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ब्रहमाकुमारीज बायोडाटा

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21-09-2020

21-09-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - संगम पर तुम्हें प्यार का सागर बाप प्यार का ही वर्सा देते हैं, इसलिए तुम सबको प्यार दो, गुस्सा मत करो''

प्रश्नः-

अपने रजिस्टर को ठीक रखने के लिए बाप ने तुम्हें कौन सा रास्ता बताया है?

उत्तर:-

प्यार का ही रास्ता बाप तुम्हें बतलाते हैं, श्रीमत देते हैं बच्चे हर एक के साथ प्यार से चलो। किसी को भी दु:ख नहीं दो। कर्मेन्द्रियों से कभी भी कोई उल्टा कर्म नहीं करो। सदा यही जाँच करो कि मेरे में कोई आसुरी गुण तो नहीं हैं? मूडी तो नहीं हूँ? कोई बात में बिगड़ता तो नहीं हूँ?

गीत:-

यह वक्त जा रहा है........

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत सुना। दिन-प्रतिदिन अपना घर अथवा मंजिल नज़दीक होती जाती है। अब जो कुछ श्रीमत कहती है, उसमें ग़फलत न करो। बाप का डायरेक्शन मिलता है कि सबको मैसेज पहुँचाओ। बच्चे जानते हैं लाखों करोड़ों को यह मैसेज देना है। फिर कोई समय आ भी जायेंगे। जब बहुत हो जायेंगे तो बहुतों को मैसेज देंगे। बाप का मैसेज मिलना तो सबको है। मैसेज है बहुत सहज। सिर्फ बोलो अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो और कोई भी कर्मेन्द्रियों से मन्सा-वाचा-कर्मणा कोई बुरा काम नहीं करना है। पहले मन्सा में आता है तब वाचा में आता है। अभी तुमको राइट-रांग समझने की बुद्धि चाहिए, यह पुण्य का काम है, यह करना चाहिए। दिल में संकल्प आता है गुस्सा करें, अब बुद्धि तो मिली है-अगर गुस्सा करेंगे तो पाप बन जायेगा। बाप को याद करने से पुण्य आत्मा बन जायेंगे। ऐसे नहीं अच्छा अभी हुआ फिर नहीं करेंगे। ऐसे फिर-फिर कहते रहने से आदत पड़ जायेगी। मनुष्य ऐसा कर्म करते हैं तो समझते हैं यह पाप नहीं है। विकार को पाप नहीं समझते हैं। अभी बाप ने बताया है - यह बड़े से बड़ा पाप है, इन पर जीत पाना है और सबको बाप का मैसेज देना है कि बाप कहते हैं मुझे याद करो, मौत सामने खड़ा है। जब कोई मरने पर होते हैं तो उनको कहते हैं - गॉड फादर को याद करो। रिमेम्बर गॉड फादर। वह समझते हैं यह गॉड फादर पास जाते हैं। परन्तु वो लोग यह तो जानते नहीं कि गॉड फादर को याद करने से क्या होगा? कहाँ जायेंगे? आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। गॉड फादर के पास तो कोई जा न सके। तो अब तुम बच्चों को अविनाशी बाप की अविनाशी याद चाहिए। जब तमोप्रधान दु:खी बन जाते हैं तब तो एक-दो को कहते हैं गॉड फादर को याद करो, सब आत्मायें एक-दो को कहती हैं, कहती तो आत्मा है ना। ऐसे नहीं कि परमात्मा कहते हैं। आत्मा, आत्मा को कहती है - बाप को याद करो। यह एक कॉमन रसम है। मरने समय ईश्वर को याद करते हैं। ईश्वर का डर रहता है। समझते हैं अच्छे वा बुरे कर्मों का फल ईश्वर ही देते हैं, बुरा कर्म करेंगे तो ईश्वर धर्मराज द्वारा बहुत सज़ा देंगे इसलिए डर रहता है, बरोबर कर्मों की भोगना तो होती है ना। तुम बच्चे अभी कर्म-अकर्म-विकर्म की गति को समझते हो। जानते हो यह कर्म अकर्म हुआ। याद में रह जो कर्म करते हैं वह अच्छे करते हैं। रावण राज्य में मनुष्य बुरे कर्म ही करते हैं। राम राज्य में बुरा काम कभी होता नहीं। अब श्रीमत तो मिलती रहती है। कहाँ बुलावा होता है, यह करना चाहिए वा नहीं करना चाहिए - हर बात में पूछते रहो। समझो कोई पुलिस की नौकरी करते हैं तो उन्हें भी कहा जाता-तुम पहले प्यार से समझाओ। सच्ची न करे तो बाद में मार। प्यार से समझाने से हाथ आ सकते हैं परन्तु उस प्यार में भी योगबल भरा होगा तो उस प्यार की ताकत से कोई को भी समझाने से समझेंगे, यह तो जैसे ईश्वर समझाते हैं। तुम ईश्वर के बच्चे योगी हो ना। तुम्हारे में भी ईश्वरीय ताकत है। ईश्वर प्यार का सागर है, उनमें ताकत है ना। सबको वर्सा देते हैं। तुम जानते हो स्वर्ग में प्यार बहुत होता है। अभी तुम प्यार का पूरा वर्सा ले रहे हो। लेते-लेते नम्बरवार पुरुषार्थ करते-करते प्यारे बन जायेंगे।

बाप कहते हैं-किसको भी दु:ख नहीं देना है, नहीं तो दु:खी होकर मरेंगे। बाप प्यार का रास्ता बताते हैं। मन्सा में आने से वह शक्ल में भी आ जाता है। कर्मेन्द्रियों से कर लिया तो रजिस्टर खराब हो जायेगा। देवताओं की चाल-चलन का गायन करते हैं ना इसलिए बाबा कहते हैं-देवताओं के पुजारियों को समझाओ। वह महिमा गाते हैं आप सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण हो और अपनी चाल-चलन भी सुनाते हैं। तो उनको समझाओ तुम ऐसे थे, अब नहीं हो फिर होंगे जरूर। तुमको ऐसा देवता बनना है तो अपनी चाल ऐसी रखो, तो तुम यह बन जायेंगे। अपनी जांच करनी है-हम सम्पूर्ण निर्विकारी हैं? हमारे में कोई आसुरी गुण तो नहीं हैं? कोई बात में बिगड़ता तो नहीं हूँ, मूड़ी तो नहीं बनता हूँ? अनके बार तुमने पुरूषार्थ किया है। बाप कहते हैं तुमको ऐसा बनना है। बनाने वाला भी हाज़िर है। कहते हैं कल्प-कल्प तुमको ऐसा बनाता हूँ। कल्प पहले जिन्होंने ज्ञान लिया है वह जरूर आकर लेंगे। पुरूषार्थ भी कराया जाता है और बेफिक्र भी रहते हैं। ड्रामा की नूँध ऐसी है। कोई कहते हैं-ड्रामा में नूँध होगी तो जरूर करेंगे। अच्छा चार्ट होगा तो ड्रामा करायेगा। समझा जाता है - उनकी तकदीर में नहीं है। पहले-पहले भी एक ऐसे बिगड़ा था, तकदीर में नहीं था-बोला ड्रामा में होगा तो ड्रामा हमको पुरूषार्थ करायेगा। बस छोड़ दिया। ऐसे तुमको भी बहुत मिलते हैं। तुम्हारा एम ऑब्जेक्ट तो यह खड़ा है, बैज तो तुम्हारे पास है, जैसे अपना पोतामेल देखते हो तो बैज को भी देखो, अपनी चाल-चलन को भी देखो। कभी भी क्रिमिनल ऑखें न हों। मुख से कोई ईविल बात न निकले। ईविल बोलने वाला ही नहीं होगा तो कान सुनेंगे कैसे? सतयुग में सब दैवीगुण वाले होते हैं। ईविल कोई बात नहीं। इन्होंने भी प्रालब्ध बाप द्वारा ही पाई है। यह तो सबको बोलो बाप को याद करो तो विकर्म विनाश हो जायेंगे। इसमें नुकसान की कोई बात नहीं है। संस्कार आत्मा ले जाती है। सन्यासी होगा तो फिर सन्यास धर्म में आ जायेगा। झाड़ तो उनका बढ़ता रहता है ना। इस समय तुम बदल रहे हो। मनुष्य ही देवता बनते हैं। सब कोई इकट्ठे थोड़ेही आयेंगे। आयेंगे फिर नम्बरवार, ड्रामा में कोई बिगर समय एक्टर थोड़ेही स्टेज पर आ जायेंगे। अन्दर बैठे रहते हैं। जब समय होता है तो बाहर स्टेज़ पर आते हैं पार्ट बजाने। वह है हद का नाटक, यह है बेहद का। बुद्धि में है हम एक्टर्स को अपने समय पर आकर अपना पार्ट बजाना है। यह बेहद का बड़ा झाड़ है। नम्बरवार आते जाते हैं। पहले-पहले एक ही धर्म था सभी धर्म वाले तो पहले-पहले आ न सकें।

पहले तो देवी-देवता धर्म वाले ही आयेंगे पार्ट बजाने, सो भी नम्बरवार। झाड़ के राज़ को भी समझना है। बाप ही आकर सारे कल्प वृक्ष का ज्ञान सुनाते हैं। इनकी भेंट फिर निराकारी झाड़ से होती है। एक बाप ही कहते हैं मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ का बीज मैं हूँ। बीज में झाड़ समाया हुआ नहीं है लेकिन झाड़ का ज्ञान समाया हुआ है। हर एक का अपना-अपना पार्ट है। चैतन्य झाड़ है ना। झाड़ के पत्ते भी नम्बरवार निकलेंगे। इस झाड़ को कोई भी समझते नहीं हैं, इनका बीज ऊपर में है इसलिए इनको उल्टा वृक्ष कहा जाता है। रचयिता बाप है ऊपर में। तुम जानते हो हमको जाना है घर, जहाँ आत्मायें रहती हैं। अभी हमको पवित्र बनकर जाना है। तुम्हारे द्वारा योगबल से सारी विश्व पवित्र हो जाती है। तुम्हारे लिए तो पवित्र सृष्टि चाहिए ना। तुम पवित्र बनते हो तो दुनिया भी पवित्र बनानी पड़े। सब पवित्र हो जाते हैं। तुम्हारी बुद्धि में है, आत्मा में ही मन-बुद्धि है ना। चैतन्य है। आत्मा ही ज्ञान को धारण कर सकती है। तो मीठे-मीठे बच्चों को यह सारा राज़ बुद्धि में होना चाहिए-कैसे हम पुनर्जन्म लेते हैं। 84 का चक्र तुम्हारा पूरा होता है तो सबका पूरा होता है। सब पावन बन जाते हैं। यह अनादि बना हुआ ड्रामा है। एक सेकण्ड भी ठहरता नहीं है। सेकण्ड बाई सेकण्ड जो कुछ होता है, सो फिर कल्प बाद होगा। हर एक आत्मा में अविनाशी पार्ट भरा हुआ है। वह एक्टर्स करके 2-4 घण्टे का पार्ट बजाते हैं। यह तो आत्मा को नैचुरल पार्ट मिला हुआ है तो बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। अतीन्द्रिय सुख अभी संगम का ही गाया हुआ है। बाप आते हैं, 21 जन्मों के लिए हम सदा सुखी बनते हैं। खुशी की बात है ना। जो अच्छी रीति समझते और समझाते हैं वह सर्विस पर लगे रहते हैं। कोई बच्चे खुद ही अगर क्रोधी हैं तो दूसरे में भी प्रवेशता हो जाती है। ताली दो हाथ की बजती है। वहाँ ऐसे नहीं होता। यहाँ तुम बच्चों को शिक्षा मिलती है - कोई क्रोध करे तो तुम उन पर फूल चढ़ाओ। प्यार से समझाओ। यह भी एक भूत है, बहुत नुकसान कर देंगे। क्रोध कभी नहीं करना चाहिए। सिखलाने वाले में तो क्रोध बिल्कुल नहीं होना चाहिए। नम्बरवार पुरुषार्थ करते रहते हैं। किसका तीव्र पुरूषार्थ होता है, किसका ठण्डा। ठण्डे पुरूषार्थ वाले जरूर अपनी बदनामी करेंगे। कोई में क्रोध है तो जहाँ जाते हैं वहाँ से निकाल देते हैं। कोई भी बदचलन वाले रह नहीं सकते। इम्तहान जब पूरा होगा तो सबको पता पड़ेगा। कौन-कौन क्या बनते हैं, सब साक्षात्कार होगा। जो जैसा काम करते हैं, उनकी ऐसी महिमा होती है।

तुम बच्चे ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को जानते हो। तुम सब अन्तर्यामी हो। आत्मा अन्दर में जानती है - यह सृष्टि चक्र कैसे फिरता है। सारे सृष्टि के मनुष्यों की चाल-चलन का, सब धर्मों का तुम्हें ज्ञान है। उनको कहा जायेगा - अन्तर्यामी। आत्मा को सब मालूम पड़ गया। ऐसे नहीं, भगवान घट-घट वासी है, उनको जानने की क्या दरकार है? वो तो अभी भी कहते हैं जो जैसा पुरुषार्थ करेंगे ऐसा फल पायेंगे। मुझे जानने की क्या दरकार है। जो करता है उसकी सज़ा भी खुद पायेंगे। ऐसी चलन चलेंगे तो अधम गति को पायेंगे। पद बहुत कम हो जायेगा, उस स्कूल में तो नापास हो जाते हैं तो फिर दूसरे वर्ष पढ़ते हैं। यह पढ़ाई तो होती है कल्प-कल्पान्तर के लिए। अब न पढ़े तो कल्प-कल्पान्तर नहीं पढ़ेंगे। ईश्वरीय लॉटरी तो पूरी लेनी चाहिए ना। यह बातें तुम बच्चे समझ सकते हो। जब भारत सुखधाम होगा तब बाकी सब शान्तिधाम में होंगे। बच्चों को खुशी होनी चाहिए-अब हमारे सुख के दिन आते हैं। दीपमाला के दिन नज़दीक होते हैं तो कहते हैं ना बाकी इतने दिन हैं फिर नये कपड़े पहनेंगे। तुम भी कहते हो स्वर्ग आ रहा है, हम अपना श्रृंगार करें तो फिर स्वर्ग में अच्छा सुख पायेंगे। साहूकार को तो साहूकारी का नशा रहता है। मनुष्य बिल्कुल घोर नींद में हैं फिर अचानक पता पड़ेगा-यह तो सच कहते थे। सच को तब समझें जब सच का संग हो। तुम अभी सच के संग में हो। तुम सत बनते हो सत बाप द्वारा। वह सब असत्य बनते हैं, असत्य द्वारा। अभी कान्ट्रास्ट भी छपा रहे हैं कि भगवान क्या कहते हैं और मनुष्य क्या कहते हैं। मैगजीन में भी डाल सकते हो। आखरीन विजय तो तुम्हारी ही है, जिन्होंने कल्प पहले पद पाया है वह जरूर पायेंगे। यह सरटेन है। वहाँ अकाले मृत्यु होता नहीं। आयु भी बड़ी होती है। जब पवित्रता थी तो बड़ी आयु थी। पतित-पावन परमात्मा बाप है तो जरूर उसने ही पावन बनाया होगा। कृष्ण की बात शोभती नहीं। पुरूषोत्तम संगमयुग पर कृष्ण फिर कहाँ से आयेगा। वही फीचर्स वाला मनुष्य तो फिर होता नहीं। 84 जन्म, 84 फीचर्स, 84 एक्टिविटी-यह बना-बनाया खेल है। उसमें फ़र्क नहीं पड़ सकता। ड्रामा कैसा वन्डरफुल बना हुआ है। आत्मा छोटी बिन्दी है, उसमें अनादि पार्ट भरा हुआ है - इसको कुदरत कहा जाता है। मनुष्य सुनकर वन्डर खायेंगे। परन्तु पहले तो यह पैगाम देना है कि बाप को याद करो। वही पतित-पावन है, सर्व का सद्गति दाता है। सतयुग में दु:ख की बात होती नहीं। कलियुग में तो कितना दु:ख है। परन्तु यह बातें समझने वाले नम्बरवार हैं। बाप तो रोज़ समझाते रहते हैं। तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा आया हुआ है हमको पढ़ाने, फिर साथ ले जायेंगे। साथ में रहने वालों से भी बांधेलियाँ ज्यादा याद करती हैं। वह ऊंच पद पा सकती हैं। यह भी समझ की बात है ना। बाबा की याद में बहुत तड़फती हैं। बाप कहते हैं बच्चे याद की यात्रा में रहो, दैवीगुण भी धारण करो तो बन्धन कटते जायेंगे। पाप का घड़ा खत्म हो जायेगा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रुहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपनी चाल-चलन देवताओं जैसी बनानी है। कोई भी ईविल बोल मुख से नहीं बोलने हैं। यह आंखें कभी क्रिमिनल न हों।

2) क्रोध का भूत बहुत नुकसान करता है। ताली दो हाथ से बजती है इसलिए कोई क्रोध करे तो किनारा कर लेना है, उन्हें प्यार से समझाना है।

वरदान:-

अव्यक्त स्वरूप की साधना द्वारा पावरफुल वायुमण्डल बनाने वाले अव्यक्त फरिश्ता भव

वायुमण्डल को पावरफुल बनाने का साधन है अपने अव्यक्त स्वरूप की साधना। इसका बार-बार अटेन्शन रहे क्योंकि जिस बात की साधना की जाती है उसी बात का ध्यान रहता है। तो अव्यक्त स्वरूप की साधना अर्थात् बार-बार अटेन्शन की तपस्या चाहिए इसलिए अव्यक्त फरिश्ता भव के वरदान को स्मृति में रख शक्तिशाली वायुमण्डल बनाने की तपस्या करो तो आपके सामने जो भी आयेगा वह व्यक्त और व्यर्थ बातों से परे हो जायेगा।

स्लोगन:-

सर्व शक्तिमान् बाप को प्रत्यक्ष करने के लिए एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाओ।

20-09-20

20-09-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 25-03-86 मधुबन


''संगमयुग होली जीवन का युग है''

आज बापदादा सर्व स्वराज्य अधिकारी अलौकिक राज्य सभा देख रहे हैं। हर एक श्रेष्ठ आत्मा के ऊपर लाइट का ताज चमकता हुआ देख रहे हैं। यही राज्य सभा होली सभा है। हर एक परम पावन पूज्य आत्मायें सिर्फ इस एक जन्म के लिए पावन अर्थात् होली नहीं बने हैं लेकिन पावन अर्थात् होली बनने की रेखा अनेक जन्मों की लम्बी रेखा है। सारे कल्प के अन्दर और आत्मायें भी पावन होली बनती हैं। जैसे पावन आत्मायें धर्मपिता के रूप में धर्म स्थापन करने के निमित्त बनती हैं। साथ-साथ कई महान आत्मायें कहलाने वाले भी पावन बनते हैं लेकिन उन्हों के पावन बनने में और आप पावन आत्माओं में अन्तर है। आपके पावन बनने का साधन अति सहज है। कोई मेहनत नहीं क्योंकि बाप से आप आत्माओं को सुख शान्ति पवित्रता का वर्सा सहज मिलता है। इस स्मृति से सहज और स्वत: ही अविनाशी बन जाते! दुनिया वाले पावन बनते हैं लेकिन मेहनत से। और उन्हें 21 जन्मों के वर्से के रूप में पवित्रता नहीं प्राप्त होती है। आज दुनिया के हिसाब से होली का दिन कहते हैं। वह होली मनाते और आप स्वयं ही परमात्म रंग में रंगने वाले होली आत्मायें बन जाते हो। मनाना थोड़े समय के लिए होता है, बनना जीवन के लिए होता है। वह दिन मनाते और आप होली जीवन बनाते हो। यह संगमयुग होली जीवन का युग है। तो रंग में रंग गये अर्थात् अविनाशी रंग लग गया। जो मिटाने की आवश्यकता नहीं। सदाकाल के लिए बाप समान बन गये। संगमयुग पर निराकार बाप समान कर्मातीत, निराकारी स्थिति का अनुभव करते हो और 21 जन्म ब्रह्मा बाप समान सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी श्रेष्ठ जीवन का समान अनुभव करते हो। तो आपकी होली है संग के रंग में बाप समान बनना। ऐसा पक्का रंग हो जो समान बना दो। ऐसी होली दुनिया में कोई खेलते हैं? बाप, समान बनाने की होली खेलने आते हैं। कितने भिन्न-भिन्न रंग बाप द्वारा हर आत्मा पर अविनाशी चढ़ जाते हैं। ज्ञान का रंग, याद का रंग, अनेक शक्तियों के रंग, गुणों के रंग, श्रेष्ठ दृष्टि, श्रेष्ठ वृत्ति, श्रेष्ठ भावना, श्रेष्ठ कामना स्वत: सदा बन जाए, यह रूहानी रंग कितना सहज चढ़ जाता है। होली बन गये अर्थात् होली हो गये। वह होली मनाते हैं, जैसे गुण हैं वैसा रूप बन जाते हैं। उसी समय कोई उन्हों का फोटो निकाले तो कैसा लगेगा। वह होली मनाकर क्या बन जाते और आप होली मनाते हो तो फरिश्ता सो देवता बन जाते हो। है सब आपका ही यादगार लेकिन आध्यात्मिक शक्ति न होने के कारण आध्यात्मिक रूप से नहीं मना सकते हैं। बाहरमुखता होने कारण बाहरमुखी रूप से ही मनाते रहते हैं। आपका यथार्थ रूप से मंगल मिलन मनाना है।

होली की विशेषता है जलाना, फिर मनाना और फिर मंगल मिलन करना। इन तीन विशेषताओं से यादगार बना हुआ है क्योंकि आप सभी ने होली बनने के लिए पहले पुराने संस्कार, पुरानी स्मृतियाँ सभी को योग अग्नि से जलाया तभी संग के रंग में होली मनाया अर्थात् बाप समान संग का रंग लगाया। जब बाप के संग का रंग लग जाता है तो हर आत्मा के प्रति विश्व की सर्व आत्मायें परमात्म परिवार बन जाते हैं। परमात्म परिवार होने के कारण हर आत्मा के प्रति शुभ कामना स्वत: ही नेचुरल संस्कार बन जाती है इसलिए सदा एक दो में मंगल मिलन मनाते रहते हैं। चाहे कोई दुश्मन भी हो, आसुरी संस्कार वाले हों लेकिन इस रूहानी मंगल मिलन से उनको भी परमात्म रंग का छींटा जरूर डालते। कोई भी आपके पास आयेगा तो क्या करेगा? सबसे गले मिलना अर्थात् श्रेष्ठ आत्मा समझ गले मिलना। यह बाप के बच्चे हैं। यह प्यार का मिलन, शुभ भावना का मिलन, उन आत्माओं को भी पुरानी बातें भुला देता है। वह भी उत्साह में आ जाते इसलिए उत्सव के रूप में यादगार बना लिया है। तो बाप से होली मनाना अर्थात् अविनाशी रूहानी रंग में बाप समान बनना। वह लोग तो उदास रहते हैं इसलिए खुशी मनाने के लिए यह दिन रखे हैं। और आप लोग तो सदा ही खुशी में नाचते गाते, मौज मनाते रहते हो। जो ज्यादा मूँझते हैं- क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ वह मौज में नहीं रह सकते। आप त्रिकालदर्शी बन गये तो फिर क्या, क्यों, कैसे यह संकल्प उठ ही नहीं सकते क्योंकि तीनों कालों को जानते हो। क्यों हुआ? जानते हैं पेपर है आगे बढ़ने लिए। क्यों हुआ? नथिंग न्यू। तो क्या हुआ का क्वेश्चन ही नहीं। कैसे हुआ? माया और मजबूत बनाने के लिए आई और चली गई। तो त्रिकालदर्शी स्थिति वाले इसमें मूँझते नहीं। क्वेश्चन के साथ-साथ रेसपाण्ड पहले आता क्योंकि त्रिकालदर्शी हो। नाम त्रिकालदर्शी और वर्तमान को भी न जान सके, क्यों हुआ, कैसे हुआ तो उसको त्रिकलदर्शी कैसे कहेंगे! अनेक बार विजयी बने हैं और बनने वाले भी हैं। पास्ट और फ्युचर को भी जानते हैं कि हम ब्राह्मण सो फरिश्ता, फरिश्ता सो देवता बनने वाले हैं। आज और कल की बात है। क्वेश्चन समाप्त हो फुल स्टाप आ जाता है।

होली का अर्थ भी है होली, पास्ट इज़ पास्ट। ऐसे बिन्दी लगाने आती है ना! यह भी होली का अर्थ है। जलाने वाली होली भी आती। रंग में रंगने वाली होली भी आती और बिन्दी लगाने की होली भी आती। मंगल मिलन मनाने की होली भी आती। चारों ही प्रकार की होली आती है ना! अगर एक प्रकार भी कम होगी तो लाइट का ताज टिकेगा नहीं। गिरता रहेगा। ताज टाइट नहीं होता तो गिरता रहता है ना। चारों ही प्रकार की होली मनाने में पास हो? जब बाप समान बनना है तो बाप सम्पन्न भी है और सम्पूर्ण भी है। परसेन्टेज की स्टेज भी कब तक? जिससे स्नेह होता है तो स्नेही को समान बनने में मुश्किल नहीं होता। बाप के सदा स्नेही हो तो सदा समान क्यों नहीं। सहज है ना। अच्छा।

सभी सदा होली और हैपी रहने वाले होली हंसो को हाइएस्ट ते हाइएस्ट बाप समान होली बनने की अविनाशी मुबारक दे रहे हैं। सदा बाप समान बनने की, सदा होली युग में मौज मनाने की मुबारक दे रहे हैं। सदा होली हंस बन ज्ञान रत्नों से सम्पन्न बनने की मुबारक दे रहे हैं। सर्व रंगों में रंगे हुए पूज्य आत्मा बनने की मुबारक दे रहे हैं। मुबारक भी है और यादप्यार भी सदा है। और सेवाधारी बाप के मालिक बच्चों के प्रति नमस्ते भी सदा है। तो यादप्यार और नमस्ते।

आज मलेशिया ग्रुप है! साउथ ईस्ट। सभी यह समझते हो कि हम कहाँ-कहाँ बिखर गये थे। परमात्म परिवार के स्टीमर से उतर कहाँ-कहाँ कोने में चले गये। संसार सागर में खो गये क्योंकि द्वापर में आत्मिक बाम्ब के बजाए शरीर के भान का बाम्ब लगा। रावण ने बाम्ब लगा दिया तो स्टीमर टूट गया। परमात्म परिवार का स्टीमर टूट गया और कहाँ-कहाँ चले गये। जहाँ भी सहारा मिला। डूबने वाले को जहाँ भी सहारा मिलता है तो ले लेते हैं ना। आप सबको भी जिस धर्म, जिस देश का थोड़ा सा भी सहारा मिला वहाँ पहुँच गये। लेकिन संस्कार तो वही हैं ना इसलिए दूसरे धर्म में जाते भी अपने वास्तविक धर्म का परिचय मिलने से पहुँच गये। सारे विश्व में फैल गये थे। यह बिछुड़ना भी कल्याणकारी हुआ, जो अनेक आत्माओं को एक ने निकालने का कार्य किया। विश्व में परमात्म परिवार का परिचय देने के लिए कल्याणकारी बन गये। सब अगर भारत में ही होते तो विश्व में सेवा कैसे होती इसलिए कोने-कोने में पहुँच गये हो। सभी मुख्य धर्मों में कोई न कोई पहुँच गये हैं। एक भी निकलता है तो हमजिन्स को जगाते जरूर हैं। बापदादा को भी 5 हज़ार वर्ष के बाद बिछुड़े हुए बच्चों को देख करके खुशी होती है। आप सबको भी खुशी होती है ना। पहुँच तो गये। मिल तो गये।

मलेशिया का कोई वी. आई. पी. अभी तक नहीं आया है। सेवा के लक्ष्य से उन्हों को भी निमित्त बनाया जाता है। सेवा की तीव्रगति के निमित्त बन जाते हैं इसलिए उन्हों को आगे रखना पड़ता है। बाप के लिए तो आप ही श्रेष्ठ आत्मायें हो। रूहानी नशे में तो आप श्रेष्ठ हो ना। कहाँ आप पूज्य आत्मायें और कहाँ वह माया में फँसे हुए। अंजान आत्माओं को भी पहचान तो देनी है ना। सिंगापुर में भी अब वृद्धि हो रही है। जहाँ बाप के अनन्य रत्न पहुँचते हैं तो रत्न, रत्नों को ही निकालते हैं। हिम्मत रख सेवा में लगन से आगे बढ़ रहे हैं। तो मेहनत का फल श्रेष्ठ ही मिलेगा। अपने परिवार को इकट्ठा करना है। परिवार का बिछुड़ा हुआ, परिवार में पहुँच जाता है तो कितना खुश होते और दिल से शुक्रिया गाते। तो यह भी परिवार में आकर कितना शुक्रिया गाते होंगे। निमित्त बन बाप का बना लिया। संगम पर शुक्रिया की मालायें बहुत पड़ती हैं। अच्छा।

अव्यक्त महावाक्य - अखण्ड महादानी बनो।

महादानी अर्थात् मिले हुए खज़ाने बिना स्वार्थ के सर्व आत्माओं प्रति देने वाले - नि:स्वार्थी। स्व के स्वार्थ से परे आत्मा ही महादानी बन सकती है। दूसरों की खुशी में स्वयं खुशी का अनुभव करना भी महादानी बनना है। जैसे सागर सम्पन्न है, अखुट है, अखण्ड है, ऐसे आप बच्चे भी मास्टर, अखण्ड, अखुट खज़ानों के मालिक हो। तो जो खज़ाने मिले हैं उन्हें महादानी बन औरों के प्रति कार्य में लगाते रहो। जो भी सम्बन्ध में आने वाली भक्त वा साधारण आत्मायें हैं उनके प्रति सदा यही लगन रहे कि इन्हें भक्ति का फल मिल जाए। जितना रहमदिल बनेंगे उतना ऐसी भटकती हुई आत्माओं को सहज रास्ता बतायेंगे।

आपके पास सबसे बड़े से बड़ा खजाना खुशी का है, आप इस खुशी के खज़ाने का दान करते रहो। जिसको खुशी देंगे वह बार-बार आपको धन्यवाद देगा। दु:खी आत्माओं को खुशी का दान दे दिया तो आपके गुण गायेंगे। इसमें महादानी बनो, खुशी का खज़ाना बांटो। अपने हमजिन्स को जगाओ। रास्ता दिखाओ। अब समय प्रमाण अपनी हर कर्मेन्द्रिय द्वारा महादानी वा वरदानी बनो। मस्तक द्वारा सर्व को स्व-स्वरूप की स्मृति दिलाओ। नयनों द्वारा स्वदेश और स्वराज्य का रास्ता दिखाओ। मुख द्वारा रचयिता और रचना के विस्तार को स्पष्ट कर ब्राह्मण सो देवता बनने का वरदान दो। हस्तों द्वारा सदा सहज योगी, कर्मयोगी बनने का वरदान दो। चरण कमल द्वारा हर कदम फालो फादर कर हर कदम में पदमों की कमाई जमा करने के वरदानी बनो, ऐसे हर कर्मेन्द्रिय से महादान, वरदान देते चलो। मास्टर दाता बन परिस्थितियों को परिवर्तन करने का, कमजोर को शक्तिशाली बनाने का, वायुमण्डल वा वृत्ति को अपनी शक्तियों द्वारा परिवर्तन करने का, सदा स्वयं को कल्याण अर्थ जिम्मेवार आत्मा समझ हर बात में सहयोग वा शक्ति के महादान वा वरदान देने का संकल्प करो। मुझे देना है, मुझे करना है, मुझे बदलना है, मुझे निर्माण बनना है। ऐसे"ओटे सो अर्जुन'' अर्थात् दातापन की विशेषता धारण करो।

अब हरेक आत्मा प्रति विशेष अनुभवी मूर्त बन, विशेष अनुभवों की खान बन, अनुभवी मूर्त बनाने का महादान करो। जिससे हर आत्मा अनुभव के आधार पर अंगद समान बन जाए। चल रहे हैं, कर रहे हैं, सुन रहे हैं, सुना रहे हैं, नहीं। लेकिन अनुभवों का खजाना पा लिया - ऐसे गीत गाते खुशी के झूले में झूलते रहें। आप बच्चों को जो भी खजाने बाप द्वारा मिले हैं, उन्हें बाँटते रहो अर्थात् महादानी बनो। सदैव कोई भी आवे तो आपके भण्डारे से खाली न जाए। आप सब बहुकाल के साथी हो और बहुकाल के राज्य अधिकारी हो। तो अन्त की कमजोर आत्माओं को महादानी, वरदानी बन अनुभव का दान और पुण्य करो। यह पुण्य आधाकल्प के लिए आपको पूजनीय और गायन योग्य बना देगा। आप सब ज्ञान के खज़ाने से सम्पन्न धन की देवियाँ हो। जब से ब्राह्मण बने हो तब से जन्मसिद्ध अधिकार में ज्ञान का, शक्तियों का खज़ाना मिला है। इस खजाने को स्व के प्रति और औरों के प्रति यूज़ करो तो खुशी बढ़ेगी, इसमें महादानी बनो। महादानी अर्थात् सदा अखण्ड लंगर (भण्डारा) चलता रहे।

ईश्वरीय सेवा का बड़े-से-बड़ा पुण्य है - पवित्रता का दान देना। पवित्र बनना और बनाना ही पुण्य आत्मा बनना है क्योंकि किसी आत्मा को आत्मघात महा पाप से छुड़ाते हो। अपवित्रता आत्मघात है। पवित्रता जीयदान है। पवित्र बनो और बनाओ - यही महादान कर पुण्य आत्मा बनो। महादानी अर्थात् बिल्कुल निर्बल, दिलशिकस्त असमर्थ आत्मा को एकस्ट्रा बल दे करके रूहानी रहमदिल बनना। महादानी अर्थात् बिल्कुल होपलेस केस में होप (उम्मींद) पैदा करना। तो मास्टर रचयिता बन प्राप्त हुई शक्तियों व प्राप्त हुए ज्ञान, गुण, व सर्व खज़ाने औरों के प्रति महादानी बनकर देते चलो। दान सदा बिल्कुल ग़रीब को दिया जाता है। बेसहारे को सहारा दिया जाता है। तो प्रजा के प्रति महादानी व अन्त में भक्त आत्माओं के प्रति महादानी बनो। आपस में एक दूसरे के प्रति ब्राह्मण महादानी नहीं। वह तो आपस में सहयोगी साथी हो। भाई-भाई हो व हमशरीक पुरूषार्थी हो। उन्हें सहयोग दो। अच्छा।

वरदान:-

पावरफुल वृत्ति द्वारा मन्सा सेवा करने वाले विश्व कल्याणकारी भव

विश्व की तडपती हुई आत्माओं को रास्ता बताने के लिए साक्षात बाप समान लाइट हाउस, माइट हाउस बनो। लक्ष्य रखो कि हर आत्मा को कुछ न कुछ देना है। चाहे मुक्ति दो चाहे जीवन-मुक्ति। सर्व के प्रति महादानी और वरदानी बनो। अभी अपने-अपने स्थान की सेवा तो करते हो लेकिन एक स्थान पर रहते मन्सा शक्ति द्वारा वायुमण्डल, वायब्रेशन द्वारा विश्व सेवा करो। ऐसी पावरफुल वृत्ति बनाओ जिससे वायुमण्डल बने - तब कहेंगे विश्व कल्याणकारी आत्मा।

स्लोगन:-

अशरीरी पन की एक्सरसाइज और व्यर्थ संकल्प रूपी भोजन की परहेज से स्वयं को तन्दरूस्त बनाओ।

 

सूचनाः- आज मास का तीसरा रविवार है, सभी राजयोगी तपस्वी भाई बहिनें सायं 6.30 से 7.30 बजे तक, विशेष योग अभ्यास के समय अपने आकारी फरिश्ते स्वरूप में स्थित हो, भक्तों की पुकार सुनें और उपकार करें। मास्टर दयालु, कृपालु बन सभी पर रहम की दृष्टि डालें। मुक्ति जीवनमुक्ति का वरदान दें।

17-09-2020

17-09-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - तुम्हें इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर ही उत्तम से उत्तम पुरुष बनना है, सबसे उत्तम पुरुष हैं यह लक्ष्मी-नारायण''

प्रश्नः-

तुम बच्चे बाप के साथ-साथ कौन-सा एक गुप्त कार्य कर रहे हो?

उत्तर:-

आदि सनातन देवी-देवता धर्म और दैवी राजधानी की स्थापना - तुम बाप के साथ गुप्त रूप से यह कार्य कर रहे हो। बाप बागवान है जो आकर कांटों के जंगल को फूलों का बगीचा बना रहे हैं। उस बगीचे में कोई भी ख़ौफनाक दु:ख देने वाली चीज़ें होती नहीं।

गीत:-

आखिर वह दिन आया आज........

ओम् शान्ति। रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। समझायेंगे तो जरूर शरीर द्वारा। आत्मा शरीर बिगर कोई भी कार्य कर नहीं सकती। रूहानी बाप को भी एक ही बार पुरूषोत्तम संगमयुग पर शरीर लेना पड़ता है। यह संगमयुग भी है, इनको पुरूषोत्तम युग भी कहेंगे क्योंकि इस संगमयुग के बाद फिर सतयुग आता है। सतयुग को भी पुरूषोत्तम युग कहेंगे। बाप आकर स्थापना भी पुरूषोत्तम युग की करते हैं। संगमयुग पर आते हैं तो जरूर वह भी पुरूषोत्तम युग हुआ। यहाँ ही बच्चों को पुरूषोत्तम बनाते हैं। फिर तुम पुरूषोत्तम नई दुनिया में रहते हो। पुरूषोत्तम अर्थात् उत्तम ते उत्तम पुरूष यह राधे-कृष्ण अथवा लक्ष्मी-नारायण हैं। यह ज्ञान भी तुमको है। और धर्म वाले भी मानेंगे बरोबर यह हेविन के मालिक हैं। भारत की बड़ी भारी महिमा है। परन्तु भारतवासी खुद नहीं जानते। कहते भी हैं ना-फलाना स्वर्गवासी हुआ परन्तु स्वर्ग क्या चीज़ है, यह समझते नहीं। आपेही सिद्ध करते हैं स्वर्ग गया, इसका मतलब नर्क में था। हेविन तो जब बाप स्थापन करे। वह तो नई दुनिया को ही कहा जाता है। दो चीज़ें हैं ना - स्वर्ग और नर्क। मनुष्य तो स्वर्ग को लाखों वर्ष कह देते हैं। तुम बच्चे समझते हो कल स्वर्ग था, इन्हों की राजाई थी फिर बाप से वर्सा ले रहे हो।

बाप कहते हैं - मीठे लाडले बच्चे, तुम्हारी आत्मा पतित है इसलिए हेल में ही है। कहते भी हैं अभी कलियुग के 40 हज़ार वर्ष बाकी हैं, तो जरूर कलियुग वासी कहेंगे ना। पुरानी दुनिया तो है ना। मनुष्य बिचारे घोर अन्धियारे में हैं। पिछाड़ी में जब आग लगेगी तो यह सब खत्म हो जायेंगे। तुम्हारी प्रीत बुद्धि है, नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। जितना प्रीत बुद्धि होगी उतना ऊंच पद पायेंगे। सवेरे उठकर बहुत प्यार से बाप को याद करना है। भल प्रेम के आंसू भी आयें क्योंकि बहुत समय के बाद बाप आकर मिले हैं। बाबा आप आकर हमको दु:ख से छुड़ाते हो। हम विषय सागर में गोते खाते कितना दु:खी होते आये हैं। अभी यह है रौरव नर्क। अभी तुमको बाबा ने सारे चक्र का राज़ समझाया है। मूलवतन क्या है - वह भी आकर बताया है। पहले तुम नहीं जानते थे, इसको कहते ही हैं कांटों का जंगल। स्वर्ग को कहा जाता है गार्डन आफ अल्लाह, फूलों का बगीचा। बाप को बागवान भी कहते हैं ना। तुमको फूल से फिर कांटा कौन बनाते हैं? रावण। तुम बच्चे समझते हो भारत फूलों का बगीचा था, अब जंगल है। जंगल में जानवर, बिच्छू आदि रहते हैं। सतयुग में कोई ख़ौफनाक जानवर आदि होते नहीं। शास्त्रों में तो बहुत बातें लिख दी हैं। कृष्ण को सर्प ने डसा, यह हुआ। कृष्ण को फिर द्वापर में ले गये हैं। बाप ने समझाया है भक्ति बिल्कुल अलग चीज़ है, ज्ञान सागर एक ही बाप है। ऐसे नहीं कि ब्रह्मा-विष्णु-शंकर ज्ञान के सागर हैं। नहीं, पतित-पावन एक ही ज्ञान सागर को कहेंगे। ज्ञान से ही मनुष्य की सद्गति होती है। सद्गति के स्थान हैं दो - मुक्तिधाम और जीवनमुक्तिधाम। अभी तुम बच्चे जानते हो यह राजधानी स्थापन हो रही है, परन्तु गुप्त। बाप ही आकर आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं, तो सब अपने-अपने मनुष्य चोले में आते हैं। बाप को अपना चोला तो है नहीं, इसलिए इनको निराकार गॉड फादर कहा जाता है। बाकी सब हैं साकारी। इनको कहा जाता है इनकारपोरियल गॉड फादर, इनकारपोरियल आत्माओं का। तुम आत्मायें भी वहाँ रहती हो। बाप भी वहाँ रहते हैं। परन्तु है गुप्त। बाप ही आकर आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं। मूलवतन में कोई दु:ख नहीं। बाप कहते हैं तुम्हारा कल्याण है ही एक बात में - बाप को याद करो, मनमनाभव। बस, बाप का बच्चा बना, बच्चे को वर्सा अन्डरस्टुड है। अल्फ को याद किया तो वर्सा जरूर है - सतयुगी नई दुनिया का। इस पतित दुनिया का विनाश भी ज़रूर होना ही है। अमरपुरी में जाना ही है। अमरनाथ तुम पार्वतियों को अमर-कथा सुना रहे हैं। तीर्थो पर कितने मनुष्य जाते हैं, अमरनाथ पर कितने जाते हैं। वहाँ है कुछ भी नहीं। सब है ठगी। सच की रत्ती भी नहीं। गाया भी जाता है झूठी काया झूठी माया... इसका भी अर्थ होना चाहिए। यहाँ है ही झूठ। यह भी ज्ञान की बात है। ऐसे नहीं कि ग्लास को ग्लास कहना झूठ है। बाकी बाप के बारे जो कुछ बोलते हैं वह झूठ बोलते हैं। सच बोलने वाला एक ही बाप है। अभी तुम जानते हो बाबा आकर सच्ची-सच्ची सत्य नारायण की कथा सुनाते हैं। झूठे हीरे-मोती भी होते हैं ना। आजकल झूठ का बहुत शो है। उनकी चमक ऐसी होती है सच्चे से भी अच्छे। यह झूठे पत्थर पहले नहीं थे। पिछाड़ी में विलायत से आये हैं। झूठे सच्चे साथ मिला देते हैं, पता नहीं पड़ता है। फिर ऐसी चीज़ें भी निकली जिससे परखते हैं। मोती भी ऐसे झूठे निकले जो ज़रा भी पता नहीं पड़ सकता। अभी तुम बच्चों को कोई संशय नहीं रहता। संशय वाले फिर आते ही नहीं। प्रदर्शनी में कितने ढेर आते हैं। बाप कहते हैं अब बड़े-बड़े दुकान निकालो, यह एक ही तुम्हारा सच्चा दुकान है। तुम सच्ची दुकान खोलते हो। बड़े-बड़े सन्यासियों के बड़े-बड़े दुकान होते हैं, जहाँ बड़े-बड़े मनुष्य जाते हैं। तुम भी बड़े-बड़े सेन्टर खोलो। भक्ति मार्ग की सामग्री बिल्कुल अलग है। ऐसे नहीं कहेंगे कि भक्ति शुरू से ही चली आई है। नहीं। ज्ञान से होती है सद्गति अर्थात् दिन। वहाँ सम्पूर्ण निर्विकारी विश्व के मालिक थे। मनुष्यों को यह भी पता नहीं कि यह लक्ष्मी-नारायण विश्व के मालिक थे। सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी, और कोई धर्म होता नहीं। बच्चों ने गीत भी सुना। तुम समझते हो आखिर वह दिन आया आज संगम का, जो हम आकर अपने बेहद के बाप से मिले। बेहद का वर्सा पाने लिए पुरूषार्थ करते हैं। सतयुग में तो ऐसे नहीं कहेंगे-आखिर वह दिन आया आज। वो लोग समझते हैं-बहुत अनाज होगा, यह होगा। समझते हैं स्वर्ग की स्थापना हम करते हैं। समझते हैं स्टूडेन्ट का नया ब्लड है, यह बहुत मदद करेंगे इसलिए गवर्मेन्ट बहुत मेहनत करती है उन्हों पर। और फिर पत्थर आदि भी वही मारते हैं। हंगामा मचाने में पहले-पहले स्टूडेन्ट ही आगे रहते हैं। वह बड़े होशियार होते हैं। उनका न्यु ब्लड कहते हैं। अब न्यु ब्लड की तो बात नहीं। वह है ब्लड कनेक्शन, अभी तुम्हारा यह है रूहानी कनेक्शन। कहते हैं ना बाबा हम आपका दो मास का बच्चा हूँ। कई बच्चे रूहानी बर्थ डे मनाते हैं। ईश्वरीय बर्थ डे ही मनाना चाहिए। वह जिस्मानी बर्थ डे कैन्सिल कर देना चाहिए। हम ब्राह्मणों को ही खिलायेंगे। मनाना तो यह चाहिए ना। वह है आसुरी जन्म, यह है ईश्वरीय जन्म। रात-दिन का फ़र्क है, परन्तु जब निश्चय में बैठे। ऐसे नहीं, ईश्वरीय जन्म मनाकर फिर जाए आसुरी जन्म में पड़े। ऐसा भी होता है। ईश्वरीय जन्म मनाते-मनाते फिर रफू-चक्कर हो जाते हैं। आजकल तो मैरेज डे भी मनाते हैं, शादी को जैसे कि अच्छा शुभ कार्य समझते हैं। जहन्नुम में जाने का भी दिन मनाते हैं। वन्डर है ना। बाप बैठ यह सब बातें समझाते हैं। अब तुमको तो ईश्वरीय बर्थ डे ब्राह्मणों के साथ ही मनाना है। हम शिवबाबा के बच्चे हैं, हम बर्थ डे मनाते हैं तो शिवबाबा की ही याद रहेगी। जो बच्चे निश्चयबुद्धि हैं उनको जन्म दिन मनाना चाहिए। वह आसुरी जन्म ही भूल जाए। यह भी बाबा राय देते हैं। अगर पक्का निश्चय बुद्धि है तो। बस हम तो बाबा के बन गये, दूसरा न कोई फिर अन्त मती सो गति हो जायेगी। बाप की याद में मरा तो दूसरा जन्म भी ऐसा मिलेगा। नहीं तो अन्तकाल जो स्त्री सिमरे........ यह भी ग्रन्थ में है। यहाँ फिर कहते हैं अन्त समय गंगा का तट हो। यह सब है भक्ति मार्ग की बातें। तुमको बाप कहते हैं शरीर छूटे तो भी स्वदर्शन चक्रधारी हो। बुद्धि में बाप और चक्र याद हो। सो जरूर जब पुरूषार्थ करते रहेंगे तब तो अन्तकाल याद आयेगी। अपने को आत्मा समझो और बाप को याद करो क्योंकि तुम बच्चों को अब वापिस जाना है अशरीरी होकर। यहाँ पार्ट बजाते-बजाते सतोप्रधान से तमोप्रधान बने हो। अब फिर सतोप्रधान बनना है। इस समय आत्मा ही इमप्योर है, तो शरीर प्योर फिर कैसे मिल सकेगा? बाबा ने बहुत मिसाल समझाये हैं फिर भी जौहरी है ना। खाद जेवर में नहीं, सोने में पड़ती है। 24 कैरेट से 22 कैरेट बनाना होगा तो चांदी डालेंगे। अभी तो सोना है नहीं। सबसे लेते रहते हैं। आजकल नोट भी देखो कैसे बनाते हैं। कागज़ भी नहीं है। बच्चे समझते हैं कल्प-कल्प ऐसा होता आया है। पूरी जांच रखते हैं। लॉकर्स आदि खुलाते हैं। जैसे किसकी तलाशी आदि ली जाती है ना। गायन भी है-किनकी दबी रही धूल में........ आग भी जोर से लगती है। तुम बच्चे जानते हो यह सब होना है इसलिए बैग-बैगेज तुम भविष्य के लिए तैयार कर रहे हो। और कोई को मालूम थोड़ेही है, तुमको ही वर्सा मिलता है 21 जन्म लिए। तुम्हारे ही पैसे से भारत को स्वर्ग बना रहे हैं, जिसमें फिर तुम ही निवास करेंगे।

तुम बच्चे अपने ही पुरूषार्थ से आपेही राजतिलक लेते हो। गरीब निवाज़ बाबा स्वर्ग का मालिक बनाने आये हैं लेकिन बनेंगे तो अपनी पढ़ाई से। कृपा या आशीर्वाद से नहीं। टीचर का तो पढ़ाना धर्म है। कृपा की बात नहीं। टीचर को गवर्मेन्ट से पगार मिलती है। सो तो जरूर पढ़ायेंगे। इतना बड़ा इज़ाफा मिलता है। पद्मापद्मपति बनते हो। कृष्ण के पांव में पद्म की निशानी देते हैं। तुम यहाँ आये हो भविष्य में पद्मपति बनने। तुम बहुत सुखी, साहूकार, अमर बनते हो। काल पर विजय पाते हो। इन बातों को मनुष्य समझ न सके। तुम्हारी आयु पूरी हो जाती है, अमर बन जाते हो। उन्होंने फिर पाण्डवों के चित्र लम्बे-चौड़े बना दिये हैं। समझते हैं पाण्डव इतने लम्बे थे। अब पाण्डव तो तुम हो। कितना रात-दिन का फ़र्क है। मनुष्य कोई जास्ती लम्बा तो होता नहीं। 6 फुट का ही होता है। भक्ति मार्ग में पहले-पहले शिवबाबा की भक्ति होती है। वह तो बड़ा बनायेंगे नहीं। पहले शिवबाबा की अव्यभिचारी भक्ति चलती है। फिर देवताओं की मूर्तियां बनाते हैं। उनके फिर बड़े-बड़े चित्र बनाते हैं। फिर पाण्डवों के बड़े-बड़े चित्र बनाते हैं। यह सब पूजा के लिए चित्र बनाते हैं। लक्ष्मी की पूजा 12 मास में एक बार करते हैं। जगत अम्बा की पूजा रोज़ करते रहते हैं। यह भी बाबा ने समझाया है तुम्हारी डबल पूजा होती है। मेरी तो सिर्फ आत्मा यानी लिंग की ही होती है। तुम्हारी सालिग्राम के रूप में भी पूजा होती है और फिर देवताओं के रूप में भी पूजा होती है। रूद्र यज्ञ रचते हैं तो कितने सालिग्राम बनाते हैं तो कौन बड़ा हुआ? तब बाबा बच्चों को नमस्ते करते हैं। कितना ऊंच पद प्राप्त कराते हैं।

बाबा कितनी गुह्य-गुह्य बातें सुनाते हैं, तो बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। हमको भगवान पढ़ाते हैं भगवान-भगवती बनाने के लिए। कितना शुक्रिया मानना चाहिए। बाप की याद में रहने से स्वप्न भी अच्छे आयेंगे। साक्षात्कार भी होगा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपना ईश्वरीय रूहानी बर्थ डे मनाना है, रूहानी कनेक्शन रखना है, ब्लड कनेक्शन नहीं। आसुरी जिस्मानी बर्थ डे भी कैन्सिल। वह फिर याद भी न आये।

2) अपना बैग बैगेज भविष्य के लिए तैयार करना है। अपने पैसे भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में सफल करने हैं। अपने पुरूषार्थ से अपने को राजतिलक देना है।

वरदान:-

स्मृति का स्विच ऑन कर सेकण्ड में अशरीरी स्थिति का अनुभव करने वाले प्रीत बुद्धि भव

जहाँ प्रभू प्रीत है वहाँ अशरीरी बनना एक सेकण्ड के खेल के समान है। जैसे स्विच ऑन करते ही अंधकार समाप्त हो जाता है। ऐसे प्रीत बुद्धि बन स्मृति का स्विच ऑन करो तो देह और देह की दुनिया की स्मृति का स्विच ऑफ हो जायेगा। यह सेकण्ड का खेल है। मुख से बाबा कहने में भी टाइम लगता है लेकिन स्मृति में लाने में टाइम नहीं लगता। यह बाबा शब्द ही पुरानी दुनिया को भूलने का आत्मिक बाम्ब है।

स्लोगन:-

देह भान की मिट्टी के बोझ से परे रहो तो डबल लाइट फरिश्ता बन जायेंगे।

18-09-2020

18-09-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे -तुम विश्व में शान्ति स्थापन करने के निमित्त हो, इसलिए तुम्हें कभी अशान्त नहीं होना चाहिए''

प्रश्नः-

बाप किन बच्चों को फरमानबरदार बच्चे कहते हैं?

उत्तर:-

बाप का जो मुख्य फरमान है कि बच्चे अमृतवेले (सवेरे) उठकर बाप को याद करो, इस मुख्य फरमान को पालन करते हैं, सवेरे-सवेरे स्नान आदि कर फ्रेश हो मुकरर टाइम पर याद की यात्रा में रहते हैं, बाबा उन्हें सपूत वा फरमानबरदार कहते हैं, वही जाकर राजा बनेंगे। कपूत बच्चे तो झाड़ू लगायेंगे।

ओम् शान्ति। इसका अर्थ तो बच्चों को समझाया है। ओम् अर्थात् मैं आत्मा हूँ। ऐसे सब कहते हैं जीव आत्मा हैं जरूर और सब आत्माओं का एक बाप है। शरीरों के बाप अलग-अलग होते हैं। यह भी बच्चों की बुद्धि में है, हद के बाप से हद का और बेहद के बाप से बेहद का वर्सा मिलता है। अब इस समय मनुष्य चाहते हैं विश्व में शान्ति हो। अगर चित्रों पर समझाया जाए तो शान्ति के लिए कलियुग अन्त सतयुग आदि के संगम पर ले आना चाहिए। यह है सतयुग नई दुनिया, उनमें एक धर्म होता है तो पवित्रता-शान्ति-सुख है। उनको कहा ही जाता है हेविन। यह तो सब मानेंगे। नई दुनिया में सुख है, दु:ख हो नहीं सकता। किसको भी समझाना बहुत सहज है। शान्ति और अशान्ति की बात यहाँ विश्व पर ही होती है। वह तो है ही निवार्णधाम, जहाँ शान्ति-अशान्ति का प्रश्न ही नहीं उठ सकता है। बच्चे जब भाषण करते हैं तो पहले-पहले विश्व में शान्ति की बात ही उठानी चाहिए। मनुष्य शान्ति के लिए बहुत प्रयास करते हैं, उनको प्राइज़ भी मिलती रहती है। वास्तव में इसमें दौड़ा-दौड़ी करने की बात है नहीं। बाप कहते हैं सिर्फ अपने स्वधर्म में टिको तो विकर्म विनाश हो जायेंगे। स्वधर्म में टिकेंगे तो शान्ति हो जायेगी। तुम हो ही एवर शान्त बाप के बच्चे। यह वर्सा उनसे मिलता है। उनको कोई मोक्ष नहीं कहेंगे। मोक्ष तो भगवान को भी नहीं मिल सकता। भगवान को भी पार्ट में जरूर आना है। कहते हैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुगे मैं आता हूँ। तो भगवान को भी मोक्ष नहीं तो बच्चे फिर मोक्ष को कैसे पा सकते हैं। यह बातें सारा दिन विचार सागर मंथन करने की हैं। बाप तो तुम बच्चों को ही समझाते हैं। तुम बच्चों को समझाने की प्रैक्टिस जास्ती है। शिवबाबा समझाते हैं तो तुम सब ब्राह्मण ही समझते हो। विचार सागर मंथन तुमको करना है। सर्विस पर तुम बच्चे हो। तुमको तो बहुत समझाना होता है। दिन-रात सर्विस में रहते हैं। म्यूज़ियम में सारा दिन आते ही रहेंगे। रात्रि को 10-11 तक भी कहाँ आते हैं। सवेरे 4 बजे से भी कहाँ-कहाँ सर्विस करने लग पड़ते हैं। यहाँ तो घर है, जब चाहें तब बैठ सकते हैं। सेन्टर्स में तो बाहर से दूर-दूर से आते हैं तो टाइम मुकरर रखना पड़ता है। यहाँ तो कोई भी टाइम बच्चे उठ सकते हैं। परन्तु ऐसे टाइम तो नहीं पढ़ना है जो बच्चे उठें और झुटका खायें इसलिए सवेरे का टाइम रखा जाता है। जो स्नान आदि कर फ्रेश हो आयें फिर भी टाइम पर नहीं आते तो उनको फरमानबरदार नहीं कह सकते हैं। लौकिक बाप को भी सपूत और कपूत बच्चे होते हैं ना। बेहद के बाप को भी होते हैं। सपूत जाकर राजा बनेंगे, कपूत जाकर झाड़ू लगायेंगे। मालूम तो सब पड़ जाता है ना।

कृष्ण जन्माष्टमी पर भी समझाया है। कृष्ण का जन्म जब होता है तब तो स्वर्ग है। एक ही राज्य होता है। विश्व में शान्ति है। स्वर्ग में बहुत थोड़े मनुष्य होंगे। वह है ही नई दुनिया। वहाँ अशान्ति हो नहीं सकती। शान्ति तब है जब एक धर्म है। जो धर्म बाप स्थापन करते हैं। बाद में जब और-और धर्म आते हैं तो अशान्ति होती है। वहाँ है ही शान्ति, 16 कला सम्पूर्ण हैं ना। चन्द्रमा भी जब सम्पूर्ण होता है तो कितना शोभता है, उनको फुल मून कहा जाता है। त्रेता में 3/4 कहेंगे, खण्डित हो गया ना। दो कला कम हो गई। सम्पूर्ण शान्ति सतयुग में होती है। 25 परसेन्ट पुरानी सृष्टि होगी तो कुछ न कुछ खिट-खिट होगी। दो कला कम होने से शोभा कम हो गई। स्वर्ग में बिल्कुल शान्ति, नर्क में है बिल्कुल अशान्ति। यह समय है जब मनुष्य विश्व में शान्ति चाहते हैं, इनसे आगे यह आवाज़ नहीं था कि विश्व में शान्ति हो। अभी आवाज़ निकला है क्योंकि अब विश्व में शान्ति हो रही है। आत्मा चाहती है कि विश्व में शान्ति होनी चाहिए। मनुष्य तो देह-अभिमान में होने कारण सिर्फ कहते रहते हैं - विश्व में शान्ति हो। 84 जन्म अब पूरे हुए हैं। यह बाप ही आकर समझाते हैं। बाप को ही याद करते हैं। वह कभी किस रूप में आकर स्वर्ग की स्थापना करेंगे, उनका नाम ही है हेविनली गॉड फादर। यह किसको भी पता नहीं है - हेविन कैसे रचते हैं। श्रीकृष्ण तो रच न सकें। उनको कहा जाता है देवता। मनुष्य देवताओं को नमन करते हैं। उनमें दैवी गुण हैं इसलिए देवता कहा जाता है। अच्छे गुण वाले को कहते हैं ना-यह तो जैसे देवता है। लड़ने-झगड़ने वाले को कहेंगे यह तो जैसे असुर है। बच्चे जानते हैं हम बेहद के बाप के सामने बैठे हैं। तो बच्चों की चलन कितनी अच्छी होनी चाहिए। अज्ञान काल में भी बाप का देखा हुआ है 6-7 कुटुम्ब इकट्ठे रहते हैं, एकदम क्षीरखण्ड हो चलते हैं। कहाँ तो घर में सिर्फ दो होंगे तो भी लड़ते-झगड़ते रहेंगे। तो तुम हो ईश्वरीय सन्तान। बहुत-बहुत क्षीरखण्ड हो रहना चाहिए। सतयुग में क्षीरखण्ड होते हैं, यहाँ क्षीरखण्ड होना तुम सीखते हो तो बहुत प्यार से रहना चाहिए। बाप कहते हैं अन्दर में जाँच करो हमने कोई विकर्म तो नहीं किया? किसको दु:ख तो नहीं दिया? ऐसे कोई बैठकर अपने को जाँचते नहीं। यह बड़ी समझ की बात है। तुम बच्चे हो विश्व में शान्ति स्थापन करने वाले। अगर घर में ही अशान्ति करने वाले होंगे तो शान्ति फिर कैसे करेंगे। लौकिक बाप का बच्चा तंग करता है तो कहेंगे यह तो मुआ भला। कोई आदत पड़ जाती है तो पक्की हो जाती है। यह समझ नहीं रहती कि हम तो बेहद के बाप के बच्चे हैं, हमको तो विश्व में शान्ति स्थापन करनी है। शिवबाबा के बच्चे हो अगर अशान्त होते हो तो शिवबाबा के पास आओ। वह तो हीरा है, वो झट तुमको युक्ति बतायेंगे-ऐसे शान्ति हो सकती है। शान्ति का प्रबन्ध देंगे। ऐसे बहुत हैं चलन दैवी घराने जैसी नहीं है। तुम अब तैयार होते हो गुल-गुल दुनिया में जाने। यह है ही गन्दी दुनिया वेश्यालय, इनसे तो ऩफरत आती है। विश्व में शान्ति होगी तो नई दुनिया में। संगम पर हो नहीं सकती। यहाँ शान्त बनने का पुरूषार्थ करते हैं। पूरा पुरूषार्थ नहीं करते तो फिर सज़ा खानी पड़ेगी। मेरे साथ तो धर्मराज है ना। जब हिसाब-किताब चुक्तु होने का समय आयेगा तो खूब मार खायेंगे। कर्म का भोग जरूर है। बीमार होते हैं, वह भी कर्मभोग है ना। बाप के ऊपर तो कोई नहीं है। समझाते हैं - बच्चे गुल-गुल बनो तो ऊंच पद पायेंगे। नहीं तो कोई फायदा नहीं। भगवान बाप जिसको आधाकल्प याद किया उनसे वर्सा नहीं लिया तो बच्चे किस काम के। परन्तु ड्रामा अनुसार यह भी होना है जरूर। तो समझाने की युक्तियाँ बहुत हैं। विश्व में शान्ति तो सतयुग में थी, जहाँ इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। लड़ाई भी जरूर लगेगी क्योंकि अशान्ति है ना। कृष्ण फिर आयेगा सतयुग में। कहते हैं कलियुग में देवताओं का परछाया नहीं पड़ सकता है। यह बातें तुम बच्चे ही अब सुन रहे हो। तुम जानते हो शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं। धारणा करनी है, सारी आयु ही लग जाती है। कहते हैं ना-सारी आयु समझाया है फिर भी समझते नहीं हैं।

बेहद का बाप कहते हैं - पहले-पहले मुख्य चीज़ तो समझाओ - ज्ञान अलग और भक्ति अलग चीज़ है। आधाकल्प है दिन, आधाकल्प है रात। शास्त्रों में कल्प की आयु ही उल्टी लिख दी है। तो आधा-आधा भी हो नहीं सकते। तुम्हारे में कोई शास्त्र आदि पढ़े हुए नहीं हैं तो अच्छे हैं। पढ़े हुए होंगे तो संशय उठायेंगे, प्रश्न पूछते रहेंगे। वास्तव में जब वानप्रस्थ अवस्था होती है तब भगवान को याद करते हैं। कोई न कोई की मत से। फिर जैसे गुरू सिखलायेंगे। भक्ति भी सिखलाते हैं। ऐसे कोई नहीं जो भक्ति न सिखलायें। उनमें भक्ति की ताकत है तब तो इतने फालोअर्स बनते हैं। फालोअर्स को भक्त पुजारी कहेंगे। यहाँ सब हैं पुजारी। वहाँ पुजारी कोई होता नहीं। भगवान कभी पुजारी नहीं बनता। अनेक प्वाइंट्स समझाई जाती है, धीरे-धीरे तुम बच्चों में भी समझाने की ताकत आती जायेगी।

अभी तुम बतलाते हो कृष्ण आ रहा है। सतयुग में जरूर कृष्ण होगा। नहीं तो वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी कैसे रिपीट होगी। सिर्फ एक कृष्ण तो नहीं होगा, यथा राजा-रानी तथा प्रजा होगी ना। इनमें भी समझ की बात है। तुम बच्चे समझते हो हम तो बाप के बच्चे हैं। बाप वर्सा देने आये हैं। स्वर्ग में तो सभी नहीं आयेंगे। न त्रेता में सब आ सकते हैं। झाड़ आहिस्ते-आहिस्ते वृद्धि को पाता रहता है। मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ है। वहाँ है आत्माओं का झाड़। यहाँ ब्रह्मा द्वारा स्थापना, फिर शंकर द्वारा विनाश फिर पालना..... अक्षर भी यह कायदेसिर बोलने चाहिए। बच्चों की बुद्धि में यह नशा है, यह सृष्टि का चक्र कैसे चलता है। रचना कैसे होती है। अब नई छोटी रचना है ना। यह जैसे बाजोली है। पहले शूद्र हैं अनेक, फिर बाप आकर रचना रचते हैं - ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मणों की। ब्राह्मण हो जाते हैं चोटी। चोटी और पैर आपस में मिलते हैं। पहले ब्राह्मण चाहिए। ब्राह्मणों का युग बहुत छोटा होता है। पीछे हैं देवतायें। यह वर्णों वाला चित्र भी काम का है। यह चित्र समझाने में बहुत इज़ी है। वैरायटी मनुष्यों का वैरायटी रूप है। समझाने में कितना मज़ा आता है। ब्राह्मण जब हैं तो सब धर्म हैं। शूद्रों से ब्राह्मणों का सैपलिंग लगता है। मनुष्य तो झाड़ के सैपलिंग लगाते हैं। बाप भी सैपलिंग लगाते हैं जहाँ विश्व में शान्ति हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सदा स्मृति रखनी है कि हम हैं ईश्वरीय सन्तान। हमें क्षीरखण्ड होकर रहना है। किसी को भी दु:ख नहीं देना है।

2) अन्दर में अपनी जाँच करनी है कि हमसे कोई विकर्म तो नहीं होता है! अशान्त होने तथा अशान्ति फैलाने की आदत तो नहीं है?

वरदान:-

''एक बाप दूसरा न कोई'' इस स्मृति से बंधनमुक्त, योगयुक्त भव

अब घर जाने का समय है इसलिए बंधनमुक्त और योगयुक्त बनो। बंधनमुक्त अर्थात् लूज़ ड्रेस, टाइट नहीं। आर्डर मिला और सेकण्ड में गया। ऐसे बंधनमुक्त, योगयुक्त स्थिति का वरदान प्राप्त करने के लिए सदा यह वायदा स्मृति में रहे कि"एक बाप दूसरा न कोई'' क्योंकि घर जाने के लिए वा सतयुगी राज्य में आने के लिए इस पुराने शरीर को छोड़ना पड़ेगा। तो चेक करो ऐसे एवररेडी बने हैं या अभी तक कुछ रस्सियां बंधी हुई है? यह पुराना चोला टाइट तो नहीं है?

स्लोगन:-

व्यर्थ संकल्प रूपी एकस्ट्रा भोजन नहीं करो तो मोटेपन की बीमारियों से बच जायेंगे।

16-09-2020

16-09-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - बाप आये हैं सबके दु:ख हर कर सुख देने, इसलिए तुम दु:ख हर्ता के बच्चे किसी को भी दु:ख मत दो''

प्रश्नः-

ऊंच पद पाने वाले बच्चों की मुख्य निशानी क्या होगी?

उत्तर:-

1- वे सदा श्रीमत पर चलते रहेंगे। 2- कभी हठ नहीं करेंगे। 3- अपने को आपेही राजतिलक देने के लिए पढ़ाई पढ़कर गैलप करेंगे। 4- अपने को कभी घाटा नहीं डालेंगे। 5- सर्व प्रति रहमदिल और कल्याणकारी बनेंगे। उन्हें सर्विस का बहुत शौक होगा। 6- कोई भी तुच्छ काम नहीं करेंगे। लड़ेंगे-झगड़ेंगे नहीं।

गीत:-

तूने रात गंवायी सो के........

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चे रूहानी बाप के सामने बैठे हैं। अब इस भाषा को तो तुम बच्चे ही समझते हो और कोई नया समझ न सके।"हे रूहानी बच्चे'' ऐसे कभी कोई कह न सके। कहने आयेगा ही नहीं। तुम जानते हो हम रूहानी बाप के सामने बैठे हैं। जिस बाप को यथार्थ रीति कोई भी जानते नहीं। भल अपने को भाई-भाई भी समझते हैं, हम सब आत्मायें हैं। बाप एक है परन्तु यथार्थ रीति नहीं जानते। जब तक सम्मुख आकर समझें नहीं तब तक समझें भी कैसे? तुम भी जब सम्मुख आते हो तब समझते हो। तुम हो ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ। तुम्हारा सरनेम ही है ब्रह्मा वंशी ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ। शिव की तो सब आत्मायें हैं। तुमको शिवकुमार व शिवकुमारी नहीं कहेंगे। यह अक्षर रांग हो जाता। कुमार हो तो कुमारी भी हो। शिव की सब आत्मायें हैं। कुमार-कुमारी तब कहा जाता जब मनुष्य के बच्चे बनते हैं। शिव के बच्चे तो निराकारी आत्मायें हैं ही। मूलवतन में सब आत्मायें ही रहती हैं, जिनको सालिग्राम कहा जाता है। यहाँ आते हैं तो फिर कुमार और कुमारियाँ बनते हैं जिस्मानी। वास्तव में तुम हो कुमार शिवबाबा के बच्चे। कुमारियाँ और कुमार तब बनते जब शरीर में आते हो। तुम बी.के. हो, इसलिए भाई-बहन कहलाते हो। अभी इस समय तुमको नॉलेज मिली है। तुम जानते हो बाबा हमको पावन बनाकर ले जायेंगे। आत्मा जितना बाप को याद करेगी तो पवित्र बन जायेगी। आत्मायें ब्रह्मा मुख से यह नॉलेज पढ़ती हैं। चित्रों में भी बाप की नॉलेज क्लीयर है। शिवबाबा ही हमको पढ़ाते हैं। न कृष्ण पढ़ा सकते, न कृष्ण द्वारा बाप पढ़ा सकते हैं। कृष्ण तो वैकुण्ठ का प्रिन्स है, यह भी तुम बच्चों को समझाना है। कृष्ण तो स्वर्ग में अपने माँ-बाप का बच्चा होगा। स्वर्गवासी बाप का बच्चा होगा, वो वैकुण्ठ का प्रिन्स है। उनको भी कोई जानते नहीं। कृष्ण जयन्ती पर अपने-अपने घरों में कृष्ण के लिए झूले बनाते हैं वा मन्दिरों में झूले बनाते हैं। मातायें जाकर गोलक में पैसे डालती हैं, पूजा करती हैं। आजकल क्राइस्ट को भी कृष्ण मिसल बनाते हैं। ताज आदि पहनाकर माँ की गोद में देते हैं। जैसे कृष्ण को दिखाते हैं। अब कृष्ण और क्राइस्ट राशि तो एक ही है। वो लोग कॉपी करते हैं। नहीं तो कृष्ण के जन्म और क्राइस्ट के जन्म में बहुत फ़र्क है। क्राइस्ट का जन्म कोई छोटे बच्चे के रूप में नहीं होता है। क्राइस्ट की आत्मा ने तो कोई में जाकर प्रवेश किया है। विष से पैदा हो न सके। आगे क्राइस्ट को कभी छोटा बच्चा नहीं दिखाते थे। क्रॉस पर दिखाते थे। यह अभी दिखाते हैं। बच्चे जानते हैं धर्म स्थापक को कोई ऐसे मार न सके, तो किसको मारा? जिसमें प्रवेश किया, उनको दु:ख मिला। सतोप्रधान आत्मा को दु:ख कैसे मिल सकता। उसने क्या कर्म किये जो इतने दु:ख भोगे। आत्मा ही सतोप्रधान अवस्था में आती है, सबका हिसाब-किताब चुक्तू होता है। इस समय बाप सबको पावन बनाते हैं। वहाँ से सतोप्रधान आत्मा आकर दु:ख भोग न सके। आत्मा ही भोगती है ना। आत्मा शरीर में है तो दु:ख होता है। मुझे दर्द है-यह किसने कहा? इस शरीर में कोई रहने वाला है। वह कहते हैं परमात्मा अन्दर है तो ऐसे थोड़ेही कहेंगे-हमको दु:ख है। सर्व में परमात्मा विराजमान है तो परमात्मा कैसे दु:ख भोगेगा। यह आत्मा पुकारती है। हे परमपिता परमात्मा हमारे दु:ख हरो, पारलौकिक बाप को ही आत्मा पुकारती है।

अभी तुम जानते हो बाप आया हुआ है, दु:ख हरने की युक्ति बता रहे हैं। आत्मा शरीर के साथ ही एवर-हेल्दी वेल्दी बनती है। मूलवतन में तो हेल्दी-वेल्दी नहीं कहेंगे। वहाँ कोई सृष्टि थोड़ेही है। वहाँ तो है ही शान्ति। शान्ति स्वधर्म में टिके हुए हैं। अभी बाप आये हैं, सबके दु:ख हरकर सुख देने। तो बच्चों को भी कहते हैं-तुम मेरे बने हो, किसको दु:ख नहीं देना। यह लड़ाई का मैदान है, परन्तु गुप्त। वह है प्रत्यक्ष। यह जो गायन है-युद्ध के मैदान में जो मरेंगे वह स्वर्ग में जायेंगे, उसका अर्थ भी समझाना पड़े। इस लड़ाई का महत्व देखो कितना है। बच्चे जानते हैं उस लड़ाई में मरने से कोई स्वर्ग में जा न सके। परन्तु गीता में भगवानुवाच है उनको मानेंगे तो सही ना। भगवान ने किसको कहा? उस लड़ाई वालों को कहा या तुमको कहा? दोनों को कहा। उन्हों को भी समझाया जाता है, अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। यह सर्विस भी करनी है। अब तुम स्वर्ग में अगर जाना चाहते हो तो पुरूषार्थ करो, लड़ाई में तो सब धर्म वाले हैं, सिक्ख भी हैं, वो तो सिक्ख धर्म में ही जायेंगे। स्वर्ग में तो तब आ सकेंगे जब तुम ब्राह्मणों से आकर ज्ञान लें। जैसे बाबा के पास आते थे तो बाबा समझाते थे-तुम लड़ाई करते शिवबाबा की याद में रहेंगे तो स्वर्ग में आ सकेंगे। बाकी ऐसे नहीं कि स्वर्ग में राजा बनेंगे। नहीं, जास्ती उन्हों को समझा भी नहीं सकते हो। उनको थोड़ा ही ज्ञान समझाया जाता है। लड़ाई में अपने इष्ट देवता को याद जरूर रखते हैं। सिक्ख होगा तो गुरु गोविन्द की जय कहेंगे। ऐसा कोई नहीं जो अपने को आत्मा समझ परमात्मा को याद करे। बाकी हाँ जो बाप का परिचय लेंगे तो स्वर्ग में आ जायेंगे। सबका बाप तो एक ही है - पतित-पावन। वह पतितों को कहते हैं मुझे याद करने से तुम्हारे पाप कट जायेंगे और मैं जो सुखधाम स्थापन करता हूँ उसमें तुम आ जायेंगे। लड़ाई में भी शिवबाबा को याद करेंगे तो स्वर्ग में आ जायेंगे। उस युद्ध के मैदान की बात और है, यहाँ और है। बाप कहते हैं ज्ञान का विनाश नहीं होता है। शिवबाबा के बच्चे तो सब हैं। अब शिवबाबा कहते हैं मामेकम् याद करने से तुम मेरे पास आ जायेंगे मुक्तिधाम। फिर जो ज्ञान सिखाया जाता है वह पढ़ेंगे तो स्वर्ग की राजाई मिल जायेगी। कितना सहज है, स्वर्ग में जाने का रास्ता सेकेण्ड में मिल जाता है। हम आत्मा बाप को याद करती हैं, लड़ाई के मैदान में तो खुशी से जाना है। कर्म तो करना ही है। देश के बचाव के लिए सब कुछ करना पड़ता है। वहाँ तो है ही एक धर्म। मतभेद की कोई बात नहीं। यहाँ कितना मतभेद है। पानी पर, जमीन पर झगड़ा। पानी बन्द कर देते हैं, तो पत्थर मारने लग पड़ते हैं। एक-दो को अनाज नहीं देते तो झगड़ा हो जाता है।

तुम बच्चे जानते हो हम अपना स्वराज्य स्थापन कर रहे हैं। पढ़ाई से राज्य पाते हैं। नई दुनिया जरूर स्थापन होनी है, नूँध है तो कितनी खुशी होनी चाहिए। कोई भी चीज़ में लड़ने-झगड़ने की कोई बात नहीं। रहना भी बहुत साधारण है। बाबा ने समझाया है तुम ससुरघर जाते हो इसलिए अब वनवाह में हो। सभी आत्मायें जायेंगी, शरीर थोड़ेही जायेंगे। शरीर का अभिमान भी छोड़ देना है। हम आत्मा हैं, 84 जन्म अब पूरे हुए हैं। जो भी भारतवासी हों-बोलो भारत स्वर्ग था, अब तो कलियुग है। कलियुग में अनेक धर्म हैं। सतयुग में एक ही धर्म था। भारत फिर से स्वर्ग बनना है। समझते भी हैं भगवान आया हुआ है। आगे चल भविष्य वाणी भी करते रहेंगे। वायुमण्डल देखेंगे ना। तो बाप बच्चों को समझाते हैं। बाप तो सभी का है ना। सबका हक है। बाप कहते हैं मैं आया हूँ और सबको कहता हूँ-मामेकम् याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। अभी तो मनुष्य समझते हैं-कभी भी लड़ाई हो सकती है। यह तो कल भी हो सकती है। लड़ाई जोर भरने में देरी थोड़ेही लगती है। परन्तु तुम बच्चे समझते हो अभी हमारी राजधानी स्थापन हुई नहीं है तो विनाश कैसे हो सकता है। अजुन बाप का पैगाम ही चारों तरफ कहाँ दिया है। पतित-पावन बाप कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। यह पैगाम सबके कानों पर जाना चाहिए। भल लड़ाई लगे, बॉम्बस भी लग जाएं परन्तु तुमको निश्चय है कि हमारी राजधानी जरूर स्थापन होनी है, तब तक विनाश हो नहीं सकता। विश्व में शान्ति कहते हैं ना। विश्व में वार होगी तो विश्व को खत्म कर देंगे।

यह है विश्व विद्यालय, सारे विश्व को तुम नॉलेज देते हो। एक ही बाप आकर सारे विश्व को पलटाते (परिवर्तन करते) हैं। वो लोग तो कल्प की आयु ही लाखों वर्ष कह देते हैं। तुम जानते हो इनकी आयु पूरे 5000 वर्ष है। कहते हैं क्राइस्ट से 3 हज़ार वर्ष पहले हेविन था। इस्लामी, बौद्धी आदि सबका हिसाब-किताब निकालते हैं। उनसे पहले दूसरे कोई का नाम है नहीं। तुम अंगे अक्षरे बता सकते हो। तो तुमको कितना नशा रहना चाहिए। झगड़े आदि की बात ही नहीं। झगड़ते वह हैं जो निधनके होते हैं। तुम अभी जो पुरूषार्थ करेंगे 21 जन्म के लिए प्रालब्ध बन जायेगी। लड़ेंगे-झगड़ेंगे तो ऊंच पद भी नहीं मिलेगा। सज़ायें भी खानी पड़ेगी। कोई भी बात है, कुछ भी चाहिए तो बाप के पास आओ, गवर्मेन्ट भी कहती है ना तुम फैंसला अपने हाथ में नहीं उठाओ। कोई कहते हैं हमको विलायत का बूट चाहिए। बाबा कहेंगे बच्चे अभी तो वनवाह में हो। वहाँ तुमको बहुत माल मिलेंगे। बाप तो राइट ही समझायेंगे ना कि यह बात ठीक नहीं है। यहाँ तुम यह आश क्यों रखते हो। यहाँ तो बहुत सिम्पुल रहना चाहिए। नहीं तो देह-अभिमान आ जाता है, इसमें अपनी नहीं चलानी होती है, बाबा जो कहे, बीमारी आदि है डॉक्टर आदि को भी बुलाते हैं, दवाई आदि से सम्भाल तो सबकी होती है। फिर भी हर बात में बाप बैठा है। श्रीमत तो श्रीमत है ना। निश्चय में विजय है। वो तो सब कुछ समझते हैं ना। बाप की राय पर चलने में ही कल्याण है। अपना भी कल्याण करना है। कोई को वर्थ पाउण्ड बना नहीं सकते हैं तो वर्थ नाट ए पेनी ठहरे ना। पाउण्ड बनने लायक नहीं। यहाँ वैल्यु नहीं तो वहाँ भी वैल्यु नहीं रहेगी। सर्विसएबुल बच्चों को सर्विस का कितना शौक रहता है। चक्र लगाते रहते हैं। सर्विस नहीं करते तो उनको रहमदिल, कल्याणकारी कुछ भी नहीं कहेंगे। बाबा को याद नहीं करते तो तुच्छ काम करते रहेंगे। पद भी तुच्छ पायेंगे। ऐसे नहीं, हमारा तो शिवबाबा से योग है। यह तो है ही बी.के.। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा ही ज्ञान दे सकते हैं। सिर्फ शिवबाबा को याद करेंगे तो मुरली कैसे सुनेंगे फिर नतीजा क्या होगा? पढ़ेंगे नहीं तो पद क्या पायेंगे। यह भी जानते हैं सबकी तकदीर ऊंच नहीं बनती है। वहाँ भी तो नम्बरवार पद होंगे। पवित्र तो सबको होना है। आत्मा पवित्र बनने बिगर शान्तिधाम जा नहीं सकती।

बाप समझाते हैं तुम सबको यह ज्ञान सुनाते चलो, कोई भल अभी नहीं भी सुनते हैं, आगे चलकर जरूर सुनेंगे। अभी कितने भी विघ्न, तूफान ज़ोर से आयें-तुम्हें डरना नहीं है क्योंकि नये धर्म की स्थापना होती है ना। तुम गुप्त राजधानी स्थापन कर रहे हो। बाबा सर्विसएबुल बच्चों को देखकर खुश होते हैं। तुम्हें अपने को आपेही राजतिलक देना है, श्रीमत पर चलना है। इसमें अपना हठ चल न सके। मुफ्त अपने को घाटे में नहीं डालना चाहिए। बाप कहते हैं-बच्चे, सर्विसएबुल और कल्याणकारी बनो। स्टूडेन्ट को टीचर कहेंगे ना, पढ़कर गैलप करो। तुमको 21 जन्मों के लिए स्वर्ग की स्कालरशिप मिलती है। डिनायस्टी में जाना यही बड़ी स्कालरशिप है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) संगम पर बहुत सिम्पुल साधारण रहना है क्योंकि यह वनवाह में रहने का समय है। यहाँ कोई भी आश नहीं रखनी है। कभी अपने हाथ में लॉ नहीं लेना है। लड़ना-झगड़ना नहीं है।

2) विनाश के पहले नई राजधानी स्थापन करने के लिए सबको बाप का पैगाम देना है कि बाप कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश हों और तुम पावन बनो।

वरदान:-

बाप द्वारा सफलता का तिलक प्राप्त करने वाले सदा आज्ञाकारी, दिलतख्तनशीन भव

भाग्य विधाता बाप रोज़ अमृतवेले अपने आज्ञाकारी बच्चों को सफलता का तिलक लगाते हैं। आज्ञाकारी ब्राह्मण बच्चे कभी मेहनत वा मुश्किल शब्द मुख से तो क्या संकल्प में भी नहीं ला सकते हैं। वह सहजयोगी बन जाते हैं इसलिए कभी भी दिलशिकस्त नहीं बनो लेकिन सदा दिलतख्तनशीन बनो, रहमदिल बनो। अहम भाव और वहम भाव को समाप्त करो।

स्लोगन:-

विश्व परिवर्तन की डेट नहीं सोचो, स्वयं के परिवर्तन की घड़ी निश्चित करो।

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