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26-01-20

26-01-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज: 13-11-85 मधुबन


संकल्प, संस्कार, सम्बन्ध बोल और कर्म में नवीनता लाओ

आज नई दुनिया के नई रचना के रचयिता बाप अपने नई दुनिया के अधिकारी बच्चों को अर्थात् नई रचना को देख रहे हैं। नई रचना सदा ही प्यारी लगती है। दुनिया के हिसाब से पुराने युग में नया वर्ष मनाते हैं। लेकिन आप नई रचना के नये युग की, नई जीवन की अनुभूति कर रहे हो। सब नया हो गया। पुराना समाप्त हो नया जन्म नई जीवन प्रारम्भ हो गई। जन्म नया हुआ तो जन्म से जीवन स्वत: ही बदलती है। जीवन बदलना अर्थात् संकल्प, संस्कार, सम्बन्ध सब बदल गया अर्थात् नया हो गया। धर्म नया, कर्म नया। वह सिर्फ वर्ष नया कहते हैं। लेकिन आप सबके लिए सब नया हो गया। आज के दिन अमृतवेले से नये वर्ष की मुबारक तो दी लेकिन सिर्फ मुख से मुबारक दी वा मन से? नवीनता का संकल्प लिया? इन विशेष तीन बातों की नवीनता का संकल्प किया? संकल्प, संस्कार और सम्बन्ध। संस्कार और संकल्प नया अर्थात् श्रेष्ठ बन गया। नया जन्म, नई जीवन होते हुए भी अब तक पुराने जन्म वा जीवन के संकल्प, संस्कार वा सम्बन्ध रह तो नहीं गये हैं? अगर इन तीनों बातों में से कोई भी बात में अंश मात्र पुरानापन रहा हुआ है तो यह अंश नई जीवन का नये युग का, नये सम्बन्ध का, नये संस्कार का सुख वा सर्व प्राप्ति से वंचित कर देगा। कई बच्चे ऐसे बापदादा के आगे अपने मन की बातें रुह-रुहान में कहते रहते हैं। बाहर से नहीं कहते। बाहर से तो कोई भी पूछता है - कैसे हो? तो सब यही कहते हैं कि बहुत अच्छा क्योंकि जानते हैं बाहर-यामी आत्मायें अन्दर को क्या जानें। लेकिन बाप से रुह-रुहान में छिपा नहीं सकते। अपने मन की बातों में यह जरूर कहते ब्राह्मण तो बन गये, शूद्र पन से किनारा कर लिया लेकिन जो ब्राह्मण जीवन की महानता, विशेषता - सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों का वा अतीन्द्रिय सुख का, फरिश्तेपन के डबल लाइट जीवन का, ऐसा विशेष अनुभव जितना होना चाहिए उतना नहीं होता। जो वर्णन इस श्रेष्ठ युग के श्रेष्ठ जीवन का है, ऐसा अनुभव, ऐसी स्थिति बहुत थोड़ा समय होती। इसका कारण क्या? जब ब्राह्मण बने तो ब्राह्मण जीवन के अधिकार का अनुभव नहीं होता, क्यों? है राजा का बच्चा लेकिन संस्कार भिखारीपन के हो तो उनको क्या कहेंगे? राजकुमार कहेंगे? यहाँ भी नया जन्म, नई ब्राह्मण जीवन और फिर भी पुराने संकल्प वा संस्कार इमर्ज हों वा कर्म में हों तो क्या उसे ब्रह्माकुमार कहेंगे? वा आधा शूद्र कुमार और आधा ब्रह्माकुमार। ड्रामा में एक खेल दिखाते हो ना आधा सफेद आधा काला। संगमयुग इसको तो नहीं समझा है। संगमयुग अर्थात् नया युग। नया युग तो सब नया।
बापदादा आज सबकी आवाज सुन रहे थे - नये वर्ष की मुबारक हो। कार्डस भी भेजते पत्र भी लिखते लेकिन कहना और करना दोनों एक हैं? मुबारक तो दी, बहुत अच्छा किया। बापदादा भी मुबारक देते हैं। बापदादा भी कहते सबके मुख के बोल में अविनाशी भव का वरदान। आप लोग कहते हो ना मुख में गुलाब, बापदादा कहते मुख के बोल में अविनाशी वरदान हो। आज से सिर्फ एक शब्द याद रखना -”नया”। जो भी संकल्प करो, बोल बोलो, कर्म करो यही चेक करो याद रखो कि नया है? यही पोतामेल चौपड़ा, रजिस्टर आज से शुरू करो। दीपमाला में चौपड़े पर क्या करते हैं? स्वास्तिका निकालते हैं ना। गणेश। और चारों ही युग में बिन्दी जरूर लगाते हैं। क्यों लगाते हैं? किसी भी कार्य को प्रारम्भ करते समय स्वास्तिका वा गणेश नम: जरूर कहते हैं। यह किसकी यादगार है? स्वास्तिका को भी गणेश क्यों कहते? स्वास्तिका स्वस्थिति में स्थित होने का और पूरी रचना की नॉलेज का सूचक है। गणेश अर्थात् नॉलेजफुल। स्वास्तिका के एक चित्र में पूरी नॉलेज समाई हुई है। नॉलेजफुल की स्मृति का यादगार गणेश वा स्वास्तिका दिखाते हैं। इसका अर्थ क्या हुआ? कोई भी कार्य की सफलता का आधार है - नॉलेजफुल अर्थात् समझदार, ज्ञान स्वरूप बनना। ज्ञान स्वरूप समझदार बन गये तो हर कर्म श्रेष्ठ और सफल होगा ना। वो तो सिर्फ कागज़ पर यादगार की निशानी लगा देते हैं लेकिन आप ब्राह्मण आत्मायें स्वयं नॉलेजफुल बन हर संकल्प करेंगी तो संकल्प और सफलता दोनों साथ-साथ अनुभव करेंगे। तो आज से यह दृढ़ संकल्प के रंग द्वारा अपने जीवन के चौपड़े पर हर संकल्प संस्कार नया ही होना है। होगा, यह भी नहीं। होना ही है। स्वस्थिति में स्थित हो यह श्रीगणेश अर्थात् आरम्भ करो। स्वयं श्रीगणेश बन करके आरम्भ करो। ऐसे नहीं सोचो यह तो होता ही रहता है। संकल्प बहुत बार करते, लेकिन संकल्प दृढ़ हो। जैसे फाउन्डेशन में पक्का सीमेन्ट आदि डालकर मजबूत किया जाता है ना! अगर रेत का फाउण्डेशन बना दें तो कितना समय चलेगा? तो जिस समय संकल्प करते हो उस समय कहते, करके देखेंगे, जितना हो सकेगा करेंगे। दूसरे भी तो ऐसे ही करते हैं। यह रेत मिला देते हो, इसीलिए फाउन्डेशन पक्का नहीं होता। दूसरों को देखना सहज लगता है। अपने को देखने में मेहनत लगती है। अगर दूसरों को देखने चाहते हो, आदत से मजबूर हो तो ब्रह्मा बाप को देखो। वह भी तो दूसरा हुआ ना, इसलिए बापदादा ने दीपावली का पोतामेल देखा। पोतामेल में विशेष कारण, ब्राह्मण बनते भी ब्राह्मण जीवन की अनुभूति न होना। जितना होना चाहिए उतना नहीं होता। इसका विशेष कारण है - परदृष्टि, परचिंतन, परपंच में जाना। परिस्थितियों के वर्णन और मनन में ज्यादा रहते हैं, इसलिए स्वदर्शन चक्रधारी बनो। स्व से पर खत्म हो जायेगा। जैसे आज नये वर्ष की सबने मिलकर मुबारक दी, ऐसे हर दिन नया दिन, नई जीवन, नया संकल्प, नये संस्कार, स्वत: ही अनुभव करेंगे। और मन से हर घड़ी बाप के प्रति, ब्राह्मण परिवार के प्रति बधाई के शुभ उमंग स्वत: ही उत्पन्न होते रहेंगे। सबकी दृष्टि में मुबारक, बधाई, ग्रीटिंग्स की लहर होगी। तो ऐसे आज के मुबारक शब्द को अविनाशी बनाओ। समझा। लोग पोतामेल रखते हैं। बाप ने पोतामेल देखा। बापदादा को बच्चों पर रहम आता है कि सारा मिलते भी अधूरा क्यों लेते? नाम नया ब्रह्माकुमार वा कुमारी और काम मिक्स क्यों? दाता के बच्चे हो, विधाता के बच्चे हो, वरदाता के बच्चे हो। तो नये वर्ष में क्या याद रखेंगे? सब नया करना है अर्थात् ब्राह्मण जीवन की मर्यादा का सब नया। नया का अर्थ कोई मिक्सचर नहीं करना। चतुर भी बहुत बन गये हैं ना। बाप को भी पढ़ाते हैं। कई बच्चे कहते हैं ना - बाबा ने कहा था ना नया करना है, तो यह नया हम कर रहे हैं। लेकिन ब्राह्मण जीवन की मर्यादा प्रमाण नया हो। मर्यादा की लकीर तो ब्राह्मण जीवन, ब्राह्मण जन्म से बापदादा ने दे दी है। समझा नया वर्ष कैसे मनाना है। सुनाया ना - 18 अध्याय शुरू हो रहा है।
गोल्डन जुबली के पहले विश्वविद्यालय की गोल्डन जुबली है। ऐसे नहीं समझना कि सिर्फ 50 वर्ष वालों की गोल्डन जुबली है। लेकिन यह ईश्वरीय कार्य की गोल्डन जुबली है। स्थापना के कार्य में जो भी सहयोगी हो चाहे दो वर्ष के हों, चाहे 50 वर्ष के हों लेकिन दो वर्ष वाले भी अपने को ब्रह्माकुमार कहते हैं ना या और कोई नाम कहते। तो यह ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मणों के रचना की गोल्डन जुबली है, इसमें सब ब्रह्माकुमार कुमारियाँ हैं। गोल्डन जुबली तक अपने में गोल्डन एजड अर्थात् सतोप्रधान संकल्प संस्कार इमर्ज करने हैं। ऐसी गोल्डन जुबली मनानी है। यह तो निमित्त मात्र रसम रिवाज की रीति से मनाते हो लेकिन वास्तविक गोल्डन जुबली गोल्डन एजड बनने की जुबली है। कार्य सफल हुआ अर्थात् कार्य अर्थ निमित्त आत्मायें सफलता स्वरूप बनें। अभी भी समय पड़ा है। इन 3 मास के अन्दर दुनिया की स्टेज के आगे निराली गोल्डन जुबली मनाके दिखाओ। दुनिया वाले सम्मान देते हैं और यहाँ समान की स्टेज की प्रत्यक्षता करनी है। सम्मान देने के लिए कुछ भी करते हो यह तो निमित्त मात्र है। वास्तविकता दुनिया के आगे दिखानी है। हम सब एक हैं, एक के हैं, एकरस स्थिति वाले हैं। एक की लगन में मगन रह एक का नाम प्रत्यक्ष करने वाले हैं, यह न्यारा और प्यारा गोल्डन स्थति का झण्डा लहराओ। गोल्डन दुनिया के नजारे आपके नयनों द्वारा बोल और कर्म द्वारा स्पष्ट दिखाई दे। ऐसी गोल्डन जुबली मनाना। अच्छा-
ऐसे सदा अविनाशी मुबारक के पात्र श्रेष्ठ बच्चों को, अपने हर संकल्प और कर्म द्वारा नये संसार का साक्षात्कार कराने वाले बच्चों को, अपनी गोल्डन एजड स्थिति द्वारा गोल्डन दुनिया आई कि आई ऐसा शुभ आशा का दीपक विश्व की आत्माओं के अन्दर जगाने वाले, सदा जगमगाते सितारों को, सफलता के दीपकों को दृढ़ संकल्प द्वारा नये जीवन का दर्शन कराने वाले, दर्शनीय मूर्त बच्चों को बापदादा का यादप्यार, अविनाशी बधाई, अविनाशी वरदान के साथ नमस्ते।
पदयात्रियों तथा साइकिल यात्रियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात
यात्रा द्वारा सेवा तो सभी ने की। जो भी सेवा की उस सेवा का प्रत्यक्ष फल भी अनुभव किया। सेवा की विशेष खुशी अनुभव की है ना। पदयात्रा तो की, सभी ने आपको पदयात्री के रूप में देखा। अभी रूहानी यात्री के रूप में देखें। सेवा के रूप में तो देखा लेकिन अभी इतनी न्यारी यात्रा कराने वाले अलौकिक यात्री हैं, यह अनुभव हो। जैसे इस सेवा में लगन से सफलता को पाया ना। ऐसे अभी रूहानी यात्रा में सफल होना है। मेहनत करते हैं, बहुत अच्छी सेवा करते हैं, सुनाते बहुत अच्छा हैं इन्हों की जीवन बहुत अच्छी है, यह तो हुआ। लेकिन अभी जीवन बनाने लग जाएं, ऐसा अनुभव करें कि इसी जीवन के बिना और कोई जीवन ही नहीं है। तो रूहानी यात्रा का लक्ष्य रख रूहानी यात्रा का अनुभव कराओ। समझा क्या करना है। चलते-फिरते ऐसे ही देखें कि यह साधारण नहीं है। यह रूहानी यात्री हैं तो क्या करना है! स्वयं भी यात्रा में रहो और दूसरों को भी यात्रा का अनुभव कराओ। पद-यात्रा का अनुभव कराया, अभी फरिश्ते पन का अनुभव कराओ। अनुभव करें कि यह इस धरनी के रहने वाले नहीं हैं। यह फरिश्ते हैं। इन्हों के पांव इस धरती पर नहीं रहते। दिन प्रतिदिन उड़ती कला द्वारा औरों को उड़ाना। अभी उड़ाने का समय है। चलाने का समय नहीं है। चलने में समय लगता और उड़ने में समय नहीं लगता। अपनी उड़ती कला द्वारा औरों को भी उड़ाओ। समझा। ऐसे दृष्टि से स्मृति से सभी को सम्पन्न बनाते जाओ। वह समझें कि हमको कुछ मिला है। भरपूर हुए हैं। खाली थे लेकिन भरपूर हो गये। जहाँ प्राप्ति होती है वहाँ सेकण्ड में न्योछावर होते हैं। आप लोगों को प्राप्ति हुई तब तो छोड़ा ना। अच्छा लगा अनुभव किया तब छोड़ा ना। ऐसे तो नहीं छोड़ा। ऐसे औरों को प्राप्ति का अनुभव कराओ। समझा! बाकी अच्छा है! जो भी सेवा में दिन बिताये, वह अपने लिए भी औरों के लिए भी श्रेष्ठ बनायें। उमंग-उत्साह अच्छा रहा! रिजल्ट ठीक रही ना। रूहानी यात्रा सदा रहेगी तो सफलता भी सदा रहेगी। ऐसे नहीं पदयात्रा पूरी की तो सेवा पूरी हुई। फिर जैसे थे वैसे। नहीं। सदा सेवा के क्षेत्र में सेवा के बिना ब्राह्मण नहीं रह सकते। सिर्फ सेवा का पार्ट चेन्ज हुआ। सेवा तो अन्त तक करनी है। ऐसे सेवाधारी हो ना या तीन मास दो मास के सेवाधारी हो! सदा के सेवाधारी सदा ही उमंग-उत्साह रहे। अच्छा। ड्रामा में जो भी सेवा का पार्ट मिलता है उसमें विशेषता भरी हुई है। हिम्मत से मदद का अनुभव किया। अच्छा। स्वयं द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करने का श्रेष्ठ संकल्प रहा क्योंकि जब बाप को प्रत्यक्ष करेंगे तब इस पुरानी दुनिया की समाप्ति होगी, अपना राज्य आयेगा। बाप को प्रत्यक्ष करना अर्थात् अपना राज्य लाना। अपना राज्य लाना है यह उमंग-उत्साह सदा रहता है ना! जैसे विशेष प्रोग्राम में उमंग-उत्साह रहा, ऐसे सदा इस संकल्प का उमंग-उत्साह रहे। समझा।

पार्टियों से:- सुना तो बहुत है! अभी उसी सुनी हुई बातों को समाना है क्योंकि जितना समायेंगे उतना बाप के समान शक्तिशाली बनेंगे। मास्टर हो ना। तो जैसे बाप सर्वशक्तिमान है ऐसे आप सभी भी मास्टर सर्वशक्तिवान अर्थात् सर्व शक्तियों को समाने वाले, बाप समान बनने वाले हो ना। बाप और बच्चों में जीवन के आधार से अन्तर नहीं दिखाई दे। जैसे ब्रह्मा बाप की जीवन देखी तो ब्रह्मा बाप और बच्चे समान दिखाई दें। साकार में तो ब्रह्मा बाप कर्म करके दिखाने के निमित्त बने ना। ऐसे समान बनना अर्थात् मास्टर सर्वशक्तिवान बनना। तो सर्वशक्तियाँ हैं? धारण तो की है लेकिन परसेन्टेज है। जितना होना चाहिए उतना नहीं है। सम्पन्न नहीं है। बनना तो सम्पन्न है ना! तो परसेन्टेज को बढ़ाओ। शक्तियों को समय पर कार्य में लगाना, इसी पर ही नम्बर मिलते हैं। अगर समय पर कार्य में नहीं आती तो क्या कहेंगे? होते भी न होना ही कहेंगे क्योंकि समय पर काम में नही आई। तो चेक करो कि समय प्रमाण जिस शक्ति की आवश्यकता है वह कार्य में लगा सकते हैं? तो बाप समान मास्टर सर्वशक्तिवान प्रत्यक्ष रूप में विश्व को दिखाना है। तब तो विश्व मानेगा कि हाँ सर्वशक्तिमान प्रत्यक्ष हो चुका, यही लक्ष्य है ना! अभी देखेंगे कि गोल्डन जुबली तक नम्बर कौन लेते हैं। अच्छा!
अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क
यदि किसी भी प्रकार का भारीपन अथवा बोझ है तो आत्मिक एक्सरसाइज़ करो। अभी-अभी कर्मयोगी अर्थात् साकारी स्वरूपधारी बन साकार सृष्टि का पार्ट बजाओ, अभी-अभी आकारी फरिश्ता बन आकारी वतनवासी अव्यक्त रूप का अनुभव करो, अभी-अभी निराकारी बन मूलवतनवासी का अनुभव करो, इस एक्सरसाइज़ से हल्के हो जायेंगे, भारीपन खत्म हो जायेगा।

वरदान:

विश्व कल्याण की भावना द्वारा हर आत्मा की सेफ्टी के प्लैन बनाने वाले सच्चे रहमदिल भव

वर्तमान समय कई आत्मायें अपने आपही स्वयं के अकल्याण के निमित्त बन रही हैं, उनके लिए रहमदिल बन कोई प्लैन बनाओ। किसी भी आत्मा के पार्ट को देखकर स्वयं हलचल में नहीं आओ लेकिन उनकी सेफ्टी का साधन सोचो, ऐसे नहीं कि यह तो होता रहता है, झाड को तो झडना ही है। नहीं। आये हुए विघ्नों को खत्म करो। विश्व कल्याणकारी वा विघ्न विनाशक का जो टाइटल है-उस प्रमाण संकल्प, वाणी और कर्म में रहमदिल बन वायुमण्डल को चेंज करने में सहयोगी बनो।

स्लोगन:

कर्मयोगी वही बन सकता है जो बुद्धि पर अटेन्शन का पहरा देता है।

25-01-2020

25-01-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम्हें विकर्मों की सज़ा से मुक्त होने का पुरूषार्थ करना है, इस अन्तिम जन्म में सब हिसाब-किताब चुक्तू कर पावन बनना है”

प्रश्न:

धोखेबाज माया कौन-सी प्रतिज्ञा तुड़वाने की कोशिश करती है?

उत्तर:

तुमने प्रतिज्ञा की है - कोई भी देहधारी से हम दिल नहीं लगायेंगे। आत्मा कहती है हम एक बाप को ही याद करेंगे, अपनी देह को भी याद नहीं करेंगे। बाप, देह सहित सबका सन्यास कराते हैं। परन्तु माया यही प्रतिज्ञा तुड़वाती है। देह में लगाव हो जाता है। जो प्रतिज्ञा तोड़ते हैं उन्हें सजायें भी बहुत खानी पड़ती हैं।

गीत:-

तुम्हीं हो माता-पिता तुम्हीं हो........

ओम् शान्ति।

ऊंच ते ऊंच भगवान की महिमा भी की है और फिर ग्लानि भी की है। अब ऊंच ते ऊंच बाप खुद आकर परिचय देते हैं और फिर जब रावण राज्य शुरू होता है तो अपनी ऊंचाई दिखाते हैं। भक्ति मार्ग में भक्ति का ही राज्य है इसलिए कहा जाता है रावण राज्य। वह राम राज्य, यह रावण राज्य। राम और रावण की ही भेंट की जाती है। बाकी वह राम तो त्रेता का राजा हुआ, उनके लिए नहीं कहा जाता। रावण है आधाकल्प का राजा। ऐसे नहीं कि राम आधाकल्प का राजा है। नहीं, यह डिटेल में समझने की बातें हैं। बाकी वह तो बिल्कुल सहज बात है समझने की। हम सब भाई-भाई हैं। हम सबका वह बाप एक निराकार है। बाप को मालूम है इस समय हमारे सब बच्चे रावण की जेल में हैं। काम चिता पर बैठ सब काले हो गये हैं। यह बाप जानते हैं। आत्मा में ही सारी नॉलेज है ना। इसमें भी सबसे जास्ती महत्व देना होता है आत्मा और परमात्मा को जानने का। छोटी-सी आत्मा में कितना पार्ट नूंधा हुआ है जो बजाती रहती है। देह-अभिमान में आकर पार्ट बजाते हैं तो स्वधर्म को भूल जाते हैं। अब बाप आकर आत्म अभिमानी बनाते हैं क्योंकि आत्मा ही कहती है कि हम पावन बनें। तो बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। आत्मा पुकारती है हे परमपिता, हे पतित-पावन, हम आत्मायें पतित बन गये हैं, आकर हमें पावन बनाओ। संस्कार तो सब आत्मा में हैं ना। आत्मा साफ कहती है हम पतित बने हैं। पतित उनको कहा जाता है जो विकार में जाते हैं। पतित मनुष्य, पावन निर्विकारी देवताओं के आगे जाकर मन्दिर में उनकी महिमा गाते हैं। बाप समझाते हैं बच्चे तुम ही पूज्य देवता थे। 84 जन्म लेते-लेते नीचे जरूर उतरना पड़े। यह खेल ही पतित से पावन, पावन से पतित होने का है। सारा ज्ञान बाप आकर इशारे में समझाते हैं। अभी सबका अन्तिम जन्म है। सबको हिसाब-किताब चुक्तू कर जाना है। बाबा साक्षात्कार कराते हैं। पतित को अपने विकर्मों का दण्ड जरूर भोगना पड़ता है। पिछाड़ी का कोई जन्म देकर ही सजा देंगे। मनुष्य तन में ही सजा खायेंगे इसलिए शरीर जरूर धारण करना पड़ता है। आत्मा फील करती है, हम सजा भोग रहे हैं। जैसे काशी कलवट खाने समय दण्ड भोगते हैं, किये हुए पापों का साक्षात्कार होता है। तब तो कहते हैं क्षमा करो भगवान, हम फिर ऐसा नहीं करेंगे। यह सब साक्षात्कार में ही क्षमा मांगते हैं। फील करते हैं, दु:ख भोगते हैं। सबसे जास्ती महत्व है आत्मा और परमात्मा का। आत्मा ही 84 जन्मों का पार्ट बजाती है। तो आत्मा सबसे पावरफुल हुई ना। सारे ड्रामा में महत्व है आत्मा और परमात्मा का। जिसको और कोई भी नहीं जानते। एक भी मनुष्य नहीं जानता कि आत्मा क्या, परमात्मा क्या है? ड्रामा अनुसार यह भी होना है। तुम बच्चों को भी ज्ञान है कि यह कोई नई बात नहीं, कल्प पहले भी यह चला था। कहते भी हैं ज्ञान, भक्ति, वैराग्य। परन्तु अर्थ नहीं समझते हैं। बाबा ने इन साधुओं आदि का संग बहुत किया हुआ है, सिर्फ नाम ले लेते हैं। अभी तुम बच्चे अच्छी रीति जानते हो कि हम पुरानी दुनिया से नई दुनिया में जाते हैं तो पुरानी दुनिया से जरूर वैराग्य करना पड़े। इनसे क्या दिल लगानी है। तुमने प्रतिज्ञा की है - कोई भी देहधारी से दिल नही लगायेंगे। आत्मा कहती है हम एक बाप को ही याद करेंगे। अपनी देह को भी याद नहीं करेंगे। बाप देह सहित सबका सन्यास कराते हैं। फिर औरों की देह से हम लगाव क्यों रखें। कोई से लगाव होगा तो उनकी याद आती रहेगी। फिर ईश्वर याद आ न सके। प्रतिज्ञा तोड़ते हैं तो सज़ा भी बहुत खानी पड़ती है, पद भी भ्रष्ट हो जाता है इसलिए जितना हो सके बाप को ही याद करना है। माया तो बड़ी धोखेबाज है। कोई भी हालत में माया से अपने को बचाना है। देह-अभिमान की बहुत कड़ी बीमारी है। बाप कहते हैं अब देही-अभिमानी बनो। बाप को याद करो तो देह-अभिमान की बीमारी छूट जाए। सारा दिन देह-अभिमान में रहते हैं। बाप को याद बड़ा मुश्किल करते हैं। बाबा ने समझाया है हथ कार डे दिल यार डे। जैसे आशिक माशूक धन्धा आदि करते भी अपने माशूक को ही याद करते रहते। अब तुम आत्माओं को परमात्मा से प्रीत रखनी है तो उनको ही याद करना चाहिए ना। तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट ही है कि हमको देवी-देवता बनना है, उसके लिए पुरूषार्थ करना है। माया धोखा तो जरूर देगी, अपने को उनसे छुड़ाना है। नहीं तो फँस मरेंगे फिर ग्लानि भी होगी, नुकसान भी बहुत होगा।
तुम बच्चे जानते हो कि हम आत्मा बिन्दी हैं, हमारा बाप भी बीजरूप नॉलेजफुल है। यह बड़ी वन्डरफुल बातें हैं। आत्मा क्या है, उसमें कैसे अविनाशी पार्ट भरा हुआ है-इन गुह्य बातों को अच्छे-अच्छे बच्चे भी पूरी तरह नहीं समझते हैं। अपने को यथार्थ रीति आत्मा समझें और बाप को भी बिन्दी मिसल समझ याद करें, वह ज्ञान का सागर है, बीजरूप है..... ऐसा समझ बड़ा मुश्किल याद करते हैं। मोटे ख्यालात से नहीं, इसमें महीन बुद्धि से काम लेना होता है-हम आत्मा हैं, हमारा बाप आया हुआ है, वह बीजरूप नॉलेजफुल है। हमको नॉलेज सुना रहे हैं। धारणा भी मुझ छोटी-सी आत्मा में होती है। ऐसे बहुत हैं जो मोटी रीति सिर्फ कह देते हैं-आत्मा और परमात्मा..... लेकिन यथार्थ रीति बुद्धि में आता नहीं है। ना से तो मोटी रीति याद करना भी ठीक है। परन्तु वह यथार्थ याद जास्ती फलदायक है। वह इतना ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। इसमें बड़ी मेहनत है। मैं आत्मा छोटी-सी बिन्दु हूँ, बाबा भी इतनी छोटी-सी बिन्दु है, उनमें सारा ज्ञान है, यह भी यहाँ तुम बैठे हो तो कुछ बुद्धि में आता है लेकिन चलते-फिरते वह चिंतन रहे, सो नहीं। भूल जाते हैं। सारा दिन वही चिंतन रहे-यह है सच्ची-सच्ची याद। कोई सच बताते नहीं हैं कि हम कैसे याद करते हैं। चार्ट भल भेजते हैं परन्तु यह नहीं लिखते कि ऐसे अपने को बिन्दी समझ और बाप को भी बिन्दी समझ याद करता हूँ। सच्चाई से पूरा लिखते नहीं हैं। भल बहुत अच्छी-अच्छी मुरली चलाते हैं परन्तु योग बहुत कम है। देह-अभिमान बहुत है, इस गुप्त बात को पूरा समझते नहीं, सिमरण नहीं करते हैं। याद से ही पावन बनना है। पहले तो कर्मातीत अवस्था चाहिए ना। वही ऊंच पद पा सकेंगे। बाकी मुरली बजाने वाले तो ढेर हैं। लेकिन बाबा जानते हैं योग में रह नहीं सकते। विश्व का मालिक बनना कोई मासी का घर थोड़ेही है। वह अल्पकाल के मर्तबे पाने के लिए भी कितना पढ़ते हैं। सोर्स ऑफ इनकम अब हुई है। आगे थोड़ेही बैरिस्टर आदि इतना कमाते थे। अभी कितनी कमाई हो गई है।
बच्चों को अपने कल्याण के लिए एक तो अपने को आत्मा समझ यथार्थ रीति बाप को याद करना है और त्रिमूर्ति शिव का परिचय औरों को भी देना है। सिर्फ शिव कहने से समझेंगे नहीं। त्रिमूर्ति तो जरूर चाहिए। मुख्य हैं ही दो चित्र त्रिमूर्ति और झाड़। सीढ़ी से भी झाड़ में जास्ती नॉलेज है। यह चित्र तो सबके पास होने चाहिए। एक तरफ त्रिमूर्ति गोला, दूसरे तरफ झाड़। यह पाण्डव सेना का फ्लैग (झण्डा) होना चाहिए। ड्रामा और झाड़ की नॉलेज भी बाप देते हैं। लक्ष्मी-नारायण, विष्णु आदि कौन हैं? यह कोई समझते नहीं। महालक्ष्मी की पूजा करते हैं, समझते हैं लक्ष्मी आयेगी। अब लक्ष्मी को धन कहाँ से आयेगा? 4 भुजा वाले, 8 भुजा वाले कितने चित्र बना दिये हैं। समझते कुछ भी नहीं। 8-10 भुजा वाला कोई मनुष्य तो होता नहीं। जिसको जो आया सो बनाया, बस चल पड़ा। कोई ने मत दी कि हनुमान की पूजा करो बस चल पड़ा। दिखाते हैं संजीवनी बूटी ले आया... उसका भी अर्थ तुम बच्चे समझते हो। संजीवनी बूटी तो है मन्मनाभव! विचार किया जाता है जब तक ब्राह्मण न बनें, बाप का परिचय न मिले तब तक वर्थ नाट ए पेनी है। मर्तबे का मनुष्यों को कितना अभिमान है। उन्हों को तो समझाने में बड़ी मुश्किलात है। राजाई स्थापन करने में कितनी मेहनत लगती है। वह है बाहुबल, यह है योगबल। यह बातें शास्त्रों में तो हैं नहीं। वास्तव में तुम कोई शास्त्र आदि रेफर नहीं कर सकते हो। अगर तुमको कहते हैं - तुम शास्त्रों को मानते हो? बोलो हाँ यह तो सब भक्ति मार्ग के हैं। अभी हम ज्ञान मार्ग पर चल रहे हैं। ज्ञान देने वाला ज्ञान का सागर एक ही बाप है, इनको रूहानी ज्ञान कहा जाता है। रूह बैठ रूहों को ज्ञान देते हैं। वह मनुष्य, मनुष्य को देते हैं। मनुष्य कभी प्रीचुअल नॉलेज दे न सकें। ज्ञान का सागर पतित-पावन, लिबरेटर, सद्गति दाता एक ही बाप है।
बाप समझाते रहते हैं यह-यह करो। अब देखें शिवजयन्ती पर कितना धमपा मचाते हैं। ट्रांसलाइट के चित्र छोटे भी हों जो सबको मिल जाएं। तुम्हारी तो है बिल्कुल नई बात। कोई समझ न सके। खूब अखबारों में डालना चाहिए। आवाज़ करना चाहिए। सेन्टर्स खोलने वाले भी ऐसे चाहिए। अभी तुम बच्चों को ही इतना नशा नहीं चढ़ा हुआ है। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार समझाते हैं। इतने ढेर ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ हैं। अच्छा, ब्रह्मा का नाम निकाल कोई का भी नाम डालो। राधे कृष्ण का नाम डालो। अच्छा फिर ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ कहाँ से आयेंगे? कोई तो ब्रह्मा चाहिए ना, जो मुख वंशावली बी.के. हों। बच्चे आगे चलकर बहुत समझेंगे। खर्चा तो करना ही पड़ता है। चित्र तो बड़े क्लीयर हैं। लक्ष्मी-नारायण का चित्र बहुत अच्छा है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे सर्विसएबुल, आज्ञाकारी, फरमानबरदार, नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क
सम्पूर्ण फरिश्ता वा अव्यक्त फरिश्ता की डिग्री लेने के लिए सर्व गुणों में फुल बनो। नॉलेजफुल के साथ-साथ फेथ-फुल, पावरफुल, सक्सेसफुल बनो। अभी नाज़ुक समय में नाज़ों से चलना छोड़ विकर्मो और व्यर्थ कर्मो को अपने विकराल रूप (शक्ति रूप) से समाप्त करो।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) कर्मातीत बनने के लिए बाप को महीन बुद्धि से पहचान कर यथार्थ याद करना है। पढ़ाई के साथ-साथ योग पर पूरा अटेन्शन देना है।

2) स्वयं को माया के धोखे से बचाना है। कोई की भी देह में लगाव नहीं रखना है। सच्ची प्रीत एक बाप से रखनी है। देह-अभिमान में नहीं आना है।

वरदान:

समय के महत्व को जान स्वयं को सम्पन्न बनाने वाले विश्व के आधारमूर्त भव

सारे कल्प की कमाई का, श्रेष्ठ कर्म रूपी बीज बोने का, 5 हजार वर्ष के संस्कारों का रिकार्ड भरने का, विश्व कल्याण वा विश्व परिवर्तन का यह समय चल रहा है। यदि समय के ज्ञान वाले भी वर्तमान समय को गंवाते हैं या आने वाले समय पर छोड़ देते हैं तो समय के आधार पर स्वयं का पुरूषार्थ हुआ। लेकिन विश्व की आधारमूर्त आत्मायें किसी भी प्रकार के आधार पर नहीं चलती। वे एक अविनाशी सहारे के आधार पर कलियुगी पतित दुनिया से किनारा कर स्वयं को सम्पन्न बनाने का पुरूषार्थ करती हैं।

स्लोगन:

स्वयं को सम्पन्न बना लो तो विशाल कार्य में स्वत:सहयोगी बन जायेंगे।

23-01-2020

23-01-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - निराकार बाप तुम्हें अपनी मत देकर आस्तिक बनाते हैं, आस्तिक बनने से ही तुम बाप का वर्सा ले सकते हो”

प्रश्न:

बेहद की राजाई प्राप्त करने के लिए किन दो बातों पर पूरा-पूरा अटेन्शन देना चाहिए?

उत्तर:

1-पढ़ाई और 2-सर्विस। सर्विस के लिए लक्षण भी बहुत अच्छे चाहिए। यह पढ़ाई बहुत वन्डरफुल है इससे तुम राजाई प्राप्त करते हो। द्वापर से धन दान करने से राजाई मिलती है लेकिन अभी तुम पढ़ाई से प्रिन्स-प्रिन्सेज बनते हो।

गीत:-

हमारे तीर्थ न्यारे हैं..........

ओम् शान्ति।

मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत की एक लाइन सुनी। तुम्हारे तीर्थ हैं - घर में बैठ चुपके से मुक्तिधाम पहुँचना। दुनिया के तीर्थ तो कॉमन हैं, तुम्हारे हैं न्यारे। मनुष्यों का बुद्धियोग तो साधू-सन्तों आदि तरफ बहुत ही भटकता रहता है। तुम बच्चों को तो सिर्फ बाप को ही याद करने का डायरेक्शन मिलता है। वह है निराकार बाप। ऐसे नहीं कि निराकार को मानने वाले निराकारी मत के ठहरे। दुनिया में मत-मतान्तर तो बहुत हैं ना। यह एक निराकारी मत निराकार बाप देते हैं, जिससे मनुष्य ऊंच ते ऊंच पद जीवनमुक्ति वा मुक्ति पाते हैं। इन बातों को जानते कुछ नहीं हैं। सिर्फ ऐसे ही कह देते निराकार को मानने वाले हैं। अनेकानेक मतें हैं। सतयुग में तो होती है एक मत। कलियुग में हैं अनेक मत। अनेक धर्म हैं, लाखों-करोड़ों मतें होंगी। घर-घर में हर एक की अपनी मत। यहाँ तुम बच्चों को एक ही बाप ऊंच ते ऊंच मत देते हैं, ऊंच ते ऊंच बनाने की। तुम्हारे चित्र देखकर बहुत लोग कहते हैं कि यह क्या बनाया है? मुख्य बात क्या है? बोलो, यह रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान है, जिस ज्ञान से हम आस्तिक बनते हैं। आस्तिक बनने से बाप से वर्सा मिलता है। नास्तिक बनने से वर्सा गंवाया है। अभी तुम बच्चों का धन्धा ही यह है - नास्तिक को आस्तिक बनाना। यह परिचय तुमको मिला है बाप से। त्रिमूर्ति का चित्र तो बड़ा क्लीयर है। ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण तो जरूर चाहिए ना। ब्राह्मणों से ही यज्ञ चलता है। यह बड़ा भारी यज्ञ है। पहले-पहले तो यह समझाना होता है कि ऊंच ते ऊंच बाप है। सभी आत्मायें भाई-भाई ठहरी। सभी एक बाप को याद करते हैं। उनको बाप कहते हैं, वर्सा भी रचता बाप से ही मिलता है। रचना से तो मिल न सके इसलिए ईश्वर को सभी याद करते हैं। अब बाप है ही स्वर्ग का रचयिता और भारत में ही आते हैं, आकर यह कार्य करते हैं। त्रिमूर्ति का चित्र तो बड़ी अच्छी चीज़ है। यह बाबा, यह दादा। ब्रह्मा द्वारा बाबा सूर्यवंशी घराने की स्थापना कर रहे हैं। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश हों। एम ऑब्जेक्ट पूरी है इसलिए बाबा मैडल्स भी बनवाते हैं। बोलो, शॉर्ट में शॉर्ट दो अक्षर में आपको समझाते हैं। बाप से सेकण्ड में वर्सा मिलना चाहिए ना। बाप है ही स्वर्ग का रचयिता। यह मैडल्स तो बहुत अच्छी चीज़ है। परन्तु बहुत देह-अभिमानी बच्चे समझते नहीं हैं। इनमें सारा ज्ञान है-एक सेकण्ड का। बाबा भारत को ही आकर स्वर्ग बनाते हैं। नई दुनिया बाप ही स्थापन करते हैं। यह पुरूषोत्तम संगमयुग भी गाया हुआ है। यह सारा ज्ञान बुद्धि में टपकना चाहिए। कोई का योग है तो फिर ज्ञान नहीं, धारणा नहीं होती। सर्विस करने वाले बच्चों को ज्ञान की धारणा अच्छी हो सकती है। बाप आकर मनुष्य को देवता बनाने की सेवा करे और बच्चे कोई सेवा न करें तो वह क्या काम के? वह दिल पर चढ़ कैसे सकते? बाप कहते हैं-ड्रामा में मेरा पार्ट ही है रावण राज्य से सबको छुड़ाना। राम राज्य और रावण राज्य भारत में ही गाया हुआ है। अब राम कौन है? यह भी जानते नहीं। गाते भी हैं-पतित-पावन, भक्तों का भगवान एक। तो पहले-पहले जब कोई अन्दर घुसे तो बाप का परिचय दो। आदमी-आदमी देखकर समझाना चाहिए। बेहद का बाप आते ही हैं बेहद के सुख का वर्सा देने। उनको अपना शरीर तो है नहीं तो वर्सा कैसे देते हैं? खुद कहते हैं कि मैं इस ब्रह्मा तन से पढ़ाकर, राजयोग सिखलाए यह पद प्राप्त कराता हूँ। इस मैडल में सेकण्ड की समझानी है। कितना छोटा मैडल है परन्तु समझाने वाले बड़े देही-अभिमानी चाहिए। वह बहुत कम हैं। यह मेहनत कोई से पहुँचती नहीं है इसलिए बाबा कहते हैं चार्ट रखकर देखो-सारे दिन में हम कितना टाइम याद में रहते हैं? सारा दिन ऑफिस में काम करते याद में रहना है। कर्म तो करना ही है। यहाँ योग में बिठाकर कहते हैं बाप को याद करो। उस समय कर्म तो करते नहीं हो। तुमको तो कर्म करते याद करना है। नहीं तो बैठने की आदत पड़ जाती है। कर्म करते याद में रहेंगे तब कर्मयोगी सिद्ध होंगे। पार्ट तो जरूर बजाना है, इसमें ही माया विघ्न डालती है। सच्चाई से चार्ट भी कोई लिखते नहीं हैं। कोई-कोई लिखते हैं, आधा घण्टा, पौना घण्टा याद में रहे। सो भी सवेरे ही याद में बैठते होंगे। भक्ति मार्ग में भी सवेरे उठकर राम की माला बैठ जपते हैं। ऐसे भी नहीं, उस समय एक ही धुन में रहते हैं। नहीं, और भी बहुत संकल्प आते रहेंगे। तीव्र भक्तों की बुद्धि कुछ ठहरती है। यह तो है अजपाजाप। नई बात है ना। गीता में भी मन्मनाभव अक्षर है। परन्तु कृष्ण का नाम देने से कृष्ण को याद कर लेते हैं, कुछ भी समझते नहीं। मैडल साथ में जरूर हो। बोलो, बाप ब्रह्मा तन से बैठ समझाते हैं, हम उस बाप से प्रीत रखते हैं। मनुष्यों को तो न आत्मा का, न परमात्मा का ज्ञान है। सिवाए बाप के यह ज्ञान कोई दे न सके। यह त्रिमूर्ति शिव सबसे मुख्य है। बाप और वर्सा। इस चक्र को समझना तो बहुत सहज है। प्रदर्शनी से भी प्रजा तो लाखों बनती रहती है ना। राजायें थोड़े होते हैं, उन्हों की प्रजा तो करोड़ों की अन्दाज में होती है। प्रजा ढेर बनती है, बाकी राजा बनाने लिए पुरूषार्थ करना है। जो जास्ती सर्विस करते हैं वे जरूर ऊंच पद पायेंगे। कई बच्चों को सर्विस का बहुत शौक है। कहते हैं नौकरी छोड़ दें, खाने लिए तो है ही। बाबा का बन गये तो शिवबाबा की ही परवरिश लेंगे। परन्तु बाबा कहते हैं-मैंने वानप्रस्थ में प्रवेश किया है ना। मातायें भी जवान हैं तो घर में रहते दोनों सर्विस करनी है। बाबा हर एक की सरकमस्टांश को देख राय देते हैं। शादी आदि के लिए अगर एलाउ न करें तो हंगामा हो जाए इसलिए हर एक का हिसाब-किताब देख राय देते हैं। कुमार हैं तो कहेंगे तुम सर्विस कर सकते हो। सर्विस कर बेहद के बाप से वर्सा लो। उस बाप से तुमको क्या मिलेगा? धूलछांई। वह तो सब मिट्टी में मिल जाना है। दिन-प्रतिदिन टाइम कम होता जाता है। कई समझते हैं हमारी मिलकियत के बच्चे वारिस बनेंगे। परन्तु बाप कहते हैं कुछ भी मिलने का नहीं है। सारी मिलकियत खाक में मिल जायेगी। वह समझते हैं पिछाड़ी वाले खायेंगे। धनवान का धन खत्म होने में कोई देरी नहीं लगती है। मौत तो सामने खड़ा ही है। कोई भी वर्सा ले नहीं सकेंगे। बहुत थोड़े हैं जो पूरी रीति समझा सकते हैं। जास्ती सर्विस करने वाले ही ऊंच पद पायेंगे। तो उन्हों का रिगॉर्ड भी रखना चाहिए, इनसे सीखना है। 21 जन्म के लिए रिगॉर्ड रखना पड़े। ऑटोमेटिक जरूर वह ऊंच पद पायेंगे, तो रिगॉर्ड तो जहाँ-तहाँ रहना ही है। खुद भी समझ सकते हैं, जो मिला सो अच्छा है, इसमें ही खुश होते हैं।
बेहद की राजाई के लिए पढ़ाई और सर्विस पर पूरा अटेन्शन चाहिए। यह है बेहद की पढ़ाई। यह राजधानी स्थापन हो रही है ना। इस पढ़ाई से यहाँ तुम पढ़कर प्रिन्स बनते हो। कोई भी मनुष्य धन दान करते हैं तो वह राजा के पास वा साहूकार के पास जन्म लेते हैं। परन्तु वह है अल्पकाल का सुख। तो इस पढ़ाई पर बहुत अटेन्शन देना चाहिए। सर्विस का ओना (फिकर) रहना चाहिए। हम अपने गांव में जाकर सर्विस करें। बहुतों का कल्याण हो जायेगा। बाबा जानते हैं - सर्विस का शौक अजुन कोई में है नहीं। लक्षण भी तो अच्छे चाहिए ना। ऐसे नहीं कि डिससर्विस कर और ही यज्ञ का भी नाम बदनाम करें और अपना ही नुकसान कर दें। बाबा तो हर बात के लिए अच्छी रीति समझाते हैं। मैडल्स आदि के लिए कितना ओना रहता है। फिर समझा जाता है-ड्रामा अनुसार देरी पड़ती है। यह लक्ष्मी-नारायण का ट्रांसलाइट चित्र भी फर्स्टक्लास है। परन्तु बच्चों पर आज बृहस्पति की दशा तो कल फिर राहू की दशा बैठ जाती है। ड्रामा में साक्षी हो पार्ट देखना होता है। ऊंच पद पाने वाले बहुत कम होते हैं। हो सकता है ग्रहचारी उतर जाए। ग्रहचारी उतरती है तो फिर जम्प कर लेते हैं। पुरूषार्थ कर अपना जीवन बनाना चाहिए, नहीं तो कल्प-कल्पान्तर के लिए सत्यानाश हो जायेगी। समझेंगे कल्प पहले मुआफिक ग्रहचारी आई है। श्रीमत पर नहीं चलेंगे तो पद भी नहीं मिलेगा। ऊंच ते ऊंच है भगवान की श्रीमत। इन लक्ष्मी-नारायण के चित्र को तुम्हारे सिवाए कोई समझ न सके। कहेंगे चित्र तो बहुत अच्छा बनाया है, बस तुमको यह चित्र देखने से मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूलवतन सारा सृष्टि का चक्र बुद्धि में आ जायेगा। तुम नॉलेजफुल बनते हो-नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। बाबा को तो यह चित्र देख बहुत खुशी होती है। स्टूडेन्ट को तो खुशी होनी चाहिए ना-हम पढ़कर यह बनते हैं। पढ़ाई से ही ऊंच पद मिलता है। ऐसे नहीं कि जो भाग्य में होगा। पुरूषार्थ से ही प्रालब्ध मिलती है। पुरूषार्थ कराने वाला बाप मिला है, उनकी श्रीमत पर नहीं चलेंगे तो बुरी गति होगी। पहले-पहले तो कोई को भी इस मैडल्स पर ही समझाओ फिर जो लायक होंगे वह झट कहेंगे - हमको यह मिल सकते हैं? हाँ, क्यों नहीं। इस धर्म का जो होगा उसको तीर लग जायेगा। उसका कल्याण हो सकता है। बाप तो सेकण्ड में हथेली पर बहिश्त देते हैं, इसमें तो बहुत खुशी रहनी चाहिए। तुम शिव के भक्तों को यह ज्ञान दो। बोलो, शिवबाबा कहते हैं मुझे याद करो तो राजाओं का राजा बन जायेंगे। बस सारा दिन यही सर्विस करो। खास बनारस में शिव के मन्दिर तो बहुत हैं, वहाँ अच्छी सर्विस हो सकती है। कोई न कोई निकलेंगे। बहुत इज़ी सर्विस है। कोई करके देखो, खाना तो मिलेगा ही, सर्विस करके देखो। सेन्टर तो वहाँ है ही। सवेरे जाओ मन्दिर में, रात को लौट आओ। सेन्टर बना दो। सबसे जास्ती तुम शिव के मन्दिर में सर्विस कर सकते हो। ऊंच ते ऊंच है ही शिव का मन्दिर। बाम्बे में बबुलनाथ का मन्दिर है। सारा दिन वहाँ जाकर सर्विस कर बहुतों का कल्याण कर सकते हैं। यह मैडल ही बस है। ट्रायल करके देखो। बाबा कहते हैं यह मैडल्स लाख तो क्या 10 लाख बनाओ। बुजुर्ग लोग तो बहुत अच्छी सर्विस कर सकते हैं। ढेर प्रजा बन जायेगी। बाप सिर्फ कहते हैं मुझे याद करो बस, मन्मनाभव अक्षर भूल गये हो। भगवानुवाच है ना। कृष्ण थोड़ेही भगवान है, वह तो पूरे 84 जन्म लेते हैं। शिवबाबा इन कृष्ण को भी यह पद प्राप्त कराते हैं। फिर धक्का खाने की क्या दरकार है। बाप तो कहते हैं सिर्फ मुझे याद करो। तुम सबसे अच्छी सर्विस शिव के मन्दिर में कर सकेंगे। सर्विस की सफलता के लिए देही-अभिमानी अवस्था में स्थित होकर सर्विस करो। दिल साफ तो मुराद हांसिल। बनारस के लिए बाबा तो खास राय देते हैं वहाँ वानप्रस्थियों के आश्रम भी हैं। बोलो हम ब्रह्मा के बच्चे ब्राह्मण हैं। बाप ब्रह्मा द्वारा कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश हों, और कोई उपाय नहीं है। सुबह से लेकर रात तक शिव के मन्दिर में बैठ सर्विस करो। ट्राई करके देखो। शिवबाबा खुद कहते हैं - हमारे मन्दिर तो बहुत हैं। तुमको कोई भी कुछ कहेंगे नहीं, और ही खुश होंगे-यह तो शिवबाबा की बहुत महिमा करते हैं। बोलो यह ब्रह्मा, यह ब्राह्मण हैं, यह कोई देवता नहीं हैं। यह भी शिवबाबा को याद कर यह पद लेते हैं। इन द्वारा शिवबाबा कहते हैं मामेकम् याद करो। कितना इज़ी है। बुजुर्ग की कोई इनसल्ट नहीं करेगा। बनारस में अभी तक इतनी कोई सर्विस हुई नहीं है। मैडल वा चित्रों पर समझाना बहुत सहज है। कोई गरीब है तो बोलो तुमको फ्री देते हैं, साहूकार है तो बोलो तुम देंगे तो बहुतों के कल्याण के लिए और भी छपा लेंगे तो तुम्हारा भी कल्याण हो जायेगा। यह तुम्हारा धन्धा सबसे तीखा हो जायेगा। कोई ट्रायल करके देखो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क
चेक करो - जो भी संकल्प उठता है वह स्वयं वा सर्व के प्रति कल्याण का है? सेकेण्ड में कितने संकल्प उठे - उसमें कितने सफल हुए और कितने असफल हुए? संकल्प और कर्म में अन्तर न हो। संकल्प जीवन का अमूल्य खजाना है। जैसे स्थूल खजाने को व्यर्थ नहीं करते वैसे एक संकल्प भी व्यर्थ न जाये।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) ज्ञान को जीवन में धारण कर फिर सर्विस करनी है। जो जास्ती सर्विस करते हैं, अच्छे लक्षण हैं उनका रिगॉर्ड भी जरूर रखना है।

2) कर्म करते याद में रहने की आदत डालनी है। सर्विस की सफलता के लिए अपनी अवस्था देही-अभिमानी बनानी है। दिल साफ रखनी है।

वरदान:

साइलेन्स की शक्ति द्वारा सेकण्ड में मुक्ति और जीवनमुक्त का अनुभव कराने वाले विशेष आत्मा भव

विशेष आत्माओं की लास्ट विशेषता है-कि सेकण्ड में किसी भी आत्मा को मुक्ति और जीवन-मुक्ति के अनुभवी बना देंगे। सिर्फ रास्ता नहीं बतायेंगे लेकिन एक सेकण्ड में शान्ति का वा अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करायेंगे। जीवनमुक्ति का अनुभव है सुख और मुक्ति का अनुभव है शान्ति। तो जो भी सामने आये वह सेकण्ड में इसका अनुभव करे-जब ऐसी स्पीड होगी तब साइंस के ऊपर साइलेंस की विजय देखते हुए सबके मुख से वाह-वाह का आवाज निकलेगा और प्रत्यक्षता का दृश्य सामने आयेगा।

स्लोगन:

बाप के हर फरमान पर स्वयं को कुर्बान करने वाले सच्चे परवाने बनो।

24-01-2020

 

 

24-01-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

 


 

“मीठे बच्चे - तुम अशरीरी बन जब बाप को याद करते हो तो तुम्हारे लिए यह दुनिया ही खत्म हो जाती है, देह और दुनिया भूली हुई है”

 

प्रश्न:

 

बाप द्वारा सभी बच्चों को ज्ञान का तीसरा नेत्र क्यों मिला है?

 

उत्तर:

 

अपने को आत्मा समझ, बाप जो है जैसा है, उसी रूप में याद करने के लिए तीसरा नेत्र मिला है। परन्तु यह तीसरा नेत्र काम त

ब करता है जब पूरा योगयुक्त रहें अर्थात् एक बाप से सच्ची प्रीत हो। किसी के नाम-रूप में लटके हुए न हों। माया प्रीत रखने में ही विघ्न डालती है। इसी में बच्चे धोखा खाते हैं।

गीत:-

मरना तेरी गली में .............

ओम् शान्ति।

सिवाए तुम ब्राह्मण बच्चों के इस गीत का अर्थ कोई समझ न सके। जैसे वेद-शास्त्र आदि बनाये हैं परन्तु जो कुछ पढ़ते हैं उसका अर्थ नहीं समझ सकते इसलिए बाप कहते हैं मैं ब्रह्मा मुख द्वारा सब वेदों-शास्त्रों का सार समझाता हूँ, वैसे ही इन गीतों का अर्थ भी कोई समझ नहीं सकते, बाप ही इनका अर्थ बताते हैं। आत्मा जब शरीर से न्यारी हो जाती है तो दुनिया से सारा संबंध टूट जाता है। गीत भी कहता है अपने को आत्मा समझ अशरीरी बन बाप को याद करो तो यह दुनिया खत्म हो जाती है। यह शरीर इस पृथ्वी पर है, आत्मा इनसे निकल जाती है तो फिर उस समय उनके लिए मनुष्य सृष्टि है नहीं। आत्मा नंगी बन जाती है। फिर जब शरीर में आती है तो पार्ट शुरू होता है। फिर एक शरीर छोड़ दूसरे में जाकर प्रवेश करती है। वापिस महतत्व में नहीं जाना है। उड़कर दूसरे शरीर में जाती है। यहाँ इस आकाश तत्व में ही उनको पार्ट बजाना है। मूलवतन में नहीं जाना है। जब शरीर छोड़ते हैं तो न यह कर्मबन्धन, न वह कर्मबन्धन रहता है। शरीर से ही अलग हो जाते हैं ना। फिर दूसरा शरीर लेते तो वह कर्मबन्धन शुरू होता है। यह बातें सिवाए तुम्हारे और कोई मनुष्य नहीं जानते। बाप ने समझाया है सब बिल्कुल ही बेसमझ हैं। परन्तु ऐसे कोई समझते थोड़ेही हैं। अपने को कितना अक्लमंद समझते हैं, पीस प्राइज़ देते रहते हैं। यह भी तुम ब्राह्मण कुल भूषण अच्छी रीति समझा सकते हो। वह तो जानते ही नहीं कि पीस किसको कहा जाता है? कोई तो महात्माओं के पास जाते हैं कि मन की शान्ति कैसे हो? यह तो कहते हैं वर्ल्ड में शान्ति कैसे हो! ऐसे नहीं कहेंगे कि निराकारी दुनिया में शान्ति कैसे हो? वह तो है ही शान्तिधाम। हम आत्मायें शान्तिधाम में रहती हैं परन्तु यह तो मन की शान्ति कहते हैं। वह जानते नहीं कि शान्ति कैसे मिलेगी? शान्तिधाम तो अपना घर है। यहाँ शान्ति कैसे मिल सकती? हाँ, सतयुग में सुख, शान्ति, सम्पत्ति सब है, जिसकी स्थापना बाप करते हैं। यहाँ तो कितनी अशान्ति है। यह सब अब तुम बच्चे ही समझते हो। सुख, शान्ति, सम्पत्ति भारत में ही थी। वह वर्सा था बाप का और दु:ख, अशान्ति, कंगालपना, यह वर्सा है रावण का। यह सब बातें बेहद का बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। बाप परमधाम में रहने वाला नॉलेजफुल है, जो सुखधाम का हमको वर्सा देते हैं। वह हम आत्माओं को समझा रहे हैं। यह तो जानते हो नॉलेज होती है आत्मा में। उनको ही ज्ञान का सागर कहा जाता है। वह ज्ञान का सागर इस शरीर द्वारा वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझाते हैं। वर्ल्ड की आयु तो होनी चाहिए ना। वर्ल्ड तो है ही। सिर्फ नई दुनिया और पुरानी दुनिया कहा जाता है। यह भी मनुष्यों को पता नहीं। न्यु वर्ल्ड से ओल्ड वर्ल्ड होने में कितना समय लगता है?
तुम बच्चे जानते हो कलियुग के बाद सतयुग जरूर आना है इसलिए कलियुग और सतयुग के संगम पर बाप को आना पड़ता है। यह भी तुम जानते हो परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा नई दुनिया की स्थापना, शंकर द्वारा विनाश कराते हैं। त्रिमूर्ति का अर्थ ही यह है-स्थापना, विनाश, पालना। यह तो कॉमन बात है। परन्तु यह बातें तुम बच्चे भूल जाते हो। नहीं तो तुमको खुशी बहुत रहे। निरन्तर याद रहनी चाहिए। बाबा हमको अब नई दुनिया के लिए लायक बना रहे हैं। तुम भारतवासी ही लायक बनते हो, और कोई नहीं। हाँ, जो और-और धर्मों में कनवर्ट हो गये हैं, वह आ सकते हैं। फिर इसमें कनवर्ट हो जायेंगे, जैसे उसमें हुए थे। यह सारी नॉलेज तुम्हारी बुद्धि में है। मनुष्यों को समझाना है यह पुरानी दुनिया अब बदलती है। महाभारत लड़ाई भी जरूर लगनी है। इस समय ही बाबा आकर राजयोग सिखलाते हैं। जो राजयोग सीखते हैं, वह नई दुनिया में चले जायेंगे। तुम सबको समझा सकते हो कि ऊंच ते ऊंच है भगवान, फिर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, फिर आओ यहाँ, मुख्य है जगत अम्बा, जगत पिता। बाप आते भी यहाँ हैं ब्रह्मा के तन में, प्रजापिता ब्रह्मा तो यहाँ है ना। ब्रह्मा द्वारा स्थापना सूक्ष्मवतन में तो नहीं होगी ना। यहाँ ही होती है। यह व्यक्त से अव्यक्त बन जाते हैं। यह राजयोग सीख फिर विष्णु के दो रूप बनते हैं। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझनी चाहिए ना। मनुष्य ही समझेंगे। वर्ल्ड का मालिक ही वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझा सकते हैं। वह नॉलेजफुल, पुनर्जन्म रहित है। यह नॉलेज किसकी बुद्धि में नहीं है। परखने की भी बुद्धि चाहिए ना। कुछ बुद्धि में बैठता है या ऐसे ही है, नब्ज देखनी चाहिए। एक अजमल खाँ नामीग्रामी वैद्य होकर गया है। कहते हैं देखने से ही उनको बीमारी का पता पड़ जाता था। अब तुम बच्चों को भी समझना चाहिए कि यह लायक है या नहीं?
बाप ने बच्चों को ज्ञान का तीसरा नेत्र दिया है, जिससे तुम अपने को आत्मा समझ, बाप जो है, जैसा है, उसको उसी रूप में याद करते हो। परन्तु ऐसी बुद्धि उनकी होगी जो पूरा योगयुक्त होंगे, जिनकी बाप से प्रीत बुद्धि होगी। सब तो नहीं हंी ना। एक दो के नाम-रूप में लटक पड़ते हैं। बाप कहते हैं प्रीत तो मेरे साथ लगाओ ना। माया ऐसी है जो प्रीत रखने नहीं देती है। माया भी देखती है हमारा ग्राहक जाता है तो एकदम नाक-कान से पकड़ लेती है। फिर जब धोखा खाते हैं तब समझते हैं माया से धोखा खाया। मायाजीत, जगतजीत बन नहीं सकेंगे, ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। इसमें ही मेहनत है। श्रीमत कहती है मामेकम् याद करो तो तुम्हारी जो पतित बुद्धि है वह पावन बन जायेगी। परन्तु कइयों को बड़ा मुश्किल लगता है। इसमें सब्जेक्ट एक ही है अलफ और बे। बस, दो अक्षर भी याद नहीं कर सकते हैं! बाबा कहे अलफ को याद करो फिर अपनी देह को, दूसरे की देह को याद करते रहते हैं। बाबा कहते हैं देह को देखते हुए तुम मुझे याद करो। आत्मा को अब तीसरा नेत्र मिला है मुझे देखने-समझने का, उससे काम लो। तुम बच्चे अभी त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी बनते हो। परन्तु त्रिकालदर्शी भी नम्बरवार हैं। नॉलेज धारण करना कोई मुश्किल नहीं है। बहुत ही अच्छा समझते हैं परन्तु योगबल कम है, देही-अभिमानी-पना बहुत कम है। थोड़ी बात में क्रोध, गुस्सा आ जाता है, गिरते रहते हैं। उठते हैं, गिरते हैं। आज उठे कल फिर गिर पड़ते हैं। देह-अभिमान मुख्य है फिर और विकार लोभ, मोह आदि में फंस पड़ते हैं। देह में भी मोह रहता है ना। माताओं में मोह जास्ती होता है। अब बाप उससे छुड़ाते हैं। तुमको बेहद का बाप मिला है फिर मोह क्यों रखते हो? उस समय शक्ल बातचीत ही बन्दर मिसल हो जाती है। बाप कहते हैं-नष्टोमोहा बन जाओ, निरन्तर मुझे याद करो। पापों का बोझा सिर पर बहुत है, वह कैसे उतरे? परन्तु माया ऐसी है, याद करने नहीं देगी। भल कितना भी माथा मारो घड़ी-घड़ी बुद्धि को उड़ा देती है। कितनी कोशिश करते हैं हम मोस्ट बिलवेड बाबा की ही महिमा करते रहें। बाबा, बस आपके पास आये कि आये, परन्तु फिर भूल जाते हैं। बुद्धि और तरफ चली जाती है। यह नम्बरवन में जाने वाला भी पुरुषार्थी है ना।
बच्चों की बुद्धि में यह याद रहना चाहिए कि हम गॉड फादरली स्टूडेन्ट हैं। गीता में भी है-भगवानुवाच, मैं तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ। सिर्फ शिव के बदले कृष्ण का नाम डाल दिया है। वास्तव में शिवबाबा की जयन्ती सारी दुनिया में मनानी चाहिए। शिवबाबा सबको दु:ख से लिबरेट कर गाइड बन ले जाते हैं। यह तो सब मानते हैं कि वह लिबरेटर, गाइड है। सबका पतित-पावन बाप है, सबको शान्तिधाम-सुखधाम में ले जाने वाला है तो उनकी जयन्ती क्यों नहीं मनाते हैं? भारतवासी ही नहीं मनाते हैं इसलिए ही भारत की यह बुरी गति हुई है। मौत भी बुरी गति से होता है। वह तो बॉम्बस ऐसे बनाते हैं, गैस निकला और खलास, जैसे क्लोरोफॉर्म लग जाता है। यह भी उन्हों को बनाने ही हैं। बन्द होना इम्पॉसिबुल है। जो कल्प पहले हुआ था सो अब रिपीट होगा। इन मूसलों और नैचुरल कैलेमिटीज़ से पुरानी दुनिया का विनाश हुआ था, सो अभी भी होगा। विनाश का समय जब होगा तो ड्रामा प्लैन अनुसार एक्ट में आ ही जायेंगे। ड्रामा विनाश जरूर करायेगा। रक्त की नदियाँ यहाँ बहेंगी। सिविलवार में एक-दो को मार डालते हैं ना। तुम्हारे में भी थोड़े जानते हैं कि यह दुनिया बदल रही है। अब हम जाते हैं सुखधाम। तो सदैव ज्ञान के अतीन्द्रिय सुख में रहना चाहिए। जितना याद में रहेंगे उतना सुख बढ़ता जायेगा। छी-छी देह से नष्टोमोहा होते जायेंगे। बाप सिर्फ कहते हैं अलफ को याद करो तो बे बादशाही तुम्हारी है। सेकण्ड में बादशाही, बादशाह को बच्चा हुआ तो गोया बच्चा बादशाह बना ना। तो बाप कहते हैं मुझे याद करते रहो और चक्र को याद करो तो चक्रवर्ती महाराजा बनेंगे इसलिए गाया जाता है सेकण्ड में जीवनमुक्ति, सेकण्ड में बेगर टू प्रिन्स। कितना अच्छा है। तो श्रीमत पर अच्छी रीति चलना चाहिए। कदम-कदम पर राय लेनी होती है।
बाप समझाते हैं मीठे बच्चे, ट्रस्टी बनकर रहो तो ममत्व मिट जाये। परन्तु ट्रस्टी बनना मासी का घर नहीं है। यह खुद ट्रस्टी बने हैं, बच्चों को भी ट्रस्टी बनाते हैं। यह कुछ भी लेते हैं क्या? कहते हैं तुम ट्रस्टी हो सम्भालो। ट्रस्टी बने तो फिर ममत्व मिट जाता है। कहते भी हैं ईश्वर का सब कुछ दिया हुआ है। फिर कुछ नुकसान पड़ता है या कोई मर जाता है तो बीमार हो पड़ते हैं। मिलता है तो खुशी होती है। जबकि कहते हो ईश्वर का दिया हुआ है तो फिर मरने पर रोने की क्या दरकार है? परन्तु माया कम नहीं है, मासी का घर थोड़ेही है। इस समय बाप कहते हैं तुमने हमको बुलाया है कि इस पतित दुनिया में हम नहीं रहना चाहते हैं, हमको पावन दुनिया में ले चलो, साथ ले चलो परन्तु इसका अर्थ भी समझते नहीं। पतित-पावन आयेगा तो जरूर शरीर खत्म होंगे ना, तब तो आत्माओं को ले जायेंगे। तो ऐसे बाप के साथ प्रीत बुद्धि होनी चाहिए। एक से ही लव रखना है, उनको ही याद करना है। माया के तूफान तो आयेंगे। कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नहीं करना चाहिए। वह बेकायदे हो जाता है। बाप कहते हैं मैं आकर इस शरीर का आधार लेता हूँ। यह इनका शरीर है ना। तुमको याद बाप को करना है। तुम जानते हो ब्रह्मा भी बाबा, शिव भी बाबा है। विष्णु और शंकर को बाबा नहीं कहेंगे। शिव है निराकार बाप। प्रजापिता ब्रह्मा है साकारी बाप। अब तुम साकार द्वारा निराकार बाप से वर्सा ले रहे हो। दादा इनमें प्रवेश करते हैं तब कहते हैं दादे का वर्सा बाप द्वारा हम लेते हैं। दादा (ग्रैन्ड फादर) है निराकार, बाप है साकार। यह वन्डरफुल नई बातें हैं ना। त्रिमूर्ति दिखाते हैं परन्तु समझते नहीं। शिव को उड़ा दिया है। बाप कितनी अच्छी-अच्छी बातें समझाते हैं तो खुशी रहनी चाहिए-हम स्टूडेन्ट हैं। बाबा हमारा बाप, टीचर, सतगुरू है। अभी तुम वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी बेहद के बाप से सुन रहे हो फिर औरों को सुनाते हो। यह 5 हज़ार वर्ष का चक्र है। कॉलेज के बच्चों को वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझानी चाहिए। 84 जन्मों की सीढ़ी क्या है, भारत की चढ़ती कला और उतरती कला कैसे होती है, यह समझाना है। सेकण्ड में भारत स्वर्ग बन जाता है फिर 84 जन्मों में भारत नर्क बनता है। यह तो बहुत ही सहज समझने की बात है। भारत गोल्डन एज से आइरन एज में कैसे आया है-यह तो भारतवासियों को समझाना चाहिए। टीचर्स को भी समझाना चाहिए। वह है जिस्मानी नॉलेज, यह है रूहानी नॉलेज। वह मनुष्य देते हैं, यह गॉड फादर देते हैं। वह है मनुष्य सृष्टि का बीजरूप, तो उनके पास मनुष्य सृष्टि का ही नॉलेज होगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क
लगाव की रस्सियों को चेक करो। बुद्धि कहीं कच्चे धागों में भी अटकी हुई तो नहीं है? कोई सूक्ष्म बंधन भी न हो, अपनी देह से भी लगाव न हो - ऐसे स्वतंत्र अर्थात् स्पष्ट बनने के लिए बेहद के वैरागी बनो तब अव्यक्त स्थिति में स्थित रह सकेंगे।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) इस छी-छी देह से पूरा नष्टोमोहा बन ज्ञान के अतीन्द्रिय सुख में रहना है। बुद्धि में रहे अब यह दुनिया बदल रही है हम जाते हैं अपने सुखधाम।

2) ट्रस्टी बनकर सब कुछ सम्भालते हुए अपना ममत्व मिटा देना है। एक बाप से सच्ची प्रीत रखनी है। कर्मेन्द्रियों से कभी भी कोई विकर्म नहीं करना है।

वरदान:

सर्व कर्मेन्द्रियों की आकर्षण से परे कमल समान रहने वाले दिव्य बुद्धि और दिव्य नेत्र के वरदानी भव

बापदादा द्वारा हर ब्राह्मण बच्चे को जन्म होते ही दिव्य समर्थ बुद्धि और दिव्य नेत्र का वरदान मिला है। जो बच्चे अपने बर्थ डे की यह गिफ्ट सदा यथार्थ रीति यूज करते हैं वे कमल पुष्प के सामन श्रेष्ठ स्थिति के आसन पर स्थित रहते हैं। किसी भी प्रकार की आकर्षण - देह के सम्बन्ध, देह के पदार्थ व कोई भी कर्मेन्द्रिय उन्हें आकर्षित नहीं कर सकती। वे सर्व आकर्षणों से परे सदा हर्षित रहते हैं। वे स्वयं को कलियुगी पतित विकारी आकर्षण से किनारा किया हुआ महसूस करते हैं।

स्लोगन:

जब कहाँ भी आसक्ति न हो तब शक्ति स्वरूप प्रत्यक्ष हो।

22-01-2020

22-01-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप का पार्ट एक्यूरेट है, वह अपने समय पर आते हैं, ज़रा भी फ़र्क नहीं पड़ सकता, उनके आने का यादगार शिवरात्रि खूब धूमधाम से मनाओ”

प्रश्न:

किन बच्चों के विकर्म पूरे-पूरे विनाश नहीं हो पाते?

उत्तर:

जिनका योग ठीक नहीं है, बाप की याद नहीं रहती तो विकर्म विनाश नहीं हो पाते। योगयुक्त न होने से इतनी सद्गति नहीं होती, पाप रह जाते हैं फिर पद भी कम हो जाता है। योग नहीं तो नाम-रूप में फंसे रहते हैं, उनकी ही बातें याद आती रहती हैं, वह देही-अभिमानी रह नहीं सकते।

गीत:-

यह कौन आज आया सवेरे सवेरे......

ओम् शान्ति।

सवेरा कितने बजे होता है? बाबा सवेरे कितने बजे आते हैं? (कोई ने कहा 3 बजे, कोई ने कहा 4, कोई ने कहा संगम पर, कोई ने कहा 12 बजे) बाबा एक्यूरेट पूछते हैं। 12 को तो तुम सवेरा नहीं कह सकते हो। 12 बजकर एक सेकण्ड हुआ, एक मिनट हुआ तो ए.एम. अर्थात् सवेरा शुरू हुआ। यह बिल्कुल सवेरा है। ड्रामा में इनका पार्ट बिल्कुल एक्यूरेट है। सेकण्ड की भी देरी नहीं हो सकती, यह ड्रामा अनादि बना हुआ है। 12 बजकर एक सेकण्ड जब तक नहीं हुआ है तो ए.एम. नहीं कहेंगे, यह बेहद की बात है। बाप कहते हैं मैं आता हूँ सवेरे-सवेरे। विलायत वालों का ए.एम., पी.एम. एक्यूरेट चलता है। उन्हों की बुद्धि फिर भी अच्छी है। वह इतना सतोप्रधान भी नहीं बनते हैं, तो तमोप्रधान भी नहीं बनते हैं। भारतवासी ही 100 परसेन्ट सतोप्रधान फिर 100 परसेन्ट तमोप्रधान बनते हैं। तो बाप बड़ा एक्युरेट है। सवेरे अर्थात् 12 बजकर एक मिनट, सेकण्ड का हिसाब नहीं रखते। सेकण्ड पास होने में मालूम भी नहीं पड़ता। अब यह बातें तुम बच्चे ही समझते हो। दुनिया तो बिल्कुल घोर अन्धियारे में है। बाप को सभी भक्त दु:ख में याद करते हैं-पतित-पावन आओ। परन्तु वह कौन है? कब आते हैं? यह कुछ भी नहीं जानते। मनुष्य होते हुए एक्यूरेट कुछ नहीं जानते क्योंकि पतित तमोप्रधान हैं। काम भी कितना तमोप्रधान है। अभी बेहद का बाप ऑर्डीनेन्स निकालते हैं - बच्चे कामजीत जगतजीत बनो। अगर अभी पवित्र नहीं बनेंगे तो विनाश को पायेंगे। तुम पवित्र बनने से अविनाशी पद को पायेंगे। तुम राजयोग सीख रहे हो ना। स्लोगन में भी लिखते हैं”बी होली बी योगी।” वास्तव में लिखना चाहिए बी राजयोगी। योगी तो कॉमन अक्षर है। ब्रह्म से योग लगाते हैं, वह भी योगी ठहरे। बच्चा बाप से, स्त्री पुरूष से योग लगाती है परन्तु यह तुम्हारा है राजयोग। बाप राजयोग सिखलाते हैं इसलिए राजयोग लिखना ठीक है। बी होली एण्ड राजयोगी। दिन-प्रतिदिन करेक्शन तो होती रहती है। बाप भी कहते हैं आज तुमको गुह्य से गुह्य बातें सुनाता हूँ। अब शिव जयन्ती भी आने वाली है। शिव जयन्ती तो तुमको अच्छी रीति मनानी है। शिव जयन्ती पर तो बहुत अच्छी रीति सर्विस करनी है। जिनके पास प्रदर्शनी है, सभी अपने-अपने सेन्टर पर अथवा घर में शिव जयन्ती अच्छी रीति मनाओ और लिख दो-शिवबाबा गीता ज्ञान दाता बाप से बेहद का वर्सा लेने का रास्ता आकर सीखो। भल बत्तियाँ आदि भी जला दो। घर-घर में शिव जयन्ती मनानी चाहिए। तुम ज्ञान गंगायें हो ना। तो हर एक के पास गीता पाठशाला होनी चाहिए। घर-घर में गीता तो पढ़ते हैं ना। पुरूषों से भी मातायें भक्ति में तीखी होती हैं। ऐसे कुटुम्ब (परिवार) भी होते हैं जहाँ गीता पढ़ते हैं। तो घर में भी चित्र रख देने चाहिए। लिख दें कि बेहद के बाप से आकर फिर से वर्सा लो।
यह शिव जयन्ती का त्योहार वास्तव में तुम्हारी सच्ची दीपावली है। जब शिव बाप आते हैं तो घर-घर में रोशनी हो जाती है। इस त्योहार को खूब बत्तियाँ आदि जलाकर रोशनी कर मनाओ। तुम सच्ची दीपावली मनाते हो। फाइनल तो होना है सतयुग में। वहाँ घर-घर में रोशनी ही रोशनी होगी अर्थात् हर आत्मा की ज्योत जगी रहती है। यहाँ तो अन्धियारा है। आत्मायें आसुरी बुद्धि बन पड़ी है। वहाँ आत्मायें पवित्र होने से दैवी बुद्धि रहती हैं। आत्मा ही पतित, आत्मा ही पावन बनती है। अभी तुम वर्थ नाट ए पेनी से पाउण्ड बन रहे हो। आत्मा पवित्र होने से शरीर भी पवित्र मिलेगा। यहाँ आत्मा अपवित्र है तो शरीर और दुनिया भी इमप्योर है। इन बातों को तुम्हारे में से कोई थोड़े हैं जो यथार्थ रीति समझते हैं और उनके अन्दर खुशी होती है। नम्बरवार पुरूषार्थ तो करते रहते हैं। ग्रहचारी भी होती है। कभी राहू की ग्रहचारी बैठती है तो आश्चर्यवत् भागन्ती हो जाते हैं। बृहस्पति की दशा से बदलकर ठीक राहू की दशा बैठ जाती है। काम विकार में गया और राहू की दशा बैठी। मल्लयुद्ध होती है ना। तुम माताओं ने देखा नहीं होगा क्योंकि मातायें होती हैं घर की घरेत्री। अब तुमको मालूम है भ्रमरी को घरेत्री अर्थात् घर बनाने वाली कहते हैं। घर बनाने का अच्छा कारीगर है, इसलिए घरेत्री नाम है। कितनी मेहनत करती है। वो भी पक्का मिस्त्री है। दो-तीन कमरा बनाती है। 3-4 कीड़े ले आती है। वैसे तुम भी ब्राह्मणियाँ हो। चाहे 1-2 को बनाओ, चाहे 10-12 को, चाहे 100 को, चाहे 500 को बनाओ। मण्डप आदि बनाते हो, यह भी घर बनाना हुआ ना। उनमें बैठ सबको भूँ-भूँ करते हो। फिर कोई तो समझकर कीड़े से ब्राह्मण बनते हैं, कोई सड़ा हुआ निकलते हैं अर्थात् इस धर्म के नहीं हैं। इस धर्म वालों को ही पूरी रीति टच होगा। तुम तो फिर भी मनुष्य हो ना। तुम्हारी ताकत उनसे (भ्रमरी से) तो जास्ती है। तुम 2 हज़ार के बीच में भी भाषण कर सकते हो। आगे चल 4-5 हज़ार की सभा में भी तुम जायेंगे। भ्रमरी की तुम्हारे से भेंट है। आजकल सन्यासी लोग भी बाहर विदेशों में जाकर कहते हैं हम भारत का प्राचीन राजयोग सिखाते हैं। आजकल मातायें भी गेरू कफनी पहनकर जाती हैं, फॉरेनर्स को ठगकर आती हैं। उनको कहती हैं भारत का प्राचीन राजयोग भारत में चलकर सीखो। तुम ऐसे थोड़ेही कहेंगे कि भारत में चलकर सीखो। तुम तो फॉरेन में जायेंगे तो वहाँ ही बैठ समझायेंगे - यह राजयोग सीखो तो स्वर्ग में तुम्हारा जन्म हो जायेगा। इसमें कपड़ा आदि बदलने की बात नहीं है। यहाँ ही देह के सब सम्बन्ध भूल अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। बाप ही लिबरेटर गाइड है, सबको दु:ख से लिबरेट करते हैं।
अभी तुमको सतोप्रधान बनना है। तुम पहले गोल्डन एज में थे, अब आइरन एज में हो। सारी वर्ल्ड, सभी धर्म वाले आइरन एज में हैं। कोई भी धर्म वाला मिले, उनको कहना है बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो तो तुम पावन बन जायेंगे, फिर मैं साथ ले जाऊंगा। बस, इतना ही बोलो, जास्ती नहीं। यह तो बहुत सहज है। तुम्हारे शास्त्रों में भी है कि घर-घर में सन्देश दिया। कोई एक रह गया तो उसने उल्हना दिया मुझे कोई ने बताया नहीं। बाप आये हैं, तो पूरा ढिंढोरा पीटना चाहिए। एक दिन जरूर सबको पता पड़ेगा कि बाप आये हैं - शान्तिधाम-सुखधाम का वर्सा देने। बरोबर जब डिटीज्म था तो और कोई धर्म नहीं था। सभी शान्तिधाम में थे। ऐसे-ऐसे ख्यालात चलने चाहिए, स्लोगन बनाने चाहिए। बाप कहते हैं देह सहित सब सम्बन्धों को छोड़ो। अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो तो आत्मा पवित्र बन जायेगी। अभी आत्मायें अपवित्र हैं। अभी सबको पवित्र बनाए बाप गाइड बन वापिस ले जायेंगे। सब अपने-अपने सेक्शन में चले जायेंगे। फिर डीटी धर्म वाले नम्बरवार आयेंगे। कितना सहज है। यह तो बुद्धि में धारण होना चाहिए। जो सर्विस करते हैं, वह छिपे नहीं रह सकते। डिस-सर्विस करने वाले भी छिप नहीं सकते। सर्विसएबुल को तो बुलाते हैं। जो कुछ भी ज्ञान नहीं सुना सकते उनको थोड़ेही बुलायेंगे। वह तो और ही नाम बदनाम कर देंगे। कहेंगे बी.के. ऐसे होते हैं क्या? पूरा रेसपॉन्ड भी नहीं करते। तो नाम बदनाम हुआ ना। शिवबाबा का नाम बदनाम करने वाले ऊंच पद पा न सकें। जैसे यहाँ भी कोई तो करोड़पति हैं, पद्मपति भी हैं, कोई तो देखो भूख मर रहे हैं। ऐसे बेगर्स भी आकर प्रिन्स बनेंगे। अभी तुम बच्चे ही जानते हो वही श्रीकृष्ण जो स्वर्ग का प्रिन्स था वह फिर बेगर बनते हैं, फिर बेगर टू प्रिन्स बनेंगे। यह बेगर थे ना, थोड़ा-बहुत कमाया - वह भी तुम बच्चों के लिए। नहीं तो तुम्हारी सम्भाल कैसे हो? यह सब बातें शास्त्रों में थोड़ेही हैं। शिवबाबा ही आकर बतलाते हैं। बरोबर यह गांव का छोरा था। नाम कोई श्रीकृष्ण नहीं था। यह आत्मा की बात है इसलिए मनुष्य मूंझे हुए हैं। तो बाबा ने समझाया शिवजयन्ती पर हर एक घर-घर में चित्रों पर सर्विस करें। लिख दें कि बेहद के बाप से 21 जन्मों के लिए स्वर्ग की बादशाही सेकण्ड में कैसे मिलती है, सो आकर समझो। जैसे दीवाली पर मनुष्य बहुत दुकान निकाल बैठते हैं, तुमको फिर अविनाशी ज्ञान रत्नों का दुकान निकाल बैठना है। तुम्हारा कितना अच्छा सजाया हुआ दुकान होगा। मनुष्य दीवाली पर करते हैं, तुम फिर शिवजयन्ती पर करो। जो शिवबाबा सबके दीप जगाते हैं, तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं। वह तो लक्ष्मी से विनाशी धन माँगते हैं और यहाँ जगत अम्बा से तुमको विश्व की बादशाही मिलती है। यह राज़ बाप समझाते हैं। बाबा कोई शास्त्र थोड़ेही उठाते हैं। बाप कहते हैं मैं नॉलेजफुल हूँ ना। हाँ, यह जानते हैं, फलाने-फलाने बच्चे सर्विस बहुत अच्छी करते हैं इसलिए याद पड़ती है। बाकी ऐसे नहीं कि एक-एक के अन्दर को बैठ जानता हूँ। हाँ, कोई समय पता पड़ जाता है-यह पतित है, शक पड़ता है। उनकी शक्ल ही मायूस हो जाती है तो ऊपर से बाबा भी कहला भेजता है, इनसे पूछो। यह भी ड्रामा में नूंध है। जो कोई-कोई के लिए बताते हैं, बाकी ऐसे नहीं सबके लिए बतायेंगे। ऐसे तो ढेर हैं, काला मुंह करते हैं। जो करेंगे सो अपना ही नुकसान करेंगे। सच बतलाने से कुछ फायदा होगा, नहीं बताने से और ही नुकसान करेंगे। समझना चाहिए बाबा हमको गोरा बनाने आये हैं और हम फिर काला मुंह कर लेते हैं! यह है ही काँटों की दुनिया। ह्यूमन काँटे हैं। सतयुग को कहा जाता है गार्डन ऑफ अल्लाह और यह है फॉरेस्ट इसलिए बाप कहते हैं जब-जब धर्म की ग्लानि होती है, तब मैं आता हूँ। फर्स्ट नम्बर श्रीकृष्ण देखो फिर 84 जन्मों के बाद कैसा बन जाता है। अभी सब हैं तमोप्रधान। आपस में लड़ते रहते हैं। यह सब ड्रामा में है। फिर स्वर्ग में यह कुछ नहीं होगा। प्वाइंट्स तो ढेर की ढेर हैं, नोट करनी चाहिए। जैसे बैरिस्टर लोग भी प्वाइंट्स का बुक रखते हैं ना। डॉक्टर लोग भी किताब रखते हैं, उसमें देखकर दवाई देते हैं। तो बच्चों को कितना अच्छी रीति पढ़ना चाहिए, सर्विस करनी चाहिए। बाबा ने नम्बरवन मंत्र दिया है मन्मनाभव। बाप और वर्से को याद करो तो स्वर्ग के मालिक बन जायेंगे। शिव जयन्ती मनाते हैं। परन्तु शिवबाबा ने क्या किया? जरूर स्वर्ग का वर्सा दिया होगा। उसको 5 हज़ार वर्ष हुए। स्वर्ग से नर्क, नर्क से स्वर्ग बनेगा।
बाप समझाते हैं-बच्चे, योगयुक्त बनो तो तुम्हें हर बात अच्छी तरह समझ में आयेगी। परन्तु योग ठीक नहीं है, बाप की याद नहीं रहती तो कुछ समझ नहीं सकते। विकर्म भी विनाश नहीं हो पाते। योगयुक्त न होने से इतनी सद्गति भी नहीं होती है, पाप रह जाते हैं। फिर पद भी कम हो जाता है। बहुत हैं, योग कुछ भी नहीं है, नाम-रूप में फँसे रहते हैं, उनकी ही याद आती रहेगी तो विकर्म विनाश कैसे होंगे? बाप कहते हैं देही-अभिमानी बनो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क
बुद्धि रुपी पांव पृथ्वी पर न रहें। जैसे कहावत है कि फरिश्तों के पांव पृथ्वी पर नहीं होते। ऐसे बुद्धि इस देह रुपी पृथ्वी अर्थात् प्रकृति की आकर्षण से परे रहे। प्रकृति को अधीन करने वाले बनो न कि अधीन होने वाले।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) शिव जयन्ती पर अविनाशी ज्ञान रत्नों का दुकान निकाल सेवा करनी है। घर-घर में रोशनी कर सबको बाप का परिचय देना है।

2) सच्चे बाप से सच्चा होकर रहना है, कोई भी विकर्म करके छिपाना नहीं है। ऐसा योगयुक्त बनना है, जो कोई भी पाप रह न जायें। किसी के भी नाम-रूप में नहीं फँसना है।

वरदान:

सागर के तले में जाकर अनुभव रूपी रत्न प्राप्त करने वाले सदा समर्थ आत्मा भव

समर्थ आत्मा बनने के लिए योग की हर विशेषता का, हर शक्ति का और हर एक ज्ञान की मुख्य पाइंट का अभ्यास करो। अभ्यासी, लगन में मगन रहने वाली आत्मा के सामने किसी भी प्रकार का विघ्न ठहर नहीं सकता इसलिए अभ्यास की प्रयोगशाला में बैठ जाओ। अभी तक ज्ञान के सागर, गुणों के सागर, शक्तियों के सागर में ऊपर-ऊपर की लहरों में लहराते हो, लेकिन अब सागर के तले में जाओ तो अनेक प्रकार के विचित्र अनुभव के रत्न प्राप्त कर समर्थ आत्मा बन जायेंगे।

स्लोगन:

अशुद्धि ही विकार रूपी भूतों का आह्वान करती है इसलिए संकल्पों से भी शुद्ध बनो।

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