच्छी रीति मनाओ और लिख दो-शिवबाबा गीता ज्ञान दाता बाप से बेहद का वर्सा लेने का रास्ता आकर सीखो। भल बत्तियाँ आदि भी जला दो। घर-घर में शिव जयन्ती मनानी चाहिए। तुम ज्ञान गंगायें हो ना। तो हर एक के पास गीता पाठशाला होनी चाहिए। घर-घर में गीता तो पढ़ते हैं ना। पुरूषों से भी मातायें भक्ति में तीखी होती हैं। ऐसे कुटुम्ब (परिवार) भी होते हैं जहाँ गीता पढ़ते हैं। तो घर में भी चित्र रख देने चाहिए। लिख दें कि बेहद के बाप से आकर फिर से वर्सा लो।
यह शिव जयन्ती का त्योहार वास्तव में तुम्हारी सच्ची दीपावली है। जब शिव बाप आते हैं तो घर-घर में रोशनी हो जाती है। इस त्योहार को खूब बत्तियाँ आदि जलाकर रोशनी कर मनाओ। तुम सच्ची दीपावली मनाते हो। फाइनल तो होना है सतयुग में। वहाँ घर-घर में रोशनी ही रोशनी होगी अर्थात् हर आत्मा की ज्योत जगी रहती है। यहाँ तो अन्धियारा है। आत्मायें आसुरी बुद्धि बन पड़ी है। वहाँ आत्मायें पवित्र होने से दैवी बुद्धि रहती हैं। आत्मा ही पतित, आत्मा ही पावन बनती है। अभी तुम वर्थ नाट ए पेनी से पाउण्ड बन रहे हो। आत्मा पवित्र होने से शरीर भी पवित्र मिलेगा। यहाँ आत्मा अपवित्र है तो शरीर और दुनिया भी इमप्योर है। इन बातों को तुम्हारे में से कोई थोड़े हैं जो यथार्थ रीति समझते हैं और उनके अन्दर खुशी होती है। नम्बरवार पुरूषार्थ तो करते रहते हैं। ग्रहचारी भी होती है। कभी राहू की ग्रहचारी बैठती है तो आश्चर्यवत् भागन्ती हो जाते हैं। बृहस्पति की दशा से बदलकर ठीक राहू की दशा बैठ जाती है। काम विकार में गया और राहू की दशा बैठी। मल्लयुद्ध होती है ना। तुम माताओं ने देखा नहीं होगा क्योंकि मातायें होती हैं घर की घरेत्री। अब तुमको मालूम है भ्रमरी को घरेत्री अर्थात् घर बनाने वाली कहते हैं। घर बनाने का अच्छा कारीगर है, इसलिए घरेत्री नाम है। कितनी मेहनत करती है। वो भी पक्का मिस्त्री है। दो-तीन कमरा बनाती है। 3-4 कीड़े ले आती है। वैसे तुम भी ब्राह्मणियाँ हो। चाहे 1-2 को बनाओ, चाहे 10-12 को, चाहे 100 को, चाहे 500 को बनाओ। मण्डप आदि बनाते हो, यह भी घर बनाना हुआ ना। उनमें बैठ सबको भूँ-भूँ करते हो। फिर कोई तो समझकर कीड़े से ब्राह्मण बनते हैं, कोई सड़ा हुआ निकलते हैं अर्थात् इस धर्म के नहीं हैं। इस धर्म वालों को ही पूरी रीति टच होगा। तुम तो फिर भी मनुष्य हो ना। तुम्हारी ताकत उनसे (भ्रमरी से) तो जास्ती है। तुम 2 हज़ार के बीच में भी भाषण कर सकते हो। आगे चल 4-5 हज़ार की सभा में भी तुम जायेंगे। भ्रमरी की तुम्हारे से भेंट है। आजकल सन्यासी लोग भी बाहर विदेशों में जाकर कहते हैं हम भारत का प्राचीन राजयोग सिखाते हैं। आजकल मातायें भी गेरू कफनी पहनकर जाती हैं, फॉरेनर्स को ठगकर आती हैं। उनको कहती हैं भारत का प्राचीन राजयोग भारत में चलकर सीखो। तुम ऐसे थोड़ेही कहेंगे कि भारत में चलकर सीखो। तुम तो फॉरेन में जायेंगे तो वहाँ ही बैठ समझायेंगे - यह राजयोग सीखो तो स्वर्ग में तुम्हारा जन्म हो जायेगा। इसमें कपड़ा आदि बदलने की बात नहीं है। यहाँ ही देह के सब सम्बन्ध भूल अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। बाप ही लिबरेटर गाइड है, सबको दु:ख से लिबरेट करते हैं।
अभी तुमको सतोप्रधान बनना है। तुम पहले गोल्डन एज में थे, अब आइरन एज में हो। सारी वर्ल्ड, सभी धर्म वाले आइरन एज में हैं। कोई भी धर्म वाला मिले, उनको कहना है बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो तो तुम पावन बन जायेंगे, फिर मैं साथ ले जाऊंगा। बस, इतना ही बोलो, जास्ती नहीं। यह तो बहुत सहज है। तुम्हारे शास्त्रों में भी है कि घर-घर में सन्देश दिया। कोई एक रह गया तो उसने उल्हना दिया मुझे कोई ने बताया नहीं। बाप आये हैं, तो पूरा ढिंढोरा पीटना चाहिए। एक दिन जरूर सबको पता पड़ेगा कि बाप आये हैं - शान्तिधाम-सुखधाम का वर्सा देने। बरोबर जब डिटीज्म था तो और कोई धर्म नहीं था। सभी शान्तिधाम में थे। ऐसे-ऐसे ख्यालात चलने चाहिए, स्लोगन बनाने चाहिए। बाप कहते हैं देह सहित सब सम्बन्धों को छोड़ो। अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो तो आत्मा पवित्र बन जायेगी। अभी आत्मायें अपवित्र हैं। अभी सबको पवित्र बनाए बाप गाइड बन वापिस ले जायेंगे। सब अपने-अपने सेक्शन में चले जायेंगे। फिर डीटी धर्म वाले नम्बरवार आयेंगे। कितना सहज है। यह तो बुद्धि में धारण होना चाहिए। जो सर्विस करते हैं, वह छिपे नहीं रह सकते। डिस-सर्विस करने वाले भी छिप नहीं सकते। सर्विसएबुल को तो बुलाते हैं। जो कुछ भी ज्ञान नहीं सुना सकते उनको थोड़ेही बुलायेंगे। वह तो और ही नाम बदनाम कर देंगे। कहेंगे बी.के. ऐसे होते हैं क्या? पूरा रेसपॉन्ड भी नहीं करते। तो नाम बदनाम हुआ ना। शिवबाबा का नाम बदनाम करने वाले ऊंच पद पा न सकें। जैसे यहाँ भी कोई तो करोड़पति हैं, पद्मपति भी हैं, कोई तो देखो भूख मर रहे हैं। ऐसे बेगर्स भी आकर प्रिन्स बनेंगे। अभी तुम बच्चे ही जानते हो वही श्रीकृष्ण जो स्वर्ग का प्रिन्स था वह फिर बेगर बनते हैं, फिर बेगर टू प्रिन्स बनेंगे। यह बेगर थे ना, थोड़ा-बहुत कमाया - वह भी तुम बच्चों के लिए। नहीं तो तुम्हारी सम्भाल कैसे हो? यह सब बातें शास्त्रों में थोड़ेही हैं। शिवबाबा ही आकर बतलाते हैं। बरोबर यह गांव का छोरा था। नाम कोई श्रीकृष्ण नहीं था। यह आत्मा की बात है इसलिए मनुष्य मूंझे हुए हैं। तो बाबा ने समझाया शिवजयन्ती पर हर एक घर-घर में चित्रों पर सर्विस करें। लिख दें कि बेहद के बाप से 21 जन्मों के लिए स्वर्ग की बादशाही सेकण्ड में कैसे मिलती है, सो आकर समझो। जैसे दीवाली पर मनुष्य बहुत दुकान निकाल बैठते हैं, तुमको फिर अविनाशी ज्ञान रत्नों का दुकान निकाल बैठना है। तुम्हारा कितना अच्छा सजाया हुआ दुकान होगा। मनुष्य दीवाली पर करते हैं, तुम फिर शिवजयन्ती पर करो। जो शिवबाबा सबके दीप जगाते हैं, तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं। वह तो लक्ष्मी से विनाशी धन माँगते हैं और यहाँ जगत अम्बा से तुमको विश्व की बादशाही मिलती है। यह राज़ बाप समझाते हैं। बाबा कोई शास्त्र थोड़ेही उठाते हैं। बाप कहते हैं मैं नॉलेजफुल हूँ ना। हाँ, यह जानते हैं, फलाने-फलाने बच्चे सर्विस बहुत अच्छी करते हैं इसलिए याद पड़ती है। बाकी ऐसे नहीं कि एक-एक के अन्दर को बैठ जानता हूँ। हाँ, कोई समय पता पड़ जाता है-यह पतित है, शक पड़ता है। उनकी शक्ल ही मायूस हो जाती है तो ऊपर से बाबा भी कहला भेजता है, इनसे पूछो। यह भी ड्रामा में नूंध है। जो कोई-कोई के लिए बताते हैं, बाकी ऐसे नहीं सबके लिए बतायेंगे। ऐसे तो ढेर हैं, काला मुंह करते हैं। जो करेंगे सो अपना ही नुकसान करेंगे। सच बतलाने से कुछ फायदा होगा, नहीं बताने से और ही नुकसान करेंगे। समझना चाहिए बाबा हमको गोरा बनाने आये हैं और हम फिर काला मुंह कर लेते हैं! यह है ही काँटों की दुनिया। ह्यूमन काँटे हैं। सतयुग को कहा जाता है गार्डन ऑफ अल्लाह और यह है फॉरेस्ट इसलिए बाप कहते हैं जब-जब धर्म की ग्लानि होती है, तब मैं आता हूँ। फर्स्ट नम्बर श्रीकृष्ण देखो फिर 84 जन्मों के बाद कैसा बन जाता है। अभी सब हैं तमोप्रधान। आपस में लड़ते रहते हैं। यह सब ड्रामा में है। फिर स्वर्ग में यह कुछ नहीं होगा। प्वाइंट्स तो ढेर की ढेर हैं, नोट करनी चाहिए। जैसे बैरिस्टर लोग भी प्वाइंट्स का बुक रखते हैं ना। डॉक्टर लोग भी किताब रखते हैं, उसमें देखकर दवाई देते हैं। तो बच्चों को कितना अच्छी रीति पढ़ना चाहिए, सर्विस करनी चाहिए। बाबा ने नम्बरवन मंत्र दिया है मन्मनाभव। बाप और वर्से को याद करो तो स्वर्ग के मालिक बन जायेंगे। शिव जयन्ती मनाते हैं। परन्तु शिवबाबा ने क्या किया? जरूर स्वर्ग का वर्सा दिया होगा। उसको 5 हज़ार वर्ष हुए। स्वर्ग से नर्क, नर्क से स्वर्ग बनेगा।
बाप समझाते हैं-बच्चे, योगयुक्त बनो तो तुम्हें हर बात अच्छी तरह समझ में आयेगी। परन्तु योग ठीक नहीं है, बाप की याद नहीं रहती तो कुछ समझ नहीं सकते। विकर्म भी विनाश नहीं हो पाते। योगयुक्त न होने से इतनी सद्गति भी नहीं होती है, पाप रह जाते हैं। फिर पद भी कम हो जाता है। बहुत हैं, योग कुछ भी नहीं है, नाम-रूप में फँसे रहते हैं, उनकी ही याद आती रहेगी तो विकर्म विनाश कैसे होंगे? बाप कहते हैं देही-अभिमानी बनो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क
बुद्धि रुपी पांव पृथ्वी पर न रहें। जैसे कहावत है कि फरिश्तों के पांव पृथ्वी पर नहीं होते। ऐसे बुद्धि इस देह रुपी पृथ्वी अर्थात् प्रकृति की आकर्षण से परे रहे। प्रकृति को अधीन करने वाले बनो न कि अधीन होने वाले।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) शिव जयन्ती पर अविनाशी ज्ञान रत्नों का दुकान निकाल सेवा करनी है। घर-घर में रोशनी कर सबको बाप का परिचय देना है।

2) सच्चे बाप से सच्चा होकर रहना है, कोई भी विकर्म करके छिपाना नहीं है। ऐसा योगयुक्त बनना है, जो कोई भी पाप रह न जायें। किसी के भी नाम-रूप में नहीं फँसना है।

वरदान:

सागर के तले में जाकर अनुभव रूपी रत्न प्राप्त करने वाले सदा समर्थ आत्मा भव

समर्थ आत्मा बनने के लिए योग की हर विशेषता का, हर शक्ति का और हर एक ज्ञान की मुख्य पाइंट का अभ्यास करो। अभ्यासी, लगन में मगन रहने वाली आत्मा के सामने किसी भी प्रकार का विघ्न ठहर नहीं सकता इसलिए अभ्यास की प्रयोगशाला में बैठ जाओ। अभी तक ज्ञान के सागर, गुणों के सागर, शक्तियों के सागर में ऊपर-ऊपर की लहरों में लहराते हो, लेकिन अब सागर के तले में जाओ तो अनेक प्रकार के विचित्र अनुभव के रत्न प्राप्त कर समर्थ आत्मा बन जायेंगे।

स्लोगन:

अशुद्धि ही विकार रूपी भूतों का आह्वान करती है इसलिए संकल्पों से भी शुद्ध बनो।

21-01-2020

21-01-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम ज्ञान की बरसात कर हरियाली करने वाले हो, तुम्हें धारणा करनी और करानी है”

प्रश्न:

जो बादल बरसते नहीं हैं, उन्हें कौन-सा नाम देंगे?

उत्तर:

वह हैं सुस्त बादल। चुस्त वह जो बरसते हैं। अगर धारणा हो तो बरसने के बिना रह नहीं सकते। जो धारणा कर दूसरों को नहीं कराते उनका पेट पीठ से लग जाता है, वह गरीब हैं। प्रजा में चले जाते हैं।

प्रश्न:

याद की यात्रा में मुख्य मेहनत कौन-सी है?

उत्तर:

अपने को आत्मा समझ बाप को बिन्दु रूप में याद करना, बाप जो है जैसा है उसी स्वरूप से यथार्थ याद करना, इसमें ही मेहनत है।

गीत:-

जो पिया के साथ है........

ओम् शान्ति।

जैसे सागर के ऊपर में बादल हैं तो बादलों का बाप हुआ सागर। जो बादल सागर के साथ हैं उनके लिए ही बरसात है। वह बादल भी पानी भरकर फिर बरसते हैं। तुम भी सागर के पास आते हो भरने के लिए। सागर के बच्चे बादल तो हो ही, जो मीठा पानी खींच लेते हो। अब बादल भी अनेक प्रकार के होते हैं। कोई खूब जोर से बरसते हैं, बाढ़ कर देते हैं, कोई कम बरसते हैं। तुम्हारे में भी ऐसे नम्बरवार हैं जो खूब जोर से बरसते हैं, उनका नाम भी गाया जाता है। जैसे वर्षा बहुत होती है तो मनुष्य खुश होते हैं। यह भी ऐसे है। जो अच्छा बरसते हैं, उनकी महिमा होती है, जो नहीं बरसते हैं उनकी दिल जैसे सुस्त हो जाती है, पेट भरेगा नहीं। पूरी रीति धारणा न होने से पेट जाकर पीठ से लगता है। फैमन होता है तो मनुष्यों का पेट पीठ से लग जाता है। यहाँ भी धारणा कर और धारणा नहीं कराते हैं तो पेट जाकर पीठ से लगेगा। खूब बरसने वाले जाकर राजा-रानी बनेंगे और वह गरीब। गरीबों का पेट पीठ से रहता है। तो बच्चों को धारणा बड़ी अच्छी करनी चाहिए। इसमें भी आत्मा और परमात्मा का ज्ञान कितना सहज है। तुम अब समझते हो हमारे में आत्मा और परमात्मा दोनों का ज्ञान नहीं था। तो पेट पीठ से लग गया ना। मुख्य है ही आत्मा और परमात्मा की बात। मनुष्य आत्मा को ही नहीं जानते हैं तो परमात्मा को फिर कैसे जान सकेंगे। कितने बड़े विद्वान, पण्डित आदि हैं, कोई भी आत्मा को नहीं जानते। अब तुमको मालूम हुआ है कि आत्मा अविनाशी है, उसमें 84 जन्मों का अविनाशी पार्ट नूंधा हुआ है, जो चलता रहता है। आत्मा अविनाशी तो पार्ट भी अविनाशी है। आत्मा कैसा आलराउन्ड पार्ट बजाती है-यह किसको पता नहीं है। वह तो आत्मा सो परमात्मा कह देते हैं। तुम बच्चों को आदि से लेकर अन्त तक पूरा ज्ञान है। वह तो ड्रामा की आयु ही लाखों वर्ष कह देते। अभी तुमको सारा ज्ञान मिला है। तुम जानते हो इस बाप के रचे हुए ज्ञान यज्ञ में यह सारी दुनिया स्वाह: होनी है इसलिए बाप कहते हैं देह सहित जो कुछ भी है यह सब भूल जाओ, अपने को आत्मा समझो। बाप को और शान्तिधाम, स्वीट होम को याद करो। यह तो है ही दु:खधाम। तुम्हारे में भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार समझा सकते हैं। अभी तुम ज्ञान से तो भरपूर हो। बाकी सारी मेहनत है याद में। जन्म-जन्मान्तर का देह-अभिमान मिटाकर देही-अभिमानी बनें, इसमें बड़ी मेहनत है। कहना तो बड़ा सहज है परन्तु अपने को आत्मा समझें और बाप को भी बिन्दु रूप में याद करें, इसमें मेहनत है। बाप कहते हैं मैं जो हूँ, जैसा हूँ, ऐसा कोई मुश्किल याद कर सकते हैं। जैसे बाप वैसे बच्चे होते हैं ना। अपने को जाना तो बाप को भी जान जायेंगे। तुम जानते हो पढ़ाने वाला तो एक ही बाप है, पढ़ने वाले बहुत हैं। बाप राजधानी कैसे स्थापन करते हैं, वह तुम बच्चे ही जानते हो। बाकी यह शास्त्र आदि सब हैं भक्ति मार्ग की सामग्री। समझाने के लिए हमको कहना पड़ता है। बाकी इसमें घृणा की कोई बात नहीं है। शास्त्रों में भी ब्रह्मा का दिन और रात कहते हैं परन्तु समझते नहीं। रात और दिन आधा-आधा होता है। सीढ़ी पर कितना सहज समझाया जाता है।
मनुष्य समझते हैं कि भगवान तो बड़ा समर्थ है वह जो चाहे सो कर सकते हैं। लेकिन बाबा कहते मैं भी ड्रामा के बंधन में बांधा हुआ हूँ। भारत पर तो कितनी आफतें आती रहती हैं फिर मैं घड़ी-घड़ी आता हूँ क्या? मेरे पार्ट की लिमिट है। जब पूरा दु:ख होता जाता है तब मैं अपने समय पर आता हूँ। एक सेकण्ड का भी फ़र्क नहीं पड़ता है। ड्रामा में हर एक का एक्यूरेट पार्ट नूँधा हुआ है। यह है हाइएस्ट बाप की रीइनकारनेशन। फिर नम्बरवार सब आते हैं, कम ताकत वाले। तुम बच्चों को अभी बाप से नॉलेज मिली है जो तुम विश्व के मालिक बनते हो। तुम्हारे में फुल फोर्स की ताकत आती है। पुरूषार्थ कर तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बनते हो। औरों का तो पार्ट ही नहीं है। मुख्य है ड्रामा, जिसकी नॉलेज तुमको अभी मिलती है। बाकी तो सब हैं मटेरियल क्योंकि वह सब इन आखों से देखा जाता है। वन्डर ऑफ दी वर्ल्ड तो बाबा है, जो फिर रचते भी स्वर्ग हैं, जिसको हेविन, पैराडाइज कहते हैं। उनकी कितनी महिमा है, बाप और बाप के रचना की बड़ी महिमा है। ऊंच ते ऊंच है भगवान। ऊंच ते ऊंच स्वर्ग की स्थापना बाप कैसे करते हैं, यह कोई भी कुछ भी नहीं जानते हैं। तुम मीठे-मीठे बच्चे भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जानते हो और उस अनुसार ही पद पाते हो, जिसने पुरूषार्थ किया वह ड्रामा अनुसार ही करते हैं। पुरूषार्थ बिगर तो कुछ मिल न सके। कर्म बिगर एक सेकण्ड भी रह नहीं सकते। वह हठयोगी प्राणायाम चढ़ा लेते हैं, जैसे जड़ बन जाते हैं, अन्दर पड़े रहते हैं, ऊपर मिट्टी जम जाती है, मिट्टी के ऊपर पानी पड़ने से घास जम जाती है। परन्तु इससे कुछ फायदा नहीं। कितना दिन ऐसे बैठे रहेंगे? कर्म तो जरूर करना ही है। कर्म सन्यासी कोई बन न सके। हाँ, सिर्फ खाना आदि नहीं बनाते हैं इसलिए उनको कर्म-सन्यासी कह देते हैं। यह भी उन्हों का ड्रामा में पार्ट है। यह निवृत्ति मार्ग वाले भी नहीं होते तो भारत की क्या हालत हो जाती? भारत नम्बरवन प्योर था। बाप पहले-पहले प्योरिटी स्थापन करते हैं, जो फिर आधाकल्प चलती है। बरोबर सतयुग में एक धर्म, एक राज्य था। फिर डीटी राज्य अब फिर से स्थापन हो रहा है। ऐसे अच्छे-अच्छे स्लोगन बनाकर मनुष्यों को सुजाग करना चाहिए। फिर से डीटी राज्य-भाग्य आकर लो। अभी तुम कितना अच्छी रीति समझते हो। कृष्ण को श्याम-सुन्दर क्यों कहते हैं-यह भी अभी तुम जानते हो। आजकल तो बहुत ही ऐसे-ऐसे नाम रख देते हैं। कृष्ण से कॉम्पीटीशन करते हैं। तुम बच्चे जानते हो पतित राजायें कैसे पावन राजाओं के आगे जाकर माथा टेकते हैं परन्तु जानते थोड़ेही हैं। तुम बच्चे जानते हो जो पूज्य थे वही फिर पुजारी बन जाते हैं। अभी तुम्हारी बुद्धि में सारा चक्र है। यह भी याद रहे तो अवस्था बड़ी अच्छी रहे। परन्तु माया सिमरण करने नहीं देती है, भुला देती है। सदैव हर्षितमुख अवस्था रहे तो तुमको देवता कहा जाए। लक्ष्मी-नारायण का चित्र देख कितना खुश होते हैं। राधे-कृष्ण अथवा राम आदि को देख इतना खुश नहीं होते क्योंकि श्रीकृष्ण के लिए शास्त्रों में हंगामें की बातें लिख दी हैं। यह बाबा बनता भी श्री नारायण है ना। बाबा तो इन लक्ष्मी-नारायण के चित्र को देख खुश होते हैं। बच्चों को भी ऐसे समझना चाहिए, बाकी कितना समय इस पुराने शरीर में होंगे फिर जाकर प्रिन्स बनेंगे। यह एम ऑबजेक्ट है ना। यह भी सिर्फ तुम जानते हो। खुशी में कितना गद्गद् होना चाहिए। जितना पढ़ेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे, पढ़ेंगे नहीं तो क्या पद मिलेगा? कहाँ विश्व के महाराजा-महारानी, कहाँ साहूकार, प्रजा में नौकर-चाकर। सब्जेक्ट तो एक ही है। सिर्फ मन्मनाभव, मध्याजी भव, अल्फ और बे, याद और ज्ञान। इनको कितनी खुशी हुई-अल्फ को अल्लाह मिला, बाकी सब दे दिया। कितनी बड़ी लॉटरी मिल गई। बाकी क्या चाहिए! तो क्यों न बच्चों के अन्दर में खुशी रहनी चाहिए इसलिए बाबा कहते हैं ऐसा ट्रांसलाइट का चित्र सबके लिए बनवायें जो बच्चे देखकर खुश होते रहें। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा हमको यह वर्सा दे रहे हैं। मनुष्य तो कुछ नहीं जानते हैं। बिल्कुल ही तुच्छ बुद्धि हैं। अभी तुम तुच्छ बुद्धि से स्वच्छ बुद्धि बन रहे हो। सब कुछ जान गये हो, और कुछ पढ़ने की दरकार नहीं। इस पढ़ाई से तुमको विश्व की बादशाही मिलती है, इसलिए बाप को नॉलेजफुल कहते हैं। मनुष्य फिर समझते हैं हर एक की दिल को जानते हैं, परन्तु बाप तो नॉलेज देते हैं। टीचर समझ सकते हैं फलाना पढ़ते हैं, बाकी सारा दिन यह थोड़ेही बैठ देखेंगे कि इनकी बुद्धि में क्या चलता है। यह तो वन्डरफुल नॉलेज है। बाप को ज्ञान का सागर, सुख-शान्ति का सागर कहा जाता है। तुम भी अभी मास्टर ज्ञान सागर बनते हो। फिर यह टाइटिल उड़ जायेगा। फिर सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण बनेंगे। यह है मनुष्य का ऊंच मर्तबा। इस समय यह है ईश्वरीय मर्तबा। कितनी समझने और समझाने की बातें हैं। लक्ष्मी-नारायण का चित्र देख बड़ी खुशी होनी चाहिए। हम अभी विश्व के मालिक बनेंगे। नॉलेज से ही सब गुण आते हैं। अपना एम ऑब्जेक्ट देखने से ही रिफ्रेशमेंट आ जाती है, इसलिए बाबा कहते हैं यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र तो हरेक के पास होना चाहिए। यह चित्र दिल में प्यार बढ़ाता है। दिल में आता है-बस, यह मृत्युलोक में लास्ट जन्म है। फिर हम अमरलोक में यह जाकर बनूँगा, ततत्वम्। ऐसे नहीं कि आत्मा सो परमात्मा। नहीं, यह ज्ञान सारा बुद्धि में बैठा हुआ हो। जब भी किसको समझाते हो, बोलो हम कभी भी कोई से भीख नहीं मांगते। प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे तो बहुत हैं। हम अपने ही तन-मन-धन से सेवा करते हैं। ब्राह्मण अपनी कमाई से ही यज्ञ को चला रहे हैं। शूद्रों के पैसे नहीं लगा सकते। ढेर बच्चे हैं वह जानते हैं जितना हम तन-मन-धन से सर्विस करेंगे, सेरन्डर होंगे उतना पद पायेंगे। जानते हैं बाबा ने बीज बोया है तो यह लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। पैसे यहाँ काम में तो आने नहीं हैं, क्यों न इस कार्य में लगा दें। फिर क्या सरेन्डर होने वाले भूख मरते हैं क्या? बहुत सम्भाल होती रहती है। बाबा की कितनी सम्भाल होती रहती है। यह तो शिवबाबा का रथ है ना। सारे वर्ल्ड को हेविन बनाने वाला है। यह हसीन मुसाफिर है।
परमपिता परमात्मा तो आकर सबको हसीन बनाते हैं, तुम सांवरे से गोरा हसीन बनते हो ना। कितना सलोना साजन है, आकर सबको गोरा बना देते हैं। उन पर तो कुर्बान जाना चाहिए। याद करते रहना चाहिए। जैसे आत्मा को देख नहीं सकते, जान सकते हैं, वैसे परमात्मा को भी जान सकते हैं। देखने में तो आत्मा-परमात्मा दोनों एक जैसे बिन्दु हैं। बाकी तो सारी नॉलेज है। यह बड़ी समझ की बातें हैं। बच्चों की बुद्धि में यह नोट रहनी चाहिए। बुद्धि में नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार धारणा होती है। डॉक्टर लोगों को भी दवाइयाँ याद रहती हैं ना। ऐसे नहीं कि उस समय बैठ किताब देखेंगे। डॉक्टरी की भी प्वाइंट्स होती हैं, बैरिस्टरी की भी प्वाइंट्स होती हैं। तुम्हारे पास भी प्वाइंट्स हैं, टॉपिक्स हैं, जिस पर समझाते हैं। कोई प्वाइंट किसको फायदा कर लेती है, कोई को किस प्वाइंट से तीर लग जाता है। प्वाइंट तो बहुत ढेर की ढेर हैं। जो अच्छी रीति धारण करेंगे वह अच्छी रीति सर्विस कर सकेंगे। आधा-कल्प से महारोगी पेशेन्ट हैं। आत्मा पतित बनी है, उनके लिए एक अविनाशी सर्जन दवाई देते हैं। वह सदैव सर्जन ही रहते हैं, कभी बीमार होते नहीं। और तो सब बीमार पड़ जाते हैं। अविनाशी सर्जन एक ही बार आकर मन्मनाभव का इन्जेक्शन लगाते हैं। कितना सहज है, चित्र को पॉकेट में रख दो सदैव। बाबा नारायण का पुजारी था तो लक्ष्मी का चित्र निकाल अकेला नारायण का चित्र रख दिया। अभी पता पड़ता है जिसकी हम पूजा करते थे, वह अब बन रहे हैं। लक्ष्मी को विदाई दे दी तो यह पक्का है, हम लक्ष्मी नहीं बनूँगा। लक्ष्मी बैठ पैर दबाये, यह अच्छा नहीं लगता था। उनको देखकर पुरूष लोग स्त्री से पैर दबवाते हैं। वहाँ थोड़ेही लक्ष्मी ऐसे पैर दबायेगी। यह रस्म-रिवाज वहाँ होती नहीं। यह रसम रावण राज्य की है। इस चित्र में सारी नॉलेज है। ऊपर में त्रिमूर्ति भी है, इस नॉलेज को सारा दिन सिमरण कर बड़ा वन्डर लगता है। भारत अब स्वर्ग बन रहा है। कितनी अच्छी समझानी है, पता नहीं, मनुष्यों की बुद्धि में क्यों नहीं बैठता है? आग बड़े जोर से लगेगी, भंभोर को आग लगनी है। रावण राज्य तो जरूर खलास होना चहिए। यज्ञ में भी पवित्र ब्राह्मण चाहिए। यह बड़ा भारी यज्ञ है - सारे विश्व में प्योरिटी लाने का। वो ब्राह्मण भी भल ब्रह्मा की औलाद कहलाते हैं, परन्तु वह तो कुख वंशावली हैं। ब्रह्मा की सन्तान तो पवित्र मुख वंशावली थे ना। तो उन्हों को यह समझाना चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क
अव्यक्त स्थिति में रहने के लिए बाप की श्रीमत है बच्चे,”सोचो कम, कर्तव्य अधिक करो।” सर्व उलझनों को समाप्त कर उज्जवल बनो। पुरानी बातों अथवा पुराने संस्कारों रूपी अस्थियों को सम्पूर्ण स्थिति के सागर में समा दो। पुरानी बातें ऐसे भूल जाएं जैसे पुराने जन्म की बातें भूल जाती हैं।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) स्वच्छ बुद्धि बन वन्डरफुल ज्ञान को धारण कर बाप समान मास्टर ज्ञान सागर बनना है। नॉलेज से सर्व गुण स्वयं में धारण करने हैं।

2) जैसे बाबा ने तन-मन-धन सर्विस में लगाया, सरेन्डर हुए ऐसे बाप समान अपना सब कुछ ईश्वरीय सेवा में सफल करना है। सदा रिफ्रेश रहने के लिए एम ऑब्जेक्ट का चित्र साथ में रखना है।

वरदान:

पास विद आनर बनने के लिए पुरूषार्थ की गति तीव्र और ब्रेक पावरफुल रखने वाले यथार्थ योगी भव

वर्तमान समय के प्रमाण पुरूषार्थ की गति तीव्र और ब्रेक पावरफुल चाहिए तब अन्त में पास विद आनर बन सकेंगे क्योंकि उस समय की परिस्थितियां बुद्धि में अनेक संकल्प लाने वाली होंगी, उस समय सब संकल्पों से परे एक संकल्प में स्थित होने का अभ्यास चाहिए। जिस समय विस्तार में बिखरी हुई बुद्धि हो उस समय स्टॉप करने की प्रैक्टिस चाहिए। स्टॉप करना और होना। जितना समय चाहें उतना समय बुद्धि को एक संकल्प में स्थित कर लें-यही है यथार्थ योग।

स्लोगन:

आप ओबीडियेन्ट सर्वेन्ट हो इसलिए अलमस्त नहीं हो सकते। सर्वेन्ट माना सदा सेवा पर उपस्थित।

19-01-20

19-01-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' मधुबन


"हर कार्य में सफलता का सहज साधन स्नेह''

आज मुरबी बच्चों के स्नेह का रिटर्न देने आये हैं। मधुबन वालों को अथक सेवा का विशेष फल देने के लिए सिर्फ मिलन मनाने आये हैं। ये है स्नेह का प्रत्यक्ष प्रमाण स्वरूप। ब्राह्मण परिवार का विशेष फाउण्डेशन है ही यह विशेष स्नेह। वर्तमान समय स्नेह हर सेवा के कार्य में सफलता का सहज साधन है। योगी जीवन का फाउण्डेशन तो निश्चय है लेकिन परिवार का फाउण्डेशन स्नेह है। जो स्नेह ही किसी के भी दिल को समीप ले आता है। वर्तमान समय याद और सेवा के बैलेन्स के साथ स्नेह और सेवा का बैलेन्स सफलता का साधन है। चाहे देश की सेवा हो, चाहे विदेश की सेवा हो, दोनों की सफलता का साधन रूहानी स्नेह है। ज्ञान और योग शब्द तो बहुतों से सुना है। लेकिन दृष्टि से व श्रेष्ठ संकल्प से आत्माओं को स्नेह की अनुभूति होना यह विशेषता और नवीनता है। और आज के विश्व को स्नेह की आवश्यकता है। कितनी भी अभिमानी आत्मा को स्नेह समीप ला सकता है। स्नेह के भिखारी शान्ति के भिखारी हैं लेकिन शान्ति का अनुभव भी स्नेह की दृष्टि द्वारा ही करा सकते हैं। तो स्नेह, शान्ति का स्वत: ही अनुभव कराता है क्योंकि स्नेह में खो जाते हैं इसलिए थोड़े समय के लिए अशरीरी स्वत: ही बन जाते हैं। तो अशरीरी बनने के कारण शान्ति का अनुभव सहज होता है। बाप भी स्नेह का ही रेसपांड देता है। चाहे रथ चले न चले फिर भी बाप को स्नेह का सबूत देना ही है। बच्चों में भी यही स्नेह का प्रत्यक्षफल बापदादा देखना चाहते हैं। कोई (गुल्जार बहन, जगदीश भाई, निर्वैर भाई) विदेश सेवा कर लौटे हैं और कोई (दादी जी और मोहिनी बहन) जा रहे हैं। ये भी उन आत्माओं के स्नेह का फल उन्हों को मिल रहा है। ड्रामा अनुसार सोचते और हैं लेकिन होता और है। फिर भी फल मिल ही जाता है इसलिए प्रोग्राम बन ही जाता है। सभी अपना-अपना अच्छा ही पार्ट बजा कर आये हैं। बना बनाया ड्रामा नूँधा हुआ है तो सहज ही रिटर्न मिल जाता है। विदेश भी अच्छी लगन से सेवा में आगे बढ़ रहा है। हिम्मत और उमंग उन्हों में चारों ओर अच्छा है। सभी की दिल के शुािढया के संकल्प बापदादा के पास पहुँचते रहते हैं क्योंकि वह भी समझते हैं, भारत में भी कितनी आवश्यकता है फिर भी भारत का स्नेह ही हमें सहयोग दे रहा है। इसी भारत में सेवा करने वाले सहयोगी परिवार को दिल से शुािढया करते हैं। जितना ही देश दूर उतना ही दिल से पालना के पात्र बनने में समीप हैं इसलिए बापदादा चारों ओर के बच्चों को शुािढया के रिटर्न में यादप्यार और शुािढया दे रहे हैं। बाप भी तो गीत गाते हैं ना।
भारत में भी अच्छे उमंग-उत्साह से पद-यात्रा का बहुत ही अच्छा पार्ट बजा रहे हैं। चारों ओर सेवा की धूमधाम की रौनक बहुत अच्छी है। उमंग-उत्साह थकावट को भुलाय सफलता प्राप्त करा रहा है। चारों ओर की सेवा की सफलता अच्छी है। बापदादा भी सभी बच्चों के सेवा के उमंग उत्साह का स्वरूप देख हर्षित होते हैं।
(नैरोबी में जगदीश भाई पोप से मिलकर आये हैं) पोप को भी दृष्टि दी ना। यह भी आप के लिए विशेष वी.आई.पी. की सेवा में सफलता सहज होने का साधन है। जैसे भारत में विशेष राष्ट्रपति आये। तो अभी कह सकते हैं कि भारत में भी आये हैं। ऐसे ही विशेष विदेश में विदेश के मुख्य धर्म के प्रभाव के नाते से समीप सम्पर्क में आये तो किसी को भी सहज हिम्मत आ सकती है कि हम भी सम्पर्क में आयें। तो देश का भी अच्छा सेवा का साधन बना और विदेश सेवा का भी विशेष साधन बना। तो समय प्रमाण जो भी सेवा में समीप आने में कोई भी रूकावट आती है, वह भी सहज समाप्त हो जायेगी। प्राइम मिनिस्टर का मिलना तो हुआ ना। तो दुनिया वालों के लिए, ये इग्जाम्पिल भी मदद देते हैं। सभी के क्वेश्चन कि और कोई आये हैं? ये क्वेश्चन खत्म हो जाते हैं। तो ये भी ड्रामा अनुसार इसी वर्ष सेवा में सहज प्रत्यक्षता के साधन बने। अभी समीप आ रहे हैं। इन्हों का तो सिर्फ नाम ही काम करेगा। तो नाम से जो काम होना है उसकी धरती तैयार हो गई। आवाज ये नहीं फैलायेंगे। आवाज फैलाने वाले माइक और हैं। ये माइक को लाइट देने वाले हैं। लेकिन फिर भी धरनी की तैयारी अच्छी हो गई है। जो विदेश में पहले वी.आई.पी. के लिए मुश्किल अनुभव करते थे, अभी वह चारों ओर सहज अनुभव करते हैं, ये रिजल्ट अभी अच्छी है। इन्हों के नाम से काम करने वाले तैयार हो जायेंगे। अभी देखो कौन निमित्त बनते हैं। धरनी तैयार करने के लिए चारों ओर सब गये। भिन्न-भिन्न तरफ धरनी को पांव देकर तैयार तो किया है। अभी फल प्रत्यक्ष रूप में किस द्वारा होता है, उसकी तैयारी अब हो रही है। सभी की रिजल्ट अच्छी है।
पदयात्री भी एक बल एक भरोसा रखकर के आगे बढ़ रहे हैं। पहले मुश्किल लगता है। लेकिन जब प्रैक्टिकल में आते हैं तो सहज हो जाता है। तो सभी देश-विदेश और जो भी सेवा के निमित्त बन सेवा द्वारा अनेकों को बापदादा के स्नेही सहयोगी बनाकर आये हैं, उन सभी को विशेष यादप्यार दे रहे हैं। हर बच्चे का वरदान अपना-अपना है। विशेष भारत के सब पदयात्रा पर चलने वाले बच्चों को और विदेश सेवा अर्थ चारों ओर निमित्त बने हुए बच्चों को और मधुबन निवासी श्रेष्ठ सेवा के निमित्त बने हुए बच्चों को, साथ-साथ जो सभी भारतवासी बच्चे यात्रा वालों को उमंग-उत्साह दिलाने के निमित्त बने हैं, उन सभी चारों ओर के बच्चों को विशेष यादप्यार और सेवा की सफलता की मुबारक दे रहे हैं। हरेक स्थान पर मेहनत तो की है, लेकिन ये विशेष कार्य अर्थ निमित्त बने इसलिए विशेष जमा हो गया। हरेक देश मोरीशस, नैरोबी, अमरीका ये सब इग्जाम्पिल तैयार हो रहे हैं। और ये इग्जाम्पिल आगे प्रत्यक्षता में सहयोगी बनेंगे। अमरीका वालों ने भी कम नहीं किया है। एक-एक छोटे स्थान ने भी जितना उमंग उल्लास से अपनी हैसियत (ताकत) के हिसाब से बहुत ज्यादा किया। फॉरेन में मैजारिटी क्रिश्चियन का फिर भी राज्य तो है ना। अभी चाहे वह ताकत खत्म हो गई है, लेकिन धर्म तो नहीं छोड़ा है। चर्च छोड़ दी है लेकिन धर्म नहीं छोड़ा है इसलिए पोप भी वहाँ राजा के समान है। राजा तक पहुँचे तो प्रजा में स्वत: ही रिगार्ड बैठता है। जो कट्टर क्रिश्चियन हैं, उन्हों के लिए भी ये एक्जाम्पिल अच्छा है। एक्जाम्पिल क्रिश्चियन के लिए निमित्त बनेगा। कृष्ण और क्रिश्चियन का कनेक्शन है ना। भारत का वातावरण फिर भी और होता है। सेक्यूरिटी आदि का बहुत होता है। लेकिन ये प्यार से मिला ये अच्छा है। रॉयल्टी से टाइम देना, विधिपूर्वक मिलना उसका प्रभाव डालता है। ये दिखाता है कि अभी समय समीप आ रहा है।
लण्डन में भी विदेश के हिसाब से बहुत अच्छी संख्या है और विशेष मुरली से प्यार है, पढ़ाई से प्यार है, ये फाउण्डेशन हैं। इसमें लण्डन का नम्बर वन है। कुछ भी हो जाए, कब क्लास मिस नहीं करते हैं। चार बजे का योग और क्लास का महत्व सबसे ज्यादा लण्डन में हैं। इसका भी कारण स्नेह है। स्नेह के कारण खिंचे हुए आते हैं। वातावरण शक्तिशाली बनाने पर अटेन्शन अच्छा है। वैसे भी दूर देश जो हैं वहाँ वायुमण्डल ही सहारा समझते हैं। चाहे सेवाकेन्द्र का वा अपना। जरा भी अगर कोई बात आती है तो फौरन अपने को चेक कर वातावरण शक्तिशाली बनाने का प्रयत्न अच्छा करते हैं। वहाँ वातावरण पावरफुल बनाने का लक्ष्य अच्छा है। छोटी-छोटी बात में वातावरण को खराब नहीं करते हैं। समझते हैं कि वातावरण शक्तिशाली नहीं होगा तो सेवा में सफलता नहीं होगी इसलिए यह अटेन्शन अच्छा रखते हैं। अपने पुरुषार्थ का भी और सेन्टर के वातावरण का भी। हिम्मत और उमंग में कोई कम नहीं हैं।
जहाँ भी कदम रखते हैं वहाँ अवश्य विशेष प्राप्ति ब्राह्मणों को भी होती है और देश को भी होती है। संदेश भी मिलता है और ब्राह्मणों में भी विशेष शक्ति बढ़ती और पालना भी मिलती। साकार रूप से विशेष पालना पाकर सभी खुश होते हैं और उसी खुशी में सेवा में आगे बढ़ते और सफलता को पाते हैं। दूर देश में रहने वालों के लिए पालना तो जरूरी है। पालना पाकर उड़ते हैं। जो मधुबन में आ नहीं सकते वह वहाँ बैठे मधुबन का अनुभव करते हैं। जैसे यहाँ स्वर्ग का और संगमयुग का आनन्द दोनों अनुभव करते हैं इसलिए ड्रामा अनुसार विदेश में जाने का पार्ट भी जो बना है वह आवश्यक है और सफलता भी है। हरेक विदेश के बच्चे अपने-अपने नाम से विशेष सेवा की मुबारक और विशेष सेवा की सफलता का रिटर्न यादप्यार स्वीकार करें। बाप के सामने एक-एक बच्चा है। हरेक देश का हरेक बच्चा नैनों के सामने आ रहा है। एक-एक को बापदादा यादप्यार दे रहे हैं। जो तड़पते हुए बच्चे हैं उन्हों की भी कमाल देख बापदादा सदा बच्चों के ऊपर स्नेह के पुष्पों की वर्षा करता है। बुद्धिबल उन्हों का कितना तेज है। दूसरा विमान नहीं है तो बुद्धि का विमान तेज है। उन्हों के बुद्धिबल पर बापदादा भी हर्षित होते हैं। हरेक स्थान की अपनी-अपनी विशेषता है। सिन्धी लोग भी अब समीप आ रहे हैं। जो आदि सो अन्त तो होना ही है।
ये भी जो भ्रान्ति बैठी हुई है कि ये सोशल वर्क नहीं करते हैं वह भी इस पदयात्रा को देख, ये भ्रान्ति भी मिट गई। अब क्रान्ति की तैयारी जोर शोर से हो रही है।
दिल्ली वाले भी पदयात्रियों का आह्वान कर रहे हैं, इतने ब्राह्मण घर में आयेंगे। ऐसे ब्राह्मण मेहमान तो भाग्यवान के पास ही आते हैं। देहली में सबको अधिकार है। अधिकारी को सत्कार तो देना है। देहली से ही विश्व में नाम जायेगा। अपनी-अपनी एरिया में तो कर ही रहे हैं। लेकिन देश-विदेश में तो देहली के ही टी.वी., रेडियो निमित्त बनेंगे।
दीदी निर्मलशान्ता जी से:- ये आदि रत्नों की निशानी है। हाँ जी का पाठ सदा याद होते हुए शरीर को भी शक्ति देकर पहुँच गयी। आदि रत्नों में ये नेचुरल संस्कार है। कब ना नहीं करते। सदैव हाँ जी करते हैं। और हाँ जी ने ही बड़ा हज़ूर बनाया है इसलिए बापदादा भी खुश हैं। हिम्मते बच्ची को मदद दे बाप ने स्नेह मिलन का फल दिया।
(दादी जी को) सभी को सेवा के उमंग-उत्साह की मुबारक देना। और सदा खुशी के झूले में झूलते रहते, खुशी से सेवा में प्रत्यक्षता की लगन से आगे बढ़ते रहते हैं इसलिए शुद्ध श्रेष्ठ संकल्प की सबको मुबारक हो। चारले, केन आदि जो ये पहला फल निकला, ये ग्रुप अच्छा रिटर्न दे रहे हैं। निर्मानता, निर्माण का कार्य सहज करती है। जब तक निर्मान नहीं बने तब तक निर्माण नहीं कर सकते। ये परिवर्तन बहुत अच्छा है। सबका सुनना और समाना और सभी को स्नेह देना ये सफलता का आधार है। अच्छी प्रोग्रेस की है। नये-नये पाण्डवों ने भी अच्छी मेहनत की है। अच्छा अपने में परिवर्तन लाया है। सब तरफ वृद्धि अच्छी हो रही है। अभी और नवीनता करने का प्लान बनाना। इतने तक तो सभी की मेहनत करने का फल निकला है जो पहले सुनते ही नहीं थे, वह समीप आकर ब्राह्मण आत्मायें बन रही हैं। अभी और प्रत्यक्षता करने का कोई नया सेवा का साधन बनेगा। ब्राह्मणों का संगठन भी अच्छा है। अभी सेवा वृद्धि की ओर बढ़ रही है। एक बार वृद्धि शुरू हो जाती है तो फिर लहर चलती है। अच्छा।

अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क
जैसे ब्रह्मा बाप ने निश्चय के आधार पर, रुहानी नशे के आधार पर, निश्चित भावी के ज्ञाता बन सेकेण्ड में सब सफल कर दिया। अपने लिए कुछ नहीं रखा। तो स्नेह की निशानी है सब कुछ सफल करो। सफल करने का अर्थ है श्रेष्ठ तरफ लगाना।

वरदान:

संगठन रूपी किले को मजबूत बनाने वाले सर्व के स्नेही, सन्तुष्ट आत्मा भव

संगठन की शक्ति विशेष शक्ति है। एकमत संगठन के किले को कोई भी हिला नहीं सकता। लेकिन इसका आधार है एक दो के स्नेही बन सर्व को रिगार्ड देना और स्वयं सन्तुष्ट रहकर सर्व को सन्तुष्ट करना। न कोई डिस्टर्व हो और न कोई डिस्टर्व करे। सब एक दो को शुभ भावना और शुभ कामना का सहयोग देते रहें तो यह संगठन का किला मजबूत हो जायेगा। संगठन की शक्ति ही विजय का विशेष आधार स्वरूप है।

स्लोगन:

जब हर कर्म यथार्थ और युक्तियुक्त हो तब कहेंगे पवित्र आत्मा।

20-01-2020

20-01-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - पुण्य आत्मा बनना है तो अपना पोतामेल देखो कि कोई पाप तो नहीं होता है, सच का खाता जमा है?”

प्रश्न:

सबसे बड़ा पाप कौन-सा है?

उत्तर:

किसी पर भी बुरी दृष्टि रखना-यह सबसे बड़ा पाप है। तुम पुण्य आत्मा बनने वाले बच्चे किसी पर भी बुरी दृष्टि (विकारी दृष्टि) नहीं रख सकते। जाँच करनी है हम कहाँ तक योग में रहते हैं? कोई पाप तो नहीं करते हैं? ऊंच पद पाना है तो खबरदारी रखो कि ज़रा भी कुदृष्टि न हो। बाप जो श्रीमत देते हैं उस पर पूरा चलते रहो।

गीत:-

मुखड़ा देख ले प्राणी.....

ओम् शान्ति।

बेहद का बाप अपने बच्चों को कहते हैं बच्चे, अपने भीतर ज़रा जाँच करो। यह तो मनुष्यों को मालूम रहता है कि हमने सारे जीवन में कितने पाप, कितने पुण्य किये हैं? रोज़ाना अपना पोतामेल देखो-कितने पाप और कितने पुण्य किये हैं? किसको रंज (नाराज़) तो नहीं किया? हर एक मनुष्य समझ सकते हैं-हमने लाइफ में क्या-क्या किया है? कितना पाप किया है, कितना दान-पुण्य आदि किया है? मनुष्य यात्रा पर जाते हैं तो दान-पुण्य करते हैं। कोशिश करके पाप नहीं करते हैं। तो बाप बच्चों से ही पूछते हैं-कितने पाप, कितने पुण्य किये हैं? अभी तुम बच्चों को पुण्य आत्मा बनना है। कोई भी पाप नहीं करना है। पाप भी अनेक प्रकार के होते हैं। कोई पर बुरी दृष्टि जाती है तो यह भी पाप है। बुरी दृष्टि होती ही है विकार की। वह है सबसे खराब। कभी भी विकार की दृष्टि नहीं जानी चाहिए। अक्सर करके स्त्री-पुरूष की तो विकार की ही दृष्टि होती है। कुमार-कुमारी की भी कहाँ न कहाँ विकार की दृष्टि उठती है। अब बाप कहते हैं यह विकार की दृष्टि नहीं होनी चाहिए। नहीं तो तुमको बन्दर कहना पड़े। नारद का मिसाल है ना। बोला हम लक्ष्मी को वर सकते हैं! तुम भी कहते हो ना हम तो लक्ष्मी को वरेंगे। नारी से लक्ष्मी, नर से नारायण बनेंगे। बाप कहते हैं अपने दिल से पूछो-कितने तक हम पुण्य आत्मा बने हैं? कोई पाप तो नहीं करते हैं? कहाँ तक योग में रहते हैं?
तुम बच्चे तो बाप को पहचानते हो तब तो यहाँ बैठे हो ना। दुनिया के मनुष्य थोड़ेही बाबा को पहचानेंगे कि यह बापदादा है। तुम ब्राह्मण बच्चे तो जानते हो परमपिता परमात्मा ब्रह्मा में प्रवेश होकर हमको अविनाशी ज्ञान रत्नों का खजाना देते हैं। मनुष्यों के पास होता है विनाशी धन। वही दान करते हैं, वह तो हैं पत्थर। यह हैं ज्ञान के रत्न। ज्ञान सागर बाप के पास ही रत्न हैं। यह एक-एक रत्न लाखों रूपयों का है। रत्नागर बाप से ज्ञान रत्न धारण कर और फिर इन रत्नों का दान करना है। जितना जो लेवे और देवे, उतना ऊंच पद पाये। तो बाप समझाते हैं अपने अन्दर देखो हमने कितने पाप किये हैं? अभी कोई पाप तो नहीं होता है? ज़रा भी कुदृष्टि न हो। बाप जो श्रीमत देते हैं उस पर पूरा चलते रहें, यह खबरदारी चाहिए। माया के तूफान तो भल आयें परन्तु कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नहीं करना है। कोई तरफ कुदृष्टि जाये तो उसके आगे खड़ा भी नहीं होना चाहिए। एकदम चला जाना चाहिए। मालूम पड़ जाता है-इनकी कुदृष्टि है। अगर ऊंच पद पाना है तो बहुत खबरदार रहना है। कुदृष्टि होगी तो फिर लूले-लंगड़े बन पड़ेंगे। बाप जो श्रीमत देते हैं, उस पर चलना है। बाप को बच्चे ही पहचान सकते हैं। समझो बाबा कहाँ जाता है, बच्चे ही समझेंगे कि बापदादा आया है। और मनुष्य देखते तो बहुत हैं परन्तु उनको थोड़ेही पता है। कोई पूछे भी यह कौन है? बोलो, बापदादा हैं। बैज तो सबके पास होने ही चाहिए। बोलो, शिवबाबा हमको इस दादा द्वारा अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान देते हैं। यह है प्रीचुअल नॉलेज। प्रीचुअल फादर सभी रूहों का बाप बैठ यह नॉलेज देते हैं। शिव भगवानुवाच, गीता में कृष्ण भगवानुवाच रांग है। ज्ञान सागर पतित-पावन शिव को ही कहा जाता है। ज्ञान से ही सद्गति होती है। यह है अविनाशी ज्ञान रत्न। सद्गति दाता एक ही बाप है। यह सब अक्षर पूरी रीति याद रखने चाहिए। अभी बच्चे समझते हैं कि हम बाप को जानते हैं और बाप भी समझते हैं कि हम बच्चों को जानते हैं। बाप तो कहेगा ना-यह सब हमारे बच्चे हैं, परन्तु जान नहीं सकते हैं। तकदीर में होगा तो आगे चलकर जानेंगे। समझो यह बाबा कहाँ जाता है, कोई पूछते हैं कि यह कौन है? जरूर शुद्ध भाव से ही पूछेंगे। अक्षर ही यह बोलो कि बापदादा हैं। बेहद का बाप है निराकार। वह जब तक साकार में न आये तब तक बाप से वर्सा कैसे मिले? तो शिवबाबा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा एडाप्ट कर वर्सा देते हैं। यह प्रजापिता ब्रह्मा और यह बी.के. हैं। पढ़ाने वाला ज्ञान का सागर है। उनसे ही वर्सा मिलता है। यह ब्रह्मा भी पढ़ता है। यह ब्राह्मण से फिर देवता बनने वाला है। कितना सहज है समझाना। कोई को भी बैज पर समझाना अच्छा है। बोलो, बाबा कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हो जायेंगे। पावन बन और पावन दुनिया में चले जायेंगे। यह पतित-पावन बाप है ना। हम पुरूषार्थ कर रहे हैं पावन बनने का। जब विनाश का समय होगा तो फिर हमारी पढ़ाई पूरी हो जायेगी। कितना सहज है समझाना। कोई भी कहाँ आते-जाते हैं तो भी बैज साथ में होना चाहिए। इस बैज के साथ फिर एक छोटा पर्चा भी होना चाहिए। उसमें लिखा हो कि भारत में बाप आकरके फिर से आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन करते हैं। और सभी अनेक धर्म इस महाभारत लड़ाई द्वारा कल्प पहले मिसल ड्रामा प्लैन अनुसार खलास हो जायेंगे। ऐसे पर्चे 2-4 लाख छपे हों, जो कोई को भी पर्चा दे सकते हैं। ऊपर में त्रिमूर्ति हो, दूसरे तरफ सेन्टर्स की एड्रेस हो। बच्चों को सारा दिन सर्विस का ख्याल चलना चाहिए।
बच्चों ने गीत सुना - रोज़ अपना पोतामेल बैठ निकालना चाहिए कि आज सारे दिन में हमारी अवस्था कैसी रही? बाबा ने ऐसे बहुत मनुष्य देखे हैं जो रोज़ रात को सारे दिन का पोतामेल बैठ लिखते हैं। जाँच करते हैं-कोई खराब काम तो नहीं किया? सारा लिखते हैं। समझते हैं अच्छी जीवन कहानी लिखी हुई होगी तो पिछाड़ी वाले भी पढ़कर ऐसे सीखेंगे। ऐसा लिखने वाले अच्छे आदमी ही होते हैं। विकारी तो सब होते ही हैं। यहाँ तो वह बात नहीं है। तुम अपना पोतामेल रोज़ देखो। फिर बाबा के पास भेज देना चाहिए तो उन्नति अच्छी होगी और डर भी रहेगा। सब क्लीयर लिखना चाहिए-आज हमारी बुरी दृष्टि गई, यह हुआ.......। जो एक-दो को दु:ख देते हैं बाबा उन्हें गाज़ी कहते हैं। जन्म-जन्मान्तर के पाप तुम्हारे सिर पर हैं। अभी तुमको याद के बल से पापों का बोझ उतारना है इसलिए रोज़ देखना चाहिए हम सारे दिन में कितना गाज़ी बने हैं? किसको दु:ख देना गोया गाज़ी बनना है। पाप बन जाता है। बाप कहते हैं गाज़ी बन किसको दु:ख मत दो। अपनी पूरी जाँच करो-हमने कितना पाप, कितना पुण्य किया है? जो भी मिले सबको यह रास्ता बताना ही है। सबको बहुत प्यार से बोलो, बाप को याद करना है और पवित्र बनना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र बनना है। भल तुम संगम पर हो परन्तु यह तो रावण राज्य है ना। इस मायावी विषय वैतरणी नदी में रहते कमल फूल समान पवित्र बनना है। कमल फूल बहुत बाल बच्चों वाला होता है। फिर भी पानी से ऊपर रहता है। गृहस्थी है, बहुत चीजें पैदा करता है। यह दृष्टान्त तुम्हारे लिए भी है, विकारों से न्यारा होकर रहो। यह एक जन्म पवित्र रहो तो फिर यह अविनाशी हो जायेगा। तुमको बाप अविनाशी ज्ञान रत्न देते हैं। बाकी तो सब हैं पत्थर। वो लोग तो भक्ति की ही बातें सुनाते हैं। ज्ञान सागर पतित-पावन तो एक ही है तो ऐसे बाप से बच्चों का कितना लव रहना चाहिए। बाप का बच्चों से, बच्चों का बाप से लव रहता है। बाकी और कोई से कनेक्शन नहीं। सौतेले वह हैं जो बाप की मत पर पूरा नहीं चलते हैं। रावण की मत पर चलते हैं तो राम की मत थोड़ेही ठहरी। आधाकल्प है रावण सम्प्रदाय इसलिए इनको भ्रष्टाचारी दुनिया कहा जाता है। अब तुम्हें और सबको छोड़ एक बाप की मत पर चलना है। बी.के. की मत मिलती है सो भी जाँच करनी होती है कि यह मत राइट है वा रांग है? तुम बच्चों को राइट और रांग समझ भी अभी मिली है। जब राइटियस आये तब ही राइट और रांग बताये। बाप कहते हैं तुमने आधाकल्प यह भक्ति मार्ग के शास्त्र सुने हैं, अब मैं तुमको जो सुनाता हूँ-यह राइट है या वह राइट है? वह कहते हैं ईश्वर सर्वव्यापी है, मैं कहता हूँ मैं तो तुम्हारा बाप हूँ। अब जज करो कौन राइट है? यह भी बच्चों को ही समझाया जाता है ना, जब ब्राह्मण बनें तब समझें। रावण सम्प्रदाय तो बहुत हैं, तुम तो बहुत थोड़े हो। उनमें भी नम्बरवार हैं। अगर कोई कुदृष्टि है, तो भी उनको रावण सम्प्रदाय कहा जायेगा। राम सम्प्रदाय का तब समझा जाए जब सारी दृष्टि बदल कर दैवी बन जाए। अपनी अवस्था से हर एक समझ तो सकते हैं ना। पहले तो ज्ञान था नहीं, अभी बाप ने रास्ता बताया है। तो देखना है अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान करता रहता हूँ? भक्त लोग दान करते हैं विनाशी धन का। अभी तुमको दान करना है अविनाशी धन का, न कि विनाशी। अगर विनाशी धन है तो अलौकिक सेवा में लगाते जाओ। पतित को दान करने से पतित ही बन जाते हो। अभी तुम अपना धन दान करते हो तो इसका एवजा फिर 21 जन्मों के लिए नई दुनिया में मिलता है। यह सब बातें समझने की हैं। बाबा सर्विस की युक्तियाँ भी बतालते रहते हैं। सब पर रहम करो। गाया हुआ भी है परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते हैं। परन्तु अर्थ नहीं समझते। परमात्मा को ही सर्वव्यापी कह दिया है। तो बच्चों को सर्विस का शौक बहुत अच्छा रखना है। औरों का कल्याण करेंगे तो अपना भी कल्याण होगा। दिन-प्रतिदिन बाबा बहुत सहज करते जाते हैं। यह त्रिमूर्ति का चित्र तो बहुत अच्छी चीज़ है। इसमें शिवबाबा भी है, फिर प्रजापिता ब्रह्मा भी है। प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारियों द्वारा फिर से भारत में 100 परसेन्ट पवित्रता-सुख-शान्ति का दैवी स्वराज्य स्थापन कर रहे हैं। बाकी अनेक धर्म इस महाभारत लड़ाई से कल्प पहले मुआफिक विनाश हो जायेंगे। ऐसे-ऐसे पर्चे छपवाकर बांटने चाहिए। बाबा कितना सहज रास्ता बताते हैं। प्रदर्शनी में भी पर्चे दो। पर्चे द्वारा समझाना सहज है। पुरानी दुनिया का विनाश तो होना ही है। नई दुनिया की स्थापना हो रही है। एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना हो रही है। बाकी यह सब विनाश हो जायेंगे कल्प पहले मुआफिक। कहाँ भी जाओ, पॉकेट में भी पर्चे और बैजेस सदैव पड़े रहें। सेकण्ड में जीवनमुक्ति गाई हुई है। बोलो, यह है बाप, यह दादा। उस बाप को याद करने से यह सतयुगी देवता पद पायेंगे। पुरानी दुनिया का विनाश, नई दुनिया की स्थापना, विष्णुपुरी नई दुनिया में फिर इन्हों का राज्य होगा। कितना सहज है। तीर्थों आदि पर मनुष्य जाते हैं, कितने धक्के खाते हैं। आर्य समाजी आदि भी ट्रेन भरकर जाते हैं। इसको कहा जाता है धर्म के धक्के, वास्तव में हैं अधर्म के धक्के। धर्म में तो धक्के खाने की दरकार नहीं है। तुम तो पढ़ाई पढ़ रहे हो। भक्ति मार्ग में मनुष्य क्या-क्या करते रहते हैं!
बच्चों ने गीत में भी सुना कि मुखड़ा देख..... यह मुखड़ा तुम्हारे सिवाए तो कोई देख नहीं सकते हैं। भगवान को भी तुम दिखला सकते हो। यह हैं ज्ञान की बातें। तुम मनुष्य से देवता, पाप आत्मा से पुण्य आत्मा बनते हो। दुनिया इन बातों को बिल्कुल नहीं जानती। यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक कैसे बनें-यह किसी को पता नहीं है। तुम बच्चे तो सब जानते हो। किसको बुद्धि में तीर लग जाए तो बेड़ा पार हो जाए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क
हर समय नवींनता का अनुभव करते औरों को भी नये उमंग-उत्साह में लाना। खुशी में नाचना और बाप के गुणों के गीत गाना। मधुरता की मिठाई से स्वयं का मुख मीठा करते दूसरों को भी मधुर बोल, मधुर संस्कार, मधुर स्वभाव द्वारा मुख मीठा कराना।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) अगर विनाशी धन है तो उसको सफल करने के लिए अलौकिक सेवा में लगाना है। अविनाशी धन का दान भी जरूर करना है।

2) अपने पोतामेल में देखना है कि हमारी अवस्था कैसी है? सारे दिन में कोई खराब काम तो नहीं होते हैं? एक-दो को दु:ख तो नहीं देते हैं? किसी पर कुदृष्टि तो नहीं जाती है?

वरदान:

हर खजाने को बाप के डायरेक्शन प्रमाण कार्य में लगाने वाले आनेस्ट वा ईमानदार भव

आनेस्ट अर्थात् ईमानदार उसे कहा जाता है जो बाप के प्राप्त खजानों को बाप के डायरेक्शन बिना किसी भी कार्य में नहीं लगाये। अगर समय, वाणी, कर्म, श्वांस वा संकल्प परमत या संगदोष में व्यर्थ तरफ गंवाते हो, स्वचिंतन के बजाए परचिंतन करते हो, स्वमान की बजाए किसी भी प्रकार के अभिमान में आते हो, श्रीमत के बदले मनमत के आधार पर चलते हो तो आनेस्ट नहीं कहेंगे। यह सब खजाने विश्व कल्याण के लिए मिले हैं, तो उसी में ही लगाना यही है आनेस्ट बनना।

स्लोगन:

आपोजीशन माया से करनी है दैवी परिवार से नहीं।

18-01-2020

18-01-2020        प्रात:मुरली        ओम् शान्ति       "बापदादा"      मधुबन


“मीठे बच्चे तुम्हारी चलन बहुत रॉयल होनी चाहिए, तुम देवता बन रहे हो तो लक्ष्य और लक्षण, कथनी और करनी समान बनाओ''

गीत:- 
तुम्हें पाके हमने जहान पा लिया है.... 

ओम् शान्ति। 
मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत सुना। अभी तो थोड़े बच्चे हैं फिर अनेकानेक बच्चे हो जायेंगे। प्रजापिता ब्रह्मा को जानना तो सभी को है ना। सभी धर्म वाले मानेंगे। बाबा ने समझाया है वह लौकिक बाप भी हद के ब्रह्मा हैं। उन्हों का सरनेम से सिजरा बनता है। यह फिर है बेहद का। नाम ही है प्रजापिता ब्रह्मा। वह हद के ब्रह्मा प्रजा रचते हैं, लिमिटेड। कोई दो चार रचेंगे, कोई नहीं भी रचते। इनके लिए तो यह कह नहीं सकेंगे कि सन्तान नहीं हैं। इनकी सन्तान तो सारी दुनिया है। बेहद के बापदादा दोनों का मीठे-मीठे बच्चों में बहुत रूहानी लव है। बच्चों को कितना लव से पढ़ाते हैं और क्या से क्या बनाते हैं! तो बच्चों को कितना खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। खुशी का पारा तब चढ़ेगा जब बाप को निरन्तर याद करते रहेंगे। बाप कल्प-कल्प बहुत प्यार से बच्चों को पावन बनाने की सेवा करते हैं। 5 तत्वों सहित सबको पावन बनाते हैं। कौड़ी से हीरे जैसा बनाते हैं। कितनी बड़ी बेहद की सेवा है। बाप बच्चों को बहुत प्यार से शिक्षा भी देते रहते हैं क्योंकि बच्चों को सुधारना बाप वा टीचर का ही काम है। बाप की श्रीमत से ही तुम श्रेष्ठ बनते हो। यह भी बच्चों को चार्ट में देखना चाहिए कि हम श्रीमत पर चलते हैं वा अपनी मनमत पर? श्रीमत से ही तुम एक्यूरेट बनेंगे। जितनी बाप से प्रीत बुद्धि होगी उतनी गुप्त खुशी से भरपूर रहेंगे। अपनी दिल से पूछना है हमको इतनी कापारी खुशी है? अव्यभिचारी याद है? कोई तमन्ना तो नहीं है? एक बाप की याद है? स्वदर्शन चक्र फिरता रहे तब प्राण तन से निकलें। एक शिवबाबा दूसरा न कोई। यही अन्तिम मंत्र है।

बाप रूहानी बच्चों से पूछते हैं मीठे बच्चे, जब बापदादा को सामने देखते हो तो बुद्धि में आता है कि हमारा बाबा, बाप भी है, शिक्षक भी है, सतगुरू भी है। बाप हमको इस पुरानी दुनिया से ले जाते हैं नई दुनिया में। यह पुरानी दुनिया तो अब खलास हुई कि हुई। यह तो अब कोई काम की नहीं है। बाप कल्प-कल्प नई दुनिया बनाते हैं। हम कल्प-कल्प नर से नारायण बनते हैं। बच्चों को यह सिमरण कर कितना हुल्लास में रहना चाहिए। बच्चे, टाइम बहुत थोड़ा है। आज क्या है कल क्या होगा। आज और कल का खेल है इसलिए बच्चों को ग़फलत नहीं करनी है। तुम बच्चों की चलन बड़ी रॉयल होनी चाहिए। अपने आपको देखना है देवताओं मिसल हमारी चलन है? देवताई दिमाग रहता है? जो लक्ष्य है वह बन भी रहे हैं या सिर्फ कथनी ही है? जो नॉलेज मिली है उसमें मस्त रहना चाहिए। जितना अन्तर्मुख हो इन बातों पर विचार करते रहेंगे तो बहुत खुशी रहेगी। यह भी तुम बच्चे जानते हो कि इस दुनिया से उस दुनिया में जाने का बाकी थोड़ा समय है। जब उस दुनिया को छोड़ दिया फिर पिछाड़ी में क्यों देखें! बुद्धियोग उस तरफ क्यों जाता? यह भी बुद्धि से काम लेना है। जब पार निकल गये फिर बुद्धि क्यों जाती? बीती हुई बातों का चिन्तन मत करो। इस पुरानी दुनिया की कोई भी आश न रहे। अब तो एक ही श्रेष्ठ आश रखनी है - हम तो चले सुखधाम। कहाँ भी ठहरना नहीं है। देखना नहीं है। आगे बढ़ते जाना है। एक तरफ ही देखते रहो तब ही अचल-अडोल स्थिर अवस्था रहेगी। समय बहुत नाज़ुक होता जाता है, इस पुरानी दुनिया की हालतें बिगड़ती ही जाती हैं। तुम्हारा इससे कोई कनेक्शन नहीं। तुम्हारा कनेक्शन है नई दुनिया से, जो अब स्थापन हो रही है। बाप ने समझाया है, अभी 84 का चक्र पूरा हुआ। अब यह दुनिया खत्म होनी ही है, इसकी बहुत सीरियस हालत है। इस समय सबसे अधिक गुस्सा प्रकृति को आता है इसलिए सब खलास कर देती है। अभी तुम जानते हो यह प्रकृति अपना गुस्सा जोर से दिखायेगी - सारी पुरानी दुनिया को डुबो देगी। फ्लड्स होंगे। आग लगेगी। मनुष्य भूखों मरेंगे। अर्थक्वेक में मकान आदि सब गिर पड़ेंगे। यह सब हालतें सारी दुनिया के लिए आनी हैं। अनेक प्रकार से मौत होगी। गैस के ऐसे-ऐसे बाम्ब्स छोड़ेंगे - जिसकी बाँस (बदबू) से ही मनुष्य मर जाएं। यह सब ड्रामा प्लैन बना हुआ है। इसमें दोष किसी का भी नहीं है। विनाश तो होने का ही है इसलिए तुम्हें इस पुरानी दुनिया से बुद्धि का योग हटा देना है। अब तुम कहेंगे वाह सतगुरू... जिसने हमको यह रास्ता बताया है। हमारा सच्चा-सच्चा गुरू बाबा एक ही है। जिसका नाम भक्ति में भी चला आता है। जिसकी ही वाह-वाह गाई जाती है। तुम बच्चे कहेंगे - वाह सतगुरू वाह! वाह तकदीर वाह! वाह ड्रामा वाह! बाप के ज्ञान से हमको सद्गति मिल रही है।

तुम बच्चे निमित्त बने हो विश्व में शान्ति स्थापन करने के। तो सबको यह खुशखबरी सुनाओ कि अब नया भारत, नई दुनिया जिसमें लक्ष्मी-नारायण का राज्य था वह फिर से स्थापन हो रहा है। यह दु:खधाम बदल सुखधाम बनना है। अन्दर में खुशी रहनी चाहिए कि हम सुखधाम के मालिक बन रहे हैं। वहाँ ऐसे कोई नहीं पूछेगा कि तुम राज़ी-खुशी हो? तबियत ठीक है? यह इस दुनिया में पूछा जाता है क्योंकि यह है ही दु:ख की दुनिया। तुम बच्चों से भी यह कोई पूछ नहीं सकता। तुम कहेंगे हम ईश्वर के बच्चे, तुम हमसे क्या खुश खैराफत पूछते हो! हम तो सदैव राज़ी खुशी हैं। स्वर्ग से भी यहाँ जास्ती खुशी है क्योंकि स्वर्ग स्थापन करने वाला बाप मिला तो सब कुछ मिला। परवाह थी पार ब्रह्म में रहने वाले बाप की वह मिल गया, बाकी किसकी परवाह! यह सदैव नशा रहना चाहिए। बहुत रॉयल, मीठा बनना है। अपनी तकदीर को ऊंच बनाने का अभी ही समय है। पदमापदमपति बनने का मुख्य साधन है - कदम-कदम पर खबरदारी से चलना। अन्तर्मुखी बनना। यह सदैव ध्यान रहे - “जैसा कर्म हम करेंगे हमको देख और करेंगे।'' देह अहंकार आदि विकारों का बीज तो आधाकल्प से बोया हुआ है। सारे दुनिया में यह बीज है। अब उसको मर्ज करना है। देह-अभिमान का बीज नहीं बोना है। अभी देही-अभिमानी का बीज बोना है। तुम्हारी अब है वानप्रस्थ अवस्था। मोस्ट बिलवेड बाप मिला है उनको ही याद करना है। बाप के बदले देह को वा देहधारियों को याद करना - यह भी भूल है। तुम्हें आत्म-अभिमानी बनने की, शीतल बनने की बहुत मेहनत करनी है।

मीठे बच्चे, इस अपनी लाइफ से तुम्हें कभी भी तंग नहीं होना चाहिए। यह जीवन अमूल्य गाई हुई है, इनकी सम्भाल भी करनी है। साथ-साथ कमाई भी करनी है। यहाँ जितने दिन रहेंगे, बाप को याद कर अथाह कमाई जमा करते रहेंगे। हिसाब-किताब चुक्तू होता रहेगा इसलिए कभी भी तंग नहीं होना है। बच्चे कहते हैं बाबा। सतयुग कब आयेगा? बाबा कहते बच्चे पहले तुम कर्मातीत अवस्था तो बनाओ। जितना समय मिले पुरुषार्थ करो कर्मातीत बनने का। बच्चों में नष्टोमोहा बनने की भी बड़ी हिम्मत चाहिए। बेहद के बाप से पूरा वर्सा लेना है तो नष्टोमोहा बनना पड़े। अपनी अवस्था को बहुत ऊंच बनाना है। बाप के बने हो तो बाप की ही अलौकिक सेवा में लग जाना है। स्वभाव बहुत मीठा चाहिए। मनुष्य को स्वभाव ही बहुत तंग करता है। ज्ञान का जो तीसरा नेत्र मिला है, उससे अपनी जांच करते रहो। जो भी डिफेक्ट हो उनको निकाल प्युअर डाइमन्ड बनना है। थोड़ा भी डिफेक्ट होगा तो वैल्यु कम हो जायेगी इसलिए मेहनत कर अपने को वैल्युबुल हीरा बनाना है।

तुम बच्चों से बाप अब नई दुनिया के सम्बन्ध का पुरुषार्थ कराते हैं। मीठे बच्चे, अब बेहद के बाप और बेहद सुख के वर्से से सम्बन्ध रखो। एक ही बेहद का बाप है जो बन्धन से छुड़ाकर तुम्हें अलौकिक सम्बन्ध में ले जाते हैं। सदैव यह स्मृति रहे कि हम ईश्वरीय सम्बन्ध के हैं। यह ईश्वरीय सम्बन्ध ही सदा सुखदाई है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे, अति स्नेही बच्चों को मात-पिता बापदादा का दिल व जान, सिक व प्रेम से यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।


वरदान:- 
सेवा करते हुए याद के अनुभवों की रेस करने वाले सदा लवलीन आत्मा भव

याद में रहते हो लेकिन याद द्वारा जो प्राप्तियां होती हैं, उस प्राप्ति की अनुभूति को आगे बढ़ाते जाओ, इसके लिए अभी विशेष समय और अटेन्शन दो जिससे मालूम पड़े कि यह अनुभवों के सागर में खोई हुई लवलीन आत्मा है। जैसे पवित्रता, शान्ति के वातावरण की भासना आती है वैसे श्रेष्ठ योगी, लगन में मगन रहने वाले हैं - यह अनुभव हो। नॉलेज का प्रभाव है लेकिन योग के सिद्धि स्वरूप का प्रभाव हो। सेवा करते हुए याद के अनुभवों में डूबे हुए रहो, याद की यात्रा के अनुभवों की रेस करो।

स्लोगन:- 
सिद्धि को स्वीकार कर लेना अर्थात् भविष्य प्रालब्ध को यहाँ ही समाप्त कर देना।
 


अव्यक्त बापदादा के मधुर महावाक्य (रिवाइज)


सफलता-मूर्त बनने के लिये मुख्य दो ही विशेषतायें चाहिये - एक प्योरिटी, दूसरी यूनिटी। अगर प्योरिटी की कमी है तो यूनिटी में भी कमी है। प्योरिटी सिर्फ ब्रह्मचर्य व्रत को नहीं कहा जाता, संकल्प, स्वभाव, संस्कार में भी प्योरिटी। मानों एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या या घृणा का संकल्प है तो प्योरिटी नहीं, इमप्योरिटी कहेंगे। प्योरिटी की परिभाषा में सर्व विकारों का अंश-मात्र तक न होना है। संकल्प में भी किसी प्रकार की इमप्योरिटी न हो। आप बच्चे निमित्त बने हुए हो - बहुत ऊंचे कार्य को सम्पन्न करने के लिये। निमित्त तो महारथी रूप से बने हुए हो ना? अगर लिस्ट निकालते हैं तो लिस्ट में भी तो सर्विसएबुल तथा सर्विस के निमित्त बनें ब्रह्मा वत्स ही महारथी की लिस्ट में गिने जाते हैं। महारथी की विशेषता कहाँ तक आयी है? सो तो हर-एक स्वयं जाने। महारथी जो लिस्ट में गिना जाता है वो आगे चलकर महारथी होगा अथवा वर्तमान की लिस्ट में महारथी है। तो इन दोनों बातों के ऊपर अटेन्शन चाहिए।

यूनिटी अर्थात् संस्कार-स्वभाव के मिलन की यूनिटी। कोई का संस्कार और स्वभाव न भी मिले तो भी कोशिश करके मिलाओ, यह है यूनिटी। सिर्फ संगठन को यूनिटी नहीं कहेंगे। सर्विसएबुल निमित्त बनी आत्मायें इन दो बातों के सिवाय बेहद की सर्विस के निमित्त नहीं बन सकती हैं। हद के हो सकते हैं, बेहद की सर्विस के लिये ये दोनों बातें चाहियें। सुनाया था ना - रास में ताल मिलाने पर ही वाह-वाह होती है। तो यहाँ भी ताल मिलाना अर्थात् रास मिलाना है। इतनी आत्मायें जो नॉलेज वर्णन करती हैं तो सबके मुख से यह निकलता है कि ये एक ही बात कहते हैं, इन सबका एक ही टॉपिक है, एक ही शब्द है, यह सब कहते है ना? इसी प्रकार सबके स्वभाव और संस्कार एक-दो में मिलें तब कहेंगे रास मिलाना। इसका भी प्लैन बनाओ।

कोई भी कमज़ोरी को मिटाने के लिये विशेष महाकाली स्वरूप शक्तियों का संगठन चाहिये जो अपने योग-अग्नि के प्रभाव से कमजोर वातावरण को परिवर्तन करें। अभी तो ड्रामा अनुसार हर-एक चलन रूपी दर्पण में अन्तिम रिजल्ट स्पष्ट होने वाली है। आगे चल कर महारथी बच्चे अपने नॉलेज की शक्ति द्वारा हर-एक के चेहरे से उन्हों की कर्म-कहानी को स्पष्ट देख सकेंगे। जैसे मलेच्छ भोजन की बदबू समझ में आ जाती है, वैसे मलेच्छ संकल्प रूपी आहार स्वीकार करने वाली आत्माओं के वायब्रेशन से बुद्धि में स्पष्ट टचिंग होगी, इसका यंत्र है बुद्धि की लाइन क्लियर। जिसका यह यंत्र पॉवरफुल होगा वह सहज जान सकेंगे।

शक्तियों व देवताओं के जड़ चित्रों में भी यह विशेषता है, जो कोई भी पाप-आत्मा अपना पाप उन्हों के आगे जाकर छिपा नहीं सकती। आप ही यह वर्णन करते रहते हैं कि हम ऐसे हैं। तो जड़ यादगार में भी अब अन्तकाल तक यह विशेषता दिखाई देती है। चैतन्य रूप में शक्तियों की यह विशेषता प्रसिद्ध हुई है तब तो यादगार में भी है। यह है मास्टर जानी जाननहार की स्टेज अर्थात् नॉलेजफुल की स्टेज। यह स्टेज भी प्रैक्टिकल में अनुभव होगी, होती जा रही है और होगी भी। ऐसा संगठन बनाया है? बनना तो है ही। ऐसे शमा-स्वरूप संगठन चाहिए, जिन्हों के हर कदम से बाप की प्रत्यक्षता हो। अच्छा।

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