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27-12-2018

27-12-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - मैं तुम्हें फिर से राजयोग सिखलाकर राजाओं का राजा बनाता हूँ, इस 'फिर से' शब्द में ही सारा चक्र समाया हुआ है''

प्रश्नः-

बाप भी प्रबल है तो माया भी? दोनों की प्रबलता क्या है?

उत्तर:-

बाप तुम्हें पतित से पावन बनाते, पावन बनाने में बाप प्रबल है इसलिए बाप को पतित-पावन सर्वशक्तिमान कहा जाता है। माया फिर पतित बनाने में प्रबल है। सच्ची कमाई में गृहचारी ऐसी बैठती है जो फायदे के बदले घाटा हो जाता है, विकारों के पीछे माया तवाई बना देती है इसलिए बाबा कहते - बच्चे, देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करो।

गीत:-

हमें उन राहों पर चलना है........  

ओम् शान्ति।

तुम बच्चों को किन राहों पर चलना है? जरूर राह बताने वाला होगा। मनुष्य रांग रास्ते पर चलते हैं तब तो दु:खी होते हैं। अभी कितने दु:खी हैं क्योंकि उनकी मत पर नहीं चलते। सब उल्टी मत पर चलते आये हैं, जब से उल्टी मत देने वाले रावण का राज्य शुरू हुआ है। बाप समझाते हैं तुम इस समय रावण की मत पर हो, तब हरेक का ऐसा बुरा हाल हुआ है। सब अपने को पतित कहते भी हैं। गांधी बापू जी भी कहते थे - पतित-पावन आओ, गोया हम पतित हैं। परन्तु कोई भी समझते नहीं कि हम पतित कैसे बने हैं? चाहते हैं भारत में राम राज्य हो परन्तु कौन बनायेगा? गीता में बाप ने सब बातें समझाई हैं, परन्तु गीता के भगवान् का ही नाम उल्टा लगा दिया है। बाप समझाते हैं तुमने क्या कर दिया है। क्राइस्ट के बाइबिल में पोप का नाम डाल दें तो कितना नुकसान हो जाए। यह भी ड्रामा है। बाप बड़े से बड़ी भूल समझाते हैं। यह आदि, मध्य, अन्त का ज्ञान गीता में है। बाप समझाते हैं मैं तुमको फिर से राजाओं का राजा बनाता हूँ। तुमने 84 जन्म कैसे लिये - यह तुम नहीं जानते हो, हम बताते हैं। यह कोई भी शास्त्र में नहीं है। शास्त्र तो अनेक हैं। भिन्न-भिन्न मतें हैं। गीता माना गीता। जिसने गीता गाई है उसने ही राय दी है। कहते हैं मैं तुमको राजयोग सिखाने फिर से आया हूँ। तुम पर माया का परछाया पड़ गया है। अभी फिर से मैं आया हूँ। गीता में भी कहते हैं हे भगवान् फिर से गीता सुनाने आओ अर्थात् फिर से गीता की नॉलेज दो। गीता में ही यह बात है कि आसुरी सृष्टि का विनाश और दैवी सृष्टि की स्थापना फिर से होती है। फिर जरूर कहेंगे। गुरूनानक फिर से आयेगा अपने समय पर, चित्र भी दिखाते हैं। कृष्ण भी फिर से वही मोर मुकुट वाला होगा। तो यह सब राज़ गीता में हैं। परन्तु भगवान् को बदल दिया है। हम ऐसे नहीं कहते कि गीता को नहीं मानते परन्तु उसमें जो यह उल्टा नाम मनुष्यों ने डाल दिया है, उसको बाप आ करके सीधा करके समझाते हैं। यह भी समझाते हैं हर एक आत्मा में अपना-अपना पार्ट नूंधा हुआ है। सब एक समान नहीं हो सकते। जैसे मनुष्य माना मनुष्य, वैसे आत्मा माना आत्मा। परन्तु हर एक आत्मा में अपना पार्ट भरा हुआ है। यह बातें समझाने वाला बड़ा बुद्धिवान चाहिए। बाप जानते हैं कौन समझा सकते हैं, कौन सर्विस करने में समझदार हैं, किसकी लाइन क्लीयर है। देही-अभिमानी रहते हैं। सब तो परिपूर्ण, देही-अभिमानी नहीं बने हैं। यह तो अन्त में रिजल्ट होगी। इम्तहान के दिन जब नज़दीक होते हैं तो मालूम पड़ जाता है कौन-कौन पास होंगे। टीचर्स भी समझ सकते हैं और बच्चे भी समझते हैं कि यह सबसे तीखा है। वहाँ तो ठगी आदि भी हो सकती है। यहाँ तो यह बात हो न सके। यह तो ड्रामा में नूंध है। कल्प पहले वाले ही निकलेंगे। हमें पता चलता है सर्विस की रफ्तार से। इस सच्ची कमाई में घाटा और लाभ, गृहचारी आदि आती है। चलते-चलते टांग टूट पड़ती है। गन्धर्वी विवाह करने बाद फिर माया एकदम तवाई बना देती है। माया भी बड़ी प्रबल है। बाबा प्रबल है पावन बनाने में, इसलिए उनको सर्वशक्तिमान पतित-पावन कहा जाता है और फिर माया प्रबल है पतित बनाने में। सतयुग में तो माया होती नहीं। वह है ही वाइसलेस वर्ल्ड, अभी है एकदम विशश वर्ल्ड। कितनी जबरदस्त प्रबलता है। चलते-चलते माया एकदम नाक से पकड़ तवाई बना देती है, फारकती दिला देती है, इतनी प्रबल है। भल सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा को कहते हैं परन्तु माया भी कम नहीं है। आधाकल्प उनका राज्य चलता है। यह कोई थोड़ेही जानते हैं। दिन और रात आधा-आधा होता है, ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात। फिर भी सतयुग को लाखों वर्ष, कलियुग को कितने वर्ष दे देते हैं। अभी बाप समझाते हैं तो समझ में आता है। यह तो बिल्कुल राइट है। बाप बैठ पढ़ाते हैं। कलियुग में मनुष्य थोड़ेही गीता का राजयोग सिखाए राजाओं का राजा बनायेंगे। ऐसे तो कोई है नहीं, जिसकी बुद्धि में हो कि हम राजयोग सीख राजाओं का राजा बनेंगे। वो गीता पाठशालायें तो अनेक हैं परन्तु कोई राजयोग सीख राजाओं का राजा वा रानी बन नहीं सकते। कोई भी एम ऑबजेक्ट राजाई पाने का नहीं है। यहाँ तो कहते हो हम बेहद के बाप से भविष्य सुख की राजाई पाने के लिए पढ़ते हैं। पहले-पहले तो अल्फ पर समझाना है। गीता पर ही सारा मदार है। मनुष्यों को कैसे पता पड़े सृष्टि चक्र कैसे फिरता है, हम कहाँ से आये हैं, फिर कहाँ जाना है। कोई को पता नहीं है। कौन देश से आया, कौन देश है जाना। गीत भी है ना, सिर्फ तोते मुआफ़िक गाते रहते हैं। बुद्धि जो आत्मा में है वह नहीं जानती कि हम जिसको हे परमपिता परमात्मा कहते हैं वह कौन है। उनको न देख सकते हैं, न जान सकते हैं। आत्मा का तो फ़र्ज है ना - बाप को जानना, देखना। अभी तुम समझ गये हो, हम आत्मा हैं परमपिता परमात्मा बाप हमको पढ़ाते हैं। बुद्धि कहती है बाप आकर पढ़ाते हैं। जैसे किसकी आत्मा को बुलाते हैं तो समझते हैं ना उनकी आत्मा आई है। तो तुम समझते हो हम आत्मा हैं, हमारा वह बाप है। बाप से जरूर वर्सा मिलना चाहिए। हम दु:खी क्यों हुए हैं, मनुष्य तो कह देते बाप ही सुख दु:ख देने वाला है। भगवान् को गाली देते रहते हैं। वह हैं आसुरी सन्तान। जैसे कल्प पहले कहा है वैसे कहते हैं। तुम अभी प्रैक्टिकल में ईश्वरीय सन्तान बने हो। आगे तुम आसुरी औलाद थे। अब बाप कहते हैं निरन्तर मुझे याद करो। किसको भी यह दो अक्षर समझाना बहुत सहज है। तुम भगवान् के बच्चे हो। भगवान् ने स्वर्ग रचा, अब नर्क बना है फिर स्वर्ग बाप ही रचेंगे। बाप हमको राजयोग सिखला रहे हैं, स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। अच्छा, शिव को नहीं जानते हो। प्रजापिता ब्रह्मा को भी रचने वाला वह बाप है। तो जरूर बाप ब्रह्मा द्वारा ही सिखायेंगे। अभी शूद्र वर्ण है। हम ब्राह्मण से देवता क्षत्रिय बनेंगे। नहीं तो विराट रूप क्यों बनाया है, चित्र ठीक है। परन्तु समझ नहीं सकते।

शूद्रों को ब्राह्मण कौन बनायेंगे? जरूर प्रजापिता ब्रह्मा चाहिए। उनको कैसे एडाप्ट किया। जैसे तुम कहते हो यह मेरी स्त्री, उनको 'मेरी' कैसे बनाया? एडाप्ट किया। बाप कहते हैं मुझे भी मात-पिता कहते हो, मैं बाप तो हूँ। मेरी कहाँ से लाऊं। तो इनमें प्रवेश कर इनका नाम ब्रह्मा रखता हूँ। स्त्री एडाप्ट की जाती है, जैसे लौकिक बाप स्त्री को एडाप्ट कर कुख वंशावली रचते हैं, बाबा ने फिर इनमें प्रवेश कर इनको एडाप्ट कर इनके मुख द्वारा मुखवंशावली बनाई है। तुम कहते हो हम ब्राह्मण-ब्राह्मणियां हैं। जरूर इनका ही नाम ब्रह्मा है। ब्रह्मा किसका बच्चा? शिवबाबा का। इनको किसने एडाप्ट किया? बेहद के बाप ने। दृष्टान्त बड़ा अच्छा है परन्तु जिसकी बुद्धि में बैठा होगा वह समझा सकेंगे। बुद्धि में नहीं होगा तो उनको समझाने आयेगा ही नहीं। लौकिक और पारलौकिक बाप तो है ना। वह भी स्त्री को एडाप्ट कर मेरी कहते हैं। यह फिर इनमें प्रवेश कर एडाप्ट करते हैं। खुद कहते हैं मुझ निराकार को इनका आधार लेना पड़ता है, तो नाम भी बदली करता हूँ। एक ही टाइम कितनों के नाम रखे। नाम की लिस्ट भी तुम्हारे पास होनी चाहिए। प्रदर्शनी में नाम की लिस्ट भी दिखानी चाहिए। बाबा ने कैसे एक ही समय नाम रखे। बाबा ने हमको अपना बनाया तो नाम बदलाया, उनको भृगु ऋषि कहते हैं। जन्म पत्री तो भगवान् के पास ही है। वन्डरफुल नाम हैं। अब सभी तो हैं नहीं। कोई तो आश्चर्यवत् भागन्ती हो गये। आज हैं, कल हैं नहीं। नम्बरवन दुश्मन है काम। यह काम विकार बहुत तंग करता है। उस पर जीत पानी है। गृहस्थ व्यवहार में इकट्ठे रहकर उन पर जीत पानी है - यह है प्रतिज्ञा। अपनी वृत्ति देखनी है, कर्मेन्द्रियों से विकर्म नहीं करना है। तूफान तो सबको आते हैं। इसमें डरना नहीं है।

बाबा से बहुत बच्चे पूछते हैं यह धंधा करें वा नहीं करें? बाबा लिखते हैं मैं कोई तुम्हारे धन्धे आदि को देखने आया हूँ क्या? मैं तो टीचर हूँ, पढ़ाने के लिए। धन्धे की बात हमसे क्यों पूछते हो? मैं तो राजयोग सिखाता हूँ। रुद्र यज्ञ भी गाया हुआ है, कृष्ण यज्ञ नहीं। बाप कहते हैं लक्ष्मी-नारायण में यह सृष्टि चक्र का ज्ञान ही नहीं। अगर यह मालूम हो कि 16 कला से फिर 14 कला बनना है तो उसी समय ही राजाई का नशा उड़ जाए। वहाँ तो है ही सद्गति। सद्गति दाता तो एक है। वही आकर युक्ति बताते हैं, दूसरा कोई बतला न सके। पहले-पहले यह बात उठाओ कि किसने कहा है - काम महाशत्रु है? यह भी गाते हैं विशश वर्ल्ड और वाइसलेस वर्ल्ड। भारत में ही रावण को जलाते रहते हैं। सतयुग में थोड़ेही जलायेंगे। अगर यह कहते हैं कि अनादि है, सतयुग में भी था फिर तो सब जगह दु:ख ही दु:ख होगा। फिर स्वर्ग कैसे कहेंगे? यह बातें समझानी है। हरेक की रफ्तार अपनी है। पता लग जाता है - कौन अच्छी रफ्तार वाला है? सम्पूर्ण तो कोई बने नहीं हैं। बाकी हाँ, सतो, रजो, तमो तो होते ही हैं। बुद्धि हर एक की अलग-अलग है। जो श्रीमत पर नहीं चलते हैं - वह हैं तमोप्रधान बुद्धि। अपने को इन्श्योर नहीं करेंगे तो भविष्य 21 जन्मों के लिए कैसे मिलेगा। मरना तो है ही। तो क्यों न इन्श्योर कर देना चाहिए। सब कुछ उनका है। तो परवरिश भी वह करेंगे। भल कोई सब कुछ देते हैं, परन्तु सर्विस नहीं करते, जो दिया वह खाते रहते हैं। तो बाकी जमा क्या होगा। कुछ भी नहीं। सर्विस का सबूत चाहिए। देखा जाता है - कौन पण्डे बन आते हैं? नये बी.के. भी आपस में सेन्टर चलाते हैं, उनको भी आफरीन दी जाती है। यह नॉलेज तो बड़ी सहज है। वानप्रस्थ अवस्था वालों को जाकर समझाओ - वानप्रस्थ अवस्था कब होती है? बाप ही गाइड बन सबको ले जायेंगे। तुम जानते हो बाप ही कालों का काल है। हम तो खुशी से बाबा के साथ इकट्ठे जाना चाहते हैं।

पहले-पहले तो मुख्य बात यह उठाओ - गीता का भगवान् कौन है, जिसने रचना रची? लक्ष्मी-नारायण को राजयोग किसने सिखाया? उनकी भी राजधानी स्थापन हो रही है। और कोई राजधानी स्थापन करने आते नहीं। बाप ही राजधानी स्थापन करने आते हैं। सब पतितों को पावन बनाते हैं। यह है विशश वर्ल्ड, वह है वाइसलेस वर्ल्ड। दोनों में नम्बरवार मर्तबे हैं। जो श्रीमत पर चलने वाले होंगे, उनकी बुद्धि में ही यह बातें बैठ सकती हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बुद्धि की लाइन सदा क्लीयर रहे इसके लिए देही-अभिमानी रहना है। सच्ची कमाई में माया किसी प्रकार से घाटा न डाल दे - यह सम्भाल करनी है।

2) कर्मेन्द्रियों से कोई भी विकर्म नहीं करना है। इन्श्योर करने के बाद सर्विस भी जरूर करनी है।

वरदान:-

योग की धूप में आंसुओं की टंकी को सुखाकर रोना प्रूफ बनने वाले सुख स्वरूप भव

कई बच्चे कहते हैं कि फलाना दु:ख देता है इसलिए रोना आता है। लेकिन वह देते हैं आप लेते क्यों हो? उनका काम है देना, आप लो ही नहीं। परमात्मा के बच्चे कभी रो नहीं सकते। रोना बन्द। न आंखों का रोना, न मन का रोना। जहाँ खुशी होगी वहाँ रोना नहीं होगा। खुशी वा प्यार के आंसू को रोना नहीं कहा जाता। तो योग की धूप में आंसुओं की टंकी को सुखा दो, विघ्नों को खेल समझो तो सुख स्वरूप बन जायेंगे।

स्लोगन:-

साक्षी रहकर पार्ट बजाने का अभ्यास हो तो टेन्शन से परे स्वत: अटेन्शन में रहेंगे।

27-12-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - मैं तुम्हें फिर से राजयोग सिखलाकर राजाओं का राजा बनाता हूँ, इस 'फिर से' शब्द में ही सारा चक्र समाया हुआ है''

प्रश्नः-

बाप भी प्रबल है तो माया भी? दोनों की प्रबलता क्या है?

उत्तर:-

बाप तुम्हें पतित से पावन बनाते, पावन बनाने में बाप प्रबल है इसलिए बाप को पतित-पावन सर्वशक्तिमान कहा जाता है। माया फिर पतित बनाने में प्रबल है। सच्ची कमाई में गृहचारी ऐसी बैठती है जो फायदे के बदले घाटा हो जाता है, विकारों के पीछे माया तवाई बना देती है इसलिए बाबा कहते - बच्चे, देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करो।

गीत:-

हमें उन राहों पर चलना है........  

ओम् शान्ति।

तुम बच्चों को किन राहों पर चलना है? जरूर राह बताने वाला होगा। मनुष्य रांग रास्ते पर चलते हैं तब तो दु:खी होते हैं। अभी कितने दु:खी हैं क्योंकि उनकी मत पर नहीं चलते। सब उल्टी मत पर चलते आये हैं, जब से उल्टी मत देने वाले रावण का राज्य शुरू हुआ है। बाप समझाते हैं तुम इस समय रावण की मत पर हो, तब हरेक का ऐसा बुरा हाल हुआ है। सब अपने को पतित कहते भी हैं। गांधी बापू जी भी कहते थे - पतित-पावन आओ, गोया हम पतित हैं। परन्तु कोई भी समझते नहीं कि हम पतित कैसे बने हैं? चाहते हैं भारत में राम राज्य हो परन्तु कौन बनायेगा? गीता में बाप ने सब बातें समझाई हैं, परन्तु गीता के भगवान् का ही नाम उल्टा लगा दिया है। बाप समझाते हैं तुमने क्या कर दिया है। क्राइस्ट के बाइबिल में पोप का नाम डाल दें तो कितना नुकसान हो जाए। यह भी ड्रामा है। बाप बड़े से बड़ी भूल समझाते हैं। यह आदि, मध्य, अन्त का ज्ञान गीता में है। बाप समझाते हैं मैं तुमको फिर से राजाओं का राजा बनाता हूँ। तुमने 84 जन्म कैसे लिये - यह तुम नहीं जानते हो, हम बताते हैं। यह कोई भी शास्त्र में नहीं है। शास्त्र तो अनेक हैं। भिन्न-भिन्न मतें हैं। गीता माना गीता। जिसने गीता गाई है उसने ही राय दी है। कहते हैं मैं तुमको राजयोग सिखाने फिर से आया हूँ। तुम पर माया का परछाया पड़ गया है। अभी फिर से मैं आया हूँ। गीता में भी कहते हैं हे भगवान् फिर से गीता सुनाने आओ अर्थात् फिर से गीता की नॉलेज दो। गीता में ही यह बात है कि आसुरी सृष्टि का विनाश और दैवी सृष्टि की स्थापना फिर से होती है। फिर जरूर कहेंगे। गुरूनानक फिर से आयेगा अपने समय पर, चित्र भी दिखाते हैं। कृष्ण भी फिर से वही मोर मुकुट वाला होगा। तो यह सब राज़ गीता में हैं। परन्तु भगवान् को बदल दिया है। हम ऐसे नहीं कहते कि गीता को नहीं मानते परन्तु उसमें जो यह उल्टा नाम मनुष्यों ने डाल दिया है, उसको बाप आ करके सीधा करके समझाते हैं। यह भी समझाते हैं हर एक आत्मा में अपना-अपना पार्ट नूंधा हुआ है। सब एक समान नहीं हो सकते। जैसे मनुष्य माना मनुष्य, वैसे आत्मा माना आत्मा। परन्तु हर एक आत्मा में अपना पार्ट भरा हुआ है। यह बातें समझाने वाला बड़ा बुद्धिवान चाहिए। बाप जानते हैं कौन समझा सकते हैं, कौन सर्विस करने में समझदार हैं, किसकी लाइन क्लीयर है। देही-अभिमानी रहते हैं। सब तो परिपूर्ण, देही-अभिमानी नहीं बने हैं। यह तो अन्त में रिजल्ट होगी। इम्तहान के दिन जब नज़दीक होते हैं तो मालूम पड़ जाता है कौन-कौन पास होंगे। टीचर्स भी समझ सकते हैं और बच्चे भी समझते हैं कि यह सबसे तीखा है। वहाँ तो ठगी आदि भी हो सकती है। यहाँ तो यह बात हो न सके। यह तो ड्रामा में नूंध है। कल्प पहले वाले ही निकलेंगे। हमें पता चलता है सर्विस की रफ्तार से। इस सच्ची कमाई में घाटा और लाभ, गृहचारी आदि आती है। चलते-चलते टांग टूट पड़ती है। गन्धर्वी विवाह करने बाद फिर माया एकदम तवाई बना देती है। माया भी बड़ी प्रबल है। बाबा प्रबल है पावन बनाने में, इसलिए उनको सर्वशक्तिमान पतित-पावन कहा जाता है और फिर माया प्रबल है पतित बनाने में। सतयुग में तो माया होती नहीं। वह है ही वाइसलेस वर्ल्ड, अभी है एकदम विशश वर्ल्ड। कितनी जबरदस्त प्रबलता है। चलते-चलते माया एकदम नाक से पकड़ तवाई बना देती है, फारकती दिला देती है, इतनी प्रबल है। भल सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा को कहते हैं परन्तु माया भी कम नहीं है। आधाकल्प उनका राज्य चलता है। यह कोई थोड़ेही जानते हैं। दिन और रात आधा-आधा होता है, ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात। फिर भी सतयुग को लाखों वर्ष, कलियुग को कितने वर्ष दे देते हैं। अभी बाप समझाते हैं तो समझ में आता है। यह तो बिल्कुल राइट है। बाप बैठ पढ़ाते हैं। कलियुग में मनुष्य थोड़ेही गीता का राजयोग सिखाए राजाओं का राजा बनायेंगे। ऐसे तो कोई है नहीं, जिसकी बुद्धि में हो कि हम राजयोग सीख राजाओं का राजा बनेंगे। वो गीता पाठशालायें तो अनेक हैं परन्तु कोई राजयोग सीख राजाओं का राजा वा रानी बन नहीं सकते। कोई भी एम ऑबजेक्ट राजाई पाने का नहीं है। यहाँ तो कहते हो हम बेहद के बाप से भविष्य सुख की राजाई पाने के लिए पढ़ते हैं। पहले-पहले तो अल्फ पर समझाना है। गीता पर ही सारा मदार है। मनुष्यों को कैसे पता पड़े सृष्टि चक्र कैसे फिरता है, हम कहाँ से आये हैं, फिर कहाँ जाना है। कोई को पता नहीं है। कौन देश से आया, कौन देश है जाना। गीत भी है ना, सिर्फ तोते मुआफ़िक गाते रहते हैं। बुद्धि जो आत्मा में है वह नहीं जानती कि हम जिसको हे परमपिता परमात्मा कहते हैं वह कौन है। उनको न देख सकते हैं, न जान सकते हैं। आत्मा का तो फ़र्ज है ना - बाप को जानना, देखना। अभी तुम समझ गये हो, हम आत्मा हैं परमपिता परमात्मा बाप हमको पढ़ाते हैं। बुद्धि कहती है बाप आकर पढ़ाते हैं। जैसे किसकी आत्मा को बुलाते हैं तो समझते हैं ना उनकी आत्मा आई है। तो तुम समझते हो हम आत्मा हैं, हमारा वह बाप है। बाप से जरूर वर्सा मिलना चाहिए। हम दु:खी क्यों हुए हैं, मनुष्य तो कह देते बाप ही सुख दु:ख देने वाला है। भगवान् को गाली देते रहते हैं। वह हैं आसुरी सन्तान। जैसे कल्प पहले कहा है वैसे कहते हैं। तुम अभी प्रैक्टिकल में ईश्वरीय सन्तान बने हो। आगे तुम आसुरी औलाद थे। अब बाप कहते हैं निरन्तर मुझे याद करो। किसको भी यह दो अक्षर समझाना बहुत सहज है। तुम भगवान् के बच्चे हो। भगवान् ने स्वर्ग रचा, अब नर्क बना है फिर स्वर्ग बाप ही रचेंगे। बाप हमको राजयोग सिखला रहे हैं, स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। अच्छा, शिव को नहीं जानते हो। प्रजापिता ब्रह्मा को भी रचने वाला वह बाप है। तो जरूर बाप ब्रह्मा द्वारा ही सिखायेंगे। अभी शूद्र वर्ण है। हम ब्राह्मण से देवता क्षत्रिय बनेंगे। नहीं तो विराट रूप क्यों बनाया है, चित्र ठीक है। परन्तु समझ नहीं सकते।

शूद्रों को ब्राह्मण कौन बनायेंगे? जरूर प्रजापिता ब्रह्मा चाहिए। उनको कैसे एडाप्ट किया। जैसे तुम कहते हो यह मेरी स्त्री, उनको 'मेरी' कैसे बनाया? एडाप्ट किया। बाप कहते हैं मुझे भी मात-पिता कहते हो, मैं बाप तो हूँ। मेरी कहाँ से लाऊं। तो इनमें प्रवेश कर इनका नाम ब्रह्मा रखता हूँ। स्त्री एडाप्ट की जाती है, जैसे लौकिक बाप स्त्री को एडाप्ट कर कुख वंशावली रचते हैं, बाबा ने फिर इनमें प्रवेश कर इनको एडाप्ट कर इनके मुख द्वारा मुखवंशावली बनाई है। तुम कहते हो हम ब्राह्मण-ब्राह्मणियां हैं। जरूर इनका ही नाम ब्रह्मा है। ब्रह्मा किसका बच्चा? शिवबाबा का। इनको किसने एडाप्ट किया? बेहद के बाप ने। दृष्टान्त बड़ा अच्छा है परन्तु जिसकी बुद्धि में बैठा होगा वह समझा सकेंगे। बुद्धि में नहीं होगा तो उनको समझाने आयेगा ही नहीं। लौकिक और पारलौकिक बाप तो है ना। वह भी स्त्री को एडाप्ट कर मेरी कहते हैं। यह फिर इनमें प्रवेश कर एडाप्ट करते हैं। खुद कहते हैं मुझ निराकार को इनका आधार लेना पड़ता है, तो नाम भी बदली करता हूँ। एक ही टाइम कितनों के नाम रखे। नाम की लिस्ट भी तुम्हारे पास होनी चाहिए। प्रदर्शनी में नाम की लिस्ट भी दिखानी चाहिए। बाबा ने कैसे एक ही समय नाम रखे। बाबा ने हमको अपना बनाया तो नाम बदलाया, उनको भृगु ऋषि कहते हैं। जन्म पत्री तो भगवान् के पास ही है। वन्डरफुल नाम हैं। अब सभी तो हैं नहीं। कोई तो आश्चर्यवत् भागन्ती हो गये। आज हैं, कल हैं नहीं। नम्बरवन दुश्मन है काम। यह काम विकार बहुत तंग करता है। उस पर जीत पानी है। गृहस्थ व्यवहार में इकट्ठे रहकर उन पर जीत पानी है - यह है प्रतिज्ञा। अपनी वृत्ति देखनी है, कर्मेन्द्रियों से विकर्म नहीं करना है। तूफान तो सबको आते हैं। इसमें डरना नहीं है।

बाबा से बहुत बच्चे पूछते हैं यह धंधा करें वा नहीं करें? बाबा लिखते हैं मैं कोई तुम्हारे धन्धे आदि को देखने आया हूँ क्या? मैं तो टीचर हूँ, पढ़ाने के लिए। धन्धे की बात हमसे क्यों पूछते हो? मैं तो राजयोग सिखाता हूँ। रुद्र यज्ञ भी गाया हुआ है, कृष्ण यज्ञ नहीं। बाप कहते हैं लक्ष्मी-नारायण में यह सृष्टि चक्र का ज्ञान ही नहीं। अगर यह मालूम हो कि 16 कला से फिर 14 कला बनना है तो उसी समय ही राजाई का नशा उड़ जाए। वहाँ तो है ही सद्गति। सद्गति दाता तो एक है। वही आकर युक्ति बताते हैं, दूसरा कोई बतला न सके। पहले-पहले यह बात उठाओ कि किसने कहा है - काम महाशत्रु है? यह भी गाते हैं विशश वर्ल्ड और वाइसलेस वर्ल्ड। भारत में ही रावण को जलाते रहते हैं। सतयुग में थोड़ेही जलायेंगे। अगर यह कहते हैं कि अनादि है, सतयुग में भी था फिर तो सब जगह दु:ख ही दु:ख होगा। फिर स्वर्ग कैसे कहेंगे? यह बातें समझानी है। हरेक की रफ्तार अपनी है। पता लग जाता है - कौन अच्छी रफ्तार वाला है? सम्पूर्ण तो कोई बने नहीं हैं। बाकी हाँ, सतो, रजो, तमो तो होते ही हैं। बुद्धि हर एक की अलग-अलग है। जो श्रीमत पर नहीं चलते हैं - वह हैं तमोप्रधान बुद्धि। अपने को इन्श्योर नहीं करेंगे तो भविष्य 21 जन्मों के लिए कैसे मिलेगा। मरना तो है ही। तो क्यों न इन्श्योर कर देना चाहिए। सब कुछ उनका है। तो परवरिश भी वह करेंगे। भल कोई सब कुछ देते हैं, परन्तु सर्विस नहीं करते, जो दिया वह खाते रहते हैं। तो बाकी जमा क्या होगा। कुछ भी नहीं। सर्विस का सबूत चाहिए। देखा जाता है - कौन पण्डे बन आते हैं? नये बी.के. भी आपस में सेन्टर चलाते हैं, उनको भी आफरीन दी जाती है। यह नॉलेज तो बड़ी सहज है। वानप्रस्थ अवस्था वालों को जाकर समझाओ - वानप्रस्थ अवस्था कब होती है? बाप ही गाइड बन सबको ले जायेंगे। तुम जानते हो बाप ही कालों का काल है। हम तो खुशी से बाबा के साथ इकट्ठे जाना चाहते हैं।

पहले-पहले तो मुख्य बात यह उठाओ - गीता का भगवान् कौन है, जिसने रचना रची? लक्ष्मी-नारायण को राजयोग किसने सिखाया? उनकी भी राजधानी स्थापन हो रही है। और कोई राजधानी स्थापन करने आते नहीं। बाप ही राजधानी स्थापन करने आते हैं। सब पतितों को पावन बनाते हैं। यह है विशश वर्ल्ड, वह है वाइसलेस वर्ल्ड। दोनों में नम्बरवार मर्तबे हैं। जो श्रीमत पर चलने वाले होंगे, उनकी बुद्धि में ही यह बातें बैठ सकती हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बुद्धि की लाइन सदा क्लीयर रहे इसके लिए देही-अभिमानी रहना है। सच्ची कमाई में माया किसी प्रकार से घाटा न डाल दे - यह सम्भाल करनी है।

2) कर्मेन्द्रियों से कोई भी विकर्म नहीं करना है। इन्श्योर करने के बाद सर्विस भी जरूर करनी है।

वरदान:-

योग की धूप में आंसुओं की टंकी को सुखाकर रोना प्रूफ बनने वाले सुख स्वरूप भव

कई बच्चे कहते हैं कि फलाना दु:ख देता है इसलिए रोना आता है। लेकिन वह देते हैं आप लेते क्यों हो? उनका काम है देना, आप लो ही नहीं। परमात्मा के बच्चे कभी रो नहीं सकते। रोना बन्द। न आंखों का रोना, न मन का रोना। जहाँ खुशी होगी वहाँ रोना नहीं होगा। खुशी वा प्यार के आंसू को रोना नहीं कहा जाता। तो योग की धूप में आंसुओं की टंकी को सुखा दो, विघ्नों को खेल समझो तो सुख स्वरूप बन जायेंगे।

स्लोगन:-

साक्षी रहकर पार्ट बजाने का अभ्यास हो तो टेन्शन से परे स्वत: अटेन्शन में रहेंगे।

04-12-2018

04-12-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - तुम्हारा रूहानी योग है एवर प्योर बनने के लिए क्योंकि तुम पवित्रता के सागर से योग लगाते हो, पवित्र दुनिया स्थापन करते हो''

प्रश्नः-

निश्चयबुद्धि बच्चों को पहले-पहले कौन-सा निश्चय पक्का होना चाहिए? उस निश्चय की निशानी क्या होगी?

उत्तर:-

हम एक बाप के बच्चे हैं, बाप से हमको दैवी स्वराज्य मिलता है यह पहले-पहले पक्का निश्चय चाहिए। निश्चय हुआ तो फौरन बुद्धि में आयेगा कि हमने जो भक्ति की है वह अब पूरी हुई, अब स्वयं भगवान् हमें मिला है। निश्चयबुद्धि बच्चे ही वारिस बनते हैं।

गीत:-

ओ दूर के मुसाफिर........  

ओम् शान्ति।

बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं दूर के मुसाफ़िर तो सब हैं। सब आत्मायें दूर से दूर परमधाम की रहने वाली हैं। यह भी शास्त्रों में है। आत्मा दूर रहती है, जहाँ सूर्य चांद की रोशनी नहीं रहती। मूल-वतन और सूक्ष्मवतन में कोई ड्रामा नहीं है। ड्रामा इस स्थूलवतन का है, जिसको ही मनुष्य सृष्टि कहा जाता है। मूलवतन और सूक्ष्मवतन में कोई 84 जन्मों का चक्र नहीं है। चक्र मनुष्य सृष्टि में दिखाया जाता है। मनुष्य सृष्टि क्या चीज़ है, मनुष्य किसका बना हुआ है? मनुष्य में एक तो आत्मा है, दूसरा शरीर है। 5 तत्वों का पुतला बनता है। उसमें आत्मा प्रवेश कर पार्ट बजाती है। तो दूर के वासी तो सब हैं। परन्तु तुम निश्चय करते हो। मनुष्यों में निश्चय नहीं है। बाप ने समझाया है मुझे दूरदेश का रहने वाला कहते हो परन्तु तुम सब आत्माओं का निवास स्थान एक है। उस नाटक में जो पार्ट बजाते हैं उसमें तो हर एक का अपना-अपना घर होता है ना। वहाँ से आकर पार्ट बजाते हैं। यहाँ तुम बच्चे समझते हो हम सब एक ही बाप के बच्चे हैं, एक ही घर परमधाम में रहने वाले हैं। वह है ब्रह्म महतत्व, यह है आकाश तत्व। यहाँ पार्ट बजाते हैं, रात-दिन होता है इसलिए सूर्य-चांद भी हैं। मूलवतन में तो दिन-रात नहीं होता है। यह सूर्य-चांद कोई देवता नहीं हैं। यह तो माण्डवे को रोशन करने वाली बत्तियां हैं। दिन में सूर्य रोशनी देता है, रात में चांद की रोशनी होती है। अभी सब मनुष्य चाहते हैं मुक्तिधाम में जायें। जानते हैं भगवान् ऊपर में रहता है। भगवान् को भी याद करेंगे - हे परमपिता परमात्मा, तो बुद्धि ऊपर चली जायेगी। आत्मा समझती है परन्तु अज्ञान छाया हुआ है। यह भी जानते हैं हम यहाँ के रहने वाले नहीं हैं। हमारा बाप वह है। मुख से ओ गॉड फादर कहते भी हैं। फिर कह देते हैं सब फादर हैं, गॉड सर्वव्यापी है। बच्चों को समझाया है सब तो फादर हैं नहीं। सब आत्मायें आपस में ब्रदर्स हैं। यह न जानने कारण लड़ते-झगड़ते रहते हैं। तुम आत्मायें ब्रदर्स हो, एक बाप की सन्तान बने हो। निश्चयबुद्धि भी नम्बरवार हैं। लौकिक सम्बन्ध में निश्चय रहता ही है कि बाप से वर्सा पाना है। यहाँ बाप से माया घड़ी-घड़ी मुंह फेर देती है। सर्वशक्तिमान बाप के बनते हो तो माया भी सर्वशक्तिमान होकर लड़ती है। पांच विकारों पर जीत पाने की युद्ध है। युद्ध तो मशहूर है। बाकी शास्त्रों में जो कौरव-पाण्डव दिखाये हैं वह बात है नहीं। यह रावण के साथ युद्ध बड़ी भारी है। हम चाहते हैं कि बाप की याद में रहकर हम सम्पूर्ण बनें, आत्मा प्योर बनें। और तो कोई भी रास्ता है नहीं सिवाए योग के। और जो भी योग सीखते हैं वह कोई प्योरिटी के लिए नहीं है। वह तो सब स्थूल योग हैं, अल्पकाल के लिए और यह रूहानी योग है एवर प्योर होने के लिए। पवित्रता के सागर के साथ हम योग लगाने से पवित्र बनते हैं। बाप कहते हैं इस योग अग्नि से तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप भस्म होते हैं। बुद्धि भी कहती है यह पतित दुनिया है। कोई से भी पूछो - यह सतयुग है या कलियुग? तो इसको सतयुग कोई भी नहीं कहेंगे। सतयुग तो नई दुनिया थी। उसको गोल्डन एज, इसको आइरन एज कहा जाता है। पुरानी दुनिया को कलियुग और नई दुनिया को सतयुग कहा जाता है। ऐसे कह नहीं सकते कि अभी सतयुग भी है तो कलियुग भी है। नहीं, नर्कवासी माना ही नर्कवासी। पुरानी दुनिया को पतित, नई दुनिया को पावन दुनिया कहेंगे। मनुष्यों के लिए ही समझाया जाता है, जानवर थोड़ेही कहेंगे पतित-पावन आओ। कोई से भी पूछो तो कहेंगे यह नर्क है। भारत ही नई दुनिया स्वर्ग था, भारत ही पुरानी दुनिया नर्क है। भारत पर ही जोर देते रहो। दूसरे सब तो बीच में आते हैं। उससे हमारा तैलुक नहीं। हमारा धर्म ही अलग है, जो अब प्राय: लोप हो गया है।

अभी तुम निश्चयबुद्धि बने हो। जानते हो हम एक बाप के बच्चे हैं। बाप से हमको स्वराज्य मिलता है। पहले तो यह पक्का निश्चय चाहिए। ज्ञान सुनते हैं, वह तो ठीक है। प्रजा बन जाती है। बाकी हम बेहद बाप के बच्चे हैं - यह निश्चय हो जाए, समझें हमने भक्ति की है भगवान् से मिलने के लिये। अभी भक्ति पूरी होती है। अब भगवान् स्वयं आकर मिला है। उनसे सूर्यवंशी स्वराज्य पद मिलता है। हम इतना ऊंच पद पाते हैं। जैसे साहूकार लोग बच्चे को गोद में लेते हैं ना। वह तो एक बच्चा लेते हैं। यहाँ तो बेहद के बाप को अनेक बच्चे चाहिए। कहते हैं जो मेरा बच्चा बनेगा उनको स्वर्ग का वर्सा मिलेगा। जो मेरा नहीं बनते तो वर्सा ले न सकें। श्रीमत पर ही नहीं चलते। जिनको निश्चय हो जाता है वह तो कहते बाबा आप फिर से आये हो, बस, हम तो आपका हाथ नहीं छोड़ेंगे। बाप बच्चों को समझाते हैं, बच्चे फिर दूसरों को समझाते हैं कि हम पारलौकिक बाप के बच्चे बने हैं। उनकी श्रीमत पर हम चलते हैं, हमको परमपिता परमात्मा पढ़ाते हैं। इतने सब बी.के. बने हैं तो जरूर निश्चय है, तो हम भी क्यों न बनें। लिख करके भेज दें कि हम आपके बने हैं। बाप कहेंगे हम कोई दूर थोड़ेही हैं। हम तो यहाँ बैठे हैं, हाजिर हैं। यहाँ प्रैक्टिकल में बैठे हैं। जैसे प्रेजीडेन्ट के लिए कहेंगे कि इस सृष्टि पर हाज़िर है तो इसका मतलब यह नहीं है कि प्रेजीडेन्ट सर्वव्यापी है। ऐसा परमपिता परमात्मा, जिसको सुख कर्ता दु:ख हर्ता कहा जाता है वह सर्वव्यापी नहीं हो सकता। उनकी हाज़िरी में मनुष्य इतने दु:खी कैसे हो सकते? जबकि बाप की गैरहाज़िरी (स्वर्ग) में भी कोई दु:खी नहीं रहता।

बाप ने बच्चों के लिए घोंसला बनाया है। जैसे चिड़िया बच्चों के लिए घोंसला बनाती है, तो बाप भी तुम्हारे लिए तुम्हारे द्वारा ही आखेरा (घोंसला) बनवाते हैं। तुम्हारे ही रहने के लिए स्वर्ग का आखेरा बन रहा है। बाप कहते हैं तुम मेरी मत पर चलेंगे तो स्वर्ग मे राज्य करेंगे। अगर पूरा निश्चय हो तो एकदम पकड़ लेवें। ऐसे भी नहीं कि यहाँ बैठ जाना है। घरबार तो छोड़ना नहीं है। वह तो घरबार छोड़ते हैं। गुरू को भगवान् समझते हैं। वह कोई जीते जी मरते नहीं हैं। तुमको तो जीते जी मरकर फिर सतयुग में जीना है। तुम बाप से बेहद का वर्सा लेते हो। जब निश्चय हुआ कि बेहद का बाप पढ़ाते हैं 21 जन्मों का वर्सा देते हैं तो उनकी श्रीमत पर चलना पड़े। बच्चा बना तो बाप डायरेक्शन देंगे। पहले तो एक हफ्ता भट्ठी में बैठो। तुमको रोज़ नॉलेज मिलती रहेगी। सब तो एक जैसे नहीं समझते हैं, हर एक अपने पुरूषार्थ और तकदीर अनुसार पाते हैं। पुरूषार्थ और तकदीर के ऊपर ही होता है। पता लग जाता है कि तकदीर में क्या है? क्या पद पायेंगे? बाप का बनकर फिर गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। अच्छा, गृहस्थ व्यवहार नहीं है तो जाकर अन्धों की लाठी बनो। सत्य नारायण की कथा सुनाने जरूर जाना है।

अब देखो, प्रेम बच्ची सेवा पर गई है। जिन्होंने निमंत्रण दिया उन्होंने आजयान की, बहुतों से मुलाकत कराई, प्रभावित हुए। परन्तु बाबा कहे - निश्चयबुद्धि एक भी नहीं हैं कि इन्हों को बेहद का बाप पढ़ाता है, जिससे 21 जन्मों का वर्सा मिलता है। प्रभावित होते हैं परन्तु ऐसे थोड़ेही निश्चय हुआ कि बरोबर ज्ञान का सागर बाप पढ़ा रहे हैं। हाँ, सिर्फ कहेंगे बहुत अच्छा है। जैसे ही बाहर गये फिर ख़लास। कोई बिरला ही पुरूषार्थ करेंगे। भल आपस में सतसंग करेंगे परन्तु जो करेंगे वह भी निश्चयबुद्धि नहीं। हाफ कास्ट कहा जाता है। निश्चय और संशय। अभी कहेंगे बाप पढ़ाते हैं, अभी कहेंगे कि यह कैसे हो सकता है? हाँ, पवित्र बनना अच्छा है परन्तु पवित्रता में रहना बड़ा मुश्किल है। पहले तो निश्चय चाहिए। गदगद होकर लिखे। जैसे बांधेली गोपिकायें पत्र लिखती हैं वैसे छुटेले कभी लिखते थोड़ेही हैं। बाबा लिख देते हैं कि एक को भी निश्चयबुद्धि नहीं बनाया है। हाँ, साधारण प्रजा बनाई, वारिस नहीं बनाया। एक भी निश्चयबुद्धि नहीं बना है। निश्चयबुद्धि ही वारिस बनते हैं। कोई भल निश्चयबुद्धि हैं परन्तु ज्ञान नहीं उठाते हैं तो उसी घराने के अन्दर जाकर दास-दासी बनते हैं। आगे जाकर एक्यूरेट साक्षात्कार होगा। पता भी पड़ेगा कि हम दास-दासी कौन-से नम्बर में बनेंगे? फिर बहुत पछतायेंगे। हम तो श्रीमत पर चले नहीं तब यह हाल हुआ। फिर भी हर हालत में कहेंगे ड्रामा। इनका ड्रामा में ऐसे ही कल्प-कल्पान्तर का पार्ट है। साक्षात्कार होना ही है। पिछाड़ी में रिजल्ट निकलनी है। फिर कहेंगे भावी। हमारी तकदीर में यह था, तुम्हारी पढ़ाई की रिजल्ट आयेगी। यह तो बड़ा भारी स्कूल है। पढ़ाने वाला एक ही है, एक ही पढ़ाई है, एक ही इम्तहान है। टीचर जानते हैं यह स्टूडेण्ट कैसा है, सब गैलप करते रहते हैं। आगे चलकर बहुत कुछ पता लग जायेगा। घड़ी-घड़ी तुम ध्यान में चले जायेंगे। जैसे शुरू में जाते थे। आप भी समझते रहते हो, बाप भी समझाते रहते हैं। तुम ग़फलत करते हो, श्रीमत पर नहीं चलते हो। ऐसे चलते-चलते आदत पड़ जाती है। भल तुम पूछो - शिवबाबा हम आपकी श्रीमत पर चलते हैं? बाबा बता देंगे तुम नहीं चलते हो तब तुम्हारी तकदीर ऐसे दिखाई पड़ती है। समझा जाता है अभी दशा खराब है, आगे चलकर खुल भी जाए। कोई काम के हल्के नशे में गिरते हैं। भारत पावन था, श्रेष्ठाचारी था जो अब भ्रष्टाचारी है। उन श्रेष्ठ देवताओं की महिमा तो है ना। बाप कहते हैं यह है ही आसुरी सम्प्रदाय, मैं आया हूँ दैवी सम्प्रदाय स्थापन करने। यह देवी-देवता धर्म है ऊंच ते ऊंच। बाप ही पतित-पावन है। परन्तु मनुष्य कुछ भी समझते नहीं हैं। जो भी धर्म स्थापन करने आते हैं - पवित्र जरूर बनते हैं। हर एक बात में अच्छे और बुरे होते हैं। कम तकदीर और अच्छी तकदीर वाले हैं। अब यह रावण राज्य ख़त्म होना है। इस रावण की नगरी को आग लगनी है। तुम राम की सेना बैठे हो। जो इस धर्म के होंगे वह समझते जायेंगे। नम्बरवार समझते हैं। कोई को एक ही तीर जनक मुआफ़िक लगने से सरेन्डर हो जाते हैं। वह कोई भी बहाना नहीं करेंगे। बहाना इसमें चल न सके। परन्तु माया के तूफान भी बहुत आते हैं। अपने घराने को ही भुला देते हैं कि हम ईश्वरीय सन्तान हैं। तो बच्चों को बहुत मीठा बनना है। काम का जरा भी नशा नहीं चाहिए। काम बड़ा ही महाशत्रु है। यही सबसे बड़ी भारी परीक्षा है। बाबा कहते - बच्चे, इकट्ठे रह पवित्र बनकर दिखाओ। बाप बच्चों की अवस्था को जानते हैं। निश्चयबुद्धि वाले बाप को अपना समाचार देंगे कि बाबा मैं आपको याद करता हूँ, यह आपकी सेवा करता हूँ। सर्विस का समाचार लिखें तब विश्वास रखूँ। सर्विस का सबूत दिखाये तब बाबा समझे इसमें उम्मीद अच्छी दिखाई पड़ती है और फिर यह भी समझना चाहिए कि बाबा अकेला है, हम बच्चे बहुत हैं। ऐसे नहीं, बाबा को रोज़-रोज़ रेसपान्स देना पड़ेगा। नहीं, बाप है ही गरीब निवाज़। दान गरीब को दिया जाता है। यह भारत खण्ड गरीब है। भारत ही साहूकार से गरीब हुआ है। यह किसको भी पता नहीं पड़ता है। यह भारत ही अविनाशी खण्ड है, जहाँ भगवान् अवतार लेते हैं। भारत सोने की चिड़िया था अर्थात् सर्व सुखों का भण्डार था। जिस सुखधाम में जाने के लिए हम सब पुरूषार्थ कर रहे हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कोई भी बहाना न कर बाप की श्रीमत पर चलते रहना है। सर्विस का सबूत देना है।

2) हम ईश्वरीय सन्तान हैं, हमारा ऊंच ते ऊंच घराना है, यह भूलना नहीं है। निश्चयबुद्धि बनना और बनाना है।

वरदान:-

ब्राह्मण जन्म की विशेषता और विचित्रता को स्मृति में रख सेवा करने वाले साक्षी भव

यह ब्राह्मण जन्म दिव्य जन्म है। साधारण जन्मधारी आत्मायें अपना बर्थ डे अलग मनाती, मैरेज डे, फ्रैन्डस डे अलग मानती, लेकिन आपका बर्थ डे भी वही है, तो मैरेज डे, मदर डे, फादर डे, इंगेजमेंट डे सब एक ही है क्योंकि आप सबका वायदा है - एक बाप दूसरा न कोई। तो इस जन्म की विशेषता और विचित्रता को स्मृति में रख सेवा का पार्ट बजाओ। सेवा में एक दो के साथी बनो, लेकिन साक्षी होकर साथी बनो। जरा भी किसी में विशेष झुकाव न हो।

स्लोगन:-

बेपरवाह बादशाह वह है जिसके जीवन में निर्माणता और अथॉरिटी का बैलेन्स हो।

22-09-2018

22-09-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - संगदोष से तुम्हें बहुत सम्भाल करनी है क्योंकि संगदोष में आने से ही उल्टे कर्म होते हैं, बाप की याद भूल जाती है''

प्रश्नः-

किस फ़ज़ीलत (मैनर्स) के आधार पर तुम बच्चे अपनी अवस्था को आगे बढ़ा सकते हो?

उत्तर:-

अगर कभी कोई भूल हो जाती है तो बाप से क्षमा मांगने की भी फ़ज़ीलत चाहिए। बाप को कहना चाहिए आई एम सॉरी। इसमें जरा भी देह-अभिमान न आये, इससे अवस्था आगे बढ़ती रहेगी। चढ़ती कला का आधार है - बाप से सच्ची दिल। कभी भी अपने को मिया मिट्ठू नहीं समझना है। भूलें हर एक से हो सकती हैं क्योंकि अभी तक कोई परिपूर्ण नहीं बने हैं।

गीत:-

हमें उन राहों पर चलना है........  

ओम् शान्ति।

कुछ तो कहना पड़ता है, उस हिसाब से ओम् शान्ति कहना अच्छा है। आत्मा को अपना स्वधर्म बताना होता है। बाप भी कहते हैं हम शान्त हैं। शान्ति देश के रहने वाले हैं। तुम भी असुल आत्मा हो। तुम्हारा स्वधर्म शान्त है। सारी दुनिया शान्ति-शान्ति करती रहती है परन्तु शान्ति किसको कहा जाता है, यह कोई नहीं जानते। समझते हैं कि यह लड़ना-झगड़ना जो चलता है वह शान्त हो जाए। परन्तु वह शान्ति तो कोई काम की नहीं। घर में स्त्री-पुरुष होते हैं, कोई तो झगड़ते हैं, कोई झगड़ते नहीं हैं। वह कोई शान्ति हुई क्या? शान्ति और चीज़ है। शान्ति तो आत्मा का स्वधर्म है। वैसे ही बाप का भी स्वधर्म है शान्त। आत्माओं का बाप कौन है? परमपिता परमात्मा। उनका धर्म क्या है? उनका भी धर्म है शान्त। परमपिता परमात्मा शान्त देश में रहने वाला है। हम भी शान्त देश में रहने वाले हैं। कोई भी आये तो बोलो - तुम्हारा स्वधर्म तो शान्त है ना। तुम असुल वहाँ के रहने वाले हो, यहाँ आये हो पार्ट बजाने। शरीर द्वारा पार्ट तो बजाना ही है। शान्ति के लिए वास्तव में जंगल आदि में जाने की भी दरकार नहीं है। आत्मा को अपने स्वधर्म का पता है। आत्मा थक जाती है तो रात को अशरीरी हो शान्त हो जाती है। रात को कितना सन्नाटा रहता है। सुबह होने से आवाज़ शुरू हो जाता है। वह हुई हद की रात और दिन। अभी तो है बेहद का दिन और रात। आत्मा 84 जन्मों का पार्ट बजाकर थक जाती है, इसलिए कहते हैं अब वापिस शान्तिधाम जाना है। बाप भी कहते हैं शान्तिधाम और सुखधाम को याद करो। सुखधाम में बैठ थोड़ेही याद किया जाता है। याद किया जाता है दु:खधाम में, अशान्तिधाम में। तो अब बाप कहते हैं - बच्चे, अब नाटक पूरा हुआ है, तुमको घर चलना है, फिर तुम्हारे लिए शान्ति भी है, तो सुख भी है।

बाप कहते हैं मैं पण्डा हूँ, तुमको वापिस सच्ची यात्रा पर ले जाने आया हूँ। शान्तिधाम का पण्डा एक बनता है वा उनके बच्चे बनते हैं। एक से तो काम नहीं होगा। कितनी बड़ी सेना है। सभी का मुख है शान्तिधाम तरफ। वह है परे ते परे धाम। बद्रीनाथ, अमरनाथ जाना कोई दूर नहीं। वहाँ जाना तो बड़ा सहज है। अच्छा, बताओ मूलवतन-सूक्ष्मवतन जाना सहज है या अमरनाथ बद्रीनाथ जाना सहज है? सूक्ष्मवतन-मूलवतन नज़दीक है या अमरनाथ, बद्रीनाथ नजदीक है? देखने में तो मूलवतन-सूक्ष्मवतन परे ते परे है। परन्तु वहाँ जाने में देरी नहीं लगती है, सेकण्ड की बात है। तुम सिर्फ बुद्धि से याद करो। वह जिस्मानी यात्रायें तो कोई नई बात नहीं। आधाकल्प वह यात्रा करते आये हो। यह रूहानी यात्रा तुमको एक ही बाप आकर कराते हैं। तुम हो सिकीलधे बच्चे। तुमको तो रास्ता बताना है। तुम मन्दिरों में जाकर समझाओ यह देवी-देवतायें कब राज्य करते थे, इनको ऐसा पूज्य किसने बनाया? तुम जानते हो हम पूज्य थे, फिर पुजारी बने हैं। तो पुजारी का दर्जा कम हुआ ना। पूज्य ऊंच हैं। बाप पूज्य बनाते हैं। तुम पूज्य देवी-देवता थे फिर पुजारी बनें, अब पूजा को छोड़ फिर पूज्य बनना है। माया के भी बहुत विघ्न पड़ते हैं। अबलाओं पर कितने अत्याचार होते हैं। और यात्राओं पर जाने अथवा मन्दिरों में, सतसंगों में जाने के लिए कोई रोकते नहीं। यहाँ पुजारी से पूज्य बनने में माया कितना हैरान करती है। घड़ी-घड़ी गिर पड़ते हैं। बहुत करके गिरते हैं काम के खड्डे में। बाप कहते हैं मूत पलीती मत बनो, इनसे सम्भलना है। सबसे गंदा है काम चिता पर चढ़ना, विषय सागर में गोता खाना। बाप कहते हैं - बच्चे, काम महाशत्रु है, इसलिए कभी भी विकार में जाने का संकल्प भी नहीं करना, इससे ही गंदे बन पड़ते हैं। ऐसे मत समझो यहाँ जो आते हैं तो उनकी बुद्धि विष से निकल जाती है। कोई-कोई ऐसे भी हैं जो एक-दो को देखते हैं तो अन्दर तूफान चलता है गन्दा बनने लिए। बाप कहते हैं कभी गंदा नहीं बनना, कोई का पीछा नहीं करना है। कभी विकार में गिरने का पुरुषार्थ नहीं करो। बाप इससे बचाते रहते हैं। सम्भलने और गिरने की कितनी चटा-भेटी चलती है। माया कितना तूफान मचाती है। कितना अच्छा व़फादार, आज्ञाकारी, सर्विसएबुल बच्चा था, माया ने ऐसी चमाट मारी जो एकदम ख़त्म हो गये, मर गये, यह ड्रामा। गन्दा माया बनाती है। आधा-कल्प दु:ख देने वाली माया है, बाप नहीं। मुफ्त में दोष धरते हैं कि ईश्वर ही दु:ख, सुख देते हैं। ईश्वर को बाप नहीं समझते। परमात्मा कभी किसको दु:ख कैसे देंगे। परमात्मा दु:ख दे तो बाकी मनुष्य तो एक-दो में बड़ा ही दु:ख देंगे। बाप समझाते हैं तुम ही अपने लिए ऐसे कर्म बनाते हो। संगदोष में भी उल्टे कर्म कर लेते हो। बाप को भूल जाते हो। साधारण है ना। तो बच्चे भूल जाते हैं। बाप तो शिक्षा अच्छी ही देंगे, परन्तु उसको भूल जाते हैं। बाप समझाते हैं योग पूरा नहीं है। ऐसे मत समझो भाषण करने वाले हैं। पण्डित की एक कथा है ना, औरों को कहा राम-राम कहने से नदी पार हो जायेंगे। खुद पार हो न सका। बोला बोट (नाव) ले आओ तो चलें। जो खुद कहता था, वह कर नहीं सका। सिर्फ कहना नहीं है परन्तु करना है। कथनी, करनी, रहनी सब समान हो, इसलिए बाप को मत भूलो। बाबा अभुल बनाते हैं। बाप कहते हैं कोई भी भूल हो जाए तो आकर माफी मांगो - आई एम सॉरी। समझो, शिवबाबा कहते हैं यह तुम्हारी भूल है। अच्छा, बाबा हम क्षमा चाहते हैं। यह भी अच्छे-अच्छे बच्चों में फ़ज़ीलत नहीं रहती है। इतनी बड़ी भूल की, माफी तो मांगे। अपने को बहुत मिया मिट्ठू समझते हैं। पाप करते हैं तो क्षमा लेनी चाहिए। नहीं तो उसकी वृद्धि होती रहती है। बाप के साथ बुद्धियोग बड़ा अच्छा चाहिए। भल भाषण तो बहुत अच्छा-अच्छा करते हैं परन्तु सम्पूर्ण कोई बना नहीं है। अन्त तक गिरते सम्भलते रहेंगे। कहते हैं - बाबा, हमसे यह भूल हो गई, आप क्षमा करना। रहमदिल क्षमा करो। भक्ति मार्ग में सारा दिन क्षमा-क्षमा करते रहते हैं। बाप को कहते हैं क्षमा करो। धर्मराज द्वारा फिर दण्ड नहीं दिलाना, इसलिए ख़बरदारी बहुत चाहिए। ऐसे मत समझो कि हम 16 कला सम्पूर्ण बन गये हैं, नहीं। बहुत बच्चे लिखते हैं बाबा अशुद्ध स्वप्न बहुत आते हैं। बाबा की याद ही नहीं ठहरती है। मिया-मिट्ठू नहीं बनना है। अन्त में 16 कला सम्पूर्ण बनेंगे। अभी तो ग्रहण लगा हुआ है। तुम्हारी वह अवस्था आनी है। यहाँ बैठे बैठे उड़ते रहेंगे। आत्मा को खींच होती है क्योंकि कल्प की थकी हुई है तो आतुरवेला (जल्दी) होती है - जल्दी-जल्दी जाऊं। परन्तु लायक भी बनना पड़े ना। कोई तो यहाँ ही घूमने-फिरने, जेवर पहनने आदि में खुश हो जाते हैं, फिर दु:खी होते हैं, तो कहते हैं नाहेक बाबा को छोड़ा। अच्छा, फिर हिम्मत करो, कुछ सीखो। अपकार करने वालों पर भी उपकार करना है। परन्तु ऐसे भी नहीं और ही माथा खराब कर दे। माया गिराती है, बाप उठाते हैं। मंज़िल है ऊंची और यह है सारी बुद्धियोग की यात्रा। पुरुषार्थ में टाइम लगता है। लक्ष्य तो बहुत सहज है। एक सेकेण्ड में तुम जीवनमुक्ति के अधिकारी बन जाते हो। एक बार बाबा कहा फिर भूलते क्यों हो? निश्चय है बाबा से स्वर्ग का वर्सा लेते हैं फिर गिरते क्यों हो? याद कर सम्भलते क्यों नहीं हो? अच्छे-अच्छे बच्चे भूल जाते हैं। फिर और ही डिस-सर्विस होती है। सर्विस भी गुप्त है तो डिससर्विस भी गुप्त है। दुनिया को क्या पता? किसमें कोई भी भूत प्रवेश होगा वा अशुद्ध सोल का प्रवेश है तो वह भी नुकसान कर देते हैं। मायावी सोल प्रवेश कर लेती है। भल ज्ञान है परन्तु परिपूर्ण कोई नहीं है। कोई न कोई ख़ामी रहती है तो डर होना चाहिए। हमको बाबा की श्रीमत पर चलना है। अगर श्रीमत पर न चले, कोई भ्रष्ट काम किया तो पद भी भ्रष्ट होगा और सज़ायें भी बहुत खायेंगे। कर्मों का फल यहाँ भी बड़ा कड़ा भोगना पड़ता है इसलिए कर्मातीत अवस्था का पुरुषार्थ करना है।

बाबा के साथ बड़ा सच्चा रहना है। सबका शिवबाबा से कनेक्शन है। सेन्टर्स सब शिवबाबा के हैं। तुम्हारा सेन्टर फिर कहाँ से आया? तुम शिवबाबा के हो। विश्व-विद्यालय बाप का है ना। ईश्वरीय विश्व-विद्यालय। मेरा यह सेन्टर है - यह ख्याल आया और मरा। ऐसे मेरा-मेरा करते कितने गिर पड़ते हैं। सब कुछ शिवबाबा का है। तुम कहते हो - बाबा, यह तन-मन-धन सब आपका है। तो बाबा भी कहते हैं - स्वर्ग की राजाई सारी तुम्हारी है। कितना एवज़ा मिलता है। तुम क्या देते हो? मरने से पहले करनीघोर को देते हैं ना। जीते जी दान करते हैं। देखते हैं - बस, होपलेस केस है तो दान-पुण्य कराते हैं। बाप भी कहते हैं - बच्चे, जीते जी कर लो, यह तो पुराना तन है। तुम आत्मायें मेरी हो। यह शरीर पार्ट बजाते-बजाते अब पुराना हो गया है। अब फिर मेरे बनो तो तुम्हारी आत्मा और शरीर दोनों शुद्ध बनेंगे। दोनों इकट्ठे साफ होते जाते हैं। आत्मा जो अपवित्र बनी है, उनको शुद्ध बनाना है। मेरे साथ योग लगाने से ही शुद्ध बनेंगे। योग रखेंगे तो चढ़ती कला होगी, योग नहीं रखेंगे तो गिरती कला हो जायेगी। सर्विस का शौक चाहिए। पूछना नहीं है सर्विस पर जायें। बाबा समझते हैं शौक नहीं है। मन्सा-वाचा-कर्मणा सर्विस का शौक चाहिए। मन्सा नहीं तो वाचा वा कर्मणा कोई न कोई सर्विस में लग जाना चाहिए तो उज़ूरा मिलेगा। आपेही जो करे सो देवता, कहने से करे सो मनुष्य, कहने से भी न करे तो कोई काम का नहीं। जितना सर्विस करेंगे उतना फल मिलना है।

शिवबाबा पूछते हैं - बच्चे, मेरे को हाथ हैं? इस तन में शिवबाबा बैठे हैं ना। चिट्ठी लिखते हैं ना। बैल पर सारा दिन थोड़ेही सवारी करेंगे। बैल जब थक जाते हैं तो उनकी आंखों में पानी आ जाता है। यहाँ तो आंसू आने की बात नहीं। इनको तो सर्विस करनी ही है। बच्चों को समझाते हैं मामेकम् याद करो। यह शिवबाबा कहते हैं, इनकी आत्मा भी सुनती है। यह तो बिल्कुल सहज है। बेहद का बाप है ही स्वर्ग का रचयिता। बाबा आते हैं स्वर्ग की स्थापना, नर्क का विनाश कराने। महाभारत लड़ाई भी सामने खड़ी है। यादव, कौरव, पाण्डव भी हैं। तुम जानते हो अब खेल पूरा होता है। बाबा लेने आया है। सिर पर विकर्मों का बोझा बहुत है। याद नहीं करेंगे तो महारानी-महाराजा नहीं बन सकेंगे। है ही यह राजयोग, न कि प्रजा योग। योग पूरा नहीं लगाते हैं तो प्रजा बन पड़ते हैं। कहते हैं - बाबा, हम पूरा वर्सा लेंगे। तो सर्विस का शौक चाहिए। लिखकर पूछ सकते हो - अगर इस समय हमारा शरीर छूट जाये तो हम क्या बनेंगे? परिपूर्ण तो अन्त में बनेंगे। अभी तुम अपूर्ण हो। अपनी अवस्था की जांच करनी है - हम कितना बाबा की सर्विस पर हैं? कितना आज्ञाकारी, व़फादार हैं? कितना सर्विस के लिए तड़फते हैं कि कोई को जाकर जीयदान करें? बिचारे बहुत दु:खी हैं। यह एक ही सतगुरू है - शान्तिधाम-सुखधाम ले जाने आये हैं। वह गुरू लोग अपने को जगत पिता, जगत शिक्षक कह न सकें, सिर्फ जगत गुरू कहलाते हैं। यह तो जगत का बाप, टीचर, गुरू एक ही है। तुम जानते हो बाप आया है तो बाप से पूरा वर्सा लो। देह-अभिमान अच्छा नहीं है। देही-अभिमानी बन बाप को याद करो फिर तुम्हारी निरोगी काया बन जायेगी। वहाँ तो पवित्रता, सुख, शान्ति, सम्पत्ति है। अथाह सम्पत्ति है। यहाँ तो देखो, पेट के लिए मारामारी है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) रूहानी पण्डा बन सच्ची यात्रा करनी और करानी है। बुद्धियोग की बहुत सम्भाल करनी है। अपने ऊपर बहुत ख़बरदारी रखनी है।

2) बाप के साथ सच्चा रहना है। कर्मातीत बनने का पुरुषार्थ करना है। जीते जी सब बाप के हवाले कर सफल कर लेना है।

वरदान:-

स्वयं को संगमयुगी समझ व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करने वाली समर्थ आत्मा भव

यह संगमयुग समर्थ युग है। तो सदा यह स्मृति रखो कि हम समर्थ युग के वासी, समर्थ बाप के बच्चे, समर्थ आत्मायें हैं, तो व्यर्थ समाप्त हो जायेगा। कलियुग है व्यर्थ, जब कलियुग का किनारा कर चुके, संगमयुगी बन गये तो व्यर्थ से किनारा हो ही गया। यदि सिर्फ समय की भी याद रहे तो समय के प्रमाण कर्म स्वत: चलेंगे। आधाकल्प व्यर्थ सोचा, व्यर्थ किया, लेकिन अब जैसा समय, जैसा बाप वैसे बच्चे।

स्लोगन:-

जो सदा ईश्वरीय विधान पर चलते हैं वही ब्रह्मा बाप समान मास्टर विधाता बनते हैं।

16-11-2018

16-11-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - तुम्हें रूहानी पण्डा बन यात्रा करनी और करानी है, याद ही तुम्हारी यात्रा है, याद करते रहो तो खुशी का पारा चढ़े''

प्रश्नः-

निराकारी दुनिया में जाते ही कौन-से संस्कार समाप्त हो जाते और कौन से संस्कार रह जाते हैं?

उत्तर:-

वहाँ नॉलेज के संस्कार समाप्त हो जाते, प्रालब्ध के संस्कार रह जाते हैं। जिन संस्कारों के आधार पर तुम बच्चे सतयुग में प्रालब्ध भोगते हो, वहाँ फिर पढ़ाई का वा पुरुषार्थ का संस्कार नहीं रहता है। प्रालब्ध मिल गई फिर ज्ञान ख़त्म हो जाता है।

गीत:-

रात के राही थक मत जाना........  

ओम् शान्ति।

यहाँ सम्मुख शिव भगवानुवाच है। गीता में दिखाते हैं - श्रीकृष्ण भगवानुवाच परन्तु कृष्ण तो उस नाम-रूप से सम्मुख हो न सके। यह तो सम्मुख कहते हैं, निराकार भगवानुवाच। कृष्णवाच कहें तो वह साकार हो जाता है। जो भी वेद-शास्त्र आदि सुनाते हैं, वह ऐसे नहीं कहेंगे कि भगवानुवाच क्योंकि वह साधू, सन्त, महात्मा आदि सब साकार में बैठे हैं। और फिर बाप कहते हैं - हे रूहानी राही। रूहानी बाप जरूर रूहों को ही कहेंगे कि बच्चे, थक मत जाना। यात्रा पर कई थक जाते हैं तो फिर वापस आ जाते हैं। वह है जिस्मानी यात्रा। भिन्न-भिन्न मन्दिरों में जिस्मानी तीर्थ यात्रा करने जाते हैं। कोई शिव के मन्दिर में जाते हैं, वहाँ सब जिस्मानी चित्र रखे हैं भक्ति मार्ग के। यह तो सुप्रीम रूह परमपिता परमात्मा आत्माओं को कहते हैं कि हे बच्चे, अब मुझ एक के साथ बुद्धि का योग लगाओ और ज्ञान भी देते हैं। तीर्थों पर जाते हैं तो वहाँ भी ब्राह्मण लोग बैठे हैं, कथा-कीर्तन करते हैं। तुम्हारी तो एक ही सत्य नारायण की कथा है, नर से नारायण बनने की। तुम जानते हो पहले स्वीट होम में जायेंगे फिर विष्णुपुरी में आयेंगे। इस समय तुम हो ब्रह्मापुरी में, इसको पियरघर कहा जाता है। तुमको जेवर आदि कुछ नहीं हैं क्योंकि तुम पियरघर में हो। तुम जानते हो ससुरघर में हमको अपार सुख मिलने हैं। यहाँ कलियुगी ससुरघर में तो अपार दु:ख हैं। तुमको तो जाना है उस पार सुखधाम में। यहाँ से ट्रांसफर होना है। बाप सभी को नयनों पर बिठाकर ले जाते हैं। दिखाते हैं ना कृष्ण का बाप उनको टोकरी में बिठाकर उस पार ले गया तो यह बेहद का बाप तुम बच्चों को उस पार ससुरघर ले जाते हैं। पहले अपने निराकारी घर में ले जायेंगे फिर ससुरघर भेज देंगे। तो वहाँ यह सब पियरघर, ससुरघर की बातें भूल जायेंगी। वह है निराकारी पियरघर, वहाँ यह नॉलेज भूल जाती है, नॉलेज के संस्कार निकल जाते हैं, बाकी प्रालब्ध के संस्कार रह जाते हैं। फिर तुम बच्चों को प्रालब्ध ही ध्यान में रहती है। प्रालब्ध अनुसार जाकर सुख के जन्म लेंगे। सुखधाम जाना है। प्रालब्ध मिल गई फिर ज्ञान ख़त्म। तुम जानते हो प्रालब्ध में हमारी फिर वही एक्ट चलेगी। तुम्हारे संस्कार ही प्रालब्ध के हो जायेंगे। अभी हैं पुरुषार्थ के संस्कार। ऐसे नहीं कि पुरुषार्थ और प्रालब्ध दोनों संस्कार वहाँ रहेंगे। नहीं, वहाँ यह ज्ञान नहीं रहता। तो यह तुम्हारी रूहानी यात्रा है, तुम्हारा चीफ पण्डा है बाप। यूं तो तुम भी रूहानी पण्डे बन जाते हो, सबको साथ में ले जाते हो। वह हैं जिस्मानी पण्डे, तुम हो रूहानी पण्डे। वह लोग अमरनाथ पर बड़े धूमधाम से जाते हैं, झुण्ड के झुण्ड ख़ास अमरनाथ पर बहुत धूमधाम से जाते हैं। बाबा ने देखा है कितने साधू-सन्त बाजे गाजे ले जाते हैं। साथ में डॉक्टर आदि भी ले जाते हैं क्योंकि ठण्डी का समय होता है। कई बीमार पड़ जाते हैं। तुम्हारी यात्रा तो बहुत सहज है। बाप कहते हैं याद में रहना ही तुम्हारी यात्रा है। याद मुख्य है। बच्चे याद करते रहें तो खुशी का पारा चढ़ा रहे। साथ में औरों को भी यात्रा पर ले जाना है। यह यात्रा एक ही बार होती है। वह जिस्मानी यात्रायें तो भक्ति मार्ग से शुरू होती हैं। वह भी कोई शुरूआत में नहीं होती। ऐसे नहीं कि फट से मन्दिर, चित्र आदि बन जाते हैं। वह तो आहिस्ते-आहिस्ते बाद में बनते जाते हैं। पहले-पहले शिव का मन्दिर बनेगा। वह भी पहले घर में सोमनाथ का मन्दिर बनाते हैं तो फिर कहाँ जाने की दरकार नहीं रहती। यह मन्दिर आदि बाद में बनते हैं, समय लगता है। आहिस्ते-आहिस्ते नये शास्त्र, नये चित्र, नये मन्दिर आदि बनते रहते। टाइम लगता है क्योंकि पढ़ने वाले भी चाहिए ना। मठ आदि जब वृद्धि को पायेंगे, फिर विचार होगा शास्त्र बनायें। तो इतने तीर्थस्थान बनें, मन्दिर बनें, चित्र बनें, टाइम लगता है ना। भल कहा जाता है कि भक्ति मार्ग द्वापर से शुरू होता है परन्तु टाइम तो लगता है ना। फिर कलायें कमती होती जायेंगी। पहले अव्यभिचारी भक्ति, फिर व्यभिचारी भक्ति हो जाती है। यह सब बातें अच्छी रीति चित्रों पर सिद्ध कर बताई जाती हैं। समझाने वालों की बुद्धि में यही चलता रहेगा कि ऐसे-ऐसे चित्र बनायें, यह समझायें। सबकी बुद्धि में नहीं चलेगा। नम्बरवार है ना। कोई की बुद्धि बिल्कुल चलती नहीं, वह फिर पद भी ऐसे पायेंगे। मालूम पड़ जाता है - यह क्या बनेंगे? जितना आगे चलेंगे - तुम समझते जायेंगे। जब लड़ाई आदि लगेगी फिर प्रैक्टिकल देख लेंगे। फिर बहुत पछतायेंगे। उस समय पढ़ाई तो हो न सके। लड़ाई के समय त्राहि-त्राहि होती रहेगी, सुन नहीं सकेंगे। पता नहीं क्या हो जायेगा। पार्टीशन हुआ तो क्या हो गया, देखा ना। यह विनाश का समय बहुत कड़ा है। हाँ, बाकी साक्षात्कार आदि बहुत होंगे, जिससे जान जायेंगे कि यह कितना पढ़ा है। बहुत पछतायेंगे भी और साक्षात्कार होंगे - देखो तुमने पढ़ाई छोड़ दी तब यह हाल हुआ है। धर्मराज साक्षात्कार कराने सिवाए सजायें कैसे देंगे? सब साक्षात्कार करायेंगे। फिर उस समय कर कुछ नहीं सकेंगे। कहेंगे हाय तकदीर। तदबीर का समय तो गया। तो बाप कहते हैं क्यों नहीं अभी पुरुषार्थ करते हो। सर्विस से ही दिल पर चढ़ेंगे। बाप कहेंगे यह बच्चे अच्छी सर्विस करते हैं। मिलेट्री का कोई मरता है तो उनके मित्र-सम्बन्धियों आदि को भी इनाम देते हैं। यहाँ तुमको इनाम देने वाला है बेहद का बाप। बाप से भविष्य 21 जन्मों के लिए इनाम मिलता है। यह तो हरेक को अपनी दिल पर हाथ रख पूछना है कि मैं कितना पढ़ता हूँ। धारणा नहीं होती तो गोया तकदीर में नहीं है। कहेंगे कर्म ही ऐसे फूटे हुए हैं। बहुत खराब कर्म करने वाले कुछ उठा नहीं सकते हैं।

बाप समझाते हैं - मीठे बच्चे, तुम्हें इस रूहानी यात्रा पर अपने साथियों को भी ले जाना है। फ़र्ज है हरेक को यह यात्रा की बात बताना। बोलो, हमारी यह रूहानी यात्रा है। वह है जिस्मानी। दिखाते हैं रंगून की तरफ एक छम-छम तलाव है, जहाँ स्नान करने से परी बन जाते हैं। लेकिन वह परी आदि तो बनते नहीं। यह है ज्ञान स्नान करने की बात, जिससे फिर तुम बहिश्त की बीबी बन जाते हो और ज्ञान-योगबल से वैकुण्ठ में आना-जाना तो तुम्हारे लिए कॉमन बात है। और ही तुमको रोका जाता है, घड़ी-घड़ी ध्यान में नहीं जाओ, आदत पड़ जायेगी। तो यह ज्ञान मान-सरोवर है, परमपिता परमात्मा आकर इस मनुष्य तन द्वारा ज्ञान सुनाते हैं, इसलिए इनको मान-सरोवर कहा जाता है। मान-सरोवर अक्षर सागर से निकला है। ज्ञान सागर में ज्ञान स्नान करना तो बहुत अच्छा है। बहिश्त की बीबी को महारानी कहा जाता है। बाप कहेंगे तुम भी बहिश्त के मालिक बनो। बच्चों पर लव रहता है। हरेक पर रहम पड़ता है, साधुओं पर भी रहम आता है। यह तो गीता में लिखा हुआ है कि साधुओं का भी उद्धार करते हैं। उद्धार होता है - ज्ञान योग से। तुम बच्चों में समझाने की बड़ी फुर्ती चाहिए। बोलो - तुम और तो सब जानते हो लेकिन छांछ जानते हो, बाकी मक्खन खिलाने वाले को तुम जानते ही नहीं हो। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। परन्तु किसकी बुद्धि में भी बैठे ना। बाप को जानने से मनुष्य हीरे जैसा बनते हैं, न जानने से मनुष्य कौड़ी मिसल, बिल्कुल पतित हैं। बाप को जानने से ही पावन बनते हैं। पतित दुनिया में कोई पावन हो न सके। तो जो महारथी बच्चे हैं, वह अच्छी रीति समझा सकेंगे। कितने ढेर ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं। प्रजापिता ब्रह्मा नाम भी मशहूर है। प्रजापिता ब्रह्मा के यह हैं मुख वंशावली। ब्रह्मा को ही 100 भुजा, 1000 भुजा दिखाते हैं। यह भी समझाया जाता है इतनी भुजायें तो हो नहीं सकती। बाकी ब्रहमा तो बहुत बचड़े वाला है। ब्रह्मा फिर किसका बच्चा? इनका तो बाप है ना। ब्रह्मा है शिवबाबा का बच्चा। इनका और कौन बाप हो सकता? मनुष्य तो कोई हो नहीं सकता। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर गाये जाते हैं सूक्ष्मवतन के। वह तो यहाँ आ न सकें। प्रजापिता ब्रह्मा तो जरूर यहाँ होगा ना। सूक्ष्मवतन में तो प्रजा नहीं रचेंगे। तो परमपिता परमात्मा आकर इस ब्रह्मा मुख द्वारा शक्ति सेना रचते हैं। पहले-पहले परिचय देना है हम ब्रह्मा मुख वंशावली हैं। तुम भी ब्रह्मा के बच्चे हो ना। प्रजापिता ब्रह्मा है सबका बाप। फिर उनसे और बिरादरियाँ निकलती हैं, नाम बदलते जाते हैं। अब तुम ब्राह्मण हो। प्रैक्टिकल में देखो प्रजापिता ब्रह्मा की कितनी औलाद हैं। जरूर औलाद को वर्सा मिलता होगा। ब्रह्मा के पास तो कोई प्रापर्टी है नहीं, प्रापर्टी है शिवबाबा के पास। ब्रह्मा वल्द शिव। बेहद के बाप से ही वर्सा मिलता है। ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा बैठ पढ़ाते हैं। हमको दादे का वर्सा मिलता है। बाबा समझाते तो बहुत हैं, परन्तु योग नहीं। कायदे पर नहीं चलते तो बाप भी क्या करे। बाप कहते हैं इनकी तकदीर। अगर बाबा से पूछें तो बाबा बता सकते हैं - इस हालत में तुम्हारा क्या पद होगा? दिल भी गवाही देता है, मैं कितनी सर्विस करता हूँ? श्रीमत पर कहाँ तक चलता हूँ? श्रीमत कहती है मनमनाभव। सबको बाप और वर्से का परिचय देते रहते हैं, ढिंढोरा भी पीटते रहते हैं। बाबा ईशारा देते रहते हैं, तुम्हें गवर्मेन्ट को भी समझाना है। जो वह भी समझें बरोबर भारत की ताकत ही चली गई है। परमपिता परमात्मा सर्वशक्तिमान से योग ही नहीं है। इनसे तुम योग लगाते हो तो एकदम विश्व के मालिक बनते हो, माया पर भी तुम जीत पहनते हो। गृहस्थ व्यवहार में रहते माया पर जीत पानी है। हमारा मददगार बाप है। कितना समझाया जाता है, धारणा करनी चाहिए। बाबा ने समझाया है धन दिये धन ना खुटे। सर्विस करेंगे तब बाबा की दिल पर चढ़ सकेंगे। नहीं तो इम्पासिबुल है। इसका मतलब यह नहीं कि बाबा प्यार नहीं करते। बाबा प्यार सर्विसएबुल को करेंगे। मेहनत करनी चाहिए। सबको यात्रा लायक बनाते हैं। मनमनाभव। यह है रूहानी यात्रा, मुझे याद करो तो तुम मेरे पास पहुँच जायेंगे। शिव पुरी में आकर फिर विष्णुपुरी में चले जायेंगे। यह बातें सिर्फ तुम बच्चे जानते हो। कोई और मनमनाभव का अर्थ समझते नहीं, पढ़ते तो बहुत हैं। बाप महामंत्र देते हैं, मुझे याद करो तो तुम विकर्माजीत बन जायेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) ज्ञान स्नान करना है। प्यार से सर्विस कर बाप के दिलतख्त पर बैठना है। पुरुषार्थ के समय में अलबेला नहीं बनना है।

2) बाप की पलकों पर बैठ कलियुगी दु:खधाम से सुखधाम चलना है इसलिए अपना सब कुछ ट्रांसफर कर देना है।

वरदान:-

स्नेह के सागर में समाकर मेरे पन की मैल को समाप्त करने वाले पवित्र आत्मा भव

जो सदा स्नेह के सागर में समाये रहते हैं उनको दुनिया की किसी भी बात की सुधबुध नहीं रहती। स्नेह में समाये होने के कारण वे सब बातों से सहज ही परे हो जाते हैं। भक्तों के लिए कहते हैं यह तो खोये हुए रहते हैं लेकिन बच्चे सदा प्रेम में डूबे हुए रहते हैं। उन्हें दुनिया की स्मृति नहीं, मेरा-मेरा सब खत्म। अनेक मेरा मैला बना देता है, एक बाप मेरा तो मैलापन समाप्त हो जाता और आत्मा पवित्र बन जाती है।

स्लोगन:-

बुद्धि में ज्ञान रत्नों को ग्रहण करना और कराना ही होलीहंस बनना है।

 

 

26-05-2018

26-05-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - आधाकल्प से माया ने तुम्हें श्रापित किया है, अब बाप तुम्हारे सब श्राप मिटाकर वर्सा देने आये हैं, तुम श्रीमत पर चलो तो वर्से के लायक बन जायेंगे।"

प्रश्नः-

देही-अभिमानी बनने का यथार्थ रहस्य तुम बच्चों ने क्या समझा है?

उत्तर:-

पुरानी दुनिया से मरकर बाप का बनना अर्थात् मरजीवा बनना ही देही-अभिमानी बनना है। इस पुरानी जुत्ती को भूल बाप समान अशरीरी बन बाप को याद करो - यही है देही-अभिमानी बनने का यथार्थ रहस्य।

गीत:

ओम् नमो शिवाए....  

ओम् शान्ति।

बच्चों ने गीत सुना। एक तरफ हैं भक्त घोर अन्धियारे में, दूसरी तरफ हैं मात-पिता के बच्चे। जिनकी महिमा सुनी और तुम तो अब सम्मुख बैठे हुए हो। कहते भी हैं शिवाए नम:। फिर फट से कह देते हैं तुम मात-पिता... सबका मात-पिता भी ठहरा, सबका स्वामी भी ठहरा। समझाया गया है जो भी मनुष्य मात्र हैं - नर अथवा नारी, सब हैं भक्त, ब्राइड्स और वह एक है ब्राइडग्रूम, स्वामी, मात-पिता। बरोबर तुम बच्चों का बाप भी है, सजनियों का साजन भी है। यह बातें तुम बच्चे ही जानते हो और सब अन्धियारे में हैं। तुम अभी सोझरे में हो। तुम जानते हो हम बाप के सम्मुख बैठे हैं। निराकार भगवान सृष्टि कैसे रचे? जरूर मात-पिता चाहिए इसलिए बाप कहते हैं मैं इस द्वारा बच्चों को नया जन्म देता हूँ। तुम भी कहते हो हम इस पुरानी दुनिया से मरकर बाप के बने हैं अर्थात् देही-अभिमानी बने हैं। बाप तो सदैव देही-अभिमानी ही है। वह आकर इस समय देही-अभिमानी बनाने का रहस्य समझाते हैं। तुम जिनकी महिमा करते थे, त्वमेव माताश्च पिता... उनके सम्मुख बैठे हो। भल तुम अपने गाँव में हो तो भी सम्मुख हो।

बाप आये हैं बच्चों की सर्विस में। पतित-पावन बाप जानते हैं कि मुझे ही पतितों को पावन बनाना पड़ता है। याद तो उनको ही करते हैं ना - पतित-पावन आओ। अभी तो तुम संगमयुग पर हो। जानते हो बरोबर हम पतित थे। पतितों को पावन करने वाला एक बाप है जिसको कहते हैं शिवाए नम:। बच्चे बाप को पुकारते हैं। बच्चे सबको प्यारे लगते हैं। बच्चों की सेवा में बाप उपस्थित रहते हैं। बच्चे पैदा होते हैं तो बाप उन्हों की सर्विस में उपस्थित होते हैं। अभी तुम जानते हो उन द्वारा पावन बन रहे हैं। बरोबर वह बिलवेड बाप है ना, जिसको आधाकल्प हमने पुकारा है। सतयुग-त्रेता में हमने बाप का वर्सा पाया था। फिर वह वर्सा गुम हो गया। माया रावण का श्राप लग गया। हम बिल्कुल ही दु:खी बन पड़े थे। दुनिया में सब दु:खी ही दु:खी हैं। दु:ख के पहाड़ गिरते हैं। तब ही बाप कहते हैं - हम आते हैं। सब पाप आत्मा बन पड़े हैं। पाप करने वाले दु:खी बन पड़ते हैं। बाप आकर के पुण्य आत्मा बनाते हैं, वर्सा देते हैं। तुम जानते हो बरोबर हम फिर से बेहद के बाप से 21 जन्मों का वर्सा लेते हैं। माया ने श्रापित कर दिया है। बाप वह श्राप मिटाते हैं। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम सदा शान्त बन जायेंगे। यहाँ तो शान्ति हो न सके। दु:खधाम है ना। हम तुमको शान्तिधाम में ले चलते हैं। वहाँ सुख, शान्ति, धन आदि सब है। बेहद के बाप से तुम 21 जन्मों के लिये झोली भरने आये हो। हरेक को अपने पुरुषार्थ से वर्सा पाना है, जबकि भगवान के बच्चे बने हो। वह है स्वर्ग का रचयिता। तो जरूर स्वर्ग का वर्सा देता होगा। हम उनके बच्चे हैं तो जरूर वर्सा मिलना चाहिए। बच्चे ही वर्से के अधिकारी हैं। बाप कहते हैं 5 हजार वर्ष पहले तुमको वर्सा दिया था फिर गँवा दिया। अभी संगमयुग है, फिर तुमको वर्सा मिल रहा है। यह तुम जानते हो कि कल्प पहले स्वदर्शन चक्रधारी ब्राह्मण कुल भूषण बने थे। वही धीरे-धीरे आते रहेंगे। दिन-प्रतिदिन ब्राह्मण कुल भूषण बनते रहेंगे। बिरादरी बढ़ती रहेगी। ब्रह्मा मुख वंशावली आप बनते हो। बनाते हैं शिवबाबा। तुम इस समय ईश्वरीय औलाद हो। तुमको सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, अहिंसा परमोधर्म का बनाते हैं। देवतायें कब हिंसा नहीं करते। तुम जानते हो हम सो देवता थे। अब फिर से हम बनते हैं। चक्र लगाया, देवता कुल से क्षत्रिय कुल अथवा वर्ण में आये। क्षत्रिय कुल से वैश्य कुल अथवा वर्ण में आये। हम 84 जन्मों का चक्र पूरा कर आये हैं। अब फिर से बाप आये हैं वर्सा देने। श्राप मिटाकर पतित से पावन बनाते हैं। यहाँ सब मनुष्य मात्र श्रापित हुए पड़े हैं। बाप आकर श्राप मिटाकर वर्सा देते हैं। यह है संगमयुग। अभी सतयुग तुमसे दूर नहीं है। स्वर्ग इतना नजदीक है, जितना यह आत्मा का शरीर नजदीक है। बहुत नजदीक है। मनुष्य स्वर्ग को बहुत दूर समझते हैं। परन्तु तुम बच्चे अब बहुत नजदीक आये हो। पाँच हजार वर्ष पहले की बात है जबकि स्वर्ग था। आधा कल्प स्वर्ग था फिर आधा कल्प नर्क चला है। अभी स्वर्ग सामने खड़ा है।

बाप कहते हैं सेकेण्ड में स्वर्ग का राज्य लो। बरोबर तुम जानते हो हम बाप के बनते हैं तो स्वर्ग के मालिक बनते हैं। जैसे बच्चा समझता है हम बाप से वर्सा लेते हैं। बाप समझेंगे वारिस पैदा हुआ। भल छोटा बच्चा है, मुख से कुछ बोल नहीं सकता है परन्तु बाप जानते हैं यह वारिस है। यह है बेहद का बाप। आत्मा समझती है बरोबर हम बाप के बने और वारिस हो गये। बाप भी कहते हैं तुम स्वर्ग के वारिस तो जरूर बन गये। परन्तु वर्से में भी बहुत दर्जे हैं। कोई सूर्यवंशी, कोई चन्द्रवंशी, कोई प्रजा में आयेंगे। मर्तबे तो अलग-अलग हैं। बच्चे कहेंगे हम बाप की प्रापर्टी के मालिक बनते हैं। तुम बच्चे जानते हो हम बेहद बाप के बच्चे हैं। हम सारे विश्व के मालिक बनते हैं। सिर्फ भारत ही नहीं, सारे विश्व के। भल भारत में राज्य करते हो परन्तु विश्व के मालिक हो। वहाँ कोई दूसरा राजा राज्य करने वाला नहीं रहता। तो तुमको कितना नशा रहना चाहिए! बेहद का बाप और बेहद के बच्चे। अब तुम कितने बच्चे हो! तुम कहेंगे हम स्वर्ग के मालिक बन रहे हैं। बाप जैसा मीठा कोई नहीं। बाप निष्काम सेवा करते हैं। खुद मालिक नहीं बनते, बच्चों को बनाते हैं। मनुष्य कहते हैं इस दादा ने खुद तो बहुत सुख देखे, बुढ़ापे में आकर सन्यास किया तो क्या हुआ। शिवबाबा के लिये तो ऐसा नहीं कहेंगे ना। वह तो कहते हैं मैं तो स्वर्ग का सुख नहीं लेता हूँ। मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाकर तुमको स्वर्ग की राजधानी देता हूँ। वह राजे लोग खुद राज्य करके फिर राज्य-भाग्य देते हैं। यह तो कहते हैं - लाडले बच्चे, मैं परमधाम से आया हूँ तुमको राज्य-भाग्य देने के लिये। मैं राज्य नहीं करता हूँ। मुझे इस पतित दुनिया, पतित शरीर में आना पड़ता है तुमको पावन बनाने। इसमें भी कितने विघ्न पड़ते हैं! कृष्ण ने नहीं भगाया था। शिवबाबा के पास तुम भागकर आते हो। कहेंगे - हम बाबा के पास जाते हैं पूरा वर्सा लेने। सम्मुख जाकर गोद लेते हैं। तुम कहते हो हमने अब ईश्वरीय गोद ली है। ईश्वर से वर्सा पाना है। बाप आते हैं पतित दुनिया में, इस रावण रूपी दुश्मन से छुड़ाने। यह 5 विकार रूपी रावण ही मनुष्य का बड़े ते बड़ा दुश्मन है। यहाँ तुमको इस दुश्मन से छूटना है। पतित-पावन एक ही बाप है, जिसको शिवाए नम: कहते हैं। सबका साजन अभी तुम सजनियों को गुल-गुल बनाकर ले जाते हैं। अभी तुम्हारी आत्मा और शरीर - दोनों ही पतित हैं। मैं तुम्हारी आत्मा को पवित्र बनाता हूँ। तो शरीर भी पवित्र मिलेगा। फिर तुम सतयुग के महाराजा-महारानी बनेंगे। साजन आकर लायक बनाते हैं। जानते हो कि माया रावण ने नालायक बनाया था। अभी शिवबाबा ब्रह्मा तन से लायक बनाते हैं। अगर श्रीमत पर चलते रहेंगे तो। श्रीमत है भगवान की। मात-पिता भी उनको कहते हैं। कृष्ण को नहीं कहेंगे। अभी तुम बच्चे जानते हो जिसकी वह महिमा करते हैं, उनसे हम पढ़ रहे हैं। ब्राह्मण कुल बनता है जरूर। फिर दैवी कुल में जाना है। जरूर ब्रह्मा मुख से पहले-पहले यह ब्राह्मण चोटी निकलते हैं। तुम ब्राह्मण हो रूहानी पण्डे, रूहानी सेवा करने वाले। बाप कहते हैं मैं तुम्हारा पण्डा बन आया हूँ सच्चे-सच्चे तीर्थ पर ले जाने। तुमको बहुत सहज बात बतलाता हूँ। सिर्फ बाप को याद करना है और अपने को आत्मा समझना है। तुम्हें कोई भी ईविल बातें नहीं सुननी है, इविल बातें बहुत नुकसानकारक हैं। इस समय सारी दुनिया में पाँच भूतों की प्रवेशता है। तो इविल ही सुनायेंगे। बेहद के बाप की कितनी भारी महिमा है फिर कह देते सर्वव्यापी है। तुम समझा सकते हो - गाते हो पतित-पावन आओ। फिर सर्वव्यापी कहते हो तो सब पावन होने चाहिए। सर्वव्यापी के ज्ञान ने ही भारत को नास्तिक, कौड़ी तुल्य बना दिया है। बाप तो कहते हैं मैं तुम बच्चों को कल्प-कल्प आकर पतित से पावन बनाकर स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। मैं तुम्हारी सेवा में उपस्थित हूँ। भल कितना भी सहन करना पड़ता है तो भी सेवा में उपस्थित हूँ। मैं तो जानता हूँ - बच्चे बहुत हैं, कोई श्रीमत पर चलते हैं, कोई नहीं चलते हैं, कोई नहीं जानते हैं। अथाह बच्चे हैं। प्रजापिता ब्रह्मा सो तो जरूर प्रजा का ही बाप होगा। क्रियेटर ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रचते हैं। ब्रह्मा द्वारा तुम बच्चों को शिक्षा देता हूँ। लाडले बच्चे, मुझे निरन्तर याद करो तो तुम पतित से पावन बनते जायेंगे और तुम्हारी बुद्धि का ताला खुलता जायेगा। पत्थर से पारस बुद्धि बनाने की सेवा करने आया हूँ। नर्क से स्वर्ग में ले जाता हूँ। बाप आते ही हैं संगम पर। जबकि सारी सृष्टि पतित तमोप्रधान जड़जड़ीभूत बन जाती है। एक-दो को दु:ख देने लग पड़ते हैं। काम कटारी चलाकर एक दो को दु:ख देते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो कि हम बाबा के पास शान्तिधाम में जायेंगे फिर सुखधाम में आयेंगे। बाप कहते हैं तुम बच्चों को रूहानी नयनों पर बिठाकर स्वीट होम ले जायेंगे। अब तुम भी पण्डे के बच्चे पण्डे बनते हो। तुम्हारा नाम भी है शिव शक्ति पाण्डव सेना। हरेक को अपने बाप का परिचय दे बाप के पास जाने का रास्ता बताते हो। तुम्हें खुद भी वर्सा लेना है और औरों को भी देना है।

देखो, मेरठ से 22 की पार्टी आई है। मेहनत करते हैं, हरेक को कौड़ी से हीरे जैसा बनाने की राह बताते हैं। गाया भी जाता है - भगवान्, अन्धों की लाठी तुम। बाप आकर काँटों की दुनिया से फूलों की दुनिया में ले जाते हैं। तुम जानते हो असुर से फिर देवता बन रहे हैं। हम ही इन वर्णों से चक्र लगाकर आये हैं। अब शूद्र से ब्राह्मण बन फिर सो देवता बनेंगे। तुम हो गये स्वदर्शन चक्रधारी। यह अलंकार हैं तुम्हारे। परन्तु विष्णु को दे दिये हैं क्योंकि तुम्हारा स्थाई तो यह पार्ट रहता नहीं इसलिए देवताओं को यह निशानी दे दी है। बाप तो बच्चों पर तरस खाते हैं। कहाँ माया का असर न लग जाये। बाप को याद नहीं करेंगे तो माया जरूर खा जायेगी। बाबा जास्ती मेहनत नहीं देते हैं। सिर्फ कहते हैं मुझ बाप को याद करो। अपने को आत्मा निश्चय करो। यह है रूहानी यात्रा। तुम भी यात्रा करो। बाप को थोड़ेही भूलना चाहिए। योग अक्षर निकाल दो। बाप को याद करना है। क्या बाप को तुम भूल जाते हो? बाप कहते हैं अशरीरी बन जाओ। तुम अशरीरी हो। यहाँ आकर यह शरीर धारण किया है। अब फिर शरीर का भान छोड़ो। मैं वापिस ले चलूँगा। मैं कालों का काल हूँ। इस पुरानी देह को भूल मुझे याद करो। यह पुरानी जूती है। फिर तुमको नया शरीर देंगे। पुराने से ममत्व मिटाओ। मैं तुमको साथ ले जाऊंगा। तो खुश होना चाहिए कि हम जाते हैं पियर घर। पाँच हजार वर्ष हुए हैं, हमने शान्तिधाम को छोड़ा है। अब फिर हम जाते हैं। यह है दु:खधाम। बाप आकर बच्चों की सेवा करते हैं। आत्मा जो छी-छी बनी है, उनकी ज्योति जगाते हैं। सपूत बच्चे जो होंगे वह कहेंगे हम तो श्री नारायण को वरेंगे। बाप कहते हैं - अपना दिल दर्पण देखो - कोई भूत तो नहीं बैठा है? भूतों को भगाते रहो ताकि भूतों का राज्य ही खत्म हो जायेगा। बाप तो बच्चों की सेवा में उपस्थित है। वह तो विचित्र है, कोई चित्र नहीं है। दूसरे के आरगन्स द्वारा बाबा पढ़ाते हैं। वास्तव में तो विचित्र सब आत्मायें हैं। फिर बाद में चित्र लेकर पार्ट बजाती हैं। बाप कहते हैं मैं इस चित्र वा प्रकृति का आधार लेता हूँ, माताओं को ज्ञान कलष देता हूँ।

जब तुम बच्चे बाप को जान जाते हो तब ही वर्सा मिलता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप को याद कर, बाबा की श्रीमत पर चल पूरा माया के श्राप से मुक्त होना है।

2) देह का भान छोड़ अशरीरी बनना है, पुरानी दुनिया से ममत्व मिटा देना है।

वरदान:-

स्व-स्थिति की शक्ति से किसी भी परिस्थिति का सामना करने वाले मास्टर नालेजफुल भव!

स्व-स्थिति अर्थात् आत्मिक स्थिति। पर-स्थिति व्यक्ति वा प्रकृति द्वारा आती है लेकिन अगर स्व-स्थिति शक्तिशाली है तो उसके आगे पर-स्थिति कुछ भी नहीं है। स्व-स्थिति वाला किसी भी प्रकार की परिस्थिति से घबरा नहीं सकता क्योंकि नॉलेजफुल आत्मा हो गई। उसे तीनों कालों की, सर्व आत्माओं की नॉलेज है। वह जानते हैं कि यह परवश है इसलिए शुभ भावना, शुभ कामना द्वारा उसकी सेवा करेंगे, घबरायेंगे नहीं, सदा मुस्कराते रहेंगे।

स्लोगन:-

भाग्यवान वह है जो सदा भाग्य के गुण गाये, कमजोरियों के नहीं।

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