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नया मलयालम टीवी चैनल

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आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र

मध्यप्रदेश के राज्य कैबिनेट मंत्री ने आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र प्रदान किया मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश सरकार ने आपदा प्रबंधन में ब्रह्मा कुमारिस संगठन के प्रयासों की सराहना की। मध्य प्रदेश सरकार में पशुपालन और मत्स्यपालन मंत्री और प्रभारी मंत्री श्री लखन सिंह यादव, मुरैना जिला कलेक्टर, प्रियंका दास के साथ, प्रशासन की ओर से इस…

निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर

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19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन.

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युवा शिविर का सफल आयोजन.

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08-08-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - जैसे बाप गाइड है, ऐसे गाइड बन सबको घर का रास्ता बताना है, अंधों की लाठी बनना है''

प्रश्नः-

इस बने-बनाये अनादि ड्रामा का राज़ कौन सा है, जो तुम बच्चे ही जानते हो?

उत्तर:-

यह बना बनाया अनादि ड्रामा है इसमें न तो कोई एक्टर एड हो सकता है, न कोई कम हो सकता है। मोक्ष किसी को भी मिलता नहीं। कोई कहे कि हम इस आवागमन के चक्र में आयें ही नहीं। बाबा कहते हाँ कुछ समय के लिए। लेकिन पार्ट से कोई बिल्कुल छूट नहीं सकते। यह ड्रामा का राज़ तुम बच्चे ही जानते हो।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे बच्चे यह जानते हैं कि भोलानाथ किसको कहा जाता है। तुम संगमयुगी बच्चे ही जान सकते हो, कलियुगी मनुष्य रिंचक भी नहीं जानते। ज्ञान का सागर एक बाप है, वही सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान समझाते हैं। अपनी पहचान देते हैं। तुम बच्चे अभी समझते हो, आगे कुछ नहीं जानते थे। बाप कहते हैं मैं ही आकर भारत को स्वर्ग बनाता हूँ, बेहद का वर्सा देता हूँ। जो तुम अभी ले रहे हो। जानते हैं हम बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा ले रहे हैं। यह बना बनाया ड्रामा है, एक भी एक्टर न एड हो सकता, न कम हो सकता है। सभी को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है। मोक्ष को पा नहीं सकते। जो-जो जिस धर्म का है फिर उस धर्म में जाने वाले हैं। बौद्धी वा क्रिश्चियन आदि इच्छा करें हम स्वर्ग में जायें, परन्तु जा नहीं सकते। जब उनका धर्म स्थापक आता है तब ही उनका पार्ट है। यह तुम बच्चों की बुद्धि में है। सारी दुनिया के मनुष्य मात्र इस समय नास्तिक हैं अर्थात् बेहद के बाप को न जानने वाले हैं। मनुष्य ही जानेंगे ना। यह नाटकशाला मनुष्यों की है। हर एक आत्मा निर्वाणधाम से आती है पार्ट बजाने। फिर पुरूषार्थ करती है निर्वाणधाम में जाने के लिए। कहते हैं बुद्ध निर्वाण गया। अब बुद्ध का शरीर तो नहीं गया, आत्मा गई। परन्तु बाप समझाते हैं, जाता कोई भी नहीं है। नाटक से निकल ही नहीं सकते। मोक्ष पा नहीं सकते। बना-बनाया ड्रामा है ना। कोई मनुष्य समझते हैं मोक्ष मिलता है, इसलिए पुरूषार्थ करते रहते हैं। जैसे जैनी लोग पुरूषार्थ करते रहते हैं, उनकी अपनी रस्म-रिवाज है, उनका अपना गुरू है, जिसको मानते हैं। बाकी मोक्ष किसको भी मिलता नहीं है। तुम तो जानते हो हम पार्टधारी हैं, इस ड्रामा में। हम कब आये, फिर कैसे जायेंगे, यह किसको भी पता नहीं है। जानवर तो नहीं जानेंगे ना। मनुष्य ही कहते हैं हम एक्टर्स पार्टधारी हैं। यह कर्मक्षेत्र है, जहाँ आत्मायें रहती हैं। उनको कर्मक्षेत्र नहीं कहा जाता। वह तो निराकारी दुनिया है। उसमें कोई खेलपाल नहीं है, एक्ट नहीं। निराकारी दुनिया से साकारी दुनिया में आते हैं पार्ट बजाने, जो फिर रिपीट होता रहता है। प्रलय कभी होती ही नहीं। शास्त्रों में दिखाते हैं - महाभारत लड़ाई में यादव और कौरव मर गये, बाकी 5 पाण्डव बचे, वह भी पहाड़ों पर गल मरे। बाकी कुछ रहा नहीं। इससे समझते हैं प्रलय हो गई। यह सब बातें बैठ बनाई हैं, फिर दिखाते हैं समुद्र में पीपल के पत्ते पर एक बच्चा अंगूठा चूसता आया। अब इनसे फिर दुनिया कैसे पैदा होगी। मनुष्य जो कुछ सुनते हैं वह सत-सत करते रहते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो कि शास्त्रों में भी क्या-क्या लिख दिया है। यह सब हैं भक्ति मार्ग के शास्त्र। भक्तों को फल देने वाला एक भगवान बाप ही है। कोई मुक्ति में, कोई जीवनमुक्ति में चले जायेंगे। हर एक पार्टधारी आत्मा का जब पार्ट आयेगा तब फिर आयेगी। यह ड्रामा का राज़ सिवाए तुम बच्चों के और कोई नहीं जानते। कहते हैं हम रचता और रचना को नहीं जानते। ड्रामा के एक्टर्स होकर और ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त, ड्युरेशन आदि को न जानें तो बेसमझ कहेंगे ना। समझाने से भी समझते नहीं। 84 लाख समझने कारण ड्युरेशन भी लाखों वर्ष दे देते हैं।

अभी तुम समझते हो बाबा हम आपसे कल्प-कल्प आकर स्वर्ग की बादशाही लेते हैं। 5 हज़ार वर्ष पहले भी आपसे मिले थे, बेहद का वर्सा लेने। यथा राजा-रानी तथा प्रजा सब विश्व के मालिक बनते हैं। प्रजा भी कहेगी हम विश्व के मालिक हैं। तुम जब विश्व के मालिक बनते हो, उस समय चन्द्रवंशी राज्य नहीं होता है। तुम बच्चे ड्रामा के सारे आदि-मध्य-अन्त को जानते हो। मनुष्य भक्ति मार्ग में जिसकी पूजा करते हैं उनको भी जानते नहीं। जिसकी भक्ति करनी होती है तो उनकी बायोग्राफी को भी जानना चाहिए। तुम बच्चे अभी सबकी बायोग्राफी जानते हो बाप के द्वारा। तुम बाप के बने हो। बाप की बायोग्राफी का पता है। वह बाप है पतित-पावन, लिबरेटर, गाइड। तुमको कहते हैं पाण्डव। तुम सबके गाइड बनते हो, अन्धों की लाठी बनते हो सबको रास्ता बताने के लिए। यथा बाप गाइड तथा तुम बच्चों को भी बनना है। सबको रास्ता बताना है। तुम आत्मा, वह परमात्मा है, उनसे बेहद का वर्सा मिलता है। भारत में बेहद का राज्य था, अब नहीं है। तुम बच्चे जानते हो हम बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा लेते हैं अर्थात् मनुष्य से देवता बनते हैं। हम ही देवतायें थे फिर 84 जन्म लेकर शूद्र बने हैं। बाप आकर शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं। यज्ञ में ब्राह्मण जरूर चाहिए। यह है ज्ञान यज्ञ, भारत में यज्ञ बहुत रचते हैं। इसमें खास आर्य समाजी बहुत यज्ञ करते हैं। अब यह तो है रूद्र ज्ञान यज्ञ, जिसमें सारी पुरानी दुनिया स्वाहा होनी है। अब बुद्धि से काम लेना पड़ता है। कलियुग में तो बहुत मनुष्य हैं, इतनी सारी पुरानी दुनिया खलास हो जायेगी। कोई भी चीज काम में नहीं आनी है। सतयुग में तो फिर सब कुछ नया होगा। यहाँ तो कितना गन्द है। मनुष्य कैसे गन्दे रहते हैं। धनवान बड़े अच्छे महलों में रहते हैं। गरीब तो बिचारे गन्द में, झोपड़ियों में पड़े हैं। अब इन झोपड़ियों को डिस्ट्राय करते रहते हैं। उनको दूसरी जगह दे वह जमीन फिर बेचते रहते हैं। नहीं उठते तो जबरदस्ती उठाते हैं। गरीब दु:खी बहुत हैं, जो सुखी हैं वह भी स्थाई सुखी नहीं। अगर सुख होता तो क्यों कहते कि यह काग विष्टा समान सुख है।

शिव भगवानुवाच, हम इन माताओं के द्वारा स्वर्ग के द्वार खोल रहे हैं। माताओं पर क्लष रखा है। वह फिर सबको ज्ञान अमृत पिलाती हैं। परन्तु तुम्हारा है प्रवृत्ति मार्ग। तुम हो सच्चे-सच्चे ब्राह्मण, तो सबको ज्ञान चिता पर बिठाते हो। अभी तुम बनते हो दैवी सम्प्रदाय। आसुरी सम्प्रदाय अर्थात् रावण राज्य। गांधी भी कहते थे राम राज्य हो। बुलाते हैं हे पतित-पावन आओ परन्तु अपने को पतित समझते थोड़ेही हैं। बाप बच्चों को सुजाग करते हैं, तुम घोर अन्धियारे से सोझरे में आये हो। मनुष्य तो समझते हैं गंगा स्नान करने से पावन बन जायेंगे। ऐसे ही गंगा में हरिद्वार का सारा किचड़ा पड़ता है। कहाँ फिर वह किचड़ा सारा खेती में ले जाते हैं। सतयुग में ऐसे काम होते नहीं। वहाँ तो अनाज ढेर के ढेर होता है। पैसा थोड़ेही खर्च करना पड़ता है। बाबा अनुभवी है ना। पहले कितना अनाज सस्ता था। सतयुग में बहुत थोड़े मनुष्य हैं हर चीज़ सस्ती रहती है। तो बाप कहते हैं - मीठे बच्चे, अभी तुमको पतित से पावन बनना है। युक्ति बहुत सहज बताते हैं, अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। आत्मा में ही खाद पड़ने से मुलम्मे की बन गई है। जो पारसबुद्धि थे वही अब पत्थरबुद्धि बने हैं। तुम बच्चे अभी बाप के पास पत्थरनाथ से पारसनाथ बनने आये हो। बेहद का बाप तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं, सो भी गोल्डन एजेड विश्व का। यह है आइरन एजेड विश्व। बाप बैठ बच्चों को पारसपुरी का मालिक बनाते हैं। तुम जानते हो यहाँ के इतने महल माड़ियाँ आदि कोई काम में नहीं आयेंगे। सब खत्म हो जायेंगे। यहाँ क्या रखा है! अमेरिका के पास कितना सोना है! यहाँ तो थोड़ा बहुत सोना जो माताओं के पास है, वह भी लेते रहते हैं क्योंकि उनको तो कर्ज में सोना देना है। तुम्हारे पास वहाँ सोना ही सोना होता है। यहाँ कौड़ियाँ, वहाँ हीरे होंगे। इनको कहा जाता है आइरन एज। भारत ही अविनाशी खण्ड है, कभी विनाश नहीं होता। भारत है सबसे ऊंच ते ऊंच। तुम मातायें सारे विश्व का उद्धार करती हो। तुम्हारे लिए जरूर नई दुनिया चाहिए। पुरानी दुनिया का विनाश चाहिए। कितनी समझने की बातें हैं। शरीर निर्वाह अर्थ धन्धा आदि भी करना है। छोड़ना कुछ भी नहीं है। बाबा कहते हैं सब कुछ करते हुए मुझे याद करते रहो। भक्ति मार्ग में भी तुम मुझ माशूक को याद करते आये हो कि हमको आकर सांवरे से गोरा बनाओ। उनको मुसाफिर कहा जाता है। तुम सब मुसाफिर हो ना। तुम्हारा घर वह है, जहाँ सब आत्मायें रहती हैं।

तुम सबको ज्ञान चिता पर बिठाते हो। सब हिसाब-किताब चुक्तू कर जाने वाले हैं। फिर नयेसिर तुम आयेंगे, जितना याद में रहेंगे उतना पवित्र बनेंगे और ऊंच पद पायेंगे। माताओं को तो फुर्सत रहती है। मेल्स की बुद्धि धन्धे आदि तरफ चक्र लगाती रहती है, इसलिए बाप ने कलष भी माताओं पर रखा है। यहाँ तो स्त्री को कहते हैं कि पति ही तुम्हारा ईश्वर गुरू सब कुछ है। तुम उनकी दासी हो। अभी फिर बाप तुम माताओं को कितना ऊंच बनाते हैं। तुम नारियाँ ही भारत का उद्धार करती हो। कोई-कोई बाबा से पूछते हैं - आवागमन से छूट सकते हैं? बाबा कहते हैं - हाँ, कुछ समय के लिए। तुम बच्चे तो आलराउन्ड आदि से अन्त तक पार्ट बजाते हो। दूसरे जो हैं वह मुक्तिधाम में रहते हैं। उनका पार्ट ही थोड़ा है। वह स्वर्ग में तो जाने वाले हैं नहीं। आवागमन से मोक्ष उसको कहेंगे जो पिछाड़ी को आये और यह गये। ज्ञान आदि तो सुन न सकें। सुनते वही हैं जो शुरू से अन्त तक पार्ट बजाते हैं। कोई कहते हैं - हमको तो यही पसन्द है। हम वहाँ ही बैठे रहें। ऐसे थोड़ेही हो सकता है। ड्रामा में नूँधा हुआ है, जाकर पिछाड़ी में आयेंगे जरूर। बाकी सारा समय शान्तिधाम में रहते हैं। यह बेहद का ड्रामा है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सच्चा-सच्चा ब्राह्मण बन सबको ज्ञान अमृत पिलाना है। ज्ञान चिता पर बिठाना है।

2) शरीर निर्वाह अर्थ धन्धा आदि सब कुछ करते पतित से पावन बनने के लिए बाप की याद में रहना है और सबको बाप की याद दिलाना है।

वरदान:-

निरन्तर याद और सेवा के बैलेन्स से बचपन के नाज़ नखरे समाप्त करने वाले वानप्रस्थी भव

छोटी-छोटी बातों में संगम के अमूल्य समय को गंवाना बचपन के नाज़ नखरे हैं। अब यह नाज़ नखरे शोभते नहीं, वानप्रस्थ में सिर्फ एक ही कार्य रह जाता है - बाप की याद और सेवा। इसके सिवाए और कोई भी याद न आये, उठो तो भी याद और सेवा, सोओ तो भी याद और सेवा - निरन्तर यह बैलेन्स बना रहे। त्रिकालदर्शी बनकर बचपन की बातें वा बचपन के संस्कारों का समाप्ति समारोह मनाओ, तब कहेंगे वानप्रस्थी।

स्लोगन:-

सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न आत्मा की निशानी है सन्तुष्टता, सन्तुष्ट रहो और सन्तुष्ट करो।


 

 

विचारपुष्प  -   जो संकल्प करो उसे बीच-बीच में दृढ़ता का ठप्पा लगाओ तो विजयी बन जायेंगे ! 

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संस्कार धन - बोध कथा  : मन का राजा 

राजा भोज वन में शिकार करने गए लेकिन घूमते हुए अपने सैनिकों से बिछुड़ गए और अकेले पड़ गए। वह एक वृक्ष के नीचे बैठकर सुस्ताने लगे। तभी उनके सामने से एक लकड़हारा सिर पर बोझा उठाए गुजरा। वह अपनी धुन में मस्त था। उसने राजा भोज को देखा पर प्रणाम करना तो दूर, तुरंत मुंह फेरकर जाने लगा।
भोज को उसके व्यवहार पर आश्चर्य हुआ। उन्होंने लकड़हारे को रोककर पूछा, ‘तुम कौन हो?’ लकड़हारे ने कहा, ‘मैं अपने मन का राजा हूं।’ भोज ने पूछा, ‘अगर तुम राजा हो तो तुम्हारी आमदनी भी बहुत होगी। कितना कमाते हो?’ लकड़हारा बोला, ‘मैं छह स्वर्ण मुद्राएं रोज कमाता हूं और आनंद से रहता हूं।’ भोज ने पूछा, ‘तुम इन मुद्राओं को खर्च कैसे करते हो?’ लकड़हारे ने उत्तर दिया, ‘मैं प्रतिदिन एक मुद्रा अपने ऋणदाता को देता हूं। वह हैं मेरे माता पिता। उन्होंने मुझे पाल पोस कर बड़ा किया, मेरे लिए हर कष्ट सहा। दूसरी मुद्रा मैं अपने ग्राहक असामी को देता हूं ,वह हैं मेरे बालक। मैं उन्हें यह ऋण इसलिए देता हूं ताकि मेरे बूढ़े हो जाने पर वह मुझे इसे लौटाएं।

तीसरी मुद्रा मैं अपने मंत्री को देता हूं। भला पत्नी से अच्छा मंत्री कौन हो सकता है, जो राजा को उचित सलाह देता है ,सुख दुख का साथी होता है। चौथी मुद्रा मैं खजाने में देता हूं। पांचवीं मुद्रा का उपयोग स्वयं के खाने पीने पर खर्च करता हूं क्योंकि मैं अथक परिश्रम करता हूं। छठी मुद्रा मैं अतिथि सत्कार के लिए सुरक्षित रखता हूं क्योंकि अतिथि कभी भी किसी भी समय आ सकता है। उसका सत्कार करना हमारा परम धर्म है।’ राजा भोज सोचने लगे, ‘मेरे पास तो लाखों मुद्राएं है पर जीवन के आनंद से वंचित हूं।’ लकड़हारा जाने लगा तो बोला, ‘राजन् मैं पहचान गया था कि तुम राजा भोज हो पर मुझे तुमसे क्या सरोकार।’ भोज दंग रह गए।

 


ब्रह्माकुमारीज् की प्रमुख खबरें -

 

 

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बोध कथा-

विचार की पवित्रता

एक राजा और नगर सेठ में गहरी मित्रता थी। वे रोज एक दूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे। नगर सेठ चंदन की लकड़ी का व्यापार करता था। एक दिन उसके मुनीम ने बताया कि लकड़ी की बिक्री कम हो गई है। तत्काल सेठ के मन में यह विचार कौंधा कि अगर राजा की मृत्यु हो जाए, तो मंत्रिगण चंदन की लकडि़यां उसी से खरीदेंगे। उसे कुछ तो मुनाफा होगा। शाम को सेठ हमेशा की तरह राजा से मिलने गया। उसे देख राजा ने सोचा कि इस नगर सेठ ने उससे दोस्ती करके न जाने कितनी दौलत जमा कर ली है, ऐसा कोई नियम बनाना होगा जिससे इसका सारा धन राज खजाने में जमा हो जाए।
दोनों इसी तरह मिलते रहे, लेकिन पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। एक दिन नगर सेठ ने पूछ ही लिया, ‘पिछले कुछ दिनों से हमारे रिश्तों में एक ठंडापन आ गया है। ऐसा क्यों?’ राजा ने कहा, ‘मुझे भी ऐसा लग रहा है। चलो, नगर के बाहर जो महात्मा रहते हैं, उनसे इसका हल पूछा जाए।’ उन्होंने महात्मा को सब कुछ बताया। महात्मा ने कहा, ‘सीधी सी बात है। आप दोनों पहले शुद्ध भाव से मिलते रहे होंगे, पर अब संभवत: एक दूसरे के प्रति आप लोगों के मन में कुछ बुरे विचार आ गए हैं इसलिए मित्रता में पहले जैसा सुख नहीं रह गया।’ नगर सेठ और राजा ने अपने-अपने मन की बातें कह सुनाईं। महात्मा ने सेठ से कहा,’ तुमने ऐसा क्यों नहीं सोचा कि राजा के मन में चंदन की लकड़ी का आलीशान महल बनवाने की बात आ जाए? इससे तुम्हारा चंदन भी बिक जाता। विचार की पवित्रता से ही संबंधों में मिठास आती है। तुमने राजा के लिए गलत सोचा इसलिए राजा के मन में भी तुम्हारे लिए अनुचित विचार आया। गलत सोच ने दोनों के बीच दूरी बढ़ा दी। अब तुम दोनों प्रायश्चित करके अपना मन शुद्ध कर लो, तो पहले जैसा सुख फिर से मिलने लगेगा।’ 5  

07-08-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - श्रीमत पर चल सबको मुक्ति-जीवनमुक्ति पाने का रास्ता बताओ, सारा दिन यही धन्धा करते रहो''

प्रश्नः-

बाप ने कौन-सी सूक्ष्म बातें सुनाई हैं जो बहुत समझने की हैं?

उत्तर:-

सतयुग अमरलोक है, वहाँ आत्मा एक चोला बदल दूसरा लेती है लेकिन मृत्यु का नाम नहीं इसलिए उसे मृत्युलोक नहीं कहा जाता। 2. शिवबाबा की बेहद रचना है, ब्रह्मा की रचना इस समय सिर्फ तुम ब्राह्मण हो। त्रिमूर्ति शिव कहेंगे, त्रिमूर्ति ब्रह्मा नहीं। यह सब बहुत सूक्ष्म बातें बाप ने सुनाई हैं। ऐसी-ऐसी बातों पर विचार कर बुद्धि के लिए स्वयं ही भोजन तैयार करना है।

ओम् शान्ति। त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। अब वो लोग त्रिमूर्ति ब्रह्मा कहते हैं। बाप कहते हैं - त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। त्रिमूर्ति ब्रह्मा भगवानुवाच नहीं कहते। तुम त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच कह सकते हो। वो लोग तो शिव-शंकर कह मिला देते हैं। यह तो सीधा है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा के बदले त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। मनुष्य तो कह देते - शंकर आंख खोलते हैं तो विनाश हो जाता है। यह सब बुद्धि से काम लिया जाता है। तीन का ही मुख्य पार्ट है। ब्रह्मा और विष्णु का तो बड़ा पार्ट है 84 जन्मों का। विष्णु का और प्रजापिता ब्रह्मा का अर्थ भी समझा है, पार्ट है इन तीन का। ब्रह्मा का तो नाम गाया हुआ है आदि देव, एडम। प्रजापिता का मन्दिर भी है। यह है विष्णु का अथवा कृष्ण का अन्तिम 84 वां जन्म, जिसका नाम ब्रह्मा रखा है। सिद्ध तो करना ही है - ब्रह्मा और विष्णु। अब ब्रह्मा को तो एडाप्टेड कहेंगे। यह दोनों बच्चे हैं शिव के। वास्तव में बच्चा एक है। हिसाब करेंगे तो ब्रह्मा है शिव का बच्चा। बाप और दादा। विष्णु का नाम ही नहीं आता। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा स्थापना कर रहे हैं। विष्णु द्वारा स्थापना नहीं कराते। शिव के भी बच्चे हैं, ब्रह्मा के भी बच्चे हैं। विष्णु के बच्चे नहीं कह सकते। न लक्ष्मी-नारायण को ही बहुत बच्चे हो सकते हैं। यह है बुद्धि के लिए भोजन। आपेही भोजन बनाना चाहिए। सबसे जास्ती पार्ट कहेंगे विष्णु का। 84 जन्मों का विराट रूप भी विष्णु का दिखाते हैं, न कि ब्रह्मा का। विराट रूप विष्णु का ही बनाते हैं क्योंकि पहले-पहले प्रजापिता ब्रह्मा का नाम धरते हैं। ब्रह्मा का तो बहुत थोड़ा पार्ट है इसलिए विराट रूप विष्णु का दिखाते हैं। चतुर्भुज भी विष्णु का बना देते। वास्तव में यह अलंकार तो तुम्हारे हैं। यह भी बड़ी समझने की बातें हैं। कोई मनुष्य समझा न सके। बाप नये-नये तरीके से समझाते रहते हैं। बाप कहते हैं त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच राइट है ना। विष्णु, ब्रह्मा और शिव। इसमें भी प्रजापिता ब्रह्मा ही बच्चा है। विष्णु को बच्चा नहीं कहेंगे। भल क्रियेशन कहते हैं परन्तु रचना तो ब्रह्मा की होगी ना। जो फिर भिन्न नाम रूप लेती है। मुख्य पार्ट तो उनका है। ब्रह्मा का पार्ट भी बहुत थोड़ा है इस समय का। विष्णु का कितना समय राज्य है! सारे झाड़ का बीज रूप है शिवबाबा। उनकी रचना को सालिग्राम कहेंगे। ब्रह्मा की रचना को ब्राह्मण-ब्राह्मणियां कहेंगे। अब जितनी शिव की रचना है उतनी ब्रह्मा की नहीं। शिव की रचना तो बहुत है। सभी आत्मायें उनकी औलाद हैं। ब्रह्मा की रचना तो सिर्फ तुम ब्राह्मण ही बनते हो। हद में आ गये ना। शिवबाबा की है बेहद की रचना - सभी आत्मायें। बेहद की आत्माओं का कल्याण करते हैं। ब्रह्मा द्वारा स्वर्ग की स्थापना करते हैं। तुम ब्राह्मण ही जाकर स्वर्गवासी बनेंगे। और तो कोई को स्वर्गवासी नहीं कहेंगे, निर्वाणवासी अथवा शान्तिधाम वासी तो सब बनते हैं। सबसे ऊंच सर्विस शिवबाबा की होती है। सभी आत्माओं को ले जाते हैं। सभी का पार्ट अलग-अलग है। शिवबाबा भी कहते हैं मेरा पार्ट अलग है। सबका हिसाब-किताब चुक्तू कराए तुमको पतित से पावन बनाए ले जाता हूँ। तुम यहाँ मेहनत कर रहे हो पावन बनने के लिए। दूसरे सब कयामत के समय हिसाब-किताब चुक्तू कर जायेंगे। फिर मुक्तिधाम में बैठे रहेंगे। सृष्टि का चक्र तो फिरना है।

तुम बच्चे ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण बन फिर देवता बन जाते हो। तुम ब्राह्मण श्रीमत पर सेवा करते हो। सिर्फ मनुष्यों को रास्ता बताते हो - मुक्ति और जीवनमुक्ति को पाना है तो ऐसे पा सकते हो। दोनों चाबी हाथ में हैं। यह भी जानते हो कौन-कौन मुक्ति में, कौन-कौन जीवनमुक्ति में जायेंगे। तुम्हारा सारा दिन यही धंधा है। कोई अनाज आदि का धन्धा करते हैं तो बुद्धि में सारा दिन वही रहता है। तुम्हारा धन्धा है रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानना और किसको मुक्ति-जीवनमुक्ति का रास्ता बताना। जो इस धर्म के होंगे वह निकल आयेंगे। ऐसे बहुत धर्म के हैं जो बदल नहीं सकते। ऐसे नहीं कि फीचर्स बदल जाते हैं। सिर्फ धर्म को मान लेते हैं। कई बौद्ध धर्म को मानते हैं क्योंकि देवी-देवता धर्म तो प्राय: लोप है ना। एक भी ऐसा नहीं जो कहे हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हैं। देवताओं के चित्र काम में आते हैं, आत्मा तो अविनाशी है, वह कभी मरती नहीं। एक शरीर छोड़ फिर दूसरा लेकर पार्ट बजाती है। उनको मृत्युलोक नहीं कहा जाता। वह है ही अमरलोक। चोला सिर्फ बदलती है। यह बातें बड़ी सूक्ष्म समझने की हैं। मुट्टा (थोक अथवा सारा) नहीं है। जैसे शादी होती है तो किनको रेज़गारी, किनको मुट्टा देते हैं। कोई सब दिखाकर देते हैं, कोई बन्द पेटी ही देते हैं। किस्म-किस्म के होते हैं। तुमको तो वर्सा मिलता है मुट्टा, क्योंकि तुम सब ब्राइड्स हो। बाप है ब्राइडग्रुम। तुम बच्चों को श्रृंगार कर विश्व की बादशाही मुट्टे में देते हैं। विश्व का मालिक तुम बनते हो।

मुख्य बात है याद की। ज्ञान तो बहुत सहज है। भल है तो सिर्फ अल्फ को याद करना। परन्तु विचार किया जाता है याद ही झट खिसक जाती है। बहुत करके कहते हैं बाबा याद भूल जाती है। तुम किसको भी समझाओ तो हमेशा याद अक्षर बोलो। योग अक्षर रांग है। टीचर को स्टूडेन्ट की याद रहती है। फादर है सुप्रीम सोल। तुम आत्मा सुप्रीम नहीं हो। तुम हो पतित। अब बाप को याद करो। टीचर को, बाप को, गुरू को याद किया जाता है। गुरू लोग बैठ शास्त्र सुनायेंगे, मंत्र देंगे। बाबा का मंत्र एक ही है - मनमनाभव। फिर क्या होगा? मध्याजी भव। तुम विष्णुपुरी में चले जायेंगे। तुम सब तो राजा-रानी नहीं बनेंगे। राजा-रानी और प्रजा होती है। तो मुख्य है त्रिमूर्ति। शिवबाबा के बाद है ब्रह्मा जो फिर मनुष्य सृष्टि अर्थात् ब्राह्मण रचते हैं। ब्राह्मणों को बैठ फिर पढ़ाते हैं। यह नई बात है ना। तुम ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ बहन-भाई ठहरे। बुढ़े भी कहेंगे हम भाई-बहन हैं। यह अन्दर में समझना है। किसको फालतू ऐसे कहना नहीं है। भगवान ने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रची तो भाई-बहन हुए ना। जबकि एक प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे हैं, यह समझने की बातें हैं। तुम बच्चों को तो बड़ी खुशी होनी चाहिए - हमको पढ़ाते कौन हैं? शिवबाबा। त्रिमूर्ति शिव। ब्रह्मा का भी बहुत थोड़ा समय पार्ट है। विष्णु का सतयुगी राजधानी में 8 जन्म पार्ट चलता है। ब्रह्मा का तो एक ही जन्म का पार्ट है। विष्णु का पार्ट बड़ा कहेंगे। त्रिमूर्ति शिव है मुख्य। फिर आता है ब्रह्मा का पार्ट जो तुम बच्चों को विष्णुपुरी का मालिक बनाते हैं। ब्रह्मा से ब्राह्मण सो फिर देवता बनते हैं। तो यह हो गया अलौकिक फादर। थोड़ा समय यह फादर है जिसको अब मानते हैं। आदि देव, आदम और बीबी। इनके बिगर सृष्टि कैसे रचेंगे। आदि देव और आदि देवी है ना। ब्रह्मा का पार्ट भी सिर्फ संगम समय का है। देवताओं का पार्ट तो फिर भी बहुत चलता है। देवतायें भी सिर्फ सतयुग में कहेंगे। त्रेता में क्षत्रिय कहा जाता। यह बड़ी गुह्य-गुह्य प्वाइंट्स मिलती हैं। सब तो एक ही समय वर्णन नहीं कर सकते। वह त्रिमूर्ति ब्रह्मा कहते हैं। शिव को उड़ा दिया है। हम फिर त्रिमूर्ति शिव कहते हैं। यह चित्र आदि सब हैं भक्ति मार्ग के। प्रजा रचते हैं ब्रह्मा द्वारा फिर तुम देवता बनते हो। विनाश के समय नैचुरल कैलेमिटीज भी आती है। विनाश तो होना ही है, कलियुग के बाद फिर सतयुग होगा। इतने सब शरीरों का विनाश तो होना ही है। सब कुछ प्रैक्टिकल में चाहिए ना। सिर्फ आंख खोलने से थोड़ेही हो सकता। जब स्वर्ग गुम होता है तो उस समय भी अर्थक्वेक आदि होती हैं। तो क्या उस समय भी शंकर आंख ऐसे मीचते हैं। गाते हैं ना द्वारिका अथवा लंका पानी के नीचे चली गई।

अब बाप समझाते हैं - मैं आया हूँ पत्थरबुद्धियों को पारसबुद्धि बनाने। मनुष्य पुकारते हैं - हे पतित-पावन आओ, आकर पावन दुनिया बनाओ। परन्तु यह नहीं समझते हैं कि अभी कलियुग है इसके बाद सतयुग आयेगा। तुम बच्चों को खुशी में नाचना चाहिए। बैरिस्टर आदि इम्तहान पास करते हैं तो अन्दर में ख्याल करते हैं ना - हम पैसे कमायेंगे, फिर मकान बनायेंगे। यह करेंगे। तो तुम अभी सच्ची कमाई कर रहे हो। स्वर्ग में तुमको सब कुछ नया माल मिलेगा। ख्याल करो सोमनाथ का मन्दिर क्या था! एक मन्दिर तो नहीं होगा। उस मन्दिर को 2500 वर्ष हुआ। बनाने में टाइम तो लगा होगा। पूजा की होगी उसके बाद फिर वह लूटकर ले गये। फौरन तो नहीं आये होंगे। बहुत मन्दिर होंगे। पूजा के लिए बैठ मन्दिर बनाये हैं। अभी तुम जानते हो बाप को याद करते-करते हम गोल्डन एज में चले जायेंगे। आत्मा पवित्र बन जायेगी। मेहनत करनी पड़ती है। मेहनत बिगर काम नहीं चलेगा। गाया भी जाता है - सेकेण्ड में जीवनमुक्ति। परन्तु ऐसे थोड़ेही मिल जाती है, यह समझा जाता है - बच्चे बनेंगे तो मिलेगी जरूर। तुम अभी मेहनत कर रहे हो मुक्तिधाम में जाने के लिए। बाप की याद में रहना पड़ता है। दिन-प्रतिदिन बाप तुम बच्चों को रिफाइन बुद्धि बनाते हैं। बाप कहते हैं तुमको बहुत-बहुत गुह्य बातें सुनाता हूँ। आगे थोड़ेही यह सुनाया था कि आत्मा भी बिन्दी है, परमात्मा भी बिन्दी है। कहेंगे पहले क्यों नहीं यह बताया। ड्रामा में नहीं था। पहले ही तुमको यह सुनायें तो तुम समझ न सको। धीरे-धीरे समझाते रहते हैं। यह है रावण राज्य। रावण राज्य में सब देह-अभिमानी बन जाते हैं। सतयुग में होते हैं आत्म-अभिमानी। अपने को आत्मा जानते हैं। हमारा शरीर बड़ा हुआ है, अब यह छोड़कर फिर छोटा लेना है। आत्मा का शरीर पहले छोटा होता है फिर बड़ा होता है। यहाँ तो कोई की कितनी आयु, कोई की कितनी। कोई की अकाले मृत्यु हो जाती है। कोई-कोई की 125 वर्ष की भी आयु होती है। तो बाप समझाते हैं तुमको खुशी बहुत होनी चाहिए - बाप से वर्सा लेने की। गन्धर्वी विवाह किया यह कोई खुशी की बात नहीं, यह तो कमज़ोरी है। कुमारी अगर कहे हम पवित्र रहना चाहते हैं तो कोई मार थोड़ेही सकते हैं। ज्ञान कम है तो डरते हैं। छोटी कुमारी को भी अगर कोई मारे, खून आदि निकले तो पुलिस में रिपोर्ट करे तो उसकी भी सज़ा मिल सकती है। जानवर को भी अगर कोई मारते हैं तो उन पर केस होता है, दण्ड पड़ता है। तुम बच्चों को भी मार नहीं सकते। कुमार को भी मार नहीं सकते। वह तो अपना कमा सकते हैं। शरीर निर्वाह कर सकते हैं। पेट कोई जास्ती नहीं खाता है - एक मनुष्य का पेट 4-5 रूपया, एक मनुष्य का पेट 400-500 रूपया। पैसा बहुत है तो हबच हो जाती है। गरीबों को पैसे ही नहीं तो हबच भी नहीं। वह सूखी रोटी में ही खुश होते हैं। बच्चों को जास्ती खान-पान के हंगामें में भी नहीं जाना चाहिए। खाने का शौक नहीं रहना चाहिए।

तुम जानते हो वहाँ हमें क्या नहीं मिलेगा! बेहद की बादशाही, बेहद का सुख मिलता है। वहाँ कोई बीमारी आदि होती नहीं। हेल्थ वेल्थ हैप्पीनेस सब रहता है। बुढ़ापा भी वहाँ बहुत अच्छा रहता। खुशी रहती है। कोई प्रकार की तकलीफ नहीं रहती है। प्रजा भी ऐसी बनती है। परन्तु ऐसे भी नहीं - अच्छा, प्रजा तो प्रजा ही सही। फिर तो ऐसे होंगे जैसे यहाँ के भील। सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण बनना है तो फिर इतना पुरूषार्थ करना चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) हम ब्रह्मा की नई रचना आपस में भाई-बहन हैं, यह अन्दर समझना है किसी को कहने की दरकार नहीं। सदा इसी खुशी में रहना है कि हमें शिवबाबा पढ़ाते हैं।

2) खान-पान के हंगामें में जास्ती नहीं जाना है। हबच (लालच) छोड़ बेहद बादशाही के सुखों को याद करना है।

वरदान:-

माया के सम्बन्धों को डायवोर्स दे बाप के सम्बन्ध से सौदा करने वाले मायाजीत, मोहजीत भव

अब स्मृति से पुराना सौदा कैन्सिल कर सिंगल बनो। आपस में एक दो के सहयोगी भल रहो लेकिन कम्पेनियन नहीं। कम्पेनियन एक को बनाओ तो माया के सम्बन्धों से डायवोर्स हो जायेगा। मायाजीत, मोहजीत विजयी रहेंगे। अगर जरा भी किसी में मोह होगा तो तीव्र पुरूषार्थी के बजाए पुरूषार्थी बन जायेंगे इसलिए क्या भी हो, कुछ भी हो खुशी में नाचते रहो, मिरूआ मौत मलूका शिकार - इसको कहते हैं नष्टोमोहा। ऐसा नष्टोमोहा रहने वाले ही विजय माला के दाने बनते हैं।

स्लोगन:-

सत्यता की विशेषता से डायमण्ड की चमक को बढ़ाओ।

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विश्व और भारत महत्वपूर्ण दिवस


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31 अगस्त (रशिया) स्वतंत्रता दिवस मनाया गया.ाारतीय मूल निवासीयोंने भारतीय स्वतंत्रता दिवस मनया तथा इस अवसपर पर भ्राता गांधी, सेंट पिटर्सबर्ग में भारत के कॉन्सील को राखी बांधी गई.

26 अगस्त (अहमदाबाद) मुख्यमंत्रीजी को राखी बांधी. भ्राता नरेंद्र मोदीजी को ब्र.कु. सरला बहनजीने राखी बांधी .

25 अगस्त (बेंगलौर) विश्वकी सबसे बड़ी राखी. ब्राहमाकुमारीज् द्वारा आयोजित वि·ा की सबसे बडी राखी का लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड दर्ज किया गया.

Top Stories प्रमुख समाचार : मार्च  2014 


 

4 अप्रैल (आसनमोल) आध्यात्मिक प्रदर्शनी का आयोजन.

3 अप्रैल (ग्वालियर) महिला दिवस पर कार्यक्रम सम्पन्न.

2 अप्रैल (ग्वालियर) विचार दिवस समारोह.

1 अप्रैल (आबूरोड) बर्फानी बाबा के साथ बेटी बचाओ जनसंवर्धन का संदेश.

31 मार्च (भोपाल) शिवनी बहन का कार्यक्रम.

30 मार्च (बेलापूर) शान्तियात्रा का आयोजन

29 मार्च (भिलाई ) ओमशान्ति चौक का लोकार्पण.

28 मार्च (मार्गो:गोवा ) दादाजीने किया उदघाटन.

27 मार्च (भिलाई) शिवदर्शन यात्रा का आयोजन

26 मार्च (सायन:मुंबई) शांती उद्यान में महिला दिवस

25 मार्च (गुलबर्गा) 47 फिट शिवलिंग का भव्य आयोजन.

24 मार्च (नेपाल) फ्यूचर ऑफ पावर.

23 मार्च (शांतीवन) रेडिओ मधुबन ने मनाया महिला दिवस.

22 मार्च (बार्शी) महिला दिवस मनाया गया

21 मार्च (मनीपाल:कर्ना.) 35 फिट महाशिवलिंग.

20 मार्च (विलेपार्ले:मुंबई) टीवी तथा फिल्म कलाकरोंने मनाई शिवरात्री.

19 मार्च (चेंबुर:मुंबई) 40 फिट शिवलिंग दर्शन.


18 मार्च (मुंबई) नारी सुरक्षा, हमारी सुरक्षा.

17 मार्च (बैंगलौर) शिवजयंती महोत्सव.

16 मार्च (बार्शी) शिवजयंती महोत्सव

15 मार्च (चेन्नई) बारा ज्योतिलिंगम् दर्शन.

14 मार्च (बेलापूर:मुंबई) शिवजयंती महोत्सव.


13 मार्च (अजमेर) भव्य शिवलिंग का निर्माण.

12 मार्च (केशोद) शिवजयंती महोत्सव.

11 मार्च (मालाड:लिबर्टी गार्डन) गीतकार श्रवणकुमार पहुंचे शिवरात्रीपर

10 मार्च (कोरबा) शिव शंकर झाँकि.

09 मार्च (ग्वालियर) शिवजयंती महोत्सव.

08 मार्च (नासिक) डो. भटकर सेवाकेंद्रपर.

07 मार्च (मालाड:दिडोंशी) सड़क निर्माण में ब्र.कु. योगदान.

06 मार्च (ग्वालीयर:दिनलयाल नगर) शिवपार्वती झाँकि

05 मार्च (बाणेर) अमरनाथ की भव्य गुफाये

04 मार्च (बेलगाम) विश्व की सबसे बडी पतंग

03 मार्च (शांतीवन) शिव ध्वज लहराया

02 मार्च (हातीना:गुज) महिला सम्मेलनसंपन्न.

01 मार्च (गुडगांव) ओआरसी में प्रशासक डायलाग.

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कोच्चि: केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री, माननीय। मुरलीधरन ने ब्रह्म कुमारियों का नया मलयालम चैनल लॉन्च किया - मलयाली को समर्पित राजयोग टीवी मलयालम। यह एक पूर्ण चैनल है जो हमारी ज़रूरत की हर चीज़ वितरित करता है। भारतीय दर्शन विज्ञान और अध्यात्म का सामंजस्य है। यह चैनल ब्रह्म कुमारियों की मानवता की समग्र दृष्टि का प्रमाण है। मंत्री ने अपने…

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मध्यप्रदेश के राज्य कैबिनेट मंत्री ने आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र प्रदान किया मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश सरकार ने आपदा प्रबंधन में ब्रह्मा कुमारिस संगठन के प्रयासों की सराहना की। मध्य प्रदेश सरकार में पशुपालन और मत्स्यपालन मंत्री और प्रभारी मंत्री श्री लखन सिंह यादव, मुरैना जिला कलेक्टर, प्रियंका दास के साथ, प्रशासन की ओर से इस…

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निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर   ग्वालियर: प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय की सहयोगी संस्था राजयोग एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के मेडिकल विंग के स्थानीय सेवाकेंद्र “प्रभु उपहार भवन, माधवगंज लश्कर ग्वालियर” द्वारा निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर का आयोजन किया गया।शिविर में परामर्श देनें के लिए डॉ. निर्मला कंचन (स्त्री रोग विशेषज्ञ), एवं…

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