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26-05-2018

26-05-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - आधाकल्प से माया ने तुम्हें श्रापित किया है, अब बाप तुम्हारे सब श्राप मिटाकर वर्सा देने आये हैं, तुम श्रीमत पर चलो तो वर्से के लायक बन जायेंगे।"

प्रश्नः-

देही-अभिमानी बनने का यथार्थ रहस्य तुम बच्चों ने क्या समझा है?

उत्तर:-

पुरानी दुनिया से मरकर बाप का बनना अर्थात् मरजीवा बनना ही देही-अभिमानी बनना है। इस पुरानी जुत्ती को भूल बाप समान अशरीरी बन बाप को याद करो - यही है देही-अभिमानी बनने का यथार्थ रहस्य।

गीत:

ओम् नमो शिवाए....  

ओम् शान्ति।

बच्चों ने गीत सुना। एक तरफ हैं भक्त घोर अन्धियारे में, दूसरी तरफ हैं मात-पिता के बच्चे। जिनकी महिमा सुनी और तुम तो अब सम्मुख बैठे हुए हो। कहते भी हैं शिवाए नम:। फिर फट से कह देते हैं तुम मात-पिता... सबका मात-पिता भी ठहरा, सबका स्वामी भी ठहरा। समझाया गया है जो भी मनुष्य मात्र हैं - नर अथवा नारी, सब हैं भक्त, ब्राइड्स और वह एक है ब्राइडग्रूम, स्वामी, मात-पिता। बरोबर तुम बच्चों का बाप भी है, सजनियों का साजन भी है। यह बातें तुम बच्चे ही जानते हो और सब अन्धियारे में हैं। तुम अभी सोझरे में हो। तुम जानते हो हम बाप के सम्मुख बैठे हैं। निराकार भगवान सृष्टि कैसे रचे? जरूर मात-पिता चाहिए इसलिए बाप कहते हैं मैं इस द्वारा बच्चों को नया जन्म देता हूँ। तुम भी कहते हो हम इस पुरानी दुनिया से मरकर बाप के बने हैं अर्थात् देही-अभिमानी बने हैं। बाप तो सदैव देही-अभिमानी ही है। वह आकर इस समय देही-अभिमानी बनाने का रहस्य समझाते हैं। तुम जिनकी महिमा करते थे, त्वमेव माताश्च पिता... उनके सम्मुख बैठे हो। भल तुम अपने गाँव में हो तो भी सम्मुख हो।

बाप आये हैं बच्चों की सर्विस में। पतित-पावन बाप जानते हैं कि मुझे ही पतितों को पावन बनाना पड़ता है। याद तो उनको ही करते हैं ना - पतित-पावन आओ। अभी तो तुम संगमयुग पर हो। जानते हो बरोबर हम पतित थे। पतितों को पावन करने वाला एक बाप है जिसको कहते हैं शिवाए नम:। बच्चे बाप को पुकारते हैं। बच्चे सबको प्यारे लगते हैं। बच्चों की सेवा में बाप उपस्थित रहते हैं। बच्चे पैदा होते हैं तो बाप उन्हों की सर्विस में उपस्थित होते हैं। अभी तुम जानते हो उन द्वारा पावन बन रहे हैं। बरोबर वह बिलवेड बाप है ना, जिसको आधाकल्प हमने पुकारा है। सतयुग-त्रेता में हमने बाप का वर्सा पाया था। फिर वह वर्सा गुम हो गया। माया रावण का श्राप लग गया। हम बिल्कुल ही दु:खी बन पड़े थे। दुनिया में सब दु:खी ही दु:खी हैं। दु:ख के पहाड़ गिरते हैं। तब ही बाप कहते हैं - हम आते हैं। सब पाप आत्मा बन पड़े हैं। पाप करने वाले दु:खी बन पड़ते हैं। बाप आकर के पुण्य आत्मा बनाते हैं, वर्सा देते हैं। तुम जानते हो बरोबर हम फिर से बेहद के बाप से 21 जन्मों का वर्सा लेते हैं। माया ने श्रापित कर दिया है। बाप वह श्राप मिटाते हैं। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम सदा शान्त बन जायेंगे। यहाँ तो शान्ति हो न सके। दु:खधाम है ना। हम तुमको शान्तिधाम में ले चलते हैं। वहाँ सुख, शान्ति, धन आदि सब है। बेहद के बाप से तुम 21 जन्मों के लिये झोली भरने आये हो। हरेक को अपने पुरुषार्थ से वर्सा पाना है, जबकि भगवान के बच्चे बने हो। वह है स्वर्ग का रचयिता। तो जरूर स्वर्ग का वर्सा देता होगा। हम उनके बच्चे हैं तो जरूर वर्सा मिलना चाहिए। बच्चे ही वर्से के अधिकारी हैं। बाप कहते हैं 5 हजार वर्ष पहले तुमको वर्सा दिया था फिर गँवा दिया। अभी संगमयुग है, फिर तुमको वर्सा मिल रहा है। यह तुम जानते हो कि कल्प पहले स्वदर्शन चक्रधारी ब्राह्मण कुल भूषण बने थे। वही धीरे-धीरे आते रहेंगे। दिन-प्रतिदिन ब्राह्मण कुल भूषण बनते रहेंगे। बिरादरी बढ़ती रहेगी। ब्रह्मा मुख वंशावली आप बनते हो। बनाते हैं शिवबाबा। तुम इस समय ईश्वरीय औलाद हो। तुमको सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, अहिंसा परमोधर्म का बनाते हैं। देवतायें कब हिंसा नहीं करते। तुम जानते हो हम सो देवता थे। अब फिर से हम बनते हैं। चक्र लगाया, देवता कुल से क्षत्रिय कुल अथवा वर्ण में आये। क्षत्रिय कुल से वैश्य कुल अथवा वर्ण में आये। हम 84 जन्मों का चक्र पूरा कर आये हैं। अब फिर से बाप आये हैं वर्सा देने। श्राप मिटाकर पतित से पावन बनाते हैं। यहाँ सब मनुष्य मात्र श्रापित हुए पड़े हैं। बाप आकर श्राप मिटाकर वर्सा देते हैं। यह है संगमयुग। अभी सतयुग तुमसे दूर नहीं है। स्वर्ग इतना नजदीक है, जितना यह आत्मा का शरीर नजदीक है। बहुत नजदीक है। मनुष्य स्वर्ग को बहुत दूर समझते हैं। परन्तु तुम बच्चे अब बहुत नजदीक आये हो। पाँच हजार वर्ष पहले की बात है जबकि स्वर्ग था। आधा कल्प स्वर्ग था फिर आधा कल्प नर्क चला है। अभी स्वर्ग सामने खड़ा है।

बाप कहते हैं सेकेण्ड में स्वर्ग का राज्य लो। बरोबर तुम जानते हो हम बाप के बनते हैं तो स्वर्ग के मालिक बनते हैं। जैसे बच्चा समझता है हम बाप से वर्सा लेते हैं। बाप समझेंगे वारिस पैदा हुआ। भल छोटा बच्चा है, मुख से कुछ बोल नहीं सकता है परन्तु बाप जानते हैं यह वारिस है। यह है बेहद का बाप। आत्मा समझती है बरोबर हम बाप के बने और वारिस हो गये। बाप भी कहते हैं तुम स्वर्ग के वारिस तो जरूर बन गये। परन्तु वर्से में भी बहुत दर्जे हैं। कोई सूर्यवंशी, कोई चन्द्रवंशी, कोई प्रजा में आयेंगे। मर्तबे तो अलग-अलग हैं। बच्चे कहेंगे हम बाप की प्रापर्टी के मालिक बनते हैं। तुम बच्चे जानते हो हम बेहद बाप के बच्चे हैं। हम सारे विश्व के मालिक बनते हैं। सिर्फ भारत ही नहीं, सारे विश्व के। भल भारत में राज्य करते हो परन्तु विश्व के मालिक हो। वहाँ कोई दूसरा राजा राज्य करने वाला नहीं रहता। तो तुमको कितना नशा रहना चाहिए! बेहद का बाप और बेहद के बच्चे। अब तुम कितने बच्चे हो! तुम कहेंगे हम स्वर्ग के मालिक बन रहे हैं। बाप जैसा मीठा कोई नहीं। बाप निष्काम सेवा करते हैं। खुद मालिक नहीं बनते, बच्चों को बनाते हैं। मनुष्य कहते हैं इस दादा ने खुद तो बहुत सुख देखे, बुढ़ापे में आकर सन्यास किया तो क्या हुआ। शिवबाबा के लिये तो ऐसा नहीं कहेंगे ना। वह तो कहते हैं मैं तो स्वर्ग का सुख नहीं लेता हूँ। मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाकर तुमको स्वर्ग की राजधानी देता हूँ। वह राजे लोग खुद राज्य करके फिर राज्य-भाग्य देते हैं। यह तो कहते हैं - लाडले बच्चे, मैं परमधाम से आया हूँ तुमको राज्य-भाग्य देने के लिये। मैं राज्य नहीं करता हूँ। मुझे इस पतित दुनिया, पतित शरीर में आना पड़ता है तुमको पावन बनाने। इसमें भी कितने विघ्न पड़ते हैं! कृष्ण ने नहीं भगाया था। शिवबाबा के पास तुम भागकर आते हो। कहेंगे - हम बाबा के पास जाते हैं पूरा वर्सा लेने। सम्मुख जाकर गोद लेते हैं। तुम कहते हो हमने अब ईश्वरीय गोद ली है। ईश्वर से वर्सा पाना है। बाप आते हैं पतित दुनिया में, इस रावण रूपी दुश्मन से छुड़ाने। यह 5 विकार रूपी रावण ही मनुष्य का बड़े ते बड़ा दुश्मन है। यहाँ तुमको इस दुश्मन से छूटना है। पतित-पावन एक ही बाप है, जिसको शिवाए नम: कहते हैं। सबका साजन अभी तुम सजनियों को गुल-गुल बनाकर ले जाते हैं। अभी तुम्हारी आत्मा और शरीर - दोनों ही पतित हैं। मैं तुम्हारी आत्मा को पवित्र बनाता हूँ। तो शरीर भी पवित्र मिलेगा। फिर तुम सतयुग के महाराजा-महारानी बनेंगे। साजन आकर लायक बनाते हैं। जानते हो कि माया रावण ने नालायक बनाया था। अभी शिवबाबा ब्रह्मा तन से लायक बनाते हैं। अगर श्रीमत पर चलते रहेंगे तो। श्रीमत है भगवान की। मात-पिता भी उनको कहते हैं। कृष्ण को नहीं कहेंगे। अभी तुम बच्चे जानते हो जिसकी वह महिमा करते हैं, उनसे हम पढ़ रहे हैं। ब्राह्मण कुल बनता है जरूर। फिर दैवी कुल में जाना है। जरूर ब्रह्मा मुख से पहले-पहले यह ब्राह्मण चोटी निकलते हैं। तुम ब्राह्मण हो रूहानी पण्डे, रूहानी सेवा करने वाले। बाप कहते हैं मैं तुम्हारा पण्डा बन आया हूँ सच्चे-सच्चे तीर्थ पर ले जाने। तुमको बहुत सहज बात बतलाता हूँ। सिर्फ बाप को याद करना है और अपने को आत्मा समझना है। तुम्हें कोई भी ईविल बातें नहीं सुननी है, इविल बातें बहुत नुकसानकारक हैं। इस समय सारी दुनिया में पाँच भूतों की प्रवेशता है। तो इविल ही सुनायेंगे। बेहद के बाप की कितनी भारी महिमा है फिर कह देते सर्वव्यापी है। तुम समझा सकते हो - गाते हो पतित-पावन आओ। फिर सर्वव्यापी कहते हो तो सब पावन होने चाहिए। सर्वव्यापी के ज्ञान ने ही भारत को नास्तिक, कौड़ी तुल्य बना दिया है। बाप तो कहते हैं मैं तुम बच्चों को कल्प-कल्प आकर पतित से पावन बनाकर स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। मैं तुम्हारी सेवा में उपस्थित हूँ। भल कितना भी सहन करना पड़ता है तो भी सेवा में उपस्थित हूँ। मैं तो जानता हूँ - बच्चे बहुत हैं, कोई श्रीमत पर चलते हैं, कोई नहीं चलते हैं, कोई नहीं जानते हैं। अथाह बच्चे हैं। प्रजापिता ब्रह्मा सो तो जरूर प्रजा का ही बाप होगा। क्रियेटर ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रचते हैं। ब्रह्मा द्वारा तुम बच्चों को शिक्षा देता हूँ। लाडले बच्चे, मुझे निरन्तर याद करो तो तुम पतित से पावन बनते जायेंगे और तुम्हारी बुद्धि का ताला खुलता जायेगा। पत्थर से पारस बुद्धि बनाने की सेवा करने आया हूँ। नर्क से स्वर्ग में ले जाता हूँ। बाप आते ही हैं संगम पर। जबकि सारी सृष्टि पतित तमोप्रधान जड़जड़ीभूत बन जाती है। एक-दो को दु:ख देने लग पड़ते हैं। काम कटारी चलाकर एक दो को दु:ख देते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो कि हम बाबा के पास शान्तिधाम में जायेंगे फिर सुखधाम में आयेंगे। बाप कहते हैं तुम बच्चों को रूहानी नयनों पर बिठाकर स्वीट होम ले जायेंगे। अब तुम भी पण्डे के बच्चे पण्डे बनते हो। तुम्हारा नाम भी है शिव शक्ति पाण्डव सेना। हरेक को अपने बाप का परिचय दे बाप के पास जाने का रास्ता बताते हो। तुम्हें खुद भी वर्सा लेना है और औरों को भी देना है।

देखो, मेरठ से 22 की पार्टी आई है। मेहनत करते हैं, हरेक को कौड़ी से हीरे जैसा बनाने की राह बताते हैं। गाया भी जाता है - भगवान्, अन्धों की लाठी तुम। बाप आकर काँटों की दुनिया से फूलों की दुनिया में ले जाते हैं। तुम जानते हो असुर से फिर देवता बन रहे हैं। हम ही इन वर्णों से चक्र लगाकर आये हैं। अब शूद्र से ब्राह्मण बन फिर सो देवता बनेंगे। तुम हो गये स्वदर्शन चक्रधारी। यह अलंकार हैं तुम्हारे। परन्तु विष्णु को दे दिये हैं क्योंकि तुम्हारा स्थाई तो यह पार्ट रहता नहीं इसलिए देवताओं को यह निशानी दे दी है। बाप तो बच्चों पर तरस खाते हैं। कहाँ माया का असर न लग जाये। बाप को याद नहीं करेंगे तो माया जरूर खा जायेगी। बाबा जास्ती मेहनत नहीं देते हैं। सिर्फ कहते हैं मुझ बाप को याद करो। अपने को आत्मा निश्चय करो। यह है रूहानी यात्रा। तुम भी यात्रा करो। बाप को थोड़ेही भूलना चाहिए। योग अक्षर निकाल दो। बाप को याद करना है। क्या बाप को तुम भूल जाते हो? बाप कहते हैं अशरीरी बन जाओ। तुम अशरीरी हो। यहाँ आकर यह शरीर धारण किया है। अब फिर शरीर का भान छोड़ो। मैं वापिस ले चलूँगा। मैं कालों का काल हूँ। इस पुरानी देह को भूल मुझे याद करो। यह पुरानी जूती है। फिर तुमको नया शरीर देंगे। पुराने से ममत्व मिटाओ। मैं तुमको साथ ले जाऊंगा। तो खुश होना चाहिए कि हम जाते हैं पियर घर। पाँच हजार वर्ष हुए हैं, हमने शान्तिधाम को छोड़ा है। अब फिर हम जाते हैं। यह है दु:खधाम। बाप आकर बच्चों की सेवा करते हैं। आत्मा जो छी-छी बनी है, उनकी ज्योति जगाते हैं। सपूत बच्चे जो होंगे वह कहेंगे हम तो श्री नारायण को वरेंगे। बाप कहते हैं - अपना दिल दर्पण देखो - कोई भूत तो नहीं बैठा है? भूतों को भगाते रहो ताकि भूतों का राज्य ही खत्म हो जायेगा। बाप तो बच्चों की सेवा में उपस्थित है। वह तो विचित्र है, कोई चित्र नहीं है। दूसरे के आरगन्स द्वारा बाबा पढ़ाते हैं। वास्तव में तो विचित्र सब आत्मायें हैं। फिर बाद में चित्र लेकर पार्ट बजाती हैं। बाप कहते हैं मैं इस चित्र वा प्रकृति का आधार लेता हूँ, माताओं को ज्ञान कलष देता हूँ।

जब तुम बच्चे बाप को जान जाते हो तब ही वर्सा मिलता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप को याद कर, बाबा की श्रीमत पर चल पूरा माया के श्राप से मुक्त होना है।

2) देह का भान छोड़ अशरीरी बनना है, पुरानी दुनिया से ममत्व मिटा देना है।

वरदान:-

स्व-स्थिति की शक्ति से किसी भी परिस्थिति का सामना करने वाले मास्टर नालेजफुल भव!

स्व-स्थिति अर्थात् आत्मिक स्थिति। पर-स्थिति व्यक्ति वा प्रकृति द्वारा आती है लेकिन अगर स्व-स्थिति शक्तिशाली है तो उसके आगे पर-स्थिति कुछ भी नहीं है। स्व-स्थिति वाला किसी भी प्रकार की परिस्थिति से घबरा नहीं सकता क्योंकि नॉलेजफुल आत्मा हो गई। उसे तीनों कालों की, सर्व आत्माओं की नॉलेज है। वह जानते हैं कि यह परवश है इसलिए शुभ भावना, शुभ कामना द्वारा उसकी सेवा करेंगे, घबरायेंगे नहीं, सदा मुस्कराते रहेंगे।

स्लोगन:-

भाग्यवान वह है जो सदा भाग्य के गुण गाये, कमजोरियों के नहीं।

25-05-18

25-05-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“हे मीठे लाल-रात को जागकर मोस्ट बिलवेड बाप को याद करो, देही-अभिमानी बनो, श्रीमत कहती है बाप समान निरहंकारी बनो”

प्रश्न:-

शिवबाबा के साथ ब्रह्मा की मत बहुत नामीग्रामी है-क्यों?

उत्तर:-

क्योंकि ब्रह्मा बाबा शिवबाबा का एक ही मुरब्बी बच्चा है। इसे अपनी मत का अहंकार नहीं है। सदैव कहते हैं-तुम हमेशा बाप की ही श्रीमत समझो, इसमें ही तुम्हारा कल्याण है। बाबा देखो कितना निरहंकारी है, माताओं को कहते हैं वन्दे मातरम्। मातायें ज्ञान गंगा हैं, शक्ति सेना हैं, इन्हें आगे रखना है, रिगार्ड देना है। इसमें देह-अभिमान नहीं आना चाहिए।

गीत:-

जो पिया के साथ है...  

ओम् शान्ति।

गीत की पहली लाइन बच्चों ने सुनी। कहते हैं जो पिया के साथ है....। परन्तु साथ में इकठ्ठे रहने काक्वेश्चन ही नहीं उठता। जो बाप के बने हैं वे साथ हैं ही। जो बाप के बनते हैं वे ब्राह्मण भल कहाँ भी रहें उनके लिए तो ज्ञान बरसात है। जो शिवबाबा के पोत्रे-पोत्रियाँ बन प्रतिज्ञा करते हैं-बाबा, हम सदा पवित्र रहेंगे, ज्ञान अमृत पियेंगे-उनके लिए ही ज्ञान की बरसात है। अमृत कोई जल नहीं, जहर की भेंट में ज्ञान को अमृत कहा गया है। तो तुम हो पाण्डव सम्प्रदाय।यादव सम्प्रदाय, कौरव सम्प्रदाय का गायन है ना-क्या करत भये। तुम पाण्डवों पर है ज्ञान अमृत की बरसात। बाकी जो कौरव-यादव हैं उन पर ज्ञान अमृत की बरसात नहीं है। यह भी बच्चे जानते हैं-यादव-कौरव बहुत हैं। पाण्डव बहुत थोड़े हैं। गाया भी जाता है राम गयो, रावण गयो.. जिनकी बहुत सम्प्रदाय है। राम की सम्प्रदाय पाण्डव बहुत थोड़े हैं। यह है पाण्डव गवर्मेन्ट, श्रीमत पर चलने वाले। यह जैसे भगवान की गवर्मेन्ट है। परन्तु है गुप्त। तुम जानते हो हम श्रीमत पर चल भारत का बेड़ा पार कर रहे हैं। जो श्रीमत पर चलते हैं वे अपना बेड़ा पार करते हैं। यादव और कौरवों के पास कितने महल हैं। तुम बच्चों को कुछ भी नहीं। तीन पैर पृथ्वी के भी तुम्हारे नहीं। सब उन्हों का है। यह भी गाया हुआ है, जिनको तीन पैर पृथ्वी के नहीं मिलते थे उन्हों की विजय हुई और वह विश्व के मालिक बन गये। पाण्डव शक्ति सेना गुप्त है। शास्त्रों में भी दिखाते हैं जुआ खेला, पाण्डवों का राज्य था फिर जुआ में हराया, अभी न तो है राज्य, न है जुआ की बात। यह सब झूठ है। तुम बरोबर पाण्डव हो। शिवबाबा है रूहानी पण्डा। बच्चों को रूहानी यात्रा सिखलाने आया है। इस ब्रह्मा तन से श्रीमत देते हैं। जैसे शिवबाबा की श्रीमत गाई हुई है, वैसे ब्रह्मा की भी गाई हुई है क्योंकि फिर भी शिवबाबा का एक ही मुरब्बी बच्चा है। इस द्वारा कितने मुखवंशावली रचे जाते हैं। पवित्रता का कंगन बँधवाकर कहते हैं-जितना मेरी मत पर चलेंगे उतना मोस्ट बिलवेड बनेंगे। तुम्हारा हीरे जैसा जीवन बनेगा। शिवबाबा कहते हैं-इनका (ब्रह्मा का) और तुम्हारा कनेक्शन मेरे साथ है। हीरे जैसा जन्म तुमको मिलता है इसलिए अब देही-अभिमानी बनो। जितना शिवबाबा को याद करेंगे उतना देही-अभिमानी बनेंगे तो माया वार नहीं करेगी।

बापदादा की हमेशा बच्चों पर नजर रहती है। अगर बच्चे कुछ भी बेकायदे चलते हैं तो बापदादा का नाम बदनाम करते हैं। तो शिक्षा देनी पड़ती है-ऐसे काम नहीं करना। नाम बदनाम करने वाले के लिए कहा जाता है सतगुरू का निंदक ठौर नपाये। ऐसा कोई उल्टा कर्तव्य नहीं करना है। तुम बच्चे जानते हो-जितना बाबा को याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे। याद में रहने वाले को ही देही-अभिमानी कहा जाता है। देह-अभिमान होने से माया का वार जोर से होगा। बड़ी मंजिल है। स्कॉलरशिप लेते हैं। कितने ब्राह्मण बनने वाले हैं। गाया जाता है 33 करोड़ देवी-देवतायें। विजय माला में वह आते हैंजो देही-अभिमानी बनते हैं। देह-अभिमानी बनना माना माया का वार होना। देही-अभिमानी बनना माना बाप का बनना। यह बात बड़ी सूक्ष्म है। पुरूषार्थ कर बाप को याद करना है। वह बाप भी है, साजन भी है। अपार सुख देने वाला है। कहते हैं तुम बच्चों के लिए हथेली पर बहिश्त ले आया हूँ। सिर्फ तुम श्रीमत पर चलो। श्रीमत कहती है देही-अभिमानी भव। देह-अभिमान ने तुम्हारा बेड़ा गर्क किया है। माया तुमको देह-अभिमानी बनाती है। रूहानी बाप को सब भूले हुए हैं। अभी बापने आकर परिचय दिया है। तुम अपने को अशरीरी आत्मा समझो। मेरा तो शिवबाबा और वर्सा (स्वर्ग की राजाई) बस। देह-अभिमान में आकर मेरा कहा तो स्वर्ग का राज्य ले नहीं सकेंगे। हम आत्मा हैं-यह पक्का निश्चय करो। यह जो आत्मा सो परमात्मा का भूसा बुद्धि में भरा हुआ है, वह निकाल दो। अभी देही-अभिमानी बनो। बाप को याद करो तो तुम्हारा बेड़ा पार होगा। श्रीमत पर चलो। देही-अभिमानी नहीं बनेंगे तो माया बेड़ा गर्क कर देगी। ऐसे बहुतों का बेड़ा माया ने गर्क किया है क्योंकि श्रीमत पर नहीं चलते हैं। युद्ध का मैदान है। तुम्हें किसी भी बात में हार नहीं खानी है। काम का भूत तो एकदम पुर्जा-पुर्जा (टुकड़ा-टुकड़ा) कर देता है। सेकेण्ड नम्बर है क्रोध का भूत। क्रोध से एक दो को मारकर खलास करते हैं। यादवों का क्रोध बढ़ेगा। एकदम जैसे डेविल बन जायेंगे। क्रोध भी बड़ा भारी दुश्मन है। काम को नहीं जीता तो पवित्र दुनिया का मालिक बन नहीं सकेंगे। क्रोध दुश्मन भी ऐसा है जो खुद को भी और औरों को भी दु:ख देते हैं। यह भी है भावी। अब यादव, कौरव, पाण्डव क्या करते हैं? यह तुम ही जानते हो। यह है पाण्डव गवर्मेन्ट। अब तुम देखते हो पाण्डवों का राज्य तो है नहीं। तीन पैर पृथ्वी के भी नहीं मिलते हैं। उन्हों का तो देखो कितना दबदबा है। तुम बच्चों में बहुत थोड़े हैं जो नारायणी नशे में रहते हैं। नशे सभी में है नुकसान। देह-अभिमान में आने से बड़ा नुकसान है। तो बाप समझाते हैं तुम सदैव शिवबाबा को याद करो। ऐसे मत समझो यह ब्रह्मा ज्ञान देते हैं। समझाते हैं शिव बाबा को याद करो। शिवबाबा कहते हैं मेरे साथ योग लगाओ। यह ब्रह्मा भी मेरे साथ योग लगाते हैं। मुझे याद करेंगे तो मैं मदद करता रहूँगा। देह-अभिमानी बनने से माया वार करती रहेगी। और फिर एक दो को दु:ख देते रहेंगे। इसमें भी दो हैं बड़े दुश्मन। नम्बरवार तो होते हैं ना। काम-क्रोध है प्रत्यक्ष विकार। मोह-लोभ आदि तो गुप्त हैं। तो इन भूतों पर विजय पानी है।

बाप कहते हैं अभी तुमको तीन पैर पृथ्वी के नहीं मिलते हैं, मैं फिर तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। बाप की हमेशा दिल होती है बच्चा नाम निकाले। कोई पूछे तुम किसके बच्चे हो, तो फलक से उत्तर देना चाहिए। ओहो, बाप ने बच्चों को बहुत ऊंचा बनाया है। लौकिक बच्चे होते हैं कोई इन्जीनियर, कोई बैरिस्टर, कोई क्या-तो बाप खुश होते हैं। कोई-कोई बच्चे तो बाप की इज्जत लेने में भी देरी नहीं करते हैं। तुमको तो बाप की इज्जत बढ़ानी है ना। कुल कलंकित बच्चे के लिए तो बाप कहेंगे मुआ भला। यह बाप भी ऐसे कहेंगे तुम कामी, क्रोधी बनकर ईश्वरीय कुल को कलंक लगाते हो। बाप से वर्सा तो पूरा लेना चाहिए। देखते हो यह मम्मा-बाबा पहले नम्बर में लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। तो क्यों न हम उनके तख्त परजीत पा लें। बरोबर तुम माँ-बाप के तख्त को जीतते हो ना। बच्चे तख्त पर बैठेंगे तो खुद नीचे आ जायेंगे। अब राजधानी स्थापना हो रही है। बाप कहते हैं राजाई प्राप्त करो। प्रजा में नहीं जाना है। नारायणी नशा रहना चाहिए। भल प्रजा में भीबहुत धनवान होते हैं, परन्तु फिर भी प्रजा कहेंगे ना। राजाओं से भी प्रजा में साहूकार होते हैं। इस समय गवर्मेन्ट कंगाल है। कर्जा लेती है तो प्रजा साहूकार हुई ना। बाप समझाते हैं तुम जानते हो भारत की गवर्मेन्ट यह लक्ष्मी-नारायण थे, अब फिर बन रहे हैं। बाप की श्रीमत पर चलने से बेड़ा पार होता है। श्रेष्ठ बनेंगे। नहीं तो माया खा जायेगी। बहुतों को खा गई है। भल यहाँ से निकले हैं, बड़े लखपति बन गये हैं। भाजी (सब्जी) बेचने वाले आज करोड़पति हो गये हैं। बाबा के पास आते हैं, कहते हैं बाबा अभी तो पैसा बहुत हो गया है। बाबा कहते हैं तुम्हारे ऊपर बोझा बहुत है, शिवबाबा से तुमने पालना बहुत ली है। कर्जा हुआ ना, इसलिए खबरदार रहना। तो वे भी समझते हैं बोझा उतार लेवें। ऐसे बहुत मिलते हैं। कराची में तुम बच्चियाँ भागी थी। कुछ ले आई थी क्या? कुछ भी नहीं। शिवबाबा के खजाने से तुम्हारी परवरिश हुई। जो कोई-कोई शिवबाबा के पिछाड़ी सरेण्डर हुए उनसे तुम बच्चों की पालना हुई। इस बाबा को थोड़े-ही पता था कि यह आपस में मिलकर ऐसे आ जायेंगे। शिवबाबा ने उनकी बुद्धि में डाला और भठ्ठी बननी थी, तो सब भागकर आ गये। तो परवरिश के लिए भी कोई बलि चढ़े। फिर उनसे कई भाग गये। माया ने हार खिला दी। माया भी कोई कम समर्थ नहीं है। अब उस परजीत पानी है बाप की याद से। योग अक्षर नहीं बोलो। कई बच्चे कहते हैं योग में बिठाओ। लेकिन यह आदत पड़ जाये गीतो चलते-फिरते तुम याद नहीं कर सकेंगे। नयों को भी यह नहीं सिखाना है कि योग में बैठो। नये को तुम अपने सामने बिठाते हो तो वह नाम-रूप में फँस पड़ता है। अनुभव ऐसा कहता है, इसलिए मना की जाती है। माँ-बाप को एक जगह याद करना होता है क्या? तुम उठते-बैठते, सर्विस करते बाबा को याद करो। बाबा के जो लाल होंगे, वे रात को जागकर भी याद करते रहेंगे। ऐसा मोस्ट बिलवेड बाबा जिससे विश्व का मालिक बनते हैं, तो क्यों न उनको याद करेंगे।

पारलौकिक बाप से अथाह सुख का वर्सा मिलता है। तुम अभी से पुरूषार्थ करते हो, मेहनत करते हो जो फिर जन्म जन्मान्तर ईश्वरीय प्रालब्ध तुम भोगते हो। ऐसे नहीं, वहाँ सतयुग में तुम ऐसे कर्म करते हो तब राजाई मिलती है। नहीं, यहाँ के ही पुरूषार्थ से प्रालब्ध पाते हो। बड़ा भारी पद है। ऐसे बहुत आये फिर आश्चर्यवत सुनन्ती, कथन्ती, फिर भागन्ती हो गये। बहुत सेन्टर्स भी स्थापना करन्ती, फिर भागन्ती, गिरन्ती हो गये.. कोई सेन्टर स्थापना करके भी आहिस्ते-आहिस्ते गिर पड़ते हैं। वण्डरफुल माया है ना। माया झट नाक से पकड़ लेती है इसलिए बाप कहते हैं निरन्तर याद करो। समझो शिवबाबा समझाते हैं। इनसे मम्मा तीखी है। बाबा निराकार, निरहंकारी है। तुम बच्चों को भी समझना है, हम निराकारी आत्मा हैं, निरहंकारी बनना है तब ही वर्सा पायेंगे। देह-अभिमान नहीं आना चाहिए। बहुत मीठा बनना है। वहाँ माया होती नहीं। तो क्यों न बाप से वर्सा ले लेवें। बाबा का राइट हैण्ड बन जायें। वह कौन बनते हैं? जो सेन्टर स्थापना करते हैं। कमाल करते हैं, कितनों का कल्याण करते हैं। कोई सेन्टर्स स्थापना कर फिर चले जाते हैं। उनका भी फल मिल जाता है। एक तरफ जमा, दूसरे तरफ ना हो जाती है। यह तो बाप जानते हैं। ब्रह्मा भी जान सकते हैं। एक ही यह मुरब्बी बच्चा है। तुम सब हो पोत्रे पोत्रियाँ। तुम जानते हो मम्मा नम्बरवन जाती है। बाबा सेकेण्ड नम्बर में आते हैं। तो माताओं का रिगार्ड बहुत करना पड़े। बाबा कहते हैं वन्दे मातरम्। तो बच्चों को भी वन्दे मातरम् करना पड़े। माता बिगर उद्धार हो न सके। वास्तव में तो हैं सब सीतायें। सब सजनियाँ हैं-एक साजन की अथवा सब बच्चे हैं एक बाप के। बाप खुद कहते हैं वन्दे मातरम्। जैसे कर्म मैं करूंगा, मुझे देख बच्चे भी ऐसा करेंगे। तो माताओं की सम्भाल करनी है। इन पर अत्याचार बहुत होते हैं। कोई विघ्न डालते हैं तो भी बिचारी मातायें बाँधेली हो जाती हैं। पाप का घड़ा ऐसे भरता है, असुर मारते हैं तो पापात्मा बन पड़ते हैं। है तो सब ड्रामा अनुसार, इसको कोई मिटा नहीं सकते। कल्प पहले मुआिफक हरेक अपना वर्सा लेने वाले हैं। साक्षात्कार होता है-कौन अच्छे-अच्छे मददगार होते हैं। शिवबाबा कहते हैं मैं तो दाता हूँ, कुछ लेता नहीं हूँ। अगर यह ख्याल आता है कि हम देते हैं, अहंकार आया तो यह म्रे। शिवबाबा तो कहते हैं तुम ठिक्कर-भित्तर देकर रिटर्न में कितना लेते हो! बाबा हमेशा दाता है। शिवबाबा को मैं देता हूँ-यह बुद्धि में कभी नहीं आना चाहिए। मैं एक पैसा देकर लाख लेता हूँ, 21 जन्म के लिए राज्य-भाग्य लेता हूँ। बाप है सद्गति दाता, झोली भरने वाला। गुप्त दान करना होता है, बाबा भी गुप्त है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) देही-अभिमानी बन माया पर जीत अवश्य पानी है। रात को जागकर भी मोस्ट बिलवेड बाप को याद करना है।

2) बाप समान निराकारी, निरहंकारी बनना है। शिवबाबा को देते हैं-यह तो संकल्प में भी नहीं लाना है।

वरदानः-

अलौकिक रीति की लेन-देन द्वारा सदा विशेषता सम्पन्न बनने वाले फ्राकदिल भव

जैसे किसी मेले में जाते हो तो पैसा देते और कोई चीज लेते हो। लेने से पहले देना होता है तो इस रूहानी मेले में भी बाप से अथवा एक दो से कुछ न कुछ लेते हो अर्थात् स्वयं में धारण करते हो। जब कोई गुण अथवा विशेषता धारण करेंगे तो साधारणता स्वत: खत्म हो जायेगी। गुण को धारण करने से कमजोरी स्वत: समाप्त हो जायेगी। तो यही देना हो जाता है। हर सेकण्ड ऐसी लेन-देन करने में फ्राकदिल बनो तो विशेषताओं से सम्पन्न बन जायेंगे।

स्लोगनः-

अपनी विशेषताओं का प्रयोग करो तो हर कदम में प्रगति का अनुभव होगा।

27-03-2018

27-03-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - विजयी रत्न बनने के लिए जीते जी मरकर देही-अभिमानी बन बाप के गले का हार बनने का पुरुषार्थ करो"

प्रश्नः-

स्वदर्शन चक्र का राज़ स्पष्ट होते हुए भी बच्चों में धारणा नम्बरवार होती है - क्यों?

उत्तर:-

क्योंकि यह ड्रामा बहुत कायदे अनुसार बना हुआ है। ब्राह्मण ही 84 जन्मों को समझकर याद कर सकते हैं लेकिन माया ब्राह्मणों को ही याद में विघ्न डालती है, घड़ी-घड़ी योग तोड़ देती है। अगर एक समान धारणा हो जाए, सब सहज पास हो जाएं तो लाखों की माला बन जाये इसलिए राजधानी स्थापन होने के कारण नम्बरवार धारणा होती है।

गीत:-

मरना तेरी गली में...  

ओम् शान्ति।

बच्चों ने गीत सुना। यह है मरजीवापने का जन्म। मनुष्य जब शरीर छोड़ते हैं तो दुनिया मिट जाती है, आत्मा अलग हो जाती है तो न मामा, न चाचा कुछ भी नहीं रहते। कहा जाता है - यह मर गया अर्थात् आत्मा जाकर परमात्मा से मिली। वास्तव में कोई जाते नहीं हैं। परन्तु मनुष्य समझते हैं आत्मा वापिस गई या ज्योति ज्योत में समाई। अब बाप बैठ समझाते हैं - यह तो बच्चे जानते हैं आत्मा को पुनर्जन्म लेना ही होता है। पुनर्जन्म को ही जन्म-मरण कहा जाता है। पिछाड़ी में जो आत्मायें आती हैं, हो सकता है एक जन्म लेना पड़े। बस, वह छोड़ फिर वापस चली जायेगी। पुनर्जन्म लेने का भी बड़ा भारी हिसाब-किताब है। करोड़ों मनुष्य हैं एक-एक का विस्तार तो नहीं बता सकेंगे। अब तुम बच्चे कहते हो - हे बाबा, हमारी देह के जो भी सम्बन्ध हैं वे सब त्याग अब हम तुम्हारे गले का हार बनने आये हैं अर्थात् जीते जी आपका होने आये हैं। पुरुषार्थ तो शरीर के साथ करना पड़ेगा। अकेली आत्मा तो पुरुषार्थ कर न सके। बाप बैठ समझाते हैं - जब रूद्र यज्ञ रचते हैं तो वहाँ शिव का चित्र बड़ा मिट्टी का बनाते हैं और अनेक सालिग्राम के चित्र मिट्टी के बनाते हैं। अब वह कौन से सालिग्राम हैं जो बनाकर और फिर उनकी पूजा करते हैं? शिव को तो समझेंगे कि यह परमपिता परमात्मा है। शिव को मुख्य रखते हैं। आत्मायें तो ढेर हैं। तो वे भी सालिग्राम बहुत बनाते हैं। 10 हजार अथवा 1 लाख भी सालिग्राम बनाते हैं। रोज़ बनाया और तोड़ा फिर बनाया। बड़ी मेहनत लगती है। अब वह न पुजारी, न यज्ञ रचवाने वाले ही जानते हैं कि यह कौन है। क्या इतनी सब आत्मायें पूज्यनीय लायक हैं? नहीं। अच्छा, समझो भारतवासियों के 33 करोड़ सालिग्राम बनायें, वह भी हो नहीं सकता क्योंकि सभी तो बाप को मदद देते नहीं। यह बड़ी गुह्य बातें हैं समझने की। चार पांच लाख रूपया खर्च करते हैं रूद्र यज्ञ रचने में। अच्छा, अब शिव तो परमपिता परमात्मा ठीक है बाकी सालिग्राम इतने सब कौन से बच्चे हैं, जो पूजे जाते हैं? इस समय तुम बच्चे ही बाप को जानते हो और मददगार बनते हो। प्रजा भी तो मदद करती है ना। शिवबाबा को जो याद करते हैं, वह स्वर्ग में तो आ जायेंगे। भल ज्ञान किसको न भी दें तो भी स्वर्ग में आ जायेंगे। वह तो कितने ढेर होंगे! परन्तु मुख्य 108 हैं। मम्मा भी देखो कितनी जबरदस्त रत्न है! कितनी पूजी जाती है! अब तुम बच्चों को देही-अभिमानी जरूर बनना है। जन्म-जन्मान्तर तुम देह-अभिमानी रहे हो। कोई भी मनुष्य ऐसे नहीं कहेगा कि मैं आत्मा परमपिता परमात्मा की सन्तान हूँ। सन्तान हैं तो उनकी पूरी बायोग्राफी मालूम होनी चाहिए। पारलौकिक बाप की बायोग्राफी बड़ी जबरदस्त है। तो बच्चे कहते हैं अब जीते जी मरकर बाबा हम आपके गले का हार जरूर बनेंगे। आत्माओं की भी बड़ी-बड़ी माला है। वैसे ही फिर मनुष्य सृष्टि की बड़े ते बड़ी माला है। प्रजापिता ब्रह्मा है मुख्य। इनको आदम, आदि देव, महावीर भी कहते हैं। अब यह बड़ी गुह्य बातें हैं।

तुम समझते हो हम सब आत्मायें एक निराकार बाप की सन्तान हैं और यह मनुष्य सृष्टि का सारा सिजरा है जिसको जिनॉलॉजिकल ट्री कहा जाता है। जैसे सरनेम होता है ना - अग्रवाल, फिर उनके बच्चे पोत्रे अग्रवाल ही होंगे। सिजरा बनाते हैं ना। एक से फिर बढ़ते-बढ़ते बड़ा झाड़ हो जाता है। जो भी आत्मायें हैं वह शिवबाबा के गले का हार हैं। वह तो अविनाशी है। प्रजापिता ब्रह्मा भी तो है। नई दुनिया कैसे रची जाती है, क्या प्रलय हो जाती है? नहीं। दुनिया तो कायम है सिर्फ जब पुरानी होती है तो बाप आकर उनको नया बनाते हैं। अभी तुम समझते हो हम नये ते नये थे। हमारी आत्मा पवित्र नई थी। प्योर सोना थी, उनसे फिर हम आत्माओं को जेवर (शरीर) भी सोना मिला, उसको काया कल्पतरू कहते हैं। यहाँ तो मनुष्यों की एवरेज आयु 40-45 वर्ष रहती है। कोई-कोई की करके 100 वर्ष होती है। वहाँ तो तुम्हारी आयु एवरेज 125 वर्ष से कम होती नहीं। तुम्हारी आयु कल्प वृक्ष समान बनाते हैं। कभी अकाले मृत्यु नहीं होगी। तुम आत्मायें शिवबाबा के बच्चे हो, ब्रह्मा द्वारा जरूर ब्राह्मण पैदा होंगे, उनसे फिर प्रजा रची जाती है। पहले-पहले तुम ब्राह्मण बनते हो ब्रह्मा मुख वंशावली। शिवबाबा तो एक है फिर माता कहाँ? यह बड़ा गुह्य राज़ है। मैं इन द्वारा आकर तुम बच्चों को एडाप्ट करता हूँ। तो तुम पुरानी दुनिया से जीते जी मरते हो। वह जो एडाप्ट करते हैं वह धन देने के लिए करते हैं। बाप एडाप्ट करते हैं स्वर्ग का वर्सा देने के लिए, लायक बनाते हैं। साथ में ले जायेंगे इसलिए इस पुरानी दुनिया से जीते जी मरना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बन बाप का बनना है। हम वहाँ के रहने वाले हैं फिर सतयुग में सुख का पार्ट बजाया। यह बातें बाप समझाते हैं। शास्त्रों में तो हैं नहीं। अब बाप बैठ तुम आत्माओं को पवित्र बनाते हैं। आत्मा की मैल निकालते हैं। तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिलता है। उन्हों ने फिर तीजरी की कथा बैठ बनाई है। वास्तव में बात यहाँ की है। तुमको ब्रह्माण्ड से लेकर सारे सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का सारा समाचार मिल जाता है। बाप एक ही बार आकर समझाते हैं। सन्यासी तो पुनर्जन्म लेते रहते हैं। यह तो आया और बच्चों को पढ़ाया। बस। यह तो नई बात हो जाती है। शास्त्रों में यह बातें हैं नहीं। यह बहुत बड़े ते बड़ा कॉलेज है। कायदा है एक हफ्ता तो अच्छी रीति समझना पड़े। भट्ठी में बैठना पड़े। गीता का पाठ अथवा भागवत का पाठ भी एक हफ्ता रखते हैं ना, तो सात रोज़ भट्ठी में बैठना पड़े। विकारी तो सभी हैं, भले सन्यासी घरबार छोड़ निर्विकारी बनते हैं फिर भी जन्म विकार से लेकर फिर निर्विकारी बनने लिए सन्यास करते हैं। कई पुनर्जन्म को भी मानते हैं क्योंकि मिसाल देखते हैं। कोई बहुत वेद-शास्त्र पढ़ते-पढ़ते शरीर छोड़ते हैं तो उन संस्कारों अनुसार फिर जन्म लेते हैं, तो छोटेपन में ही शास्त्र अध्ययन हो जाते हैं। जन्म ले अपने को अपवित्र समझ फिर पवित्र बनने के लिए सन्यास करते हैं। तुम तो एक ही बार पवित्र बन देवता बनते हो। तुमको फिर सन्यास नहीं करना पड़ेगा। तो उनका सन्यास अधूरा हुआ ना। यह बातें खुद भी समझा नहीं सकते हैं। बाबा बैठ समझाते हैं। वह है उत्तम ते उत्तम बाप, जिसके तुम बच्चे बने हो। यह स्कूल भी है, रोजाना नई-नई बातें निकलती हैं। कहते हैं आज गुह्य ते गुह्य सुनाता हूँ। नहीं सुनेंगे तो धारणा कैसे होगी? अब बाप बैठ समझाते हैं तुम मेरे बने हो तो शरीर का भान छोड़ो, मैं गाइड बन आया हूँ वापिस ले जाने।

तुम हो पाण्डव सम्प्रदाय। वह जिस्मानी पण्डे हैं, तुम रूहानी पण्डे हो। वह जिस्मानी यात्रा पर ले जाते हैं। तुम्हारी है रूहानी यात्रा। उन्होंने तो पाण्डवों को हथियार दे, युद्ध के मैदान में दिखाया है। अभी तुम बच्चों में भी ताकत चाहिए। बहुत होते जायेंगे तो फिर ताकत भी बढ़ती जायेगी। तो बाप बैठ समझाते हैं कि मैंने तुमको गोद में लिया है इस ब्रह्मा द्वारा इसलिए इनको मात-पिता कहा जाता है। यह तो सब कहते हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे। अच्छा, उनको तो गॉड फादर कहा जाता है। गॉड मदर तो नहीं कहा जाता। तो मदर कैसे कहते? मनुष्य फिर जगदम्बा को मदर समझ लेते हैं। परन्तु नहीं, उनके भी मात-पिता हैं, उनकी माता भला कौन सी है? यह बड़ी गुह्य बातें हैं। गायन तो है परन्तु सिद्ध कर कौन समझाये? तुम जानते हो यह मात-पिता है। पहले है माता। बरोबर तुमको इस ब्रह्मा माता के पास पहले आना पड़े। इनमें प्रवेश कर तुमको एडाप्ट करता हूँ, इसलिए यह मात-पिता ठहरे। यह बातें कोई शास्त्र में नहीं हैं। यह बाप बैठ समझाते हैं - कैसे तुम मुख वंशावली बनते हो। मैं ब्रह्मा मुख से तुमको रचता हूँ। कोई राजा है, कहेंगे मुख से तुमको कहता हूँ तुम मेरे हो। यह आत्मा कहती है। परन्तु उनको फिर भी मात-पिता नहीं कहेंगे। यह बड़ी वन्डरफुल बात है। तुम जानते हो हम शिवबाबा के बने हैं तो यह देह का भान छोड़ना पड़े। अपने को आत्मा अशरीरी समझना मेहनत का काम है। इसको कहा ही जाता है राजयोग और ज्ञान। दोनों अक्षर आते हैं। मनुष्य जब मरते हैं तो उनको कहते हैं राम-राम कहो या गुरू लोग अपना नाम दे देते हैं। गुरू मर जाता तो फिर उनके बच्चे को गुरू कर देते हैं। यहाँ तो बाप जायेंगे तो सभी को जाना है। यह मृत्युलोक का अन्तिम जन्म है। बाबा हमको अमरलोक में ले जाते हैं, वाया मुक्तिधाम जाना है।

यह भी समझाया जाता है जब विनाश होता है तो यह कलियुग का पुर नीचे चला जाता है। सतयुग ऊपर आ जाता है। बाकी कोई समुद्र के अन्दर नहीं चले जाते हैं। यहाँ तुम बच्चे सागर के पास आते हो रिफ्रेश होने। यहाँ तुम सम्मुख ज्ञान डांस देखते हो, दिखाते हैं गोप-गोपियों ने कृष्ण को डांस कराई, यह बात इस समय की है। चात्रक बच्चों के सामने बाप की मुरली चलती है। बच्चों को भी सीखना पड़े। फिर जो जितना सीखे। समझाना है बेहद के बाप से स्वर्ग का वर्सा लो। हे भगवान कहते हो, वह तो है रचयिता। जरूर स्वर्ग ही रचेंगे। यह एक ही बाप है जो स्वर्ग रचते हैं वो फिर आधाकल्प चलता है। बाबा तुम्हें कितने राज़ समझाते हैं। बच्चों को मेहनत कर धारणा करनी है। स्वदर्शन चक्र का राज़ भी बाबा ने कितना साफ बताया है। 84 जन्मों के चक्र को ब्राह्मण ही याद कर सकते हैं। यह है बुद्धि का योग लगाकर चक्र को याद करना। परन्तु माया घड़ी-घड़ी योग तोड़ देती है, विघ्न डालती है। सहज हो तो फिर सब पास कर लें। लाखों की माला बन जाये। यह तो ड्रामा ही कायदे अनुसार है। मुख्य हैं 8, उनमें फ़र्क नहीं पड़ सकता। त्रेता के अन्त में जितने प्रिन्स-प्रिन्सेज हैं सभी मिलकर जरूर यहाँ ही पढ़ते होंगे। प्रजा भी पढ़ती होगी। यहाँ ही किंगडम स्थापन होती है। बाप ही किंगडम स्थापन करते हैं और कोई प्रीसेप्टर किंगडम नहीं स्थापन करते। यही बड़ा वन्डरफुल राज़ है। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य कहाँ से आया? कलियुग में तो राजाई है नहीं। अनेक धर्म हैं। भारतवासी कंगाल हैं। कलियुग की रात पूरी हो, दिन शुरू हुआ और बादशाही चली। यह क्या हुआ! अल्लाह अवलदीन का खेल दिखाते हैं ना। तो कारून के खजाने निकल आते हैं। तुम सेकेण्ड में दिव्य दृष्टि से वैकुण्ठ देख आते हो। अच्छा!

मात-पिता, बापदादा, बच्चे सारी फैमली इक्ट्ठी बैठी है। मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप समान सभी को रिफ्रेश करने की सेवा करनी है। चात्रक बन ज्ञान डांस करनी और करानी है।

2) इस शरीर का भान छोड़ पुरानी दुनिया से जीते जी मरना है। अशरीरी रहने का अभ्यास करना है। स्वयं को स्वर्ग के वर्से का लायक भी बनाना है।

वरदान:-

उड़ती कला के वरदान द्वारा सदा आगे बढ़ने वाले सर्व बन्धन मुक्त भव|

बाप का बनना अर्थात् उड़ती कला के वरदानी बनना। इस वरदान को जीवन में लाने से कभी किसी कदम में भी पीछे नहीं होंगे। आगे ही आगे बढ़ते रहेंगे। सर्वशक्तिमान बाप का साथ है तो हर कदम में आगे हैं। स्वयं भी सदा सम्पन्न और दूसरों को भी सम्पन्न बनाने की सेवा करते हैं। वे किसी भी प्रकार की रुकावट में अपने कदमों को रोकते नहीं। ऐसे वरदानी बच्चे किसी के बन्धन में आ नहीं सकते, सर्व बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं।

स्लोगन:-

जिनके पास सर्व शक्तियों का स्टॉक है, प्रकृति उनकी दासी बन जाती है।

 

 

03-05-2018

03-05-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - ऊंची मत एक बाप की है, उसी पर सदा चलते रहो, मातेले बन बाप से पूरा-पूरा वर्सा लो"

प्रश्नः-

सौतेले बच्चों को किस बात का निश्चय न होने के कारण बाप के पूरे मददगार नहीं बन सकते हैं?

उत्तर:-

सौतेले बच्चों को यह निश्चय ही नहीं होता कि अभी पवित्र बनने से ही पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। बिना पवित्र बनें पवित्र दुनिया स्थापन नहीं हो सकती। यह निश्चय हो तो पूरे-पूरे मददगार बनें। मातेले बच्चे बाप को पूरा पहचान लायक बनने का पुरुषार्थ करते हैं। बाप की श्रीमत पर चल श्रेष्ठ बनते हैं।

गीत:-

तकदीर जगाकर आई हूँ....  

ओम् शान्ति।

बच्चों ने गीत सुना। यह बच्चों का कहना है कि हम पाठशाला में आये हुए हैं। इनको कामॅन सतसंग नहीं कहेंगे। सत के साथ संग तुम्हारा ही है। सत कहा जाता है एक परमपिता परमात्मा को। अब तुम बच्चे उस सत अर्थात् बेहद बाप के संग में बैठे हो। बाप हैं वास्तव में दो। हद का बाप और बेहद का बाप। एक है सभी आत्माओं का निराकारी बाप, दूसरा है प्रजापिता ब्रह्मा। तुम बच्चों को अब दोनों बाप मिले हैं। बेहद का बाप, जिसको परमपिता परमात्मा कहा जाता है, वह एक ही सब भक्तों का भगवान है। भक्त तो अथाह हैं। भगवान है एक। वह है निराकार बेहद का बाप। दूसरा है प्रजापिता ब्रह्मा बेहद का बाप और तीसरा है लौकिक बाप। शरीर तो विकार से जन्म लेने वाला है। उनको कुख वंशावली कहा जाता है। इस कलियुगी दुनिया को पाप आत्माओं की दुनिया कहा जाता है। दूसरी है पुण्य आत्माओं की दुनिया - वाइसलेस वर्ल्ड, नई दुनिया। दुनिया एक ही है, दो नहीं हैं। घर एक ही होता है, दो नहीं। शुरू में उसको नया घर कहा जाता है, फिर पुराना हो जाता है। भारत नया था तो उसको सतयुग कहा जाता है। अब पुराना है, तो उनको कलियुग कहा जाता है। इनको दु:ख देने वाली विकारी दुनिया कहा जाता है। जब विश्व नई थी तो भारत भी नया था। अब सृष्टि पुरानी है तो भारत भी पुराना हो गया है। नये भारत में सिवाए देवी-देवताओं के और कोई धर्म नहीं था। एक ही लक्ष्मी-नारायण का राज्य था और कोई खण्ड नहीं था, 5 हज़ार वर्ष की बात है। भारत को स्वर्ग कहा जाता था। दो कला कम हुई तो त्रेता में राम-सीता का राज्य हुआ। देवता, क्षत्रिय धर्म में आ गये। सतयुग त्रेता दोनों को मिलाकर सुखधाम कहा जाता है। जब दु:खधाम द्वापर से शुरू होता है तो भक्ति मार्ग शुरू होता है। भारत जो सद्गति में था सो दुर्गति में आ जाता है। पहले 16 कला सद्गति फिर 14 कला सद्गति फिर जब द्वापर से वाम मार्ग शुरू हुआ तो भारतवासी दु:खी होने शुरू हुए। दु:खी बनाया है रावण ने। अब सब रावण मत पर चल रहे हैं। ईश्वर को कोई जानते नहीं। ऊंचे ते ऊंची मत उनकी गाई हुई है। अब तुम आये हो नई दुनिया के लिए तकदीर जगाने। मनुष्य तो सब पुरानी दुनिया के लिए मेहनत करते हैं।

तुम जानते हो अभी इस पुरानी दुनिया के विनाश के लिए महाभारत लड़ाई है। परन्तु विनाश होने के पहले नई सृष्टि भी चाहिए। अब बाप नई सृष्टि रच रहे हैं। तुम सब हो ईश्वर की सन्तान। पहले आसुरी सन्तान थे। अभी सदा पावन की सन्तान बने हो - सुखधाम का वर्सा पाने अर्थात् देवता पद पाने। तुम बेहद के बाप से तकदीर बनाने आये हो। बाप तुम बच्चों को बेहद का सुख देने फिर से आया है। भारतवासी बिल्कुल कौड़ी तुल्य बन पड़े हैं। अब राजा कोई नहीं, प्रजा का प्रजा पर राज्य है। देवी-देवता जो पवित्र थे, अब पतित बन पड़े हैं। गाते हैं पतित-पावन आओ। रावण को जलाते हैं परन्तु रावण जलता नहीं। सतयुग में थोड़ेही जलायेंगे। सतयुग में वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी देवी-देवताओं का राज्य था। इस समय सब नर्क-वासी बन पड़े हैं। अब इस पार से उस पार जाना है। खिवैया एक ही है, वह आकर विषय सागर से क्षीर-सागर में ले जाते हैं। यहाँ के साहूकार लोग समझते हैं हम तो स्वर्ग में हैं। जो गरीब हैं वह नर्क में हैं। उनको मालूम नहीं स्वर्ग किसको कहा जाता है। तुम जानते हो सतयुग में था पारसनाथ और पारसनाथियों का राज्य। बेहद के बाप को तुम पहचान कर बाप कहते हो तो जरूर वर्सा मिलना चाहिए। तुमको यह याद रखना है कि हम शान्तिधाम के वासी हैं। परमधाम से यहाँ आये हैं पार्ट बजाने। 84 जन्म कैसे लेते हो - यह बाप बैठ सारा हिसाब समझाते हैं। बाप कहते हैं - बच्चे, अब कलियुग का अन्त है। यहाँ तुम बाप से सहज योग सीख रहे हो। तुम कहते हो - बाबा, हम सूर्यवंशी घराने में जरूर आयेंगे। यह एम ऑब्जेक्ट है। यह पाठशाला है भगवान की। भगवानुवाच - बच्चे, मैं तुमको मनुष्य से देवता बनाने आया हूँ। तुम राजाओं का राजा बनो। मातेले बन पूरा वर्सा लो। श्रीमत पर चलेंगे तो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनेंगे। बाप है ऊंचे ते ऊंचा। निराकार भगवान, न साकारी, न आकारी। आकारी है ब्रह्मा-विष्णु-शंकर देवतायें। उनको भगवान नहीं कहा जाता है। भगवान है एक, भक्त हैं अनेक। बाबा पूछते हैं भक्त कितने हैं? 5-6 सौ करोड़। भक्ति मार्ग वाले भक्त अब धक्के खा रहे हैं। कोई कहाँ, कोई कहाँ। तुम सब ड्रामा के एक्टर्स हो तो ड्रामा के क्रियेटर, डायरेक्टर का मालूम होना चाहिए। परन्तु कुछ भी नहीं जानते। सतयुग में सूर्यवंशी देवतायें थे उन्हों की महिमा गाते हैं। हैं तो दोनों मनुष्य फिर उन्हों की महिमा क्यों गाते हैं? क्योंकि उन्हों को ईश्वर ने ऐसा बनाया है। तुमको भी बाप मनुष्य से देवता बना रहे हैं। फिर तुम देवता से क्षत्रिय... आदि बनेंगे। नई दुनिया में रहने वाले देवतायें फिर पुरानी दुनिया में तमोप्रधान पतित बन जाते हैं। बाबा आकर फिर लायक बनाते हैं। कौड़ी से हीरे जैसा बनाते हैं। तुम्हारे में कोई अच्छी रीति पहचानते हैं कोई सेमी। सेमी को सौतेला कहा जाता है। निश्चय नहीं करते कि बाबा हम जरूर पवित्र बन पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। मददगार नहीं बनते। पहले तो मात-पिता का बनना पड़े। बाबा हम आपके थे फिर आधा कल्प बाप को भूल माया के वश हो गये। अब फिर आपके बने हैं। इस पतित दुनिया में पतितों का ही मान है। स्वर्ग में ऐसी कोई बात नहीं होती।

बाबा ने समझाया है स्वर्ग में शरीर छोड़ने के पहले साक्षात्कार होता है। अभी हम यह शरीर छोड़ जाए बालक बनेंगे। शरीर की आयु पूरी हुई है। अकाले मृत्यु होता नहीं। पुराना शरीर छोड़ नया ले लेते हैं। सर्प का मिसाल, भ्रमरी का मिसाल... भ्रमरी में भी अक्ल है। आज के मनुष्य में यह अक्ल नहीं रहा है। तुम सच्ची-सच्ची भ्रमरियाँ हो। वैरायटी कीड़ों को भूँ-भूँ करके मनुष्य से देवता बनाती हो। तुमको बाप सुखी बनाने आया है। सहज योग सिखलाने आया है। बाप ने राजयोग कब सिखलाया था, यह कोई नहीं जानते इसलिए बाप कहते हैं - बच्चे, तुम मेरी मत पर चलकर श्रेष्ठ बनो। इस समय सबकी आसुरी मत है। सर्व-व्यापी के ज्ञान ने भारत को बिल्कुल कौड़ी मिसल बनाया है। कर्जा लेते रहते हैं। भगवान कौन है, कहाँ रहते हैं - मनुष्य कुछ भी नहीं जानते। वह तो निराकार है फिर यहाँ कैसे ढूँढते हो। भगवान कहते हैं तुम कहते हो हम शिवानंद के फालोअर्स हैं फिर उनको फालो कहाँ करते हो। आजकल उन्हों का कितना मान है। परन्तु श्रीमत तो एक ही परमपिता परमात्मा की गाई हुई है। अब तुम आये हो ईश्वर की मत पर चल ईश्वर से वर्सा लेने के लिए। बाप कहते हैं जो धक्के खाते हैं वह मुझे नहीं जानते हैं। उनको पता ही नहीं कि बाप पढ़ाकर वर्सा दे विश्व का मालिक बनाते हैं। तुम अभी धक्का खाने से छूट गये हो। भगवानु-वाच - तुम्हें देवता बनाने आया हूँ। तुम बी.के.जानते हो भगवान आकर बच्चों को विश्व के मालिकपने का वर्सा देते हैं। तुम पुरुषार्थ से विश्व के मालिक बनते हो। बाप है विश्व का रचता। अब तुमको धक्का नहीं खाना है। धक्के खाने वाले को भगवान नहीं मिलता है। तुम तो बाप से सुख का वर्सा लेते हो। बाकी सबको शान्तिधाम का वर्सा मिल जायेगा। अब दु:ख का खाता खलास कर सुख का जमा करते हो। बाकी सब सजा खाकर अपने-अपने सेक्शन में चले जायेंगे।

बच्चों ने गीत सुना। नई दुनिया के लिए नई तकदीर बनाने आये हैं। वही तकदीर फिर 21 जन्म पूरा होने से पुरानी बनती है। अब पुरुषार्थ करना है - चाहे सूर्यवंशी राज्य लो, चाहे साहूकार प्रजा बनो, चाहे गरीब प्रजा बनो। प्रजा भी बहुत साहूकार होती है जो कई राजे लोग भी उन्हों से कर्जा लेते हैं। अभी भी प्रजा साहूकार है। सतयुग में ऐसे नहीं होता। जो पिछाड़ी में राजा-रानी बनते हैं उनसे प्रजा में बहुत साहूकार होते हैं। बड़े-बड़े महलों में रहते हैं। अब जो चाहे बनो। अभी सब दु:खी हैं, बाबा आये हैं तुमको स्वर्ग में सदा सुखी अथवा स्वर्गवासी बनाने। इस समय नर्क के वासी फिर भी जन्म नर्क में ही लेंगे। तुम स्वर्गवासी बनने का पुरुषार्थ कर रहे हो। बाबा के शरीर का कोई नाम नहीं है। मनुष्यों को 84 जन्म में 84 नाम मिलते हैं। भिन्न नाम, रूप, देश, काल। शिवबाबा को न आकारी, न साकारी शरीर मिलता है। कहते हैं मैं लोन लेता हूँ। आता तब हूँ जब इनकी वानप्रस्थ अवस्था होती है। यह ड्रामा सेकेण्ड बाई सेकेण्ड शूट होता जाता है। हम तुम कल्प पहले मिले थे, अब मिले हैं, फिर मिलेंगे। जो सेकेण्ड बीता सो ड्रामा। बाप भी ड्रामा के बंधन में बाँधा हुआ है। बाप कहते हैं तुम बच्चों को आकर हीरे जैसा बनाता हूँ। मैं तुम्हारा मोस्ट ओबिडियेन्ट, मोस्ट बिलवेड फादर, टीचर और सतगुरू भी बनता हूँ। मेरा कोई बाप, टीचर, गुरू नहीं। सबका बाप मैं स्वयं हूँ। नॉलेजफुल हूँ। मेरा कोई गुरू नहीं। स्वयं सबका सद्गति दाता हूँ। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) भ्रमरी की तरह भूँ-भूँ कर मनुष्य को देवता बनाने की सेवा करनी है। बाप की श्रीमत पर सदा सुखी बनना और बनाना है।

2) ऊंच तकदीर बनाने के लिए पावन जरूर बनना है। सबको विषय सागर से क्षीरसागर में ले चलने के लिए बाप समान खिवैया बनना है।

वरदान:-

रूहानी प्रसन्नता के वायब्रेशन द्वारा सर्व को शान्ति और शक्ति की अनुभूति कराने वाले सर्व प्राप्ति स्वरूप भव

जो परमात्म प्राप्तियों से सम्पन्न, सर्व प्राप्ति स्वरूप बच्चे हैं, उनके चेहरे द्वारा रूहानी प्रसन्नता के वायब्रेशन अन्य आत्माओं तक पहुंचते हैं और वे भी शान्ति और शक्ति की अनुभूति करते हैं। जैसे फलदायक वृक्ष अपने शीतलता की छाया में मानव को शीतलता का अनुभव कराता है और मानव प्रसन्न हो जाता है, ऐसे आपकी प्रसन्नता के वायब्रेशन अपने प्राप्तियों की छाया द्वारा तन-मन के शान्ति और शक्ति की अनुभूति कराते हैं।

स्लोगन:-

जो स्मृति स्वरूप रहते हैं उन्हें कोई भी परिस्थिति खेल अनुभव होती है।

04-03-18

04-03-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 14-04-83 मधुबन


“सम्पन्न आत्मा सदा स्वयं और सेवा से सन्तुष्ट”

आज दूर देशवासी बच्चों से मिलने के लिए बच्चों के साकारी लोक में साकार का आधार ले बच्चों को और इस साकारी पुरानी दुनिया को भी देख रहे हैं। पुरानी दुनिया अर्थात् हलचल की दुनिया। बापदादा हलचल के दुनिया की रौनक देख बच्चों की अचल स्थिति को देख रहे थे। यह सब हलचल के नज़ारे साक्षी हो देखते हैं। खेल में यह नज़ारे और ही अपना अचल स्वीट होम और अपनी निर्विघ्न स्वीट राजधानी याद दिलाते हैं। स्मृति आती है कि हमारा घर, हमारा राज्य क्या था और अब भी क्या राज्य आने वाला है और घर जाने वाले हैं। आज बापदादा यह दृश्य देख रूहरिहान कर रहे थे। यह सब हलचल की दुनिया में रह, यह दृश्य देखना कब तक? ब्रह्मा बाप को, बच्चों का यह थोड़ा बहुत सहन करने का दृश्य देख दिल में आता कि अभी से सभी को वतन में बुला लेवें। यह बात पसन्द है? उड़ सकेंगे? कोई रस्सियाँ आदि तो नहीं बांधी हुई हैं? किसी भी प्रकार के लगाव से पंख कमज़ोर तो नहीं हैं? लगाव से पंख कहाँ चिपके हुए तो नहीं हैं? अभी ऐसी तैयारी की हुई है? बापदादा तो सेकण्ड में उड़ेंगे और आप तैयारी करते-करते रह जाओ तो! तैयार तो हो ना! पहले तो दो बातें अपने से पूछनी पड़ें -
1- एक तो सम्पूर्ण स्वतंत्र आत्मा हैं? अपने पुरूषार्थ की रफतार से अपने आप से सन्तुष्ट हैं? अपनी सन्तुष्टता के साथ-साथ स्वयं की श्रेष्ठ स्थिति का सर्व सम्पर्क वाली आत्माओं से सन्तुष्टता का रेसपान्ड मिलता है?
2- दूसरी बात सेवा में स्वयं से सन्तुष्ट हैं? यथार्थ शक्तिशाली विधि का रिटर्न सिद्धि प्राप्त हो रही है? अपने राज्य की वैरायटी प्रकार की आत्माओं को जैसे राज्य अधिकारी रॉयल फैमली के अधिकारी, रॉयल प्रजा के अधिकारी और साधारण प्रजा के अधिकारी, सर्व प्रकार की आत्माओं को संख्या प्रमाण तैयार किया है? करावनहार बाप है लेकिन निमित्त करनहार बच्चों को ही बनाते हैं क्योंकि कर्म का फल प्रालब्ध मिलती है। निमित्त कर्म बच्चों को ही करना है। सम्बन्ध में ब्रह्मा बाप के साथ-साथ बच्चों को आना है। बाप तो न्यारा और प्यारा ही रहेगा। तो ऐसी चेकिंग करके फिर बताओ कि तैयार हो? कार्य को आधा में तो नहीं छोड़ना है ना! और बिना सम्पन्नता के आत्मा कर्मातीत हो बाप के साथ जा नहीं सकती है। समान वाले ही साथ जायेंगे। जाना तो साथ है या पीछे-पीछे आना है! शिव की बरात में तो नहीं आना है ना! अभी बताओ तैयार हो? या सोच रहे हो कि छू मंत्र का कुछ खेल हो जाए। शिव मंत्र ही छू मंत्र है। वह तो मिला हुआ है ना! ब्रह्मा बाप को बहुत ओना था कि बच्चों को तकलीफ न हुई हो। तकलीफ हुई वा मनोरंजन हुआ? (आज बहुत वर्षा होने के कारण टेन्ट आदि सब गिर गये) टेन्ट हिला वा दिल भी हिली? दिल तो मजबूत है ना। क्या होगा, कैसे जायेंगे, यह हलचल तो नहीं है? कुछ तो नई चीज भी देखो ना! आबू की मानसून आप लोग तो कभी देखते नहीं हो। यह भी थोड़ा सा अनुभव हो रहा है। पहाड़ों की बारिश भी देखनी चाहिए ना। यह भी एक रमणीक दृश्य देखा। जल्दी भागने का संकल्प तो नहीं आता है ना। यह भी अच्छा है जो लास्ट दिन में तूफान आया है। कोई नई न्यूज़ तो जाकर सुनायेंगे ना कि क्या क्या देखा। सुनाने के समाचार में रमणीकता तो आयेगी ना! वैसे तो सब अचल हैं। अभी तो बहुत कुछ होना है। यह तो कुछ नहीं है। यह भी तत्वों के परिवर्तन की निशानियाँ हैं। इसको देख जैसे तत्वों की रफ्तार तेज जा रही है, ऐसे स्व-परिवर्तन की रफ्तार भी तीव्र हो। अच्छा।
ऐसे सदा स्व-परिवर्तन में तीव्रगति से चलने वाले, स्व की सम्पूर्णता से सेवा के कार्य की सम्पन्नता करने वाले, सदा साक्षीपन की स्थिति में स्थित रह हलचल के पार्ट को भी रमणीक पार्ट समझ अचल हो देखने वाले, ऐसे सदा शक्तिशाली श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:-

1) सदा साक्षीपन की स्थिति में स्थित रहते हुए ड्रामा के हर दृश्य को देखते हो? साक्षीपन की स्थिति सदा ड्रामा के अन्दर हीरो पार्ट बजाने में सहयोगी होती है। अगर साक्षीपन नहीं तो हीरो पार्ट बजा नहीं सकते। हीरो पार्टधारी से साधारण पार्टधारी बन जाते हैं। साक्षीपन की स्टेज सदा ही डबल हीरो बनाती है। एक हीरे समान बनाती है और दूसरा हीरो पार्टधारी बनाती है। साक्षीपन अर्थात् देह से न्यारे, आत्मा मालिकपन की स्टेज पर स्थित रहे। देह से भी साक्षी, मालिक। इस देह से कर्म कराने वाली, करने वाली नहीं। ऐसी साक्षी स्थिति सदा रहती है? साक्षी स्थिति सहज पुरूषार्थ का अनुभव कराती है? क्योंकि साक्षी स्थिति में किसी भी प्रकार का विघ्न या मुश्किलात आ नहीं सकती। यह है मूल अभ्यास। यही साक्षी स्थिति का पहला और लास्ट पाठ है क्योंकि लास्ट में जब चारों ओर की हलचल होगी, तो उस समय साक्षी स्थिति से ही विजयी बनेंगे। तो यही पाठ पक्का करो। अच्छा -
2) सदा अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें समझते हो? संगमयुग श्रेष्ठ युग है, परिवर्तन युग है, आत्मा और परमात्मा के मिलन मेले का युग है। ऐसे संगमयुग की विशेषताओं को सोचो तो कितनी हैं! इन्हीं विशेषताओं की स्मृति में रह समर्थ बनो। जैसी स्मृति वैसा स्वरूप स्वत: बन जाता है। तो सदा ज्ञान का मनन करते रहो। मनन करने से शक्ति भरती है। अगर मनन नहीं करते, सिर्फ सुनते सुनाते तो शक्ति स्वरूप नहीं लेकिन सुनाने वाले स्पीकर बनेंगे। आप बच्चों के मनन का चित्र भक्ति में भी दिखाया है। कैसे मनन करो, वह चित्र याद है! विष्णु का चित्र नहीं देखा है? आराम से लेटे हुए हैं और मनन कर रहे हैं, सिमरण कर रहे हैं। सिमरण कर मनन कर हर्षित हो रहे हैं। तो यह किसका चित्र है? शैया देखो कैसी है! सांप को शैया बना दिया अर्थात् विकार अधीन हो गये। उसके ऊपर सोया है। नीचे वाली चीज़ अधीन होती है, ऊपर मालिक होते हैं। मायाजीत बन गये तो निश्चिंत। माया से हार खाने की, युद्ध करने की कोई चिन्ता नहीं। तो निश्चिन्त और मनन करके हर्षित हो रहे हैं। ऐसे अपने को देखो मायाजीत बने हैं! कोई भी विकार वार न करे। रोज़ नई-नई प्वाइंट स्मृति में रख मनन करो तो बड़ा मज़ा आयेगा, मौज में रहेंगे क्योंकि बाप का दिया हुआ खजाना मनन करने से अपना अनुभव होता है। जैसे भोजन पहले अलग होता है, खाने वाला अलग होता है। लेकिन जब हज़म कर लेते तो वही भोजन खून बन शक्ति के रूप में अपना बन जाता है। ऐसे ज्ञान भी मनन करने से अपना बन जाता, अपना खज़ाना है - यह महसूसता आयेगी।
3) सभी अपने को सदा श्रेष्ठ आत्मा समझते हो? श्रेष्ठ आत्मा अर्थात् हर संकल्प, बोल और कर्म सदा श्रेष्ठ हो क्योंकि साधारण जीवन से निकल श्रेष्ठ जीवन में आ गये। कलियुग से निकल संगमयुग पर आ गये। जब युग बदल गया, जीवन बदल गई, तो जीवन बदला अर्थात् सब कुछ बदल गया। ऐसा परिवर्तन अपने जीवन में देखते हो? कोई भी कर्म, चलन साधारण लोगों के मुआफिक न हो। वे हैं लौकिक और आप अलौकिक। तो अलौकिक जीवन वाले लौकिक आत्माओं से न्यारे होंगे। संकल्प को भी चेक करो कि साधारण है वा अलौकिक है? साधारण है तो साधारण को चेक करके चेन्ज कर लो। जैसे कोई चीज़ सामने आती है तो चेक करते हो यह खाने योग्य है, लेने योग्य है, अगर नहीं होती तो नहीं लेते, छोड़ देते हो ना! ऐसे कर्म करने के पहले कर्म को चेक करो। साधारण कर्म करते-करते साधारण जीवन बन जायेगी फिर तो जैसे दुनिया वाले वैसे आप लोग भी उसमें मिक्स हो जायेंगे। न्यारे नहीं लगेंगे। अगर न्यारापन नहीं तो बाप का प्यारा भी नहीं। अगर कभी-कभी समझते हो कि हमको बाप का प्यार अनुभव नहीं हो रहा है तो समझो कहाँ न्यारेपन में कमी है, कहाँ लगाव है। न्यारे नहीं बने हो तब बाप का प्यार अनुभव नहीं होता। चाहे अपनी देह से, चाहे सम्बन्ध से, चाहे किसी वस्तु से...स्थूल वस्तु भी योग को तोड़ने के निमित्त बन जाती है। सम्बन्ध में लगाव नहीं होगा लेकिन खाने की वस्तु में, पहनने की वस्तु में लगाव होगा, कोई छोटी चीज़ भी नुकसान बहुत बड़ा कर देती है। तो सदा न्यारापन अर्थात् अलौकिक जीवन। जैसे वह बोलते, चलते, गृहस्थी में रहते ऐसे आप भी रहो तो अन्तर क्या हुआ! तो अपने आपको देखो कि परिवर्तन कितना किया है! चाहे लौकिक सम्बन्ध में बहू हो, सासू हो, लेकिन आत्मा को देखो। बहू नहीं है लेकिन आत्मा है। आत्मा देखने से या तो खुशी होगी या रहम आयेगा। यह आत्मा बेचारी परवश है, अज्ञान में है, अंजान में है। मैं ज्ञानवान आत्मा हूँ तो उस अंजान आत्मा पर रहम कर अपनी शुभ भावना से बदलकर दिखाऊंगी। अपनी वृत्ति, दृष्टि चेन्ज चाहिए। नहीं तो परिवार में प्रभाव नहीं पड़ता। तो वृत्ति और दृष्टि बदलना ही अलौकिक जीवन है। जो काम अज्ञानी करते वह आप नहीं कर सकते हो। संग का रंग आपको न लग जाए। अपने को देखो मैं ज्ञानी आत्मा हूँ, मेरा प्रभाव अज्ञानी पर पड़ता है, अगर नहीं पड़ता तो शुभ भावना नहीं है। बोलने से प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन सूक्ष्म भावना जो होगी उसका फल मिलेगा। अच्छा।
4) हर कदम में सर्वशक्तिवान बाप का साथ है, ऐसा अनुभव करते हो? जहाँ सर्वशक्तिवान बाप है वहाँ सर्व प्राप्तियाँ स्वत: होंगी। जैसे बीज है तो झाड़ समाया हुआ है। ऐसे सर्वशक्तिवान बाप का साथ है तो सदा मालामाल, सदा तृप्त, सदा सम्पन्न होंगे। कभी किसी बात में कमज़ोर नहीं होंगे। कभी कोई कम्पलेट नहीं करेंगे। सदा कम्पलीट। क्या करें, कैसे करें... यह कम्पलेन्ट नहीं। साथ हैं तो सदा विजयी हैं। किनारा कर देते तो बहुत लम्बी लाइन है। एक क्यों क्यू बना देती है। तो कभी क्यों की क्यू न लगे। भक्तों की प्रजा की क्यू भले लगे लेकिन क्यों की क्यू नहीं लगानी है। ऐसे सदा साथ रहने वाले चलेंगे भी साथ। सदा साथ हैं, साथ रहेंगे और साथ चलेंगे यही पक्का वायदा है ना। बहुतकाल की कमी अन्त में धोखा दे देगी। अगर कोई भी कमी की रस्सी रह जायेगी तो उड़ नहीं सकेंगे। तो सब रस्सियों को चेक करो। बस बुलावा आये, समय की सीटी बजे और चल पड़ें। हिम्मते बच्चे मददे बाप। जहाँ बाप की मदद है वहाँ कोई मुश्किल कार्य नहीं। हुआ ही पड़ा है।
5) सदा अपने को मास्टर सर्वशक्तिवान अनुभव करते हो? इस स्वरूप की स्मृति में रहने से हर परिस्थिति ऐसे अनुभव होगी जैसे परिस्थिति नहीं लेकिन एक साइडसीन है। परिस्थिति समझने से घबरा जाते लेकिन साइडसीन अर्थात् रास्ते के नज़ारे हैं तो सहज ही पार कर लेते क्योंकि नज़ारों को देख खुशी होती है, घबराते नहीं। तो विघ्न, विघ्न नहीं हैं लेकिन विघ्न आगे बढ़ने का साधन है। परीक्षा क्लास आगे बढ़ाती है। तो यह विघ्न, परिस्थिति, परीक्षा आगे बढ़ाने के लिए आते हैं, ऐसे समझते हो ना! कभी कोई बात सोचते - यह क्या हुआ, क्यों हुआ? तो सोचने में भी टाइम जाता है। सोचना अर्थात् रूकना। मास्टर सर्वशक्तिवान कभी रूकते नहीं। सदा अपने जीवन में उड़ती कला का अनुभव करते हैं।
6) वरदाता बाप द्वारा सर्व वरदान प्राप्त हुए? बाप द्वारा सबसे मुख्य वरदान कौन सा मिला? एक तो सदा योगी भव और दूसरा पवित्र भव। तो यह दोनों विशेष वरदान सदा जीवन में अनुभव करते हो? योगी जीवन बना ली या योग लगाने वाले योगी हो? योग लगाने वाले योगी दो चार घण्टा योग लगायेंगे फिर खत्म। लेकिन योगी जीवन अर्थात् निरन्तर। तो निरन्तर योगी जीवन है। ऐसे ही पवित्र भव का वरदान मिला है। पवित्र भव के वरदान से पूज्य आत्मा बन गये। योगी भव के वरदान से सदा शक्ति स्वरूप बन गये। तो शक्ति स्वरूप और पवित्र पूज्य स्वरूप दोनों ही बन गये हो ना। सदा पवित्र रहते हो? कभी-कभी तो नहीं। क्योंकि एक दिन भी कोई अपवित्र बना तो अपवित्र की लिस्ट में आ जायेगा। तो पवित्रता की लिस्ट में हो? कभी क्रोध तो नहीं आता? क्रोध या मोह का आना इसको पवित्रता कहेंगे? मोह अपवित्रता नहीं है क्या? अगर नष्टोमोहा नहीं बनेंगे तो स्मृति स्वरूप भी नहीं बन सकेंगे। कोई भी विकार आने नहीं देना। जब किसी भी विकार को आने नहीं देंगे तब कहेंगे पवित्र और योगी भव!

बापदादा सभी बच्चों से उम्मीदें रखते हैं, हर बच्चे को दृढ़ संकल्प करना है, व्यर्थ नहीं सोचेंगे, व्यर्थ नहीं करेंगे, व्यर्थ की बीमारी को सदा के लिए खत्म करेंगे। यही एक दृढ़ संकल्प सदा के लिए सफलता मूर्त बना देगा। सदा सावधान रहना है अर्थात् व्यर्थ को खत्म करना है। अच्छा - ओम् शान्ति।

वरदान:

दिव्य बुद्धि द्वारा दिव्य सिद्धियों को प्राप्त करने वाले सिद्धि स्वरूप भव

जैसा समय उस विधि से दिव्य बुद्धि को यूज़ करो तो सर्व सिद्धियां आपकी हथेली पर हैं। सिद्धि कोई बड़ी चीज़ नहीं है सिर्फ दिव्य बुद्धि की सफाई है। जैसे आजकल के जादूगर हाथ की सफाई दिखाते हैं, यह दिव्य बुद्धि की सफाई सर्व सिद्धियों को हथेली में कर देती है। आप ब्राह्मण आत्माओं ने सब दिव्य सिद्धियां प्राप्त की हैं इसलिए आपकी मूर्तियों द्वारा आज तक भी भक्त सिद्धि प्राप्त करने के लिए जाते हैं।

स्लोगन:

जिनके पास सर्वशक्तिमान् बाप की सर्वशक्तियाँ हैं उनकी हार कभी हो नहीं सकती।

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