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06/12/17

06/12/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - बाप को और चक्र को याद करो, मुख से कुछ भी बोलने की दरकार नहीं, सिर्फ इस नर्क से दिल हटा दो तो तुम एवर निरोगी बन जायेंगे''

प्रश्न:

बाप डायरेक्ट आकर अपने बच्चों की श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने के लिए कौन सी राय देते हैं?

उत्तर:

बच्चे, अब तुम्हारा सब कुछ खत्म होने वाला है। कुछ भी काम नहीं आयेगा इसलिए सुदामे की तरह अपनी भविष्य प्रालब्ध बना लो। बाप डायरेक्ट आया है तो अपना सब कुछ सफल कर लो। हॉस्पिटल कम कॉलेज खोल दो जिससे बहुतों का कल्याण हो। सबको रास्ता बताओ। श्रीमत पर सदा चलते रहो।

ओम् शान्ति।

बेहद का बाप बच्चों को समझा रहे हैं। समझाया उसको जाता है जो बेसमझ होते हैं। तुम जानते हो कि बरोबर सब पतित हैं और पतित-पावन बाप को याद करते हैं। पतित मनुष्य को जरूर बेसमझ कहेंगे। सभी बुलाते हैं कि हे पतित-पावन आकर हमको पावन बनाओ। भारतवासी जानते हैं कि सतयुग में यह भारत पावन था। पावन गृहस्थ धर्म था, इस समय पतित गृहस्थ अधर्म है। धर्मात्मा पावन को कहा जाता है। इस भारत में 5 हजार वर्ष पहले जब लक्ष्मी-नारायण का राज्य था तो उनको पावन राज्य कहा जाता था। नर और नारी दोनों पावन थे। बाप बैठ समझाते हैं आधाकल्प से भक्ति मार्ग चला है। जप-तप आदि करना, वेद अध्ययन करना, यह सब भक्ति मार्ग है, इससे मुझे कोई प्राप्त नहीं कर सकता। मुझ बाप को जानते ही नहीं हैं। यह सब वेस्ट आफ टाइम, वेस्ट आफ इनर्जी करते हैं। द्वापर से लेकर भक्ति मार्ग शुरू होता है। फिर देवतायें वाम मार्ग में जाते हैं। लाखों करोड़ों रूपया खर्च कर देवताओं के मन्दिर बनाते हैं। सोमनाथ का मन्दिर कितना हीरे-जवाहरों से सजा हुआ था। उस समय के हिसाब अनुसार करोड़ों रुपये खर्च नहीं किया होगा क्योंकि उस समय तो हीरे-जवाहर आदि का दाम कुछ भी नहीं रहता। इस समय अगर वह मन्दिर होता तो अथाह पदमों की मिलकियत हो जाए।
अब बाप समझाते हैं मीठे बच्चे वेद, शास्त्र अध्ययन करना, यह भक्ति है, उसको ज्ञान नहीं कहा जाता। सतयुग में तीर्थ आदि नहीं मानते हैं। गंगा-जमुना नदियाँ तो सतयुग में भी हैं। अभी भी हैं। सतयुग में कोई तीर्थ करने के लिए नदियाँ नहीं थी। बाप तो है ज्ञान का सागर, वह बैठ ज्ञान देते हैं। आधाकल्प यह भक्ति चलती है। पहले अव्यभिचारी भक्ति होती है। शिव की ही पूजा करते हैं। फिर देवताओं की, अभी तो भक्ति व्यभिचारी हो गई है। भक्ति करते, शास्त्र आदि पढ़ते रहते हैं तो सब भगत हो गये। सजनियाँ मुझ एक साजन को याद करती हैं। भक्तों की रक्षा करने वाला है भगवान। तो जरूर भक्ति में तकलीफ होती है तब तो कहते हैं आकर हमको लिबरेट करो। दु:ख से मुक्त करो। गाइड बन मुक्तिधाम में ले चलो। उनको यह पता नहीं है कि भगवान कौन है। शिव वा शंकर के मन्दिर में जाते हैं। शिव-शंकर को इकट्ठा कर दिया है। हैं दोनों अलग-अलग, वह निराकार, वह सूक्ष्म शरीरधारी। वह मूलवतन में रहने वाला, वह सूक्ष्मवतन में रहने वाला। तो बाप समझाते हैं मन्दिर में बैल दिखाते हैं। समझते हैं शिव-शंकर की बैल पर सवारी थी। अब शिव के लिए कहते हैं वह सर्वव्यापी है। ऐसे नहीं कहेंगे कि शिव शंकर सर्वव्यापी हैं। एक परमपिता परमात्मा निराकार को कहते हैं। अब बाप कहते हैं देखो मैं निराकार तुमको कैसे पढ़ाता हूँ। बैल पर कोई सवारी थोड़ेही होती है। हमारी सवारी बैल पर क्यों दिखाई है? मैं तो साधारण मनुष्य तन में प्रवेश करके आता हूँ। इनके 84 जन्मों की कहानी बैठ तुमको सुनाता हूँ। तुम भी ब्रह्मा मुख वंशावली आकर बने हो। इनका नाम है भागीरथ अर्थात् भाग्यशाली रथ क्योंकि पहले-पहले यह सुनते हैं और यही सौभाग्यशाली हैं। सतयुग में बहुत थोड़े होते हैं। बाकी सब आत्मायें वापिस चली जाती हैं अपने घर, जहाँ से आई हैं। यह कर्मक्षेत्र है। सृष्टि का चक्र फिरता रहता है। मूलवतन, सूक्ष्मवतन में यह सतयुग त्रेता नहीं होते हैं। यह ड्रामा का चक्र यहाँ फिरता है। आधाकल्प ज्ञान सतयुग-त्रेता, आधाकल्प भक्ति द्वापर-कलियुग। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था फिर लक्ष्मी-नारायण दी फर्स्ट, सेकेण्ड.. राजाई चलती है। त्रेता में है चन्द्रवंशी राम की डिनायस्टी। सतयुग में 8 जन्म, त्रेता में 12 जन्म। यह 84 जन्मों की कहानी बाप ही समझाते हैं। बाप अपने ब्राह्मण बच्चों को ही मिलते हैं और किसको नहीं। बच्चे बने हैं तब उनको पढ़ाते हैं। बाप कहते हैं - मैं तुम्हारा बाप-टीचर-सतगुरू हूँ। सद्गति कर साथ ले जाता हूँ। पावन होने का बहुत सहज उपाय है, जो तुमको बतलाता हूँ। यहाँ बैठ तुम क्या करते हो? बच्चे कहते हैं - बाबा हम आपको याद करते हैं। आपका फरमान है कि निरन्तर मुझे याद करने का पुरुषार्थ करो तो इस योग अग्नि से तुम्हारे विकर्म विनाश हो जायेंगे। फिर तुम पवित्र सतोप्रधान बन जायेंगे। अब तुम तमोप्रधान हो, याद से ही खाद निकलेगी। कोई तकलीफ की बात नहीं। एवर निरोगी बनने के लिए कितनी सहज युक्ति है। देवतायें कभी बीमार नहीं होते। इस याद से ही तुम निरोगी बनेंगे। पाप भस्म होने से तुम पावन बन जायेंगे। बड़ी भारी कमाई है। घूमो, फिरो सिर्फ मुझे याद करो। पहले यह प्रैक्टिस करनी है। याद करने से हम 21 जन्म के लिए निरोगी बन जायेंगे। कोई तकलीफ की बात नहीं, सिर्फ मामेकम् याद करो। यह बाप ने आत्माओं को कहा, हे आत्मायें सुनती हो? बाप मुख से कहते हैं मुझे याद करो और घर को याद करो। अब यह नर्क खलास होना है। जाना है अपने घर। भोजन बनाते समय भी याद का पुरुषार्थ करो। भल तुम कर्मयोगी हो तो भी कम से कम 8 घण्टे तक जरूर पहुँचो। 5 मिनट, 10 मिनट, आधा घण्टा ऐसे चार्ट को बढ़ाते रहो। जाँच करते रहो हमने कितना समय बाप को याद किया? जिस बाप से वैकुण्ठ की बादशाही मिलती है, 21 जन्मों के लिए सदा निरोगी बनते हैं। कितनी सहज युक्ति है। चक्र का नॉलेज समझाया है कि चोटी ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह चक्र याद करना है। बीज और झाड़ को याद करो। अभी तुम जानते हो एक धर्म की स्थापना हो तो दूसरे धर्म विनाश हो जायेंगे। सतयुग में एक ही धर्म है। तुमको मेहनत ही इसमें है। बाप कहते हैं मुझ बीज को याद करो और झाड़ को याद करो। स्थापना, विनाश और पालना... यह है बहुत सहज। सहजयोग और सहज ज्ञान। बीज से झाड़ कैसे निकलता है, यह तुम्हारी बुद्धि में ज्ञान है। रहो भल गृहस्थ में परन्तु पवित्र रहना है। यह तो अच्छा है ना। बाप कहते हैं 63 जन्म तुमने नर्क में गोते खाये हैं। पाप किये, अब बिल्कुल ही पाप आत्मा बन पड़े हो। रावण की मत पर चलते आये हो। गाँधी भी रामराज्य चाहते थे। इसका मतलब रावण राज्य में थे। मनुष्यों की बुद्धि कितनी मलीन हो गई है। कुछ भी समझते नहीं हैं। स्वर्ग कब था किसको पता ही नहीं है। लक्ष्मी-नारायण को 5 हजार वर्ष हुए हैं, यह किसको मालूम नहीं है। सतयुग की आयु लाखों वर्ष कह देते हैं। आधाकल्प है ज्ञान, आधाकल्प है भक्ति फिर जब पुरानी दुनिया हो जाती है तो आता है वैराग्य। इस नर्क से दिल हटा देते हैं।
तुम यहाँ बैठे बहुत कमाई करते हो। बाप कहते हैं - तुम चक्रवर्ती राजा बनते हो। यह तुम्हारा अन्तिम 84 वाँ जन्म है, विनाश सामने खड़ा है। मृत्युलोक का विनाश अमरलोक की स्थापना हो रही है। अमरनाथ बाबा से हम सत्य-नारायण बनने की सत्य कथा सुन रहे हैं। है एक कथा। शास्त्र आदि कितने ढेर बनाये हैं। करोड़-पदम रूपये खर्च करते हैं। है सब झूठ। बाप सच बताए सचखण्ड की स्थापना करते हैं। कितना अच्छी रीति समझाया जाता है। कैसी भी अबलायें, गणिकायें, अहिल्यायें उस स्वर्ग का मालिक बन सकती हैं। तुम्हारे पास अभी क्या रखा है? अमेरिका में क्या है? बड़े-बड़े महल हैं। वह तो अभी गिरे कि गिरे। स्वर्ग में तो अकीचार धन था। यहाँ तो धन है ही नहीं। अमेरिका के व्हाइट हाउस को क्या लूटेंगे? कुछ भी रखा नहीं है। वहाँ सतयुग में तो गरीब से गरीब का महल भी यहाँ से अच्छा होगा। चाँदी सोना लगा हुआ होगा। वहाँ सब सस्ताई रहती है, सबको अपनी जमीन रहती है। सुदामे का मिसाल... भक्ति मार्ग में दो मुट्ठी ईश्वर अर्थ देते आये हो। कोई 5-10-100 रुपये भी दान करते हैं, जिसका एवजा दूसरे जन्म में मिलता है इसलिए ही मनुष्य दान-पुण्य आदि करते हैं। कोई हॉस्पिटल खोलते हैं तो दूसरे जन्म में तन्दरुस्ती अच्छी मिलती है। कोई बीमारी नहीं होती है। कोई कॉलेज बनाते हैं तो दूसरे जन्म में पढ़कर होशियार हो जाते हैं। एक जन्म का फल दूसरे जन्म में मिलता है। अब परमपिता परमात्मा निराकार बाप तो दाता है। बाप कहते हैं - बच्चे एक हॉस्पिटल कम कॉलेज खोलो, इसमें बहुतों का कल्याण होगा। इसका फल तुमको 21 जन्म के लिए मिलेगा। वह है इनडायरेक्ट एक जन्म के लिए, यह है डायरेक्ट, 21 जन्मों के लिए प्रालब्ध मिलती है क्योंकि अब बाप डायरेक्ट बैठे हैं। समझाते हैं तुम्हारा सब कुछ खत्म होने वाला है। महल माड़ियाँ सब मिट्टी में मिल जानी हैं इसलिए अब भविष्य की कमाई करो जो तुम्हारे काम आये। जो भी आये उसको रास्ता बताओ, बाप को याद करो तो तुम्हारी कट निकलेगी। पारलौकिक बाप है। बाप कहते हैं श्रीमत पर चलने से तुम स्वर्ग के मालिक, पारसबुद्धि बन सकते हो। कितनी युक्तियाँ भी समझाते रहते हैं। हर एक के कर्म का हिसाब अपना-अपना है। बाप कर्म-अकर्म-विकर्म की गति बैठ समझाते हैं। कोई भी तकलीफ हो तो सर्जन के पास आकर श्रीमत लो। अहिल्याओं, कुब्जाओं... सबको यह रास्ता बताना है। पवित्रता पर ही हंगामा होता आया है। विष नहीं दिया तो मारने लग पड़ते। घर से निकाल देते हैं। कितना हंगामा करते हैं। बाबा कहते हैं इस ज्ञान यज्ञ में असुरों के विघ्न बहुत पड़ेंगे। अबलाओं पर अत्याचार बहुत होंगे और सतसंगों में कभी अत्याचार नहीं होते हैं। यहाँ पर विघ्न पड़ते हैं। बाबा कहते हैं - कितने पतित बन पड़े हैं। अभी तुम पवित्र बनते हो - पावन दुनिया का मालिक बनने के लिए। बाप का फरमान है यह अन्तिम जन्म पवित्र बन मुझे याद करो तो विकर्म विनाश हों। इसका नाम ही है सहज राजयोग और कोई शास्त्र में यह युक्ति नहीं है। गीता में है देह के सब धर्म त्याग मुझ अपने बाप को याद करो। अब कृष्ण तो भगवान है नहीं। भगवान सब आत्माओं का बाप एक है। शरीर का लोन लिया है, यह है भाग्यशाली रथ। इनको खुशी तो होती है कि मेरा शरीर भगवान काम में लाते हैं। इस शरीर में बाप आकर सबका कल्याण करते हैं। बाकी बैल आदि नहीं है। इन बातों को नया क्या समझे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) इस अन्तिम जन्म में सम्पूर्ण पवित्र बन बाप की याद में ही रहना है। इस पतित दुनिया से दिल हटा देना है।

2) स्वदर्शन चक्रधारी बनना है। हॉस्पिटल कम कॉलेज खोल अनेकों का कल्याण करना है। हर कदम पर सुप्रीम सर्जन से श्रीमत लेनी है।

वरदान:

स्वदर्शन चक्र के टाइटल की स्मृति द्वारा परदर्शन मुक्त बनने वाले मायाजीत भव!

संगमयुग पर स्वयं बाप बच्चों को भिन्न-भिन्न टाइटल्स देते हैं, उन्हीं टाइटल्स को स्मृति में रखो तो श्रेष्ठ स्थिति में सहज ही स्थित हो जायेंगे। सिर्फ बुद्धि से वर्णन नहीं करो लेकिन सीट पर सेट हो जाओ, जैसा टाइटल वैसी स्थिति हो। यदि स्वदर्शन चक्रधारी का टाइटल स्मृति में रहे तो परदर्शन चल नहीं सकता। स्वदर्शन चक्रधारी अर्थात् मायाजीत। माया उसके आगे आने की हिम्मत भी नहीं रख सकती। स्वदर्शन चक्र के आगे कोई भी ठहर नहीं सकता।

स्लोगन:

वानप्रस्थ स्थिति का अनुभव करो और कराओ तो बचपन के खेल समाप्त हो जायेंगे।

14/11/17

14/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम रूहानी यात्रा पर हो, तुम्हें वापिस इस मृत्युलोक में नहीं आना है, तुम्हारा उद्देश्य है मनुष्य से देवता बनना और बनाना”

प्रश्न:

16 कला सम्पूर्ण बनने वालों की निशानी क्या होगी?

उत्तर:

वह अपनी झोली ज्ञान रत्नों से अच्छी तरह से भरकर दूसरों की भी भरेंगे। ज्ञान रत्नों का दान कर अपना मर्तबा ऊंच बनायेंगे। 2- वह पक्के महावीर होंगे, उन्हें माया जरा भी हिला नहीं सकती। वह अखण्ड-अचल शुरू से अन्त तक चलते रहेंगे ।

प्रश्न:

पापों से मुक्त हो पुण्य आत्मा बनने की युक्ति क्या है?

उत्तर:

इस अन्तिम जन्म की कहानी बाप को सुनाकर राय लो। साथ-साथ बाप को याद करते ज्ञान रत्नों का दान करते रहो तो पुण्य आत्मा बन जायेंगे।

गीत:-

भोलेनाथ से निराला...  

ओम् शान्ति।

बाबा ने ओम् का अर्थ समझाया है। बाप भी कहते हैं - ओम् शान्ति। ओम् शान्ति। आत्मा का अपना स्वरूप वा लक्ष्य शान्ति है। आत्मा का धर्म शान्त है। बाबा भी अपना परिचय देते हैं। जैसे परमपिता परमात्मा का परिचय वैसे आत्माओं का। मनुष्य ओम् का अर्थ कितना लम्बा करते हैं। ओम् अर्थात् भगवान भी कह देते हैं। भोलानाथ की भी महिमा है। भोलानाथ शंकर को नहीं कहेंगे क्योकि शंकर आदि-मध्य-अन्त का राज़ नहीं समझाते हैं। वह तो भोलानाथ ही बताते हैं। भोलानाथ वर्सा देते हैं - शंकर वर्सा नहीं देते। ऐसे भी नहीं शंकर कोई शान्ति देते हैं। नहीं। शान्ति देने लिए भी साकार में आकर समझाना पड़े। शंकर तो साकार में आते नहीं। भोलानाथ ही शान्ति, सुख, सम्पत्ति, बड़ी आयु भी देते हैं। हर चीज़ अविनाशी देते हैं क्योंकि अविनाशी बाप है, वर्सा भी अविनाशी देते हैं। ड्रामा को भी अविनाशी कहा जाता है। हद के ड्रामा वा नाटक तो अभी बने हैं। यह तो अनादि ड्रामा है। यह बेहद का नाटक है। स्थूल नाटक मनुष्यों के होते हैं। वह रिपीट होते हैं। जैसे कंस वध का खेल बनाया है फिर वही खेल दिखायेंगे। यह बेहद का ड्रामा सतयुग से शुरू होता है। कलियुग अन्त तक खलास हो फिर रिपीट होता है। वर्ल्ड रिपीट कहा जाता है। कौन सी वर्ल्ड? बरोबर सतयुगी वर्ल्ड जो थी वह अब रिपीट होनी है। आधाकल्प के बाद पुरानी वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती है। नई को दिन, पुरानी को रात कहा जाता है। यह सब बातें बाप समझाते हैं। वह है ज्ञान सागर। शुरू से लेकर अन्त तक ज्ञान लेना है। पढ़ना है। वह पढ़ाई 15-20 वर्ष चलती है। यह बड़ा भारी इम्तहान है, इनका उद्देश्य है मनुष्य से देवता बनना। जो भी सिर पर पाप हैं उनको जलाना है। इसके लिए बाबा ने रूहानी यात्रा सिखलाई है। जहाँ से वापिस इस मृत्युलोक में नहीं आना है। जिस्मानी यात्रा तो जन्म-जन्मान्तर बहुत की, तुम बच्चों ने आदि को भी जाना है, मध्य को भी जाना है। मध्य में कितनी बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। रावण राज्य शुरू होता है। भक्ति मार्ग शुरू होता है। मनुष्य भ्रष्टाचारी बनने शुरू होते हैं। सम्पूर्ण भ्रष्टाचारी बनने में आधाकल्प लगता है। माया का राज्य द्वापर से शुरू होता है। तो भक्ति और रावण राज्य दोनों नाम गिरने के हैं। भक्ति के बाद भगवान मिलेगा। बाप कहते हैं तुम सबसे जास्ती भक्ति करते हो। फिर ज्ञान भी तुम ही लेते हो। ज्ञान और भक्ति के संगम पर तुमको वैराग्य चाहिए। तुम सन्यास करते हो 5 विकारों का। उनको सिखलाने वाला शंकराचार्य है, उनका है हठ योग। अनेक प्रकार के योग सीखते हैं। घरबार छोड़ ब्रह्म के साथ योग रखते हैं। उनको तत्व ज्ञानी, तत्व योगी कहते हैं। ज्ञान देते भी हैं तत्व का। समझते हैं चक्र फिरना है, हमको पार्ट बजाना है। यह बातें उनके आगे ऐसे हैं जैसे बन्दर के आगे डमरू बजायें। अब बन्दर मिसल मनुष्यों को मन्दिर लायक बनाने के लिए यह ज्ञान डांस करते हैं, ज्ञान डांस को उन्होंने डमरू नाम रख दिया है। और कहते हैं राम ने बन्दर सेना ली। बाबा समझाते हैं तुम सब बन्दर थे। शिवबाबा ज्ञान डमरू बजाए बन्दर से मन्दिर बनाते हैं। वह समझते हैं लंका में रावण का राज्य था। बाप कहते हैं सारी दुनिया सागर के बीच खड़ी है। इस समय सारी दुनिया में रावण राज्य है। वह हद की बातें सुनाते हैं। बाप तो बेहद का राज़ समझाते हैं। सारी दुनिया रावण की जंजीरों में फॅसी हुई है। सारी दुनिया को विकारों के कारण पतित कहा जाता है। पतित पुकारते हैं कि हे पतित-पावन आओ, आकर हमको पावन बनाओ। आत्मा को ही पावन बन वापिस घर जाना है।
तुम जानते हो एक बाप के बच्चे हम भाई बहन ठहरे। तो जरूर प्रजापिता ब्रह्मा भी चाहिए। शिवबाबा कहते हैं कि तुम निराकार आत्मायें शिव वंशी हो फिर साकार में भाई बहन बनते हो। निराकार में सब भाई-भाई हो। फिर प्रजापिता ब्रह्मा साकार में आते हैं तो तुमको भाई बहन बनाते हैं। रूहानी रीति से भाई-भाई जिस्मानी रीति से भाई बहन हो। तो यह निश्चय रखना है कि हम शिववंशी प्रजापिता ब्रह्माकुमार कुमारियाँ हैं। वर्सा पाना है बाप से। बाप को अविनाशी सर्जन भी कहा जाता है। हर एक का कर्मबन्धन अलग-अलग है। बाप आकर कर्म, अकर्म और विकर्म की गति समझाते हैं। हर एक को अपनी-अपनी जीवन कहानी सुनानी होती है। यह तो जानते हो द्वापर से लेकर तुम पतित बनते हो। अब यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है, जो कुछ पाप किये हैं वह सब कुछ जमा होते आये हैं। अब हमको पुण्य जमा करने हैं। इतने जन्म के पाप कैसे कटें और हम पुण्य आत्मा कैसे बनें? बाप कहते हैं - मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे और ज्ञान रत्नों का दान करना है। जो बहुत दान करेंगे वह ऊंच मर्तबा पायेंगे। भारत जैसा दान कोई करता नहीं। अब उनको मिलता कहाँ से है? बेहद का बाप सबसे बड़ा फ्लैन्थ्रोफिस्ट है। बाप आकर जीयदान देते हैं। झोली भरकर तृप्त कर देते हैं। अपनी झोली कम वा जास्ती भरना वह तो बच्चों के ऊपर है। नम्बरवार झोली भरते हैं। कितने ब्राह्मण ब्राह्मणियाँ हैं। कितने सेन्टर्स हैं। वृद्धि को पाते जायेंगे। शिवबाबा का सिज़रा है अविनाशी। यह फिर साकार सिजरा बनता है। ड्रामा अनुसार शूद्र से ब्राह्मण बनना ही है। तुम नहीं बनो - यह नहीं हो सकता। ड्रामा अनुसार इतने बनने हैं जितने ड्रामा अनुसार बने थे, वही सतयुग के देवता बनते हैं। झाड वृद्धि को पाता रहता है। कितने झड़ भी जाते हैं। कोई तो ऐसे पक्के महावीर बनते हैं जो माया उनको हिला न सके। वह अखण्ड अचल रहते हैं। अखण्ड अर्थात् शुरू से लेकर चलते आते हैं। महावीर भी तुम बच्चों को कहा जाता है। अचल स्थिर बनना है, ऐसा कोई कह न सके कि हम 16 कला बन गये हैं। नहीं। बनना जरूर है। 16 कला सम्पूर्ण बनने की निशानी क्या है? जो अच्छी रीति अपनी झोली भरकर औरों की भरते हैं। ड्रामा अनुसार कल्प पहले जिसने ज्ञान की धारणा की है, सो करेंगे। हम साक्षी होकर देखते हैं। पुरुषार्थ तो जरूर करना पड़े। पुरुषार्थ के बिगर प्रालब्ध नहीं मिल सकती। वह सब मनुष्य, मनुष्य के द्वारा पुरुषार्थ करते हैं। शास्त्र भी मनुष्यों ने बनाये हैं। अब तुमको परमपिता परमात्मा की श्रीमत मिलती है। ऊंचे ते ऊंचा है भगवान। ऊंचे ते ऊंचा उनका ठाँव है। बाप आया है सुखधाम, शान्तिधाम का मालिक बनाने। सबको शान्तिधाम ले जाते हैं। कितना बड़ा बेहद का पण्डा है। वह एक है, बाकी जिस्मानी यात्रा पर ले जाने वाले तो अनेक पण्डे हैं। कुम्भ के मेले पर ढेर पण्डे होते हैं। यह सच्चा-सच्चा कुम्भ का मेला है। परन्तु पण्डा एक ही है। तुम हो पाण्डव सेना। उन्होने तो 5 पाण्डव दिखाये हैं। वास्तव में गायन इनका है। यह है शक्ति सेना, वन्दे मातरम्। मुख्य है भारत। यह सबका माता-पिता है, सबको पावन बनाते हैं। कृष्ण को तो सब नहीं मानते। कृष्ण का नाम गीता में डालने के कारण भारत को इतना ऊंच तीर्थ समझते नहीं हैं। बाप कहते हैं गीता पढ़ते-पढ़ते मनुष्यों की क्या हालत हो गई है। बाप तो सबको वर्सा देते हैं। ज्ञान तो अथाह है। सागर को स्याही बनाओ तो भी बेअन्त, अन्त नहीं पाया जाता। गीता में शिवाए नम: के बदले कृष्ण का नाम डाल दिया है। अब तुमको अन्धों की लाठी बनना है। बाप का परिचय देना है कि ऊंचे ते ऊंच कौन है? परमपिता परमात्मा। वर्सा किससे मिलेगा? उनसे। कल्प पहले भी ब्रह्मा द्वारा वर्सा लिया था। स्थापना हुई थी। वर्णों को जरूर फिरना है। तुम शूद्र से ब्राह्मण बनते हो। ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ रचा जाता है। तुम हो सच्चे ब्राह्मण, वह हैं झूठे ब्राह्मण। भगवानुवाच - मैं तुम बच्चों को राजयोग सिखलाता हूँ। यहाँ तुमको भगवान पढ़ाते हैं। वहाँ मनुष्य, मनुष्य को पढ़ाते हैं। सबको पहले बाप का परिचय देना है। परमपिता परमात्मा से आपका क्या सम्बन्ध है? कितना भी समझाओ फिर भी कह देते हैं परमात्मा सर्वव्यापी है। पत्थरबुद्धि हैं। अरे हम सम्बन्ध पूछते हैं, सर्वव्यापी का सम्बन्ध होता है क्या? प्रदर्शनी करते जाओ तो वृद्धि होती जायेगी। तुमको बहुत वोट्स मिलती जायेंगी। बाबा लिखते रहते हैं - धर्म के नेताओं आदि को निमंत्रण देना है। फिर पहरा भी पूरा रखना है। अगर तुमने यह दो तीन बातें सिद्ध कर दी तो उन सबका धन्धा ही ठण्डा हो जायेगा।
तो बच्चों को सर्विस जोर-शोर से बढ़ानी है। बहुत समझते भी हैं। परन्तु बाहर निकले और खलास। सृष्टि चक्र को समझ ले वह मुश्किल हैं। ऐसे-ऐसे जो सही कर जाते हैं उनको फिर चिट्ठी लिखनी चाहिए कि तुम फार्म भरकर फिर सो गये क्यों? मेहनत चाहिए परन्तु ड्रामा अनुसार जो बच्चों ने मेहनत की है वह ठीक है। ड्रामा में जो था सो रिपीट हुआ। जितनी सर्विस बढ़नी थी, जितने ब्राह्मण बनने थे उतने बने हैं। वृद्धि होती जायेगी। कोई सेकेण्ड में बाप को पहचानेंगे। कोई 7 दिन में, कोई एक मास में, कोई चलते-चलते ठण्डे हो पड़ते हैं। फिर संजीवनी बूटी से खड़े हो जाते हैं। बच्चे जानते हैं - श्रीमत पर हम भारत को स्वर्ग बनाने के रेसपान्सिबुल बने हुऐ हैं। श्रीमत से स्वर्गवासी बनाना है। यह खेल है। अब तुम शिवालय में चलते हो। पहले तुम स्वर्गवासी थे फिर इतने जन्मों के बाद रावण ने नर्कवासी बनाना शुरू किया। अब पूरे नर्कवासी, कंगाल बन गये हैं।
बाबा कहते हैं तुम बच्चे स्वदर्शन चक्रधारी बनते हो। रावण का सिर काटते हो। रावण दुश्मन पर जीत पाते हो। रावण फारेनर है। हमारा रामराज्य था। अब सारी दुनिया ने रावण से हराया है। यह शोक वाटिका है। सतयुग अशोक वाटिका है। यहां अशोका होटल नाम रखा है। जैसे सन्यासियों ने शिव नाम रखा है। शिव और विष्णु की माला मशहूर है। ब्राह्मणों की माला बन न सके। कृष्ण की भी माला बन न सके। यह है रुद्र माला। विष्णु की माला प्रवृत्ति मार्ग की है। मनुष्य कहेंगे इन जैसा पावन बनाओ। एम आबॅजेक्ट सामने खड़ा है। तुम श्याम से सुन्दर बन रहे हो। पुरानी दुनिया को लात मारते हो। कृष्ण की आत्मा गौरी थी, इसलिए स्वर्ग का गोला उनके हाथ में दे दिया है। कृष्ण, नारायण, शिव को भी काला कर दिया है। जो शिव सर्व का रचयिता है, उसे भी जानते नहीं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते ।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) बाप समान मनुष्य आत्माओं को जीयदान देना है। बेहद के बाप से दान लेकर दूसरों को देना है। महादानी जरूर बनना है।

2) स्वदर्शन चक्रधारी बन रावण का सिर काटना है। बेहद का वैरागी बन विकारों का सन्यास करना है।

वरदान:

ड्रामा में समस्याओं को खेल समझ एक्यूरेट पार्ट बजाने वाले हीरो पार्टधारी भव!

हीरो पार्टधारी उसे कहा जाता - जिसकी कोई भी एक्ट साधारण न हो, हर पार्ट एक्यूरेट हो। कितनी भी समस्यायें हो, कैसी भी परिस्थितियां हों किसी के भी अधीन नहीं, अधिकारी बन समस्याओं को ऐसे पार करें जैसे खेल-खेल में पार कर रहे हैं। खेल में सदा खुशी रहती है, चाहे कैसा भी खेल हो, बाहर से रोने का भी पार्ट हो लेकिन अन्दर रहे कि यह सब बेहद का खेल है। खेल समझने से बड़ी समस्या भी हल्की बन जायेगी।

स्लोगन:

जो सदा प्रसन्न रहते हैं वही प्रशन्सा के पात्र हैं।

01/11/17__

01/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - श्रीमत पर चल स्वच्छ शुद्ध बन धारणा कर फिर युक्तियुक्त सेवा करनी है, अहंकार में नहीं आना है, शुद्ध घमण्ड में रहना है”

प्रश्न:

किस एक बात के कारण बाप को इतनी बड़ी नॉलेज देनी पड़ती है?

उत्तर:

गीता के रचयिता निराकार परमपिता परमात्मा को सिद्ध करने के लिए बाप तुम्हें इतनी बड़ी नॉलेज देते हैं। सबसे बड़ी भूल यही है जो गीता में पतित-पावन बाप की जगह श्रीकृष्ण का नाम डाला है, इसी बात को सिद्ध करना है। इसके लिए भिन्न-भिन्न युक्तियां रचनी है। बाप की माहिमा और श्रीकृष्ण की महिमा अलग-अलग बतानी है।

गीत:-

मरना तेरी गली में .....  

ओम् शान्ति।

बच्चों ने गीत सुना, कहते हैं आये हैं तेरे दर पर जीते जी मरने के लिए। किसके दर पर? फिर भी यही बात निकलती कि अगर गीता का भगवान कृष्ण को कहें तो यह सब बातें हो न सकें। वह है सतयुग का प्रिन्स। गीता कृष्ण ने नहीं सुनाई। गीता परमपिता परमात्मा ने सुनाई। सारा मदार इस बात पर है। एक बात को समझ जाएं तो भारत के जो इतने शास्त्र हैं - सब झूठे सिद्ध हो जाएं। यह हैं सब भक्तिमार्ग के, इनमें कर्मकान्ड तीर्थ यात्रा, जप-तप आदि की कहानियां लिखी हुई हैं। भक्ति मार्ग में तुम इतनी मेहनत करते आये हो, वह तो दरकार नहीं। यह तो सेकेण्ड की बात है। सिर्फ यह एक बात सिद्ध करने के लिए भी बाप को कितनी नॉलेज देनी पड़ती है। प्राचीन नॉलेज जो भगवान ने ही दी है, वही नॉलेज है। सारी बात गीता पर है। परमपिता परमात्मा ने ही आकर देवी-देवता धर्म की स्थापना अर्थ सहज राजयोग और ज्ञान सिखलाया है, जो अब प्राय:लोप है। मनुष्य समझते हैं कृष्ण फिर आकर गीता सुनायेगा। परन्तु अब तुमको यह अच्छी तरह सिद्ध करना है कि गीता परमपिता परमात्मा ने, जो ज्ञान का सागर है, उसने सुनाई है। कृष्ण की महिमा और परमपिता परमात्मा की महिमा अलग-अलग है। वह है सतयुग का प्रिन्स, जिसने सहज राजयोग से राज्य-भाग्य पाया है। पढ़ते समय नाम रूप और है फिर जब राज्य पाया है तब और है। पहले पतित है फिर पावन बना है, यह सिद्ध कर बताना है। पतित-पावन कृष्ण को कभी नहीं कहेंगे। पतित-पावन है ही एक बाप। अब वही श्रीकृष्ण की आत्मा जो काली अर्थात् श्याम बन गई है। अब फिर से पतित-पावन द्वारा राजयोग सीख भविष्य पावन दुनिया का प्रिन्स बन रही है। यह सिद्ध कर समझाने में युक्तियां चाहिए। फारेनर्स को सिद्धकर बताना है। नम्बरवन है ही गीता सर्वशास्त्रमई श्रीमत भगवत गीता माता। अब माता को जन्म किसने दिया? बाप ही माता को एडाप्ट करते हैं। ऐसे नहीं कहेंगे कि क्राइस्ट ने बाइबिल को एडाप्ट किया। क्राइस्ट ने जो शिक्षा दी उनका बाइबिल बनाकर पढ़ते रहते हैं। अब गीता की शिक्षा किसने दी जो पुस्तक बनाकर पढ़ते रहते हैं। यह किसको पता नहीं और सबके शास्त्रों का पता है। यह जो सहज राजयोग की शिक्षा है वह किसने दी, यह सिद्ध करना है। दुनिया तो दिन-प्रतिदिन तमोप्रधान होती जाती है। यह सब ख्यालात स्वच्छ बुद्धि में ही बैठ सकते हैं। जो श्रीमत पर नहीं चलते उनको धारणा भी नहीं हो सकती। श्रीमत कहेगी तुम बिल्कुल समझा नहीं सकते हो। बाबा फट से कह देंगे - मुख्य बात यह है कि गीता का भगवान परमपिता परमात्मा है। वही पतित-पावन है। मनुष्य तो सर्वव्यापी कह देते हैं वा ब्रह्म तत्च कह देते। जो आता है वह कह देते हैं - बिगर समझ। भूल सारी गीता से निकली है, जो गीता का रचयिता कृष्ण को कह दिया है। तो समझाने के लिए युक्तियां रचनी पड़े। गुप्ता जी को भी कहते थे कि बनारस में यह सिद्धकर समझाओ कि गीता का भगवान श्रीकृष्ण नहीं।
अब देहली में सम्मेलन होता है। सब रिलीज़स मनुष्यों को बुला रहे हैं क्या उपाय करें जो शान्ति हो जाए? अब शान्ति स्थापन करना इनके हाथ में तो है नहीं। कहते भी हैं पतित-पावन आओ। फिर यह पतित कैसे शान्ति स्थापन कर सकते? जबकि बुलाते रहते हैं। परन्तु पतित-पावन को जानते नहीं। कह देते हैं रघुपति राघो राजाराम। वह तो है नहीं। झूठा बुलावा करते हैं, जानते कुछ भी नहीं। अब यह कौन जाकर बताये। बड़े अच्छे बच्चे चाहिए। ऐसे बहुत हैं जो अपने को बहुत ज्ञानी समझते हैं। परन्तु है कुछ भी नहीं। मिसाल है चूहे को मिली हल्दी की गांठ.. नम्बरवार हैं। इसमें बड़ी युक्ति चाहिए, जिससे सिद्ध हो जाए - गीता भगवान ने रची है। वह कह देते कोई भी हो, हैं तो सब भगवान। बाबा कहते हैं - भगवानुवाच, मैं उस कृष्ण की आत्मा, जो 84 जन्म पूरे कर अन्तिम जन्म में है, उनको एडाप्ट कर ब्रह्मा बनाए उन द्वारा गीता ज्ञान देता हूँ। वह ब्रह्मा फिर इस सहज राजयोग से फर्स्ट प्रिन्स सतयुग का बन जाता है। यह समझानी और कोई की बुद्धि में नहीं है। तुम बच्चों में भी यथार्थ रीति अभी वह शुद्ध घमण्ड आया नहीं है। इतनी प्रदर्शनी आदि करते हैं - अजुन सिद्ध नहीं करते। पहले यह भूल सिद्धकर बतानी है कि श्रीमत भगवत गीता है सब शास्त्रों की माई बाप। उसका रचयिता कौन था? जैसे क्राइस्ट ने बाइबिल को जन्म दिया। वह है क्रिश्चियन धर्म का शास्त्र। अच्छा बाइबिल का बाप कौन? क्राइस्ट। उनको माई बाप नहीं कहेंगे। मदर की तो वहाँ बात नहीं। यह तो यहाँ माता पिता है। क्रिश्चियन ने रीस की है कृष्ण के धर्म से। वह क्राइस्ट को मानने वाले हैं। अब गीता किसने सुनाई? उससे कौन सा धर्म स्थापन हुआ? यह कोई नहीं जानते। कभी नहीं कहते कि पतित-पावन परमपिता परमात्मा ने यज्ञ रचा। गोले के चित्र से समझ सकेंगे कि बरोबर परमपिता परमात्मा ने ज्ञान दिया है। राधे कृष्ण तो सतयुग में बैठे हैं, उन्होंने अपने को ज्ञान नहीं दिया। ज्ञान देने वाला दूसरा चाहिए। कोई ने तो उसको पास कराया होगा ना। यह राजाई प्राप्त करने का ज्ञान किसने दिया? किस्मत आपेही तो नहीं बनती। किस्मत बनाने वाला बाप या टीचर होता है। गुरू तो गति देते, परन्तु गति सद्गति का भी कोई अर्थ नहीं समझते। सद्गति प्रवृत्ति मार्ग वालों की होती है। गति माना सब बाप के पास जाते हैं। यह बातें कोई समझते नहीं हैं। वह तो भक्ति के बड़े-बड़े दुकान खोल बैठे हैं। सच्चे ज्ञान का एक भी दुकान नहीं। सब हैं भक्ति के। बाप कहते हैं यह वेद शास्त्र आदि सब भक्ति मार्ग की सामग्री है। यह जप तप आदि करने से मैं नहीं मिलता हूँ। मैं तो बच्चों को ज्ञान देकर पावन बनाता हूँ। सारे सृष्टि की सद्गति करता हूँ। वाया गति में जाकर सद्गति में आना है। सब तो सतयुग में नहीं आयेंगे, यह ड्रामा बना हुआ है। जो कल्प पहले तुमको सिखाया था, जो चित्र बनाये थे, वह अब भी बनवा रहे हैं। यह जो बड़ी भूल है, वह सिद्ध हो जाए फिर युक्ति से चित्र बनायेंगे। कहते हैं 3 धर्मो की टांगों पर सृष्टि खड़ी है। एक देवता धर्म की टांग टूटी हुई है, इसलिए हिलती रहती है। पहले एक टांग पर सृष्टि बड़ी फर्स्टक्लास रहती। एक ही धर्म था, जिसको अद्वैत राज्य कहा जाता है। फिर वह एक टांग गुम हो 3 टांगे निकली हैं, जिसमें कुछ भी ताकत नहीं रहती। आपस में ही लड़ाई झगड़ा चलता रहता है। धनी को जानते ही नहीं। निधनके बन पड़े हैं। समझाने की बड़ी युक्ति चाहिए। प्रदर्शनी में भी मुख्य यह बात समझानी है कि गीता का भगवान श्रीकृष्ण नहीं, परमपिता परमात्मा है, जिसका बर्थ प्लेस भारत है। कृष्ण है साकार, वह है निराकार। उनकी महिमा अलग है। ऐसे युक्ति से कार्टून बनाना चाहिए जो सिद्ध हो जाए कि गीता परमात्मा ने गाई और कृष्ण को ऐसा बनाया। कहते हैं ब्रह्मा का दिन ज्ञान और ब्रह्मा की रात भक्ति। अभी है रात। सतयुग स्थापन करने वाला कौन? ब्रह्मा आया कहाँ से? सूक्ष्मवतन में भी कहाँ से आया? प्रजापिता ब्रह्मा को परमात्मा एडाप्ट करते हैं। परमपिता परमात्मा ही पहले-पहले सूक्ष्म सृष्टि रचते हैं। वहाँ ब्रह्मा दिखाते हैं। वहाँ प्रजापिता होता नहीं। प्रजापिता ब्रह्मा कहाँ से आया? यह बातें कोई समझ न सकें। कृष्ण के अन्तिम जन्म में इनको परमपिता परमात्मा ने अपना रथ बनाया है। यह किसकी बुद्धि में नहीं है। यह बड़ा भारी क्लास है। टीचर जानते हैं यह स्टूडेण्ट कौन सा है? तो क्या बाप नहीं समझते होंगे? यह बेहद के बाप का बेहद का क्लास है। यहाँ की बात ही निराली है। शास्त्रों में प्रलय दिखाकर रोला कर दिया है।
तुम जानते हो कृष्ण ने गीता नहीं सुनाई। उसने तो गीता का ज्ञान सुनकर राज्य पद पाया है। तुमको सिद्ध कर बताना है - गीता का भगवान निराकार शिव है, उनके गुण यह हैं। इस भूल के कारण ही भारत कौड़ी जैसा बना है। अभी परमापिता परमात्मा ने ज्ञान का कलष माताओं पर रखा है। मातायें ही स्वर्ग का द्वार खोलती हैं। यह सब बातें नोट कर समझानी चाहिए। भक्ति वास्तव में गृहस्थियों के लिए है। ये है प्रवृत्ति मार्ग का सहज राजयोग। हम सिद्ध कर समझाने के लिए आये हैं। बच्चों को युक्तियुक्त काम करना है। बच्चों को ही बाप का शो करना है। सदैव हर्षित मुख, अचल, स्थेरियम, मस्त रहना है, आगे चलकर ऐसे बच्चे निकलते जरूर हैं। ब्रह्माकुमार कुमारी वह जो 21 जन्म के लिए बाप से वर्सा दिलाये। कुमारियों की महिमा भारी है, मुख्य मम्मा है। वह ज्ञान सूर्य है, यह है गुप्त मम्मा (ब्रह्मा)। इस राज़ को मुश्किल ही कोई समझते हैं। मन्दिर भी उस मम्मा के हैं। इस गुप्त बूढ़ी मम्मा का कोई मन्दिर नहीं। यह माता-पिता कम्बाइन्ड है। कृष्ण तो सतयुग का प्रिन्स है। कृष्ण में भगवान आ न सके। गीता के भगवान की महिमा अलग है। वह पतित-पावन, लिबरेटर, गाइड है। तो परमात्मा की महिमा बिल्कुल अलग है। एक कैसे हो सकते। मुख्य बात ही यह है कि गीता किसने सुनाई? वेद शास्त्र आदि सब गीता के बाल बच्चे हैं और सब भक्ति की सामग्री है, ज्ञान मार्ग में कुछ होता नहीं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) हर काम बहुत युक्तियुक्त करना है। हर्षितमुख, अचल, स्थिर और ज्ञान की मस्ती में रहकर बाप का शो करना है।

2) ज्ञान की नई और निराली बातें सिद्ध करनी है।

वरदान:

मंजिल को सामने रख ब्रह्मा बाप को फालो करते हुए फर्स्ट नम्बर लेने वाले तीव्र पुरुषार्थी भव!

तीव्र पुरुषार्थी के सामने सदा मंजिल होती है। वे कभी यहाँ वहाँ नहीं देखते। फर्स्ट नम्बर में आने वाली आत्मायें व्यर्थ को देखते हुए भी नहीं देखती, व्यर्थ बातें सुनते हुए भी नहीं सुनती। वे मंजिल को सामने रख ब्रह्मा बाप को फालो करती हैं। जैसे ब्रह्मा बाप ने अपने को करनहार समझकर कर्म किया, कभी करावनहार नहीं समझा, इसलिए जिम्मेवारी सम्भालते भी सदा हल्के रहे। ऐसे फालो फादर करो।

स्लोगन:

जो बात अवस्था को बिगाड़ने वाली है - उसे सुनते हुए भी नहीं सुनो।


मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

1- आत्मा परमात्मा में अन्तर, भेद:- आत्मा और परमात्मा अलग रहे बहुकाल सुन्दर मेला कर दिया जब सतगुरु मिला दलाल... जब अपन यह शब्द कहते हैं तो उसका यथार्थ अर्थ है कि आत्मा, परमात्मा से बहुतकाल से बिछुड़ गई है। बहुतकाल का अर्थ है बहुत समय से आत्मा परमात्मा से बिछुड़ गई है, तो यह शब्द साबित (सिद्ध) करते हैं कि आत्मा और परमात्मा अलग-अलग दो चीज़ हैं, दोनों में आंतरिक भेद है परन्तु दुनियावी मनुष्यों को पहचान न होने के कारण वो इस शब्द का अर्थ ऐसा ही निकालते हैं कि मैं आत्मा ही परमात्मा हूँ, परन्तु आत्मा के ऊपर माया का आवरण चढ़ा हुआ होने के कारण अपने असली स्वरूप को भूल गये हैं, जब वो माया का आवरण उतर जायेगा फिर आत्मा वही परमात्मा है। तो वो आत्मा को अलग इस मतलब से कहते हैं और दूसरे लोग फिर इस मतलब से कहते हैं कि मैं आत्मा सो परमात्मा हूँ परन्तु आत्मा अपने आपको भूलने के कारण दु:खी बन पड़ी है। जब आत्मा फिर अपने आपको पहचान कर शुद्ध बनती है तो फिर आत्मा परमात्मा में मिल एक ही हो जायेंगे। तो वो आत्मा को अलग इस अर्थ से कहते हैं परन्तु अपन तो जानते हैं कि आत्मा परमात्मा दोनों अलग चीज़ है। न आत्मा, परमात्मा हो सकती और न आत्मा परमात्मा में मिल एक हो सकती है और न फिर परमात्मा के ऊपर आवरण चढ़ सकता है।

2- “कर्म बन्धन टूटने से ही मन की शान्ति अर्थात् जीवनमुक्त स्थिति को पा सकते हैं”

वास्तव में हरेक मनुष्य की यह चाहना अवश्य रहती है कि हमको मन की शान्ति प्राप्त हो जावे इसलिए अनेक प्रयत्न करते आये हैं मगर मन को शान्ति अब तक प्राप्त नहीं हुई, इसका यथार्थ कारण क्या है? अब पहले तो यह सोच चलना जरुरी है कि मन के अशान्ति की पहली जड़ क्या है? मन की अशान्ति का मुख्य कारण है - कर्मबन्धन में फंसना। जब तक मनुष्य इन पाँच विकारों के कर्मबन्धन से नहीं छूटे हैं तब तक मनुष्य अशान्ति से छूट नहीं सकते। जब कर्मबन्धन टूट जाता है तब मन की शान्ति अर्थात् जीवनमुक्त स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं। अब सोच करना है - यह कर्मबन्धन टूटे कैसे? और उसे छुटकारा देने वाला कौन है? यह तो हम जानते हैं कोई भी मनुष्य आत्मा किसी भी मनुष्य आत्मा को छुटकारा दे नहीं सकती। यह कर्मबन्धन का हिसाब-किताब तोड़ने वाला सिर्फ एक परमात्मा है, वही आकर इस ज्ञान योगबल से कर्मबन्धन से छुड़ाते हैं इसलिए ही परमात्मा को सुख दाता कहा जाता है। जब तक पहले यह ज्ञान नहीं है कि मैं आत्मा हूँ, असुल में मैं किसकी सन्तान हूँ, मेरा असली गुण क्या है? जब यह बुद्धि में आ जाए तब ही कर्मबन्धन टूटे। अब यह नॉलेज हमें परमात्मा द्वारा ही प्राप्त होती है गोया परमात्मा द्वारा ही कर्मबन्धन टूटते हैं। ओम् शान्ति।

10/11/17

10/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - तुम्हें श्रीमत पर पूरा-पूरा ध्यान देना है, बाप का फरमान है बच्चे मुझे याद करो और नॉलेज को धारण कर दूसरों की सेवा करो''

प्रश्न:

बाबा बच्चों की उन्नति के लिए कौन सी राय बहुत अच्छी देते हैं?

उत्तर:

मीठे बच्चे, अपना हिसाब-किताब (पोतामेल) रखो। अमृतवेले प्यार से याद करो, लाचारी याद में नहीं बैठो, श्रीमत पर देही-अभिमानी बन पूरा-पूरा रहमदिल बनो तो बहुत अच्छी उन्नति होती रहेगी।

प्रश्न:

याद में विघ्न रूप कौन बनता है?

उत्तर:

पास्ट में जो विकर्म किये हुए हैं, वही याद में बैठने समय विघ्न रूप बनते हैं। तुम बच्चे याद में बाप का आह्वान करते हो, माया भुलाने की कोशिश करती है। तुम याद का चार्ट रखो, मेहनत करो तो माला में पिरो जायेंगे।

गीत:-

तू प्यार का सागर है....  

ओम् शान्ति।

यहाँ जब बैठते हो तो बाबा की याद में बैठना है। माया बहुतों को याद करने नहीं देती क्योंकि देह-अभिमान है। कोई को मित्र सम्बन्धी, कोई को खान-पान आदि क्या-क्या याद आता रहता है। यहाँ जब आकर बैठते हो तो बाप का आह्वान करना चाहिए। जैसे जब लक्ष्मी की पूजा होती है तो लक्ष्मी का आह्वान करते हैं। लक्ष्मी कोई आती नहीं है। यहाँ भी कहा जाता है तुम बाप को याद करो अथवा आह्वान करो, बात एक ही है। याद से विकर्म विनाश होंगे। धारणा नहीं हो सकती है क्योंकि विकर्म बहुत हैं। बाप को भी याद नहीं कर सकते हैं। जितना बाप को याद करेंगे उतना विकर्माजीत, निरोगी बनेंगे। है बहुत सहज। परन्तु माया अथवा पास्ट के विकर्म सामने आते हैं जो याद में विघ्न डालते हैं। बाप कहते हैं तुमने ही आधाकल्प अयथार्थ रीति से याद किया। अभी तो तुम प्रैक्टिकल में आह्वान करते हो क्योंकि तुम जानते हो कि बाबा आया हुआ है। परन्तु यह याद की आदत पक्की हो जानी चाहिए। तुमको एवर निरोगी बनने के लिए अविनाशी सर्जन दवाई देते हैं कि मुझे याद करो फिर तुम मेरे से आकर मिलेंगे। मेरे द्वारा मेरे को याद करने से ही तुम मेरा वर्सा पायेंगे। बाप और स्वीट होम को याद करना है, जहाँ जाना है, वह बुद्धि में रहता है। बाप वहाँ से आकर सच्चा पैगाम देते हैं और कोई भी ईश्वरीय पैगाम नहीं देते। वह तो यहाँ स्टेज पर पार्ट बजाने आते हैं और ईश्वर को भूल जाते हैं। लक्ष्मी-नारायण यहाँ आते हैं तो ईश्वर का पता नहीं रहता। उनको भी पैगम्बर नहीं कह सकते। यह तो मनुष्यों ने नाम लगा दिये हैं। वह आते ही हैं पार्ट बजाने। वह याद कैसे करेंगे? उनको पार्ट बजाते-बजाते पतित बनना ही है, फिर अन्त में पतित से पावन बनना है। वह तो बाप ही आकर बनाते हैं। बाप की याद से ही पावन बनना है। बाप कहते हैं बच्चे मेरे पास पावन बनाने का एक ही उपाय है। देह सहित जो भी देह के सम्बन्ध हैं उनको भूल जाना है। तुम जानते हो मुझ आत्मा को बाप को याद करने का फरमान मिला हुआ है। उस पर चलने वाले को ही फरमानवरदार कहा जाता है। जो कम याद करते हैं, वह कम फ़रमानवरदार। फ़रमानवरदार पद भी ऊंचा पाते हैं। बाबा का एक फ़रमान है याद करो, दूसरा है नॉलेज को धारण करो। याद नहीं करेंगे तो सज़ायें बहुत खानी पड़ेगी। स्वदर्शन चक्र फिराते रहेंगे तो धन बहुत मिलेगा। भगवानुवाच, मेरे द्वारा मुझे भी जानो और सृष्टि चक्र के आदि-मध्य-अन्त को भी जानो। यह दो बातें मुख्य हैं जिस पर ध्यान देना है। श्रीमत पर पूरा ध्यान देंगे तो ऊंच पद पायेंगे फिर रहमदिल बनना है, सबको रास्ता बताना है, सबका कल्याण करना है। मित्र सम्बन्धियों आदि को भी सच्ची यात्रा पर ले जाने की युक्ति रचनी है। वह है जिस्मानी यात्रा, यह है रूहानी यात्रा। यह प्रीचुअल नॉलेज कोई के पास नहीं है। वह है सब शास्त्रों की फिलॉसाफी। यह है रूहानी नॉलेज, सुप्रीम रूह यह नॉलेज देते हैं रूहों को। रूहों को ही वापिस ले जाना है। अमृतवेले जब आकर बैठते हैं, कोई तो लाचारी आकर बैठते हैं। उन्हों को अपनी उन्नति का कुछ भी ख्याल नहीं है। बच्चों में देह-अभिमान बहुत है। देही-अभिमानी हो तो रहमदिल बन श्रीमत पर चलें।
बाप कहते हैं अपना चार्ट लिखो - कितना समय याद करते हैं? आगे चार्ट रखते थे। अच्छा बाबा को न भेजो अपने पास तो रखो। अपनी शक्ल देखनी है। हम लक्ष्मी को वरने लायक बने हैं? व्यापारी लोग अपना पोतामेल रखते हैं। कोई-कोई सारे दिन की दिनचर्या रखते हैं। हॉबी होती है लिखने की। यह बाबा बहुत अच्छी राय देते हैं कि अपना हिसाब-किताब रखो। कितना समय याद किया? कितना समय किसको समझाया? ऐसा चार्ट रखें तो बहुत उन्नति हो जाये। बाबा मम्मा को तो नहीं लिखना है। माला के दाने जो बनते हैं उन्हों को पुरुषार्थ बहुत करना है, बाबा ने कहा ब्राह्मणों की माला अभी नहीं बन सकती, अन्त में बनेंगी, जब रुद्र की माला बनेंगी। ब्राह्मणों की माला तो बदलती रहती है। आज 3-4 नम्बर में हैं, कल लास्ट 16108 में चले जाते हैं। कोई गिरते हैं तो बिल्कुल दुर्गति को पा लेते हैं। माला से तो गये, प्रजा में भी चण्डाल जाकर बनते हैं। अगर माला में पिरोना है तो मेहनत करो। बाबा सबके लिए बहुत अच्छी राय देते हैं। भल गूँगा हो, कोई को भी ईशारे से बाबा की याद दिला सकते हैं। अन्धे, लूले कैसे भी हों - तन्दरूस्त से भी ज्यादा ऊंच पद पा सकते हैं। सेकण्ड में जीवनमुक्ति गाई हुई है। बाबा का बना और वर्सा मिल गया। उनमें नम्बरवार पद हैं। बच्चा पैदा हुआ, वर्से के हकदार बन गया। यहाँ तुम हो मेल्स बच्चे। बाप से वर्से का हक लेना है। सारा मदार पुरुषार्थ पर है। फिर कहते हैं कल्प पहले भी हार खाई होगी। बॉक्सिंग है ना। पाण्डवों की थी माया रावण के साथ लड़ाई। कोई तो पुरूषार्थ कर विश्व के मालिक डबल सिरताज बनते हैं। कोई फिर प्रजा में भी नौकर चाकर बनते हैं। सभी यहाँ पढ़ रहे हैं। राजधानी स्थापन हो रही है। अटेन्शन आगे वाले दानों तऱफ जायेगा। 8 दाने कैसे चल रहे हैं। पुरूषार्थ से मालूम पड़ जाता है। ऐसे नहीं अन्तर्यामी है, सबकी दिल को जानते हैं। नहीं, जानी-जाननहार अर्थात् नॉलेजफुल है। सृष्टि के आदि मध्य अन्त को जानते हैं। बाकी एक-एक के दिल को थोड़ेही रीड करेंगे। मुझे थाट रीडर समझा है। वास्तव में मैं जानी जाननहार अर्थात् नॉलेजफुल हूँ। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की मेरे पास नॉलेज है। यह चक्र फिर से कैसे रिपीट होता है। मैं उस रिपीटेशन के राज़ को जानता हूँ। वह सब राज़ तुम बच्चों को समझाता हूँ। हर एक समझ सकते हैं कि परमात्मा कौन है और कितनी सर्विस करते हैं! बाकी बाबा एक-एक की दिल को जानने का धन्धा नहीं करता है। वह चैतन्य मनुष्य सृष्टि का बीज, नॉलेजफुल है। जानी जाननहार अक्षर बहुत पुराना है। हम तो जो नॉलेज जानता हूँ वह तुमको पढ़ाता हूँ। बाकी तुम क्या-क्या करते हो वह सारा दिन बैठ देखूँगा क्या? मैं तो सहज राजयोग ज्ञान सिखलाने आता हूँ। बाबा कहते हैं बच्चे तो बहुत हैं, बच्चे ही पत्र आदि लिखते हैं और मैं भी बच्चों के आगे ही प्रत्यक्ष होता हूँ। फिर वह सगा है वा लगा है - सो फिर मैं समझ सकता हूँ। हर एक की पढ़ाई है। श्रीमत पर सभी को एक्ट में आना है। कल्याणकारी बनना है।
तुम जानते हो ब्रह्स्पति को वृक्षपति डे भी कहा जाता है। वृक्षपति सोमनाथ भी ठहरा, शिव भी ठहरा। बच्चों को बहुत करके गुरुवार के दिन स्कूल में बिठाते हैं। गुरू भी करते हैं। तुमको सोमनाथ बाप पढ़ाते हैं। रूद्र भी सोमनाथ को कहते हैं। कहते हैं रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा। यह एक ही यज्ञ चलता है, जिसमें सारी पुरानी दुनिया की सामग्री स्वाहा होनी है। तत्व भी उथल पाथल में आ जाते हैं। सब इसमें स्वाहा हुए हैं। सामने महाभारत लड़ाई खड़ी है। यह सब शान्ति के लिए यज्ञ रचते हैं, परन्तु मटेरियल यज्ञ से शान्ति हो न सके। इस यज्ञ से विनाश ज्वाला प्रगट होती है। यह भ्रष्टाचारी दुनिया इसमें स्वाहा होने वाली है। यह सब बच्चों को देखना है। देखने वाले बड़े महावीर चाहिए। मनुष्य तो हाय-हाय करेंगे। तुम्हारे लिए लिखा हुआ है - मिरुआ मौत मलूका शिकार...सतयुग में बहुत थोड़े मनुष्य थे, एक धर्म था। अब कलियुग के अन्त में देखो कितने मनुष्य हैं? कितने धर्म हैं? यह सब धर्म कहाँ तक चलेंगे? सतयुग जरूर आना है। अब सतयुग की स्थापना कौन करेंगे? रचता बाप ही करेंगे। कलियुग का विनाश भी सामने खड़ा है। तुम भूल गये हो कि गीता का भगवान कौन है? भगवान ने स्वर्ग की स्थापना की, इसमें लड़ाई की कोई बात नहीं। उसने माया पर जीत पहनाई है। इस राज़ को न समझ उन्होंने असुर और देवताओं की लड़ाई दिखाई है। वह तो होती नहीं। तुम बच्चों को बाप द्वारा जो पास्ट, प्रेजन्ट, फ्युचर की नॉलेज मिली है, यह स्वदर्शन चक्र तुमको फिराना है। बाप और रचना को याद करना है। कितनी सहज बात है।
गीत:- तू प्यार का सागर है। आज बाबा ने लिखा है, तुम ओशन आफ नॉलेज, ओशन आफ ब्लिस लिखते हो बाकी ओशन आफ लव भी जरूर लिखना है। बाप की महिमा बहुत है। परन्तु सर्वव्यापी कहने से बाप की महिमा गुम कर दी है। कृष्ण के लिए भी लिखा है 16108 रानियाँ थी...जन्माष्टमी के दिन कृष्ण को झूले में झुलाते हैं। परन्तु किसको भी पता नहीं कि कृष्ण ही नारायण बनते हैं। राधे फिर लक्ष्मी बनती है। लक्ष्मी ही फिर जगत अम्बा बनती है, यह कोई नहीं जानते। अब बाप कहते हैं मेरे को जानने से तुम सब कुछ जान जायेंगे। परन्तु जो देही-अभिमानी नहीं बनते उनको धारणा भी नहीं होती है। आधा कल्प तो देह-अभिमान चला है। सतयुग में भी परमात्मा का ज्ञान नहीं रहता है। यहाँ पार्ट बजाने आते हैं और परमात्मा को भूल जाते हैं। यह तो समझते हैं आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। परन्तु वहाँ दु:ख की बात नहीं। यह परमात्मा की महिमा है। ज्ञान का सागर, प्रेम का सागर...एक बूँद है मनमनाभव, मध्याजीभव। यह मिलने से हम विषय सागर से क्षीर सागर में चले जाते हैं। स्वर्ग में घी दूध की नदियाँ बहती हैं। यह सब महिमा है। बाकी घी दूध की नदी थोड़ेही हो सकती है। यह भी तुम जानते हो स्वर्ग किसको कहा जाता है। भल अजमेर में मॉडल है परन्तु जानते कुछ नहीं। तुम कोई को समझाओ तो झट समझ जायेंगे। बाकी यह रास-विलास तो खेल कूद है। जैसे बाबा के पास आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान है तो तुम बच्चों की बुद्धि में फिरना चाहिए। बाप की महिमा एक्यूरेट सुनानी है। उनकी महिमा अपरमअपार है। सब एक जैसे नहीं हो सकते। हर एक को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है। पोप का भी अगर ड्रामा अनुसार पार्ट होगा तो मिलेगा। अगर दूसरा होगा तो फिर आगे चलकर देखेंगे। जो दिव्य दृष्टि से दिखाया था, वह सब इन आंखों से देखेंगे। विष्णु का साक्षात्कार किया है। वहाँ भी प्रैक्टिकल जायेंगे। फिर साक्षात्कार होना बन्द हो जाता है। सतयुग त्रेता में न साक्षात्कार, न भक्ति। फिर भक्ति मार्ग से यह सब बातें शुरू होती हैं। कितनी अच्छी-अच्छी बातें बाबा समझाते हैं। जो फिर बच्चों को औरों को समझानी हैं। बहनों भाइयों आकर बाप से वर्सा लो। उस ज्ञान से परमात्मा को सर्वव्यापी कह महिमा गुम कर दी है और ग्लानी कर दी है। तुम बच्चे यथार्थ महिमा को जानते हो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) हर एक्ट श्रीमत पर करनी है। सबका कल्याणकारी रहमदिल बन सेवा करनी है।

2) याद की आदत पक्की डालनी है। याद में बैठने समय कोई भी मित्र सम्बन्धी, खान-पान आदि याद न आये, इसका अटेन्शन रखना है। याद का चार्ट रखना है।

वरदान:

अपनी सर्व जिम्मेवारियों का बोझ बाप को दे स्वयं हल्का रहने वाले निमित्त और निर्माण भव!

जब अपनी जिम्मेवारी समझ लेते हो तब माथा भारी होता है। जिम्मेवार बाप है, मैं निमित्त मात्र हूँ - यह स्मृति हल्का बना देती है। इसलिए अपने पुरूषार्थ का बोझ, सेवाओं का बोझ, सम्पर्क-सम्बन्ध निभाने का बोझ...सब छोटे-मोटे बोझ बाप को देकर हल्के हो जाओ। अगर थोड़ा भी संकल्प आया कि मुझे करना पड़ता है, मैं ही कर सकता हूँ, तो यह मैं-पन भारी बना देगा और निर्माणता भी नहीं रहेगी। निमित्त समझने से निर्माणता का गुण भी स्वत: आ जाता है।

स्लोगन:

सन्तुष्टमणी वह है - जिसके जीवन का श्रृंगार सन्तुष्टता है।

09-09-17

09-09-17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन 


“मीठे बच्चे - बाप समान पतितों को पावन बनाने का पुरूषार्थ करो, यह समय बहुत वैल्युबुल है, इसलिए व्यर्थ बातों में अपना समय बरबाद मत करो”

प्रश्न:

बाप बच्चों की किस एक बात पर बहुत तरस खाते हैं?

उत्तर:

कई बच्चे आपस में झरमुई झगमुई कर अपना समय बहुत गवाते हैं। घूमने फिरने जाते हैं तो बाप को याद करने के बजाए व्यर्थ चिंतन करते हैं। बाप को उन बच्चों पर बहुत तरस पड़ता है। बाबा कहते मीठे बच्चे - अब अपनी जीवन सुधार लो। व्यर्थ समय नहीं गवाओ। तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने के लिए सच्ची दिल से बाप को युक्तियुक्त याद करो, लाचारी याद नहीं करो।

ओम् शान्ति।

भगवानुवाच। बच्चे भी समझते होंगे जरूर कि भगवान हमको पढ़ा रहे हैं। हम बहुत पुराने स्टूडेन्ट हैं। एक ही टीचर के पास कोई भी पढ़ते नहीं हैं। 12 मास पढ़ेंगे फिर टीचर बदली करेंगे। यहाँ यह मुख्य टीचर बदली नहीं होता। बाकी बच्चियां तो बहुत हैं - राजयोग सिखाने के लिए। एक से तो काम चल न सके। पावन बनने के लिए कितने ढेर बुलाते हैं। एक को ही बुलाते हैं। पावन बनाने वाला एक ही टीचर ठहरा। वन्डर है जो पतित-पावन को बुलाते हैं, समझते कुछ भी नहीं। द्रोपदी ने भी पुकारा ना कि हमें यह नंगन करते हैं, रक्षा करो। आधाकल्प तुम पुकारते आये हो। बोलो, तुम ही सब तो पुकारते थे ना। द्रोपदी का मिसाल दिया है, पतित तो सारी दुनिया है। पतित और पावन में रात दिन का फर्क है। पतित हैं पत्थर बुद्धि। बाप आकर सब विकारों से घृणा दिलाते हैं। आत्मा समझती है कि मुझ आत्मा का यह शरीर पतित है। तुम भी समझते हो यह शरीर पतित है, जंक लगा हुआ है। जिन्हों को पावन फर्स्टक्लास शरीर है, वह सारे विश्व पर राज्य करते थे, उनको कहेंगे पारसबुद्धि। पत्थरबुद्धि और पारसबुद्धि का गायन भी भारत में ही है। तो बच्चों को ख्याल आना चाहिए कि इस पतित भारत को पावन कैसे बनायें। परन्तु नम्बरवार सर्विसएबुल को यह ख्यालात आते होंगे और पतितों को पावन बनाने का पुरूषार्थ करते होंगे। बाप का पहला फर्ज ही यह है। बाप आते ही हैं तमोप्रधान से सतोप्रधान बनाने। तो जितना बाप को ओना है उतना बच्चों को भी होना चाहिए। बाप कहते हैं मैं तुमको अपने से भी ऊंचा बनाता हूँ। तुमको ख्यालात भी जास्ती चलने चाहिए। मेरे से भी जास्ती सर्विस तुम बच्चे करते हो ना। बाबा थोड़ेही 3-4 घण्टे बैठ समझाते हैं प्रदर्शनी आदि में। बाप बच्चों की महिमा करते हैं। परन्तु वह खुशी, वह योग कम दिखाई देता है इसलिए बेहद का बाप जो इन द्वारा पढ़ाते हैं, यह सबसे नजदीक है। इतना एकदम नजदीक बाप, दादा कब देखा है? मुख्य है ही आत्मा। आत्मा निकल जाए तो शरीर कोई काम का नहीं रहता। मनुष्य के शरीर की कोई वैल्यु नहीं रहती। कोई काम में नहीं आता, राख हो जाता है। जानवरों आदि की हि•यां भी काम में आ जाती हैं। चमड़ा भी काम में आता है। मनुष्य का तो कुछ भी नहीं बनता। हि•यां पानी में डाल खत्म कर देते हैं। निशानी भी नहीं रहती। उन्हों की निशानी फिर भी जंगलों में पड़ी रहती है। मनुष्य का सतयुग से लेकर त्रेता अन्त तक तो मूल्य है। देवतायें हैं तब तो पूज्य लायक हैं। पीछे पाई की भी वैल्यु नहीं रहती इसलिए कहा जाता है पत्थरबुद्धि। भरी ढोते रहते हैं, पैसे आदि की चिंता रहती है। वहाँ तो बिल्कुल निश्चिंत रहते हैं। तो बाप कहते हैं कि तुम्हारा यह शरीर बहुत वैल्युबुल है। यह टाइम भी वैल्युबुल है, इनको वेस्ट नहीं गँवाओ। फालतू बातों में समय नहीं गँवाओ। अपनी आत्मा को याद के बल से सतोप्रधान बनाना है और कोई उपाय पावन बनने का नहीं है। एक ही शास्त्र में भगवानुवाच है - जिसको कहते हैं श्रीमत भगवत गीता। तो बाप कहते हैं आओ - कंगाल बच्चे, तुम्हें सिरताज बनाऊं। तुम भी समझते हो कि बरोबर हम कंगाल हैं। भल बहुत धनवान हैं, पदमापदमपति हैं, उन्हों के फोटो, नाम आदि निकालते हैं ना। तुम बच्चों में भी नम्बरवार धनवान हैं। तुम कहेंगे हम स्थाई सच्चे धनवान हैं। यह धन ही साथ देता है। तुम्हारे आगे वह सब कंगाल हैं। नाम भल पदमपति आदि है। सतगुरू बाबा ने भी तुम्हारा नाम पदमापदमपति अविनाशी रखा है। तुम हो स्वर्ग के पदमपति। वह हैं नर्क के पदमपति। नर्क और स्वर्ग को तुम समझते हो। वह पत्थरबुद्धि बिल्कुल नहीं समझते। आगे चल तुम्हारे पास आयेंगे, जब विनाश देखेंगे तब समझेंगे यह तो पुरानी दुनिया का विनाश हो जायेगा। फिर कहेंगे यह ब्रह्माकुमार कुमारियां तो सच कहते थे। अच्छा, अब क्या करना है? कुछ कर नहीं सकेंगे। पैसे आदि एकदम जल मर सब खत्म हो जायेंगे। बाम्बस आदि गिरते हैं तो मकान, जायदाद आदि सब खत्म हो जाता है। शरीर भी खत्म हो जाते हैं। यह तुम देखेंगे - बड़ा भयानक सीन आने वाला है। उस समय ज्ञान में आ नहीं सकेंगे। अब यह भगवान बैठ समझाते हैं। बच्चे जानते हैं - हम आये हैं भगवान से पढ़ने। तुम कितने तकदीरवान हो। यह भी सबको निश्चय नहीं है, निश्चय हो तो भगवान से क्यों नहीं पढ़े। रात दिन बत्तियां जगाकर मर-झुरकर, भोजन न खाकर भी एकदम पढ़ने को लग पड़े। वाह यह तो 21 जन्मों की कमाई है। बहुत अच्छी रीति पढ़ने को लग जाये। पढ़ाई भी क्या है, मुख्य है ही बाप को याद करना। बाबा को बहुत तरस आता है। बाबा जानते हैं बच्चे घूमने फिरने जाते हैं, एक भी बाप की याद में नहीं रहते। झरमुई झगमुई बहुत करते हैं। बच्चों को बहुत ओना रहना चाहिए। बस टाइम बहुत थोड़ा है। भारत कितना बड़ा है। बहुत सर्विस है। पहले अपनी जीवन तो सुधार लें। बाबा बहुत बार कहते हैं - बच्चे झरमुई झगमुई मत करो। यह बातें छोड़ दो, अपना जीवन सुधारो। सबको आपस में लड़ मरना है। ड्रामा की भावी ऐसी है। तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने में टाइम तो लगता है ना। अपनी दिल से पूछना है कि हम कितना समय याद करते हैं? सच्ची दिल से बहुत प्यार से युक्तियुक्त याद कोई 5 मिनट भी मुश्किल करते हैं। बहुत लव से याद किया जाता है। बिगर लव कभी किसको याद करते हैं क्या? बहुत हैं जो लाचारी हालत में याद करते हैं। लव से याद करना आता ही नहीं। सच्ची दिल पर साहेब राजी। देखो - बाबा एक ही आवाज करते हैं मनमनाभव अर्थात् याद करो तो तुम्हारे सब पाप कट जायेंगे। हम ही तुम्हारा दोस्त हूँ। बाकी तो सब हैं दुश्मन। तुम एक दो के भी दुश्मन हो। बहुत आपस में लड़ते झगड़ते हैं तो दोस्त कैसे ठहरे। बाप कहते हैं अगर आत्मा भाई-भाई समझो तो दुश्मनी सारी खत्म हो जाए। न नाक, न कान, न मुख है.. तो दुश्मनी किससे रखेंगे। शरीरों को देखो ही नहीं। तुम भी आत्मा, वह भी आत्मा तो दुश्मनी निकल जाती है। बहुत मेहनत है। बिगर मेहनत कुछ मिलता है क्या? उस पढ़ाई में भी कितना माथा मारते हैं। सहज भी है। बाप कहते हैं - सिमर सिमर सुख पाओ। यह तो जानते हो कि भक्ति मार्ग में सिमरसिमर दु:ख ही पाया है, जिसको सिमरते हैं - उनके आक्यूपेशन का पता नहीं। कितने को सिमरते हैं, हनूमान को सिमरो, गणेश को सिमरो...एक है सिमर-सिमर सुख पाओ, दूसरा है सिमर-सिमर दु:ख पाओ क्योंकि भक्ति रात है ना। शिवबाबा की रात थोड़ेही हो सकती। रात में धक्का खाया जाता है। पहले नम्बर में यह (ब्रह्मा) धक्का खाते हैं। उसके साथ तुम ब्राह्मण भी साथी हो। ब्राह्मणों का सारा कुल है, जो भी ब्राह्मण बनते हैं वह आकर सुख पाते हैं सिमरने से। तुम सबको कहते हो कि शिवबाबा को याद करो तो पाप कट जायेंगे। तुम एक बाप का सिमरण करते हो, मनुष्य तो अनेकों का सिमरण करते-करते पाप आत्मा बन जाते हैं। सीढ़ी उतरते जाते हैं। अब तुम एक बाप को याद करो, अर्थ सहित। बाप कहते हैं मैं आया ही हूँ वर्सा देने, पावन बनाने। अर्थ है ना। शिवबाबा पतित-पावन है - यह किसको पता भी नहीं है। कोई आकर बतावे तो सही कि कैसे आकर पावन बनाते हैं। तुम्हारे पास यहाँ बैठे भी पूरी रीति जानते ही नहीं है। माया भुलाने वाली कोई कम नहीं है। तुम खुद कहते हो बाबा हम याद करते हैं, माया भुला देती है। बाबा कहते हैं अरे तुम बाबा को याद नहीं करेंगे तो वर्सा कैसे मिलेगा। बाप के सिवाए कोई वर्सा देगा! जितना बाप को याद करेंगे उतना वर्सा आटोमेटिकली मिलेगा। सीधा समझाते हैं - राजाई स्थापना हो रही है, इसमें सूर्यवंशी भी बनते हैं। कितने मनुष्यों के कान तक आवाज पहुंचाना है। बाबा कहते हैं बच्चे, मन्दिरों में जाओ, गली-गली में जाकर सर्विस करो। बाबा के भक्त सो देवताओं के भक्त, जैसे मन्दिरों वा सतसंगों में बैठे रहते हैं, बुद्धि कहाँ न कहाँ धन्धेधोरी, मित्र सम्बन्धियों आदि तरफ दौड़ती रहती, धारणा कुछ भी नहीं। यहाँ भी ऐसे हैं जो कुछ भी सुनते नहीं, झुटका खाते रहते हैं। बाप को देखते नहीं, अरे ऐसे बाप को तो कितना न अच्छी रीति देखना चाहिए। सामने टीचर बैठा है। बाप कहते हैं मैं इन कर्मेन्द्रियों द्वारा तुमको पढ़ाता हूँ। आत्मा पढ़ती है। बाप आत्माओं से बात करते हैं। आंख, कान, नाक आदि पढ़ते हैं क्या? पढ़ने वाली आत्मा है। दुनिया में यह किसको पता नहीं है क्योंकि देह-अभिमान है ना। आत्मा में ही सब संस्कार हैं। बाप कहते हैं आत्मा को देखो, कितनी मेहनत की बात है। मेहनत बिगर विश्व के मालिक थोड़ेही बनेंगे। मेहनत करेंगे तब विश्व के मालिक बनेंगे। वन्डर तो देखो कि बेहद की पढ़ाई है। पढ़ाने वाला बेहद का बाप है। राजा से रंक तक यहाँ ही बनते हैं - इस पढ़ाई से। जितना जो पढ़ते और पढ़ाते हैं उतना ऊंच पद पाते हैं। बाप आते ही हैं पढ़ाने, पतित से पावन बनाने। बाप को देखते ही नहीं - तो क्या समझना चाहिए! पाई पैसे का पद, नौकर-चाकर जाए बनेंगे। नौकर-चाकर जैसे राजा के पास होते वैसे प्रजा के पास। कहेंगे तो दोनों को ही नौकर। पिछाड़ी में करके थोड़ा लिफ्ट मिलती है। मोचरा खाकर मानी (रोटी) टुकड़ा मिल जायेगा। तो पुरूषार्थ बहुत अच्छा होना चाहिए। बाप से बहुत प्यार से सुनना चाहिए, फिर रिपीट करना चाहिए। स्कूल में पढ़ते हैं फिर घर में भी जाकर स्कूल के काम करते हैं। ऐसे नहीं कि सिर्फ घूमते फिरते हैं। पढ़ाई का ओना रहता है। यहाँ तो कई हैं जो कुछ भी नहीं समझते। बिल्कुल जैसे पुराने पत्थरबुद्धि हैं। बाबा का बनकर अगर फिर कड़ी भूलें करते हैं तो सौगुणा दण्ड मिल जाता है। तो बाप समझाते हैं मीठे-मीठे बच्चे टाइम वेस्ट मत करो। बहुत भारी मंजिल है। कल्प-कल्प तुम्हारा ऐसा ही पद बन जायेगा। यहाँ तुम आये हो - नर से नारायण बनने। नौकर-चाकर बनने थोड़ेही आये हो। पिछाड़ी में सबको एक्यूरेट साक्षात्कार होगा कि हम यह बनने वाले हैं। बुद्धि भी कहती है जो किसका कल्याण ही नहीं करेंगे, वह क्या पद पायेंगे। कोई तो रात दिन बहुत सर्विस करते रहते हैं। प्रदर्शनी मेले में बहुत सर्विस होती है। बाबा कहते हैं ऐसी अच्छी-अच्छी चीजें म्युजयम में बनाओ जो मनुष्यों की दिल उठे देखने की, समझेंगे कि यहाँ तो जैसे स्वर्ग लगा पड़ा है। सेन्टर्स को स्वर्ग थोड़ेही कहेंगे। दिनप्रतिदिन नई बातें होती रहती हैं, चित्र बनते रहते हैं। विचार सागर मंथन होता रहता है ना। समझाने के लिए ही चित्र आदि होते हैं। बाबा अभी मनुष्यों को दैवीगुणों वाला बनाते हैं, तो आत्मा भी नई, शरीर भी नया मिलता है। नया माना नया, नये कपड़े बदल फिर पुराने थोड़ेही पहनेंगे। भगवान आयेगा तो जरूर कमाल करके दिखायेंगे ना। भगवान है ही स्वर्ग की स्थापना करने वाला। अच्छा! 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) बाप जो सुनाते हैं उसे बहुत प्यार से आत्म-अभिमानी होकर सुनना है। सामने बैठकर बाप को देखते रहना है। झुटका नहीं खाना है। पढ़ाई में बहुत रूचि रखनी है। भोजन त्यागकर भी पढ़ाई जरूर करनी है।

2) एक बाप को सच्चा दोस्त बनाना है, आपस में दुश्मनी समाप्त करने के लिए मैं आत्मा भाई-भाई हूँ, यह अभ्यास करना है। शरीर को देखते हुए भी नहीं देखना है।

वरदान:

होलीहंस बन व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करने वाले फीलिंग प्रूफ भव

सारे दिन में जो व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ बोल, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ सम्बन्ध-सम्पर्क होता है उस व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन कर दो। व्यर्थ को अपनी बुद्धि में स्वीकार नहीं करो। अगर एक व्यर्थ को भी स्वीकार किया तो वह एक अनेक व्यर्थ का अनुभव करायेगा, जिसे ही कहते हैं फीलिंग आ गई इसलिए होलीहंस बन व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन कर दो तो फीलिंग प्रूफ बन जायेंगे। कोई गाली दे, गुस्सा करे - आप उसको शान्ति का शीतल जल दो-यह है होलीहंस का कर्तव्य।

स्लोगन:

साधना के बीज को प्रत्यक्ष करने का साधन है बेहद की वैराग्य वृत्ति।

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