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31-05-2022

31-05-2022 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम्हें शुद्ध नशा होना चाहिए कि हम श्रीमत पर अपने ही तन-मन-धन से खास भारत आम सारी दुनिया को स्वर्ग बनाने की सेवा कर रहे हैं''

प्रश्नः-
तुम बच्चों में भी सबसे अधिक सौभाग्यशाली किसको कहें?

उत्तर:-
जो ज्ञान को अच्छी रीति धारण करते और दूसरों को भी कराते हैं, वे बहुत-बहुत सौभाग्यशाली हैं। अहो सौभाग्य तुम भारतवासी बच्चों का, जिन्हें स्वयं भगवान बैठकर राजयोग सिखला रहे हैं। तुम सच्चे-सच्चे मुख वंशावली ब्राह्मण बने हो। तुम्हारा यह झाड़ धीरे-धीरे बढ़ता जायेगा। घर-घर को स्वर्ग बनाने की सेवा तुम्हें करनी है।

गीत:-
नई उमर की कलियां

ओम् शान्ति। तुम बच्चे समझते हो कि हम सेना हैं। तुम हो सबसे पावरफुल क्योंकि सर्वशक्तिमान् के तुम शिव शक्ति सेना हो। इतना नशा चढ़ना चाहिए। बाबा यहाँ नशा चढ़ाते हैं, घर में जाने से भूल जाते हैं। तुम शिव शक्ति सेना क्या कर रहे हो? सारी दुनिया जो रावण की जंजीरों में बंधी हुई है, उनको छुड़ाते हो। यह शोकवाटिका में हैं। भल एरोप्लेन में घूमते हैं। बड़े-बड़े मकान हैं, परन्तु यह तो सब खत्म होने वाले हैं। इनको रुण्य के पानी (मृगतृष्णा) मिसल राज्य कहा जाता है। बाहर से देखने में भभका बहुत है, अन्दर पोलमपोल लगा हुआ है। द्रोपदी का मिसाल भी है। बाबा कहते हैं कि मैं जब आया था तो यही सब था जो अभी तुम देख रहे हो। पार्टीशन भी अब हुआ जो तुम देख रहे हो। बाकी लड़ाई के मैदान आदि की तो बात है नहीं। यह रथ है जिसमें शिवबाबा विराजमान हो बैठकर बच्चों को ज्ञान देते हैं। तुम भारत की सेवा कर रहे हो। जो भी त्योहार हैं, इस भारत में मनाये जाते हैं - वह सब अभी के हैं। तीजरी की कथा, गीता की कथा, शिव पुराण, रामायण आदि सभी इस समय के लिए बैठ बनाये हैं। सतयुग, त्रेता में तो यह बात नहीं है। बाद में शास्त्र बनाने शुरू किये हैं। वह तो फिर भी बनेंगे। तुम बच्चों ने सब समझ लिया है। आगे तो बिल्कुल घोर अंधियारे में थे। इस समय कोई भी सृष्टि चक्र को यथार्थ रीति नहीं जानते हैं। अभी तुम बच्चों को शुद्ध अंहकार होना चाहिए। तुम तन-मन-धन से भारत की सेवा कर रहे हो, खास भारत की आम सारी दुनिया की। बाप की मदद से हम मुक्ति जीवनमुक्ति का रास्ता बतलाते हैं। तुम श्रीमत पर ये सेवा करते हो। श्रीमत है शिवबाबा की। परन्तु शिव का नाम गुम कर दिया है। बाकी ब्रह्मा की मत और श्रीकृष्ण की मत दिखाई है। सो भी कृष्ण को द्वापर में ले गये हैं। तुम भारत को स्वर्ग अर्थात् हीरे मिसल बनाते हो। परन्तु हो कितने साधारण, कोई घमण्ड नहीं। तुमको यहाँ अपना सब कुछ स्वाहा करना है, गोया शिवबाबा पर पूरा-पूरा बलि चढ़ना है। तो शिवबाबा फिर 21 जन्म बलि चढ़ते हैं। बाबा ऐसे नहीं कहते कि गृहस्थ व्यवहार नहीं सम्भालना है। वह भी सम्भालना है, परन्तु श्रीमत पर। अविनाशी सर्जन से कुछ छिपाना नहीं। गाया भी जाता है गुरू बिगर घोर अंधियारा। यह ब्रह्मा दादा भी कहते हैं कि शिवबाबा बिगर हम और तुम बिल्कुल घोर अंधियारे में थे। वह तो शिव शंकर को मिला देते हैं। ब्रह्मा कौन है? कब आते हैं? क्या आकर करते हैं? हर एक बात समझना चाहिए ना। जानवर तो नहीं समझेंगे। अभी तुम बच्चे नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जान गये हो। विद्वान, पण्डित आदि कोई नहीं जानते हैं कि सतगुरू बिगर घोर अन्धियारा है। गुरू लोग तो बहुत हैं। सभी का सतगुरू एक है, जिसको वृक्षपति कहते हैं। तो तुम बच्चों को नशा चढ़ना चाहिए। यह दुनिया जो इन ऑखों से देख रहे हो, वह नहीं रहेगी। जो अब बुद्धि से जानते हो वही रहना है। तो इस पुरानी दुनिया से ममत्व मिटा देना चाहिए। बच्चों को भी सम्भालना है। बाबा को कितने ढेर बाल-बच्चे हैं। कोई तो कहते हैं बाबा हम आपका दो मास का बच्चा हूँ। कोई कहते एक मास का बच्चा हूँ। एक मास के बच्चे भी झट धारणा कर एकदम जवान बन जाते हैं और कोई तो 20 वर्ष वाले भी जामड़े (बौने) बन जाते हैं। यह तो तुम जानते हो कि नया झाड़ है, धीरे-धीरे वृद्धि को पायेंगे। पहले जरूर पत्ते निकलेंगे। बाद में फूल निकलेंगे। यहाँ ही फूल बनना है। वहाँ सब फूल ही फूल हैं। यहाँ तो कोई गुलाब के, कोई चम्पा के बनते हैं। जैसी-जैसी धारणा ऐसा पद मिल जाता है। वहाँ फूल की बात नहीं। मर्तबे की बात है। तो यह नशा रहना चाहिए कि हम इन ऑखों से पवित्र शिवालय स्वर्ग को देखेंगे। आधाकल्प सिर्फ कहते थे कि फलाना स्वर्ग पधारा। वह कामना प्रैक्टिकल में बाप ही अब पूरी करते हैं।

अभी तुम बाप के बच्चे बन जाते हो तो भारत का खाना आबाद हो जाता है। 33 करोड़ देवता गाये जाते हैं, वह इतने कोई सतयुग त्रेता में नहीं रहते हैं। यह तो सारे भारत के देवी-देवता धर्म की आदमशुमारी है। बाहर की तरफ देखो तो कितने फ्रैक्शन पड़ गये हैं। चीन-जापान है तो बौद्धी, नाम फिर भी बौद्ध का लेंगे लेकिन फ्रैक्शन (मतभेद) कितनी है। यहाँ भारत में तो शिवबाबा को उड़ा दिया है, उनको बिल्कुल जानते ही नहीं। चित्र हैं, गाते भी हैं, नंदीगण भी है परन्तु जानते नहीं। अभी तुम बच्चे जानते हो, बाप ने बताया है कि हम परमधाम से आकर यहाँ यह शरीर ले पार्ट बजा रहे हैं। तुम चक्र को जान गये हो। ज्ञान-अंजन सतगुरू दिया, अज्ञान अंधेर विनाश। आगे तो कुछ भी पता नहीं था। अभी बेहद के बाप क्रियेटर, डायरेक्टर, मुख्य एक्टर को तुम जान गये हो। 84 जन्म किसको लेने चाहिए! कौन लेते होंगे, तो तुम जानते हो। तुम्हारा अब तीसरा नेत्र खुला है तो इतना नशा रहना चाहिए। मनुष्य जब शराब पीते हैं तो भल दीवाला मारा हुआ हो तो भी नशे में समझते हैं कि सबसे साहूकार मैं हूँ। बाबा तो वैष्णव थे, कभी टच नहीं किया। बाकी सुना है कि शराब पिया और नशा चढ़ा। कहते हैं कि यादवों ने भी शराब पी, मूसल निकाल एक दो के कुल का नाश किया। यहाँ भी मिलेट्री को शराब पिलाते हैं तो मरने, मारने का ख्याल नहीं रहता। नशा चढ़ जाता है। तो तुम बच्चों को भी सदैव नारायणी नशा रहना चाहिए। हम वही कल्प पहले वाले शक्ति सेना हैं। अनेक बार हमने भारत को हीरे जैसा बनाया है, इसमें मूँझने की बात नहीं है। संशयबुद्धि विनशन्ती, निश्चयबुद्धि विजयन्ती। संशय बुद्धि ऊंच पद नहीं पायेंगे। प्रजा में कम पद पा लेंगे। वहाँ तो तुम्हारे महलों में सदैव बाजे बजते रहेंगे। दु:ख की बात ही नहीं। आगे राजाओं के महलों के दरवाजे के बाहर चबूतरे पर शहनाईयां बजती थी। अभी तो वह राजाओं का ठाठ खत्म हो गया है। प्रजा का राज्य हो गया है।

अभी तुम बच्चे जानते हो कि हम पवित्र बन योग में रह और चक्र को याद करते-करते भारत को स्वर्ग बना देंगे, परन्तु बहुत बच्चे भूल जाते हैं। बाबा राय देते हैं कि सबसे अच्छा कर्तव्य है गरीबों की सेवा करना। आजकल गरीब तो बहुत हैं। मनुष्य हॉस्पिटल बहुत बनाते हैं तो मरीज़ों को सुख मिले, जो हॉस्पिटल खोलेंगे उनको दूसरे जन्म में कुछ अच्छी काया मिलेगी, रोगी नहीं बनेंगे। कोई-कोई अच्छा तन्दरूस्त होते हैं, मुश्किल कभी बीमार होते हैं। तो जरूर आगे जन्म में तन्दरूस्ती का दान दिया होगा। वह है हॉस्पिटल खोलना। कोई एज्यूकेशन में बहुत होशियार होते हैं तो जरूर विद्या का दान किया होगा। कोई-कोई संन्यासियों को छोटेपन में ही शास्त्र कण्ठ हो जाते हैं तो कहेंगे पास्ट जन्म के आत्मा संस्कार ले आई है। तो यहाँ भी कोई 3 पैर पृथ्वी का लेकर यह रूहानी हॉस्पिटल खोले और लिख दे कि आकर 21 जन्मों के लिए हेल्थ का वर्सा लो बाप से। कितनी सहज बात है। तुम पूछते हो बताओ लक्ष्मी-नारायण को यह वर्सा किसने दिया, तो जरूर पूछने वाला खुद जानता होगा। बाप ही स्वर्ग का रचयिता है। कैसे रचता है, वह बैठो तो हम समझायें। हम भी उनसे वर्सा ले रहे हैं। शिवबाबा, ब्रह्मा बाबा द्वारा स्थापना करा रहे हैं फिर पालना भी वही करेंगे। शंकर द्वारा विनाश भी होना है। विनाश जरूर नर्क का होगा ना। नई दुनिया तो अब बन रही है। छोटे से बैज पर तुम समझा सकते हो कि ब्रह्मा द्वारा स्थापना हो रही है। यही राजयोग है। मनुष्य से देवता बनना है, जो अपने कुल का होगा उसको झट दिल में लग जायेगा। उसका चेहरा ही चमक जायेगा और पुरुषार्थ से अपना वर्सा ले लेंगे। अपने ब्राह्मण कुल के जो हैं - वह शुद्र कुल से बदलने जरूर हैं, यह ड्रामा में नूँध है। तुम भारत की बहुत सेवा करते हो परन्तु गुप्त। आगे भी ऐसे-ऐसे की थी। ड्रामा को अभी अच्छी रीति जानना है। गाया जाता है आप मुये मर गई दुनिया। बाकी आत्मा रह जाती है। आत्मा तो मरती नहीं। आत्मा शरीर से अलग हो जाती है तो उनके लिए दुनिया ही नहीं रही। फिर जब शरीर में जायेगी तब माँ-बाप का सम्बन्ध आदि नया होगा। यहाँ भी तुमको अशरीरी बनना है। अभी तो यह दुनिया प्रैक्टिकल में खत्म होनी है।

बाप कहते हैं मुझे याद करते रहो तो विकर्मो का जो बोझा है वह उतर जायेगा और तुम सम्पूर्ण बन जायेंगे। बच्चों के मैनर्स बहुत अच्छे होने चाहिए। बोलना, चलना, खाना, पीना...। बहुत थोड़ा बोलना चाहिए। राजायें लोग बहुत थोड़ा और आहिस्ते बोलते हैं, चुप रहते हैं। तुम्हारे में तो बहुत फज़ीलत (सभ्यता) होनी चाहिए। देवताओं में फज़ीलत थी। यहाँ तो मनुष्य बन्दर मिसल हैं तो बदफज़ीलत हैं। कुछ भी अक्ल नहीं। बेहद का बाप जो सृष्टि को स्वर्ग बनाते हैं, उनको पत्थर ठिक्कर कुत्ते बिल्ली सबमें ढकेल दिया है। माया ने एकदम बुद्धि को गॉडरेज का ताला लगा दिया है। अब बाबा आकर ताला खोलते हैं। अभी तुम बच्चे कितने बुद्धिवान बन गये हो। शिवबाबा, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, लक्ष्मी-नारायण, जगदम्बा आदि सबकी बायोग्राफी को तुम जान गये हो।। अब तुमको सतगुरू शिवबाबा से पूरी समझ मिली है। बाबा नॉलेजफुल है ना। हर एक अपने दिल से पूछे तो बरोबर हम कुछ नहीं जानते थे। बन्दर जैसी चलन थी। अब हम सब जान गये हैं। बाबा नई रचना कैसे रचते हैं। ऊंचे ते ऊंचा ब्राह्मण कुल बनाते हैं सो तुम जानते हो। मूर्ति जो पूज्य है वह कुछ बोलती नहीं है। अभी तुम समझते हो कि हम ही पूज्य फिर पुजारी बनते हैं।

अभी तुम सच्चे-सच्चे ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण हो। तुम जानते हो कि संगम युग पर सतयुग की रचना कैसे होती है, यह और कोई नहीं जानते। बैरिस्टर पढ़ायेगा तो क्या बनायेगा? भगवान भी आकर सहज राजयोग सिखलाते हैं। अहो सौभाग्य भारतवासी बच्चों का... तुम्हारे में भी सौभाग्यशाली वह जो अच्छी रीति धारणा करके दूसरों को कराते रहते हैं। आगे चल बहुत घर स्वर्ग बनेंगे। झाड़ धीरे-धीरे बढ़ता है। मेहनत है। जितना ऊंच जायेंगे उतना माया के तूफान ज़ोर से आयेंगे। पहाड़ी पर जितना ऊंच जायेंगे उतना तूफान ठण्डी आदि का सामना भी होगा। सर्विस में जितना टाइम मिले उतना अच्छा है, एडवरटाइज़ करो। जो दिल में राय आवे वह बताओ कि ऐसे-ऐसे करना चाहिए। बाबा कहेंगे कि भल करो। बिचारे मनुष्य बहुत दु:खी हैं। इस समय सब तमोप्रधान बन पड़े हैं। कोई भी चीज़ सच्ची नहीं रही है। झूठी माया, झूठी काया... अब तुम बच्चे स्वर्गवासी बनते हो।

इस गीत में सीता की महिमा करते हैं। जिस देश में सीता थी, वह देश पवित्र था। उस देश में फिर रावण कहाँ से आया? वन्डर तो यह है कि फिर कहते कि बन्दरों की सेना ली। अब बन्दरों की सेना कहाँ से आई! यहाँ भी मनुष्यों का लश्कर है। गवर्मेन्ट बन्दरों का लश्कर थोड़ेही लेती है। फिर वहाँ बन्दरों की सेना कैसे आई? यह भी समझते नहीं हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सम्पूर्ण बनने के लिए याद की यात्रा से अपने विकर्मों का बोझ उतारना है, अच्छे मैनर्स धारण करना है। सभ्यता (फज़ीलत) से व्यवहार करना है। बहुत कम बोलना है।

2) किसी भी बात में संशय बुद्धि नहीं बनना है। भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में अपना सब कुछ सफल करना है। शिवबाबा पर पूरा-पूरा बलि चढ़ना है।

वरदान:-
सर्व खजानों को विधि पूर्वक जमा कर सम्पूर्णता की सिद्धि प्राप्त करने वाले सिद्धि स्वरूप भव

63 जन्म सभी खजाने व्यर्थ गंवाये, अब संगमयुग पर सर्व खजानों को यथार्थ विधि पूर्वक जमा करो, जमा करने की विधि है-जो भी खजाने हैं उन्हें स्व प्रति और औरों के प्रति शुभ वृत्ति से कार्य में लगाओ। सिर्फ बुद्धि के लॉकर में जमा नहीं करो लेकिन खजानों को कार्य में लगाओ। उन्हें स्वयं प्रति भी यूज करो, नहीं तो लूज़ हो जायेंगे इसलिए यथार्थ विधि से जमा करो, तो सम्पूर्णता की सिद्धि प्राप्त कर सिद्धि स्वरूप बन जायेंगे।

स्लोगन:-
परमात्म प्यार का अनुभव है तो कोई भी रुकावट रोक नहीं सकती।

 

30-05-2022

30-05-2022 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप आया है तुम्हारी सब शुद्ध कामनायें पूरी करने, रावण अशुद्ध कामना पूरी करता और बाप शुद्ध कामना पूरी करता''

प्रश्नः-
जो बाप की श्रीमत का उल्लंघन करते हैं - उनकी अन्तिम गति क्या होगी?

उत्तर:-
श्रीमत का उल्लंघन करने वालों को माया के भूत अन्त में राम नाम सत है... करके घर ले जायेंगे। फिर बहुत कड़ी सजा खानी पड़ेगी। श्रीमत पर न चले तो यह मरे। धर्मराज पूरा हिसाब लेता है, इसलिए बाप बच्चों को अच्छी मत देते, बच्चे माया की बुरी मत से सावधान रहो। ऐसा न हो बाप का बनकर फिर कोई विकर्म हो जाए और 100 गुणा दण्ड भोगना पड़े। श्रीमत पर न चलना, पढ़ाई छोड़ना ही अपने ऊपर बददुआ, अकृपा करना है।

गीत:-
ओम् नमो शिवाए...

ओम् शान्ति। यह परमपिता परमात्मा की महिमा भक्त लोग गाते हैं। कहते भी हैं हे भगवान, हे शिवबाबा, यह किसने कहा? आत्मा ने अपने बाबा को याद किया क्योंकि आत्मा जानती है हमारा लौकिक बाप भी है और यह है पारलौकिक बाप, शिवबाबा। वह आते भी हैं भारत में और एक ही बार अवतार लेते हैं। गाते भी हैं हे पतित-पावन आओ, भ्रष्टाचारी पतितों को श्रेष्ठाचारी पावन बनाने के लिए। परन्तु सब अपने को पतित भ्रष्टाचारी समझते नहीं हैं। सब एक किसम के भी नहीं होते हैं। हर एक का पद अपना-अपना होता है। हर एक के कर्मों की गति न्यारी होती है, एक न मिले दूसरे से। बाप बैठ समझाते हैं - तुम बाप को न जानने के कारण इतने आरफन पतित बन गये हो। कहते भी हैं पतित-पावन, सर्व के सद्गति दाता आप हो। फिर गीता वा गंगा पतित-पावनी कैसे हुई। तुमको इतना बेसमझ किसने बनाया है? इन पांच विकारों रूपी रावण ने। अभी सभी रावण राज्य अथवा शोक वाटिका में हैं। हेड जो हैं उन्हों को तो बहुत फिकरात रहती है। सब दु:खी हैं, इसलिए पुकारते हैं हे बाबा आप आओ, हमको स्वर्ग में ले चलो। सदैव निरोगी, बड़ी आयु वाले, शान्ति सम्पन्न, धनवान बनाओ। बाप तो सुख शान्ति का सागर है ना। मनुष्य की यह महिमा नहीं हो सकती। भल मनुष्य अपने को शिवोहम् भी कहलाते हैं, परन्तु हैं पतित। बाप समझाते हैं - तुम बाप को सर्वव्यापी कहते हो, इससे तो कोई भी बात ठहरती नहीं। भक्ति भी चल नहीं सकती क्योंकि भगत भगवान को याद करते हैं। भगवान एक है, भक्तियां अनेक हैं। जब सब मुझ भगवान को पत्थर ठिक्कर में ठोक खुद भी पत्थरबुद्धि बन जाते हैं, तब मुझे आना पड़ता है। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा पावन दुनिया की स्थापना कराते हैं। यह प्रजापिता ब्रह्मा के एडाप्टेड बच्चे हैं, कितने ढेर बच्चे हैं। अभी भी वृद्धि को पायेंगे। जो ब्राह्मण बनेंगे वही फिर देवता बनेंगे। पहले तुम शूद्र थे। फिर ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण बने फिर देवता क्षत्रिय बनेंगे। यह चक्र फिरता है। यह बाप ही समझाते हैं। यह मनुष्य सृष्टि है, सूक्ष्मवतन में हैं फरिश्ते। वहाँ कोई झाड़ नहीं है। यह मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ यहाँ है। तो बाप आकर इस ज्ञान अमृत का कलष माताओं के सिर पर रखते हैं। वास्तव में कोई अमृत नहीं है। यह है नॉलेज। बाप आकर सहज राजयोग की शिक्षा देते हैं। बाप कहते हैं मैं तो निराकार हूँ, नम्बरवन मनुष्य के तन में प्रवेश करता हूँ। खुद कहते हैं जब मैं ब्रह्मा तन में प्रवेश करूँ तब तो ब्राह्मण सम्प्रदाय हो। ब्रह्मा यहाँ ही चाहिए। वह सूक्ष्मवतन वासी तो अव्यक्त ब्रह्मा है। मैं इस व्यक्त में प्रवेश करता हूँ, इनको फरिश्ता बनाने के लिए। तुम भी अन्त में फरिश्ते बन जाते हो। तुम ब्राह्मणों को यहाँ ही पवित्र बनना है। फिर पवित्र दुनिया में जाकर जन्म लेंगे। तुम दोनों हिंसा नहीं करते हो। काम कटारी चलाना सबसे तीखी हिंसा है, जिससे मनुष्य आदि मध्य अन्त दु:ख पाते हैं। द्वापर से लेकर काम कटारी चलाते आये हैं, तब ही गिरना शुरू होता है। मनुष्य के पास है भक्ति की नॉलेज। वेद शास्त्र पढ़ना, भक्ति करना। गाते भी हैं ज्ञान, भक्ति, वैराग्य। भक्ति के बाद ही बाबा सारी दुनिया से वैराग्य दिलाते हैं क्योंकि इस पतित दुनिया का विनाश होना है इसलिए देह सहित देह के सभी सम्बन्धियों आदि को भूल जाओ। मुझ एक के साथ बुद्धियोग लगाओ। ऐसी प्रैक्टिस हो जो अन्त समय कोई भी याद न पड़े। इस पुरानी दुनिया का त्याग कराया जाता है। बेहद का संन्यास बेहद का बाप ही कराते हैं। पुनर्जन्म तो सबको लेना है, नहीं तो इतनी वृद्धि कैसे होती। हद के संन्यासियों द्वारा पवित्रता का बल भारतवासियों को मिलता है। भारत जैसा पवित्र खण्ड और कोई होता नहीं, बाप की यह बर्थ प्लेस है। परन्तु मनुष्य जानते नहीं, बाप कैसे अवतार लेते हैं, क्या करते हैं। कुछ भी जानते नहीं। ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात भी कहते हैं। दिन अर्थात् स्वर्ग, रात अर्थात् नर्क। जानते नहीं। ब्रह्मा की रात तो तुम बच्चों की भी रात। ब्रह्मा का दिन तो तुम बच्चों का भी दिन हो जाता है। रावण राज्य में सब दुर्गति को पाये हुए हैं। अभी तुम बच्चे बाप द्वारा सद्गति को पा रहे हो। तुम इस समय हो ईश्वरीय औलाद। परमपिता परमात्मा का बच्चा ब्रह्मा उनके तुम एडाप्टेड बच्चे, तो शिवबाबा के पोत्रे ठहरे। यह पुत्र ब्रह्मा भी सुनते तो तुम पोत्रे पोत्रियां भी सुनते हो। अभी फिर यह ज्ञान प्राय: लोप हो जायेगा। यह राजयोग बाप ही आकर सिखलाते हैं। संन्यासियों का पार्ट ही अलग है और तुम आदि सनातन देवी-देवता धर्म वालों का पार्ट ही अलग है। वहाँ देवताओं की आयु भी बड़ी रहती है। अकाले मृत्यु नहीं होती है। वहाँ देवतायें आत्म-अभिमानी होते हैं। परमात्म-अभिमानी नहीं। फिर माया की प्रवेशता होने से देह-अभिमानी बन जाते हैं। इस समय तुम आत्म-अभिमानी भी हो तो परमात्म-अभिमानी भी हो। इस समय तुम जानते हो हम परमात्मा की सन्तान हैं, परमात्मा के आक्यूपेशन को जानते हैं। यह शुद्ध अभिमान हुआ। अपने को शिवोहम् या परमात्मा कहना यह अशुद्ध अभिमान है। तुम अभी अपने को भी और परमात्मा को भी जान गये परमात्मा द्वारा। तुम जानते हो परमपिता परमात्मा कल्प-कल्प आते हैं। भक्ति मार्ग में भी अल्पकाल का सुख वह देते हैं। बाकी वह चित्र तो जड़ हैं। तुम जिस मनोकामना से पूजा आदि करते हो तो मैं तुम्हारी सब शुद्ध कामनायें पूरी करता हूँ। अशुद्ध कामना तो रावण पूरी करता है। बहुत रिद्धि सिद्धि आदि सीखते हैं। वह है रावण मत। मैं हूँ ही सुख दाता। मैं किसको दु:ख नहीं देता हूँ। कहते हैं दु:ख सुख ईश्वर ही देते हैं। यह भी मेरे ऊपर कलंक लगाते हैं। अगर ऐसा है तो बुलाते ही क्यों हो। परमात्मा रहम करो, क्षमा करो। जानते हैं, धर्मराज के द्वारा बहुत दण्ड खिलायेंगे।

बाप समझाते हैं बच्चे भक्ति मार्ग के इन शास्त्रों आदि में कोई सार नहीं है। अभी तुमको भक्ति अच्छी नहीं लगती। ऐसे भी नहीं कहते हो कि हे भगवान। आत्मा दिल अन्दर याद करती है। बस यह है अजपाजाप। आत्माओं से निराकार बाप बात करते हैं। आत्मा सुनती है। अगर कहे सर्वव्यापी है फिर तो सब परमात्मा हो गये। बाप कहते हैं कितने पत्थरबुद्धि बन गये हैं। मनुष्यों को तो बड़ा डर रहता है, कहाँ गुरू बद्दुआ न दे। बाप तो है सुखदाता। बद्दुआ अथवा अकृपा तो बाप बच्चों के ऊपर करते ही नहीं। बच्चे श्रीमत पर नहीं चलते, पढ़ते नहीं तो अकृपा अपने ऊपर करते हैं। बाप कहते हैं बच्चे मुझ एक बाप को याद करो। सतयुग त्रेता में भक्ति होती नहीं। अब रात है तो मनुष्य धक्का खाते रहते हैं, तब कहा जाता है सतगुरू बिगर घोर अन्धियारा। सतगुरू ही आकर सारे चक्र का राज़ समझाते हैं कि तुम देवता थे फिर क्षत्रिय बने, फिर वैश्य शूद्र बनें। ऐसे 84 जन्म पूरे किये। 8 पुनर्जन्म सतयुग में, 12 पुनर्जन्म त्रेता में, फिर 63 जन्म द्वापर कलियुग में। चक्र को फिरना ही है। यह बातें मनुष्य नहीं जानते। यही भारत विश्व का मालिक था और कोई खण्ड नहीं था। जब झूठ खण्ड शुरू होता है तो फिर और-और खण्ड भी होते हैं। अब तो देखो लड़ाई झगड़ा कितना है। यह है ही आरफन्स की दुनिया, बाप को नहीं जानते। रड़ियाँ मारते रहते हैं हे परमात्मा... बाप कहते हैं मैं एक ही बार आता हूँ, पतित दुनिया को पावन बनाने। बापू के लिए समझते थे कि रामराज्य स्थापन करते हैं, उनको बहुत पैसे देते थे। परन्तु वह पैसा कभी अपने काम में नहीं लगाते थे। फिर भी रामराज्य तो हुआ नहीं। यह तो है शिवबाबा, दाता है ना। सिर्फ समझाते हैं विनाश तो होना ही है, इससे तुम पैसे को सफल करो। यह सेन्टर आदि खोलो। बोर्ड लगा दो एक बाप से आकर स्वर्ग का वर्सा ले लो सेकेण्ड में। बाप कहते हैं मेरी याद से ही तुम पावन बनेंगे। तुम्हारी बुद्धि में यह चक्र फिरना चाहिए। ब्राह्मण ही यज्ञ के रक्षक बनते हैं। यह है रुद्र ज्ञान यज्ञ, कृष्ण का यज्ञ नहीं। सतयुग में यज्ञ होते नहीं। यह है ज्ञान यज्ञ। बाकी सब हैं भक्ति के यज्ञ। अनेक प्रकार के शास्त्र यज्ञ में रखते हैं। चौं-चौं का मुरब्बा बना देते हैं, उसको ज्ञान यज्ञ नहीं कहेंगे। बाबा कहते हैं मुझ, रूद्र का ज्ञान यज्ञ रचा हुआ है। जो मेरी मत पर चलेंगे उनको बड़ा इनाम मिलेगा, विश्व की बादशाही। तुम बच्चों को मुक्ति, जीवन मुक्ति की सौगात देता हूँ। बाबा कहते हैं मनुष्यों की तो 84 लाख योनियां रखी, और मुझे तो कण-कण में डाल दिया है फिर भी मैं पर-उपकारी सेवा-धारी हूँ। तुम रावण की मत पर मुझे गाली देते आये हो। यह भी ड्रामा बना हुआ है। अभी तुम बच्चों को कदम-कदम श्रीमत पर चलना है। बाप अच्छी मत देंगे, माया बुरी मत देगी इसलिए खबरदार रहना। मेरा बनकर फिर कोई विकर्म किया तो सौगुणा दण्ड पड़ जायेगा। योगबल से फिर शरीर भी पवित्र मिलेगा। संन्यासी लोग तो कह देते हैं आत्मा निर्लेप है बाकी शरीर पतित है इसलिए गंगा स्नान करते हैं। अरे आत्मा सच्चा सोना नहीं होगी तो जेवर सच्चे सोने का कैसे बनेगा। इस समय 5 तत्व भी तमोप्रधान हैं।

यह तुम्हारी रूहानी गवर्मेन्ट बड़े ते बड़ी है, परन्तु देखो तुमको सर्विस करने के लिए 3 पैर पृथ्वी के भी नहीं मिलते हैं, फिर तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। विश्व की बादशाही ऐसी देता हूँ जो वहाँ कोई खिटपिट नहीं कर सकते। आसमान, सागर आदि सबके मालिक बन जाते हो। कोई भी हद नहीं रहती। अभी तो बिल्कुल कंगाल बन पड़े हैं। अभी फिर तुम विश्व के मालिक बन रहे हो तो श्रीमत पर चलना पड़े। श्रीमत पर न चला तो यह मरा। माया के भूत राम नाम सत है, करके घर ले जायेंगे। सजा बड़ी कड़ी खायेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) यज्ञ की प्यार से सेवा कर, कदम-कदम पर श्रीमत पर चलते बाप से मन-इच्छित फल अर्थात् विश्व की बादशाही लेनी है।

2) विनाश तो होना ही है - इसलिए अपना सब कुछ सफल कर लेना है। पैसा है तो सेन्टर खोल अनेको के कल्याण के निमित्त बनना है।

वरदान:-
मन्सा द्वारा तीव्रगति की सेवा करने वाले बाप समान मर्सीफुल भव

संगमयुग पर बाप द्वारा जो वरदानों का खजाना मिला है उसे जितना बढ़ाना चाहो उतना दूसरों को देते जाओ। जैसे बाप मर्सीफुल है ऐसे बाप समान मर्सीफुल बनो, सिर्फ वाणी से नहीं, लेकिन अपनी मन्सा वृत्ति से वायुमण्डल द्वारा भी आत्माओं को अपनी मिली हुई शक्तियां दो। जब थोड़े समय में सारे विश्व की सेवा सम्पन्न करनी है तो तीव्रगति से सेवा करो। जितना स्वयं को सेवा में बिजी करेंगे उतना सहज मायाजीत भी बन जायेंगे।

स्लोगन:-
अपने सन्तुष्ट और खुशनुम: जीवन से हर कदम में सेवा करने वाले ही सच्चे सेवाधारी हैं।

 

28-02-2022

28-02-2022 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम्हें पढ़ाई से राजाई लेनी है, यह पढ़ाई है तुम्हें डबल सिरताज बनाने वाली, तुम अपने लिए अपनी राजाई स्थापन करते हो''

प्रश्नः-
कौन सा कर्तव्य एक बाप का ही है जिसके लिए मनुष्य पुरूषार्थ तो बहुत करते लेकिन कर नहीं पाते हैं?

उत्तर:-
पीसलेस वर्ल्ड को पीसफुल बनाना - यह काम केवल एक बाप का है। मनुष्य पुरूषार्थ करते हैं, सब मिलकर एक हो जाएं। सारे विश्व में पीस हो। एक दो को पीस प्राइज भी देते हैं। परन्तु उन्हें पता ही नहीं कि जब दुनिया में रामराज्य था तब पीस थी, अभी रावण राज्य है, यहाँ पीस हो ही नहीं सकती।

गीत:- किसने यह सब खेल रचाया...

ओम् शान्ति। बच्चों की दिल में आया कि पारलौकिक बाप आया है लेने के लिए। कहाँ ले जायेगा? शान्तिधाम। फिर क्या होगा? जिन्होंने अच्छी रीति पढ़ा है वह सुखधाम में आयेंगे। वहाँ आना है वाया मुक्तिधाम से। आत्मा समझती है कि बेहद का बाप सुख देने के लिए आया है। सारा दिन यह याद रह सकती है। जिन्हों को निश्चय नहीं वह यहाँ आ नहीं सकते। तुम ईश्वरीय औलाद हो। बाबा भी समझते हैं मैं बच्चों के सामने आया हुआ हूँ। बरोबर कल्प पहले भी पतित भ्रष्टाचारी दुनिया में आये थे। यहाँ सब भ्रष्टाचारी हैं, वहाँ हैं सब श्रेष्ठाचारी, यथा राजा रानी तथा प्रजा। यह खेल है ईश्वरीय सम्प्रदाय और आसुरी सम्प्रदाय का।

जब कोई गीत बजता है तो दिल में आना चाहिए कि बाबा ने हमको बहुत ऊंच बनाया है। ऊंचे ते ऊंचा बाप जरूर ऊंच ही बनायेंगे। ऐसे बाप की बहुत महिमा है। कोई भी कुछ करते हैं तो उनकी महिमा होती है। यह फलाने धन्धे में बड़ा अच्छा है। फलाना मनुष्य बड़ा होशियार है। हर कोई में गुण होते हैं। परमपिता परमात्मा की महिमा सबसे भारी है। हर एक मनुष्य मात्र को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है। परमपिता परमात्मा को भी बड़े ते बड़ा पार्ट मिला हुआ है। इस ड्रामा में बड़े-बड़े मुख्य पार्टधारी कौन हैं? कौरव और पाण्डव दोनों को भाई-भाई दिखाते हैं फिर उस तरफ दिखाते हैं बड़े-बड़े भीष्म पितामह, अश्वस्थामा आदि, यह सब विद्वानों, पण्डितों के नाम हैं। अब विद्वान थोड़ेही युद्ध के मैदान में लड़ाई करेंगे। लॉ नहीं है। झूठी काया झूठी माया... रावण झूठ और राम सत्य बताते हैं। परमपिता परमात्मा को ही सत्य कहते हैं। गॉड इज़ ट्रूथ। गॉड है ही एक। बाकी जो रचता और रचना के बारे में समझाते हैं वह सब है झूठ। यह सब ज्ञान की बातें हैं। ज्ञान में सच क्या है, झूठ क्या है वह बाप आकर समझाते हैं। भारत का गीता ज्ञान तो प्राय:लोप हो गया है। बाकी आटे में नमक मिसल कुछ निशानियां हैं। बाप कहते हैं मैं आकर बच्चों को वेदों, शास्त्रों का सार समझाता हूँ। गीता है मुख्य, जिसमें ही भगवानुवाच है। बाप कहते हैं तुमने श्रीकृष्ण भगवान का नाम लिख दिया है। परन्तु बाप आकर समझाते हैं जिसको तुम भगवान कहते हो वह सतयुग का फर्स्ट प्रिन्स है। वह पहले-पहले मेरे से विदाई ले मुक्तिधाम से आया था - सतयुग का प्रिंस बनने। अच्छा - श्रीकृष्ण की इतनी महिमा है, उनका बाप भी तो होगा ना। जैसा बाप वैसा बच्चा। श्रीकृष्ण के बाप की महिमा कहाँ गई। उसने किससे वर्सा लिया! श्रीकृष्ण है सतयुग के आदि का। स्वयंवर बाद लक्ष्मी-नारायण बने हैं। कितने धनवान थे। इतना धन उन्हों के पास कहाँ से आया? इस समय तो कुछ भी नहीं है। क्या हुआ? इतने पदार्थ कहाँ से और कैसे मिले? किसने दिया? तुम बच्चे जानते हो कि बेहद के बाप ने पढ़ाया। इस पढ़ाई से बरोबर तुम सतयुग के राजा बनने वाले हो। वह जो अल्पकाल के लिए विकारी राजायें बनते हैं वह कोई नॉलेज से नहीं बनते हैं। जो बहुत दान-पुण्य करते हैं वह जाकर साहूकार घर में जन्म लेते हैं। यहाँ तुम पढ़ाई से राजा महाराजा बनते हो, सो भी डबल सिरताज। तो कहते हैं सब कुछ करके अपने आप छिपाया। तुम जो बच्चे हो जानते हो बाप ने राज्य दिया था, बड़े सुखी थे। देवताओं का पूजन कितना अच्छा होता है, पूजन देखना हो तो श्रीनाथ द्वारे जाओ। देवताओं के जड़ चित्रों पर इतना माल चढ़ाते हैं तो खुद जब मालिक होंगे तो क्या नहीं खान-पान होगा। नई दुनिया है ना। नई खेती माल अच्छा देती है। पुरानी होने से ताकत कम हो जाती है। तुम बच्चों ने साक्षात्कार किया है। बाप समझाते हैं ऐसे था ना फिर क्या हुआ! तुम्हारे ऊपर 5 विकारों रूपी माया आकर चटकी और तुम कांटे बनते गये। बबुल का झाड़ होता है ना, उसमें कांटे बहुत होते हैं। उसको कहा जाता है कांटों का जंगल। इस समय एक-एक मनुष्य कांटा है। काम कटारी चलाते रहते हैं। माया के चटकने से रावण राज्य हो गया है। तुम हो गुप्त वेष में। किसको भी पता नहीं।

तुम बच्चे अभी कल्प पहले मुआफिक श्रीमत पर चल रहे हो। सिर्फ कल्प पहले मुआफिक नहीं, कल्प-कल्प के मुआफिक। तुम बैठ बाप से राजयोग की शिक्षा सीखते हो। तुम हो नान वायोलेन्स। तुम अन-नोन हो। तुम अपने को जानते हो, दुनिया तो नहीं जानती कि यह शक्तियां गुप्त रीति योगबल से विश्व पर अपनी दैवी राजाई स्थापन कर रही हैं। तुम हर एक अपनी बाद-शाही लेने का पुरूषार्थ करते हो। वह सिपाही लोग लड़ते हैं अपने बादशाह के लिए। परन्तु तुम अपने लिए सब कुछ करते हो। भारत को ही गोल्डन एज बनाते हो। जो-जो बनाते हैं वही आकर फिर राज्य करेंगे। गोया तुम भारत की सेवा करते हो गुप्त। जो करेंगे वही फल पायेंगे। जो मेहनत कर राजा रानी वा प्रजा बनेंगे वही आयेंगे। भारत में ही आकर राज्य करेंगे। तुम्हारी यहाँ है शिव शक्ति पाण्डव सेना। पाण्डव अक्षर पण्डे पर है। बाप ने आकर समझाया है - मुख्य रूहानी पण्डा मैं हूँ। पाण्डवों में मेल्स भी हैं, तो फीमेल्स भी हैं, प्रवृत्ति मार्ग है ना। बाकी लड़ाई की तो बात ही नहीं। शास्त्रों में तो क्या-क्या बैठ लिखा है। कितने नाम दिखाये हैं। बाप बैठ समझाते हैं - यह सब ड्रामा की नूँध है। कहते हैं भक्ति से भगवान मिलेगा। भक्ति का फल देना यानी सद्गति करना। फिर सतयुग में भक्ति आदि होती नहीं। संन्यास धर्म को तो बहुत थोड़ा टाइम हुआ है। स्वर्ग में यह आ न सकें। अभी तुम जानते हो कि स्वर्ग में किसका राज्य था। कौन सा धर्म था? बाप आकर देवी-देवता धर्म स्थापन करते हैं तो फिर और धर्मो का विनाश होता है। तुम ईश्वरीय सम्प्रदाय के हो। वह हैं आसुरी सम्प्रदाय। यह है ही पतित दुनिया। अभी तुम सब कहेंगे हम ईश्वर की औलाद हैं। ईश्वर कौन है? वह निराकार शिव है ब्रह्मा नहीं। लोग समझते हैं ब्रह्म ही ईश्वर है। अब ब्रहम् को परमपिता परमात्मा थोड़ेही कहेंगे। अपने को ईश्वर कहते हैं, नाम रख दिया है ब्रह्म ज्ञानी। कोई अर्थ ही नहीं। ब्रह्म महतत्व है जहाँ हम आत्मायें रहती हैं। सालिग्राम भी कहते हैं। रूद्र यज्ञ जब रचते हैं तो परमपिता परमात्मा का बड़ा शिवलिंग और छोटे-छोटे सालिग्राम बनाते हैं। परन्तु ऐसे है नहीं। परमात्मा बड़ा और आत्मायें छोटी। नहीं, उनको कहा जाता है परमपिता परम आत्मा, सुप्रीम सोल, परमधाम में रहने वाली आत्मा। आत्मा याद करती है आरगन्स द्वारा। अभी यह सब बातें तुम जानते हो। रचता और रचना के आदि मध्य अन्त और मुख्य पार्टधारी कौन हैं? कैसे पार्ट बजाते हैं? कौन कितना जन्म लेते हैं? तो यह हिसाब होगा ना। परन्तु इनमें भी जाने की दरकार नहीं। बाप कहते हैं बच्चे, यह है तुम्हारा धर्माऊ जन्म। 84 जन्म तो ठीक हैं। यह है धर्माऊ कल्याणकारी जन्म। अभी हमारा कल्याण होने वाला है, इसलिए यह कल्याणकारी जन्म और कल्याणकारी युग कहा जाता है। इस संगम का किसको पता नहीं है। संगम को युगे-युगे कहा है तो 4 संगम रख दिये हैं। बाप कहते हैं नहीं, यह तो उतरती कला के हैं। सतयुग से त्रेता होगा तो 2 कला कम होंगी। फिर द्वापर से और कम हो जायेंगी। पतित बनते जाते हैं। यह है वैराइटी धर्मो का झाड़, कितनी भाषायें हैं। कितनी अशान्ति है। अब तुम बच्चे जानते हो स्वर्ग में अशान्ति हो नहीं सकती। यहाँ बहुतों को पीस प्राइज़ मिलती है। पीस तो है नहीं। पुरूषार्थ करते हैं मिलकर एक हो जाएं। पोप भी कहते हैं कि वननेस हो जाए। सभी ब्रदर्स हैं परन्तु आपस में बनती क्यों नहीं है? उन्हों को ड्रामा का तो पता नहीं है। जब दुनिया में एक राम राज्य था तो पीस थी। अभी तो रावण राज्य है। अनेक धर्म हैं। अब इस पीसलेस को फिर से पीसफुल बनाना, एक बाप का ही काम होगा ना! यह तो दुनिया का प्रश्न है ना। वर्ल्ड के फादर को फुरना रहेगा ना। बाप कहते हैं मैं ही वर्ल्ड को पीस में लाता हूँ। भारत में पीस थी ना। पीसलेस आत्माओं को वापिस घर ले जाते हैं। वर्ल्ड की पीस के लिए वर्ल्ड गॉड फादर को आना है। उनका ही पार्ट है। तो कहते हैं सब कुछ करके... सबको सुख शान्ति दे करके फिर छिप जाते हैं। ऐसा छिप जाते हैं जो सतयुग त्रेता में भी कोई नहीं जानते, द्वापर कलियुग में भी कोई नहीं जानते। जब तक खुद न आकर अपना परिचय दे। देवतायें भी नहीं जानते। अपनी आत्मा को जानते हैं बाकी रचता को नहीं जान सकते।

बाप कहते हैं - यह नॉलेज प्राय:लोप हो जाती है। यह जो इतने मन्दिर शास्त्र आदि बनें हैं, सब खत्म हो जाने हैं। भक्ति मार्ग की एक चीज़ भी नहीं रहती है। अभी बाप कहते हैं सिर्फ मुझ एक बाप को याद करो और सबसे ममत्व मिटाओ। संन्यासी तो ऐसे कह न सकें। उनका है निवृत्ति मार्ग। पावन से पतित, फिर पतित से पावन तुमको बनना है। संन्यासियों का भी ड्रामा अनुसार पार्ट है। यह न हो तो भारत और ही दु:खी हो जाए। मुख्य बात है ही पवित्रता की। पवित्रता की ताकत से तुम पतित सृष्टि को पावन बनाते हो, बाप की श्रीमत से। हम आत्मायें बाबा के साथ जाने वाली हैं। पवित्र बनते-बनते हम पहुँच जायेंगे। यह यात्रा बहुत वन्डरफुल है। हे रात के राही थक मत जाना। सतयुग को दिन कहा जाता है। पहले तुम स्वीटहोम जाकर फिर दिन में आयेंगे। तुम हो रूहानी यात्रा के ब्राह्मण, कितना समझने की बातें हैं। जितना बाप को याद करेंगे, पद भी उतना ऊंच पायेंगे। कमाई बहुत है। नहीं करेंगे तो भस्मीभूत हो जायेंगे। कुछ तो मेहनत करनी चाहिए ना। लौकिक बाप को उठते-बैठते चलते-फिरते याद करते हो ना! पारलौकिक बाप को क्यों भूल जाते हो, लज्जा नहीं आती है! लौकिक बाप को कभी भूलते हो क्या? पारलौकिक बाप जिससे स्वर्ग का वर्सा मिलता है, उनको भूल जाते हो तो वर्सा भी भूल जायेगा फिर क्या पद पायेंगे। युक्ति से बतलाते रहते हैं। बस बाबा आया कि आया। हमको अब यह शरीर भी नहीं चाहिए। बड़ी मीठी नॉलेज है। देने वाला भी बड़ा मीठा है। आधाकल्प दु:ख में याद करते आये हो। बाबा हमको सभी दु:खों से छुड़ाओ। अब तुमको सभी दु:खों से छुड़ाते हैं। अगर हमारी मत पर चलेंगे तो। मैं तुम्हारा बाप हूँ ना फिर क्यों कहते हो कि बाबा हम भूल जाते हैं। तुम बच्चे हो ना। शान्तिधाम, सुखधाम जायेंगे ना। मुझ बाप को याद नहीं कर सकते हो। मैं तुम्हें डबल सिरताज बनाऊंगा। बच्चे कहते हैं हाँ बाबा याद करेंगे फिर कहते हो भूल गया। वन्डर है ना - इतना स्वर्ग का वर्सा मिलता है, तुम भूल जाते हो? अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप की श्रीमत और पवित्रता की ताकत से इस पतित सृष्टि को पावन बनाने की सेवा करनी है। अपने लिए अपना राज्य स्थापन करना है।

2) पारलौकिक बाप जो मीठे ते मीठा है, जिससे स्वर्ग का वर्सा मिलता है, उसे निरन्तर याद करना है। योगबल से अपनी राजाई लेनी है।

वरदान:-
हर बोल द्वारा जमा का खाता बढ़ाने वाले आत्मिक भाव और शुभ भावना सम्पन्न भव

बोल से भाव और भावना दोनों अनुभव होती हैं। अगर हर बोल में शुभ वा श्रेष्ठ भावना, आत्मिक भाव है तो उस बोल से जमा का खाता बढ़ता है। यदि बोल में ईर्ष्या, हषद, घृणा की भावना किसी भी परसेन्ट में समाई हुई है तो बोल द्वारा गंवाने का खाता ज्यादा होता है। समर्थ बोल का अर्थ है - जिस बोल में प्राप्ति का भाव वा सार हो। अगर बोल में सार नहीं है तो बोल व्यर्थ के खाते में चला जाता है।

स्लोगन:-
हर कारण का निवारण कर सदा सन्तुष्ट रहना ही सन्तुष्टमणि बनना है।

03-03-2022

03-03-2022 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - बाबा आये हैं तुम्हें सच्चा-सच्चा वैष्णव बनाने, तुम अभी ट्रांसफर हो काले से गोरे बन रहे हो''

प्रश्नः-
सर्व की कामनायें पूर्ण करने वाले आप बच्चों का टाइटल क्या है? तुम्हें कौन सी कामना पूर्ण करनी है?

उत्तर:-
तुम सर्व की मनोकामनायें पूर्ण करने वाले जगत अम्बा के बच्चे कामधेनु हो। सभी की कामना है - हमें मुक्ति जीवनमुक्ति मिले। तो तुम जगत अम्बा, जगत पिता के बच्चे सबको मुक्ति-जीवनमुक्ति का रास्ता बताते रहो, यही तुम्हारा धन्धा है।

गीत:-
अम्बे तू है जगदम्बे.......

ओम् शान्ति। यह है मम्मा के लिए भक्तों की महिमा। कहते हैं कि भक्तों की रक्षा करने वाले। अब यह भक्ति मार्ग हो गया। मम्मा की महिमा शिवबाबा के पिछाड़ी है, जब परमपिता परमात्मा शिव आते हैं तब आकर जगत अम्बा को रचते हैं। रचने का अर्थ ही है ट्रांसफर करना। काले को गोरा बनाते हैं। इस समय जगत अम्बा तो एक ही है। जैसे शिव का चित्र तो एक ही है फिर उसके भिन्न-भिन्न नाम रख, भिन्न-भिन्न मन्दिर बनाये हैं। अनेक प्रकार से महिमा भी करते हैं। परमपिता परमात्मा एक ही है। वैसे जगत अम्बा भी एक ही है। दो भुजाओं वाली है। 8 भुजाओं वाले कोई देवी-देवता होते नहीं। प्रजापिता अथवा जगत अम्बा भी दो भुजा वाली है। जगत अम्बा की महिमा जास्ती कलकत्ते में है। मशहूर है काली कलकत्ते वाली। उनका चित्र भी बहुत भयानक बनाया है। खप्पर की माला भी पहनती है। यह सब है भक्ति मार्ग। जगत अम्बा तो बलि ले नहीं सकती। वह तो जगत को रचने वाली ठहरी। वह बलि कैसे ले सकती अथवा वह मांसाहारी कैसे हो सकती। उनके मन्दिर न सिर्फ कलकत्ते में हैं परन्तु बहुत जगह हैं। माता अपने बच्चों की बलि थोड़ेही लेगी। भक्ति कितनी कड़ी है। अब उन्हों को कोई बैठ समझावे कि जगत अम्बा का ऐसा भयानक रूप नहीं होता है। न ऐसी बलि लेती है। उनमें भी एक है वैष्णव देवी, दूसरी है मांसाहारी। अब जो मांसाहारी है वह वैष्णव बनती है। भल मम्मा तो कुमारी है, शायद कुछ न भी खाया हो। जगत अम्बा ब्रह्मा की बेटी कुमारी ठहरी। अब कुमारी को फिर अम्बा कैसे कहा जाता, यह समझने की बात है। कलकत्ते में बहुत पूजा होती है। बहुत भयानक शक्ल बनाई है, जगत अम्बा की तो ऐसी शक्ल हो न सके। वह सबकी मनोकामनायें पूर्ण करने वाली है। वह सच्ची-सच्ची वैष्णव देवी है। उसके पिछले जन्म में जरूर मांसाहारी होगी। फिर वैष्णव अथवा पावन दैवीगुण वाली बन रही है। है सारी संगमयुग की बात। तो जगत अम्बा के मन्दिर में जाकर महिमा करनी चाहिए। पहले बताना है निराकार आत्माओं का बाप भी एक है। फिर साकार प्रजापिता ब्रह्मा भी एक है। ब्रह्मा की बेटी सरस्वती भी एक है, वह कभी बलि आदि नहीं लेती। पहले सुन्दर थी, अब सांवरी है, फिर सुन्दर बनेंगी। तो सारा कुटुम्ब भी सुन्दर बन जायेगा। बहुत जगह अम्बा को दो भुजा वाली ही दिखाते हैं। समझाने से कोई तो समझ भी जायेंगे, कोई तो झगड़ा भी करेंगे। हंगामा करने में देरी नहीं करते। तो समझाने में होशियार चाहिए।

तुम बच्चे हो कल्याणकारी। मम्मा भल पहले कलकत्ते में गई थी परन्तु ऐसी मुरली नहीं चली थी। जगत अम्बा है एक। तुम अनेकानेक बच्चियां हो। नाम तो एक का होगा ना। एक के ही अनेक मन्दिर बनाये हैं। अब कलकत्ते में भक्तों को इस पूजा से छुड़ायें कैसे? उन्हों को भी पूज्य तो बनाना है ना! तो वहाँ जाकर कोई समझावे। इस समय वह जगत अम्बा सबकी मनोकामनायें पूर्ण करने वाली बैठी है। वह है कामधेनु। किस रीति वह कामनायें पूरी करती है, यह कोई नहीं जानते। तुम हो कामधेनु जगत अम्बा की बच्चियां। सिर्फ गऊ माता नहीं, पुरुष भी हैं। वह भी बहुतों की कामनायें पूर्ण करते हैं। तुम्हारा धन्धा ही है सबकी मनोकामनायें पूर्ण करना। कहाँ भाई भी सेन्टर्स चलाते हैं। उन्हों की बुद्धि में आता है कि हम भी सभी की मनोकामनायें पूर्ण करें अर्थात् मुक्ति जीवनमुक्ति का रास्ता बतावें, स्वर्ग का वर्सा दें। जिन्होंने कल्प पहले लिया है, वही लेंगे। हाँ, वहाँ सब प्रकार के सुख मिलते हैं। जगत पिता, जगत अम्बा इन दोनों का रचयिता है शिवबाबा। इन द्वारा कितनी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं। कलकत्ते में बहुत पूजा होती है। कोई किसको, कोई किसको मानने वाला होगा। कोई वैष्णव देवी को भी मानने वाले होंगे। वह तुम्हारी बातों से झट राज़ी हो जायेंगे। बोलो, तुमको राज्य भाग्य मिला हुआ था इस जगत अम्बा से। जगत अम्बा को फिर कहाँ से मिला? जगत पिता से। उनको कहाँ से मिला? शिवबाबा से। जो सारी सृष्टि का रचयिता है, तुम अच्छी रीति समझा सकते हो। जगत अम्बा को सब मानते हैं। जरूर जगत अम्बा और जगत पिता को भी वर्सा शिवबाबा से मिलता है फिर उनके द्वारा बच्चों को मिलता है। जगत अम्बा एक है, दो भुजाओं वाली है। बहुत भुजायें नहीं हैं। सरस्वती ब्रह्मा की बेटी है ज्ञान-ज्ञानेश्वरी। परन्तु उनका रूप तो भयानक दिखा दिया है। तो उस पर समझाना पड़ता है कि जगत अम्बा का ऐसा भयानक रूप नहीं है। सतोप्रधान मनुष्य से फिर तमोप्रधान बनते हैं। तमोप्रधान मनुष्य फिर सतोप्रधान मनुष्यों को पूजते हैं। जगत अम्बा मनुष्य ठहरी क्योंकि जगत तो यहाँ है। मूलवतन, सूक्ष्मवतन को जगत नहीं कहेंगे। सूक्ष्मवतन में देवतायें, मूलवतन में आत्मायें रहती हैं। तो यह सब बातें समझाने की हैं। बाकी बाप और वर्से को याद करना है। 84 जन्मों की कहानी भारतवासियों को ही सुनानी पड़े। जो देवता थे, वह अब नहीं हैं। जो देवी-देवताओं के पुजारी होंगे, वही इन सब बातों को समझेंगे। वह फिर ऊंच पद प्राप्त करने के लिए मेहनत भी करेंगे। कई बच्चे समझते हैं हम तो बाबा के बच्चे बन गये, जरूर ऊंच पद पायेंगे। परन्तु विचार करो पहले तो जरूर अच्छा पढ़ेंगे तब तो अच्छा पद पायेंगे। पढ़ेंगे नहीं और ही विकर्म करते रहेंगे तो एक तो सजा खानी पड़ेगी, दूसरा फिर जाकर नौकर चाकर दास दासियां बनेंगे क्योंकि विकर्मो का बोझा बहुत है। जन्म-जन्मान्तर दासी बने, पिछाड़ी में पद पाया तो क्या हुआ! इससे तो प्रजा को बहुत धन मिलता है। वह किसके दास दासियां नहीं बनते। यह सब समझने की बातें हैं। बाकी मूल बात बाप समझा रहे थे तो वैष्णव देवी ही लक्ष्मी बनती है। लक्ष्मी का मन्दिर बड़ा या वैष्णव देवी का मन्दिर बड़ा? महिमा किसकी बड़ी है? वह है ज्ञान ज्ञानेश्वरी। लक्ष्मी को ज्ञान ज्ञानेश्वरी नहीं कहेंगे इसलिए महिमा जगत अम्बा की है। बड़ा मेला भी उनका लगता है। लक्ष्मी को दीप माला पर बुलाते हैं। यह है आत्माओं का परमात्मा के साथ मेला। इन बातों को कोई मनुष्य नहीं समझते। समझाने वाला बड़ा होशियार चाहिए। जो युक्ति से प्यार से काम चलावे। जो कोई भी समझ जाए तो बरोबर यह ठीक समझाते हैं। श्री लक्ष्मी कितनी सुन्दर थी! लक्ष्मी-नारायण की जो इतनी पूजा है वह भी पक्के वैष्णव हैं। जगत अम्बा भी वैष्णव है। बाप ने उन्हें राजयोग सिखलाकर मनुष्य से देवता बनाया है। तुम्हारी पूजा अभी नहीं हो सकती है क्योंकि शरीर तो पवित्र नहीं है। तुम सम्पूर्ण बन जाते हो तो तुम्हारा शरीर बदल जाता है, तब तुम पूजा लायक बनते हो। वास्तव में संन्यासियों को पूजना नहीं चाहिए। आजकल तो शिवोहम् कह बैठ पूजा कराते हैं। उन्हों में भी एक मठ है जो अपनी पूजा नहीं कराते हैं। अब शिव तो है निराकार, वह अपनी पूजा कैसे करावे। देखो, शिवबाबा इसमें आते हैं तो अपनी पूजा थोड़ेही कराते हैं। बाप तो आकर पुजारी से पूज्य बनाते हैं। पूजा करना कैसे सिखलायेंगे! शिवबाबा कुछ भी करने नहीं देते। कहते हैं राम-राम भी मुख से नहीं कहो। केवल बाप को याद करना है। याद करना कोई जाप नहीं है। बच्चे बाप से वर्सा लेते हैं। बच्चा थोड़ेही बाप का जाप जपेगा! तुमको भी जाप नहीं जपना है। जाप और याद में रात दिन का फ़र्क है। प्वाइंट्स तो ढेर नई-नई मिलती रहती हैं समझाने के लिए। यह भी जरूरी बात है कि यह भी बाप है। इनसे मिलता है बेहद का वर्सा और लौकिक बाप से मिलता है हद का वर्सा। इस पारलौकिक बाप ने कल्प पहले भी वर्सा दिया था, अब फिर देने आये हैं। बुद्धि में सारा ज्ञान फिरना चाहिए, जिससे मनुष्य देवता बन जायें। देखो, ज्ञान मार्ग में समझाने की बड़ी मेहनत चाहिए। जिससे मनुष्य की जीवन हीरे जैसी बन जाये। दु:खी तो बहुत हैं, एक दो में लड़ते रहते हैं। बाप आकर ईश्वरीय सम्प्रदाय बनाकर फिर दैवी सम्प्रदाय बनाते हैं, इसलिए लड़ाई झगड़े की बात ही नहीं। ईश्वरीय दरबार में कोई आसुरी रह न सके। मूत पलीती कपड़ों को यहाँ बैठने का हुक्म नहीं है। बाप समझाते रहते हैं बच्चे कभी आपस में लड़ना-झगड़ना नहीं। सतगुरू का निंदक ठौर न पाये, यानी सतयुग में ऊंच पद नहीं पाये। सतगुरू जो स्वर्ग का मालिक बनाते हैं, उनकी निंदा करे, तो ऊंच पद पा न सके। यह है सारी यहाँ की बात। परन्तु वह अपने ऊपर ले गये हैं और मनुष्यों को डराते रहते हैं। यहाँ तो पूरा पवित्र बनना है। वह गुरू कर लेते हैं लेकिन पवित्र नहीं बनते हैं। गृहस्थी को गुरू बनाने से कोई फायदा नहीं। यह है प्रजा का राज्य फिर दैवी राज्य बनाने वाला समर्थ चाहिए। बाबा आया है आसुरी दुनिया को दैवी बनाने। दैवी धर्म की स्थापना हो जायेगी, बाकी सब धर्म वाले खत्म हो जायेंगे। कहते हैं भगवान आकर फल देंगे। इससे सिद्ध होता है कि कोई भी निर्वाणधाम में जा नहीं सकते। बाप ही आकर राजयोग सिखलाते हैं। बाप कहते हैं मैं तुम्हारा परमपिता परमात्मा हूँ। मेरे में ही सारा ज्ञान है। मेरे को ही पतित-पावन कहते हैं। मैं ही तुमको राजयोग सिखलाता हूँ। तुमको फिर औरों को सिखलाना है। समझाने वाले सब एक जैसे नहीं हैं। तुमको नोट करना चाहिए। अच्छा भाषण करने वालों को भी सब प्वाइंट्स उस समय याद नहीं आती हैं। बाद में ख्याल आता है - यह सुनाना चाहता था। नोट जरूर करना है। परन्तु ऐसे भी नहीं नोट करके फिर छोड़ दें, पढ़े नहीं। धारणा तब होगी जब श्रीमत पर चलेंगे। सुबह अमृतवेले उठकर बाबा को जरूर याद करना है। फिर प्वाइंटस रिपीट करें, औरों को सुनावें तब ऊंच पद पायें। राजा बनना कोई मासी का घर नहीं है। समझा। मेहनत करनी है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) पूज्य बनने का पूरा पुरुषार्थ करना है। अपनी पूजा नहीं करानी है। आत्मा और शरीर दोनों पवित्र होंगे तब ही पूज्यनीय लायक बनेंगे।

2) होशियारी से समझदार बन कल्याण की भावना रख सेवा करनी है। दैवीगुणों वाला सच्चा वैष्णव बनना है।

वरदान:-
परमात्म प्यार में धरती की आकर्षण से ऊपर उड़ने वाले मायाप्रूफ भव

परमात्म प्यार धरनी की आकर्षण से ऊपर उड़ने का साधन है। जो धरनी अर्थात् देह-अभिमान की आकर्षण से ऊपर रहते हैं उन्हें माया अपनी ओर खींच नहीं सकती। कितना भी कोई आकर्षित रूप हो लेकिन माया की आकर्षण आप उड़ती कला वालों के पास पहुंच नहीं सकती। जैसे राकेट धरनी की आकर्षण से परे हो जाता है। ऐसे आप भी परे हो जाओ, इसकी विधि है न्यारा बनना वा एक बाप के प्यार में समाये रहना - इससे मायाप्रूफ बन जायेंगे।

स्लोगन:-
स्व स्थिति को ऐसा शक्तिशाली बनाओ जो परिस्थितियां उसे नीचे ऊपर न कर सकें।

अनमोल ज्ञान रत्न - (दादियों की पुरानी डायरी से)

ज्ञान ही खुशी का फाउण्डेशन अथवा थुर है, जिस फाउण्डेशन पर ही सारे जीवन रूपी झाड का मदार है। अगर फाउण्डेशन पक्का नहीं है तो वह खुशी अल्पकाल के लिए हो जाती है। जैसे मायावी मनुष्य कहते हैं कि हम खुशी में हैं क्योंकि हमारे पास सब धन पदार्थ मौजूद हैं। परन्तु हम जानते हैं कि उन्हें सर्वदा के लिए स्थाई खुशी नहीं रह सकती क्योकि उन्हों के पास ज्ञान का फाउण्डेशन ही नहीं है। यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कोई साहूकार किसी फल का माल निकाल आपेही खा लेवे और उसका छिलका फेंक देवे, जिसे कोई गरीब उठा ले और उसे देख खुश हो जाए कि हमारे पास भी माल है, परन्तु वास्तव में माल मालिक खा जाता है। वैसे हम इन अल्पकाल मायावी सुखों को तुच्छ समझ, इस अविनाशी ज्ञान से ईश्वरीय स्थाई अतिन्द्रिय सुख को प्राप्त कर रहे हैं और वे फिर अल्पकाल क्षणभंगुर सुख देने वाली माया को, जिसमें वास्तव में कोई सुख नहीं है उसके पिछाड़ी चटक, उसकी रसना ले, उसमें ही सुख समझ बैठे हैं और इस ही घमण्ड में रहते हैं कि हमारे पास भी कोई माल है। अच्छा - ओम् शान्ति।

22-02-2022

22-02-2022 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम सबको सच्ची गीता सुनाकर सुख देने वाले सच्चे-सच्चे व्यास हो, तुम्हें अच्छी तरह पढ़कर सबको पढ़ाना है, सुख देना है''

प्रश्नः-
सबसे ऊंची मंजिल कौन सी है, जिस पर पहुंचने का तुम पुरूषार्थ करते हो?

उत्तर:-
अपने को अशरीरी समझना, इस देह-अभिमान पर जीत पाना - यही ऊंची मंजिल है क्योंकि सबसे बड़ा दुश्मन है देह-अभिमान। ऐसा पुरुषार्थ करना है जो अन्त में बाप के सिवाए कोई याद न आये। शरीर छोड़ बाप के पास जाना है। यह शरीर भी याद न रहे। यही मेहनत करनी है।

गीत:-
इस पाप की दुनिया से....

ओम् शान्ति। जीव आत्मायें या बच्चे समझते हैं दिल में कि अभी हमको बाबा कहाँ ले चलते हैं। बरोबर जहाँ से हम आये हैं वहाँ ही ले चलेंगे। फिर हमको पुण्य आत्माओं की सृष्टि, जीव आत्माओं की दुनिया में भेज देंगे। श्रेष्ठ और भ्रष्ट अक्षर निकले हैं, जरूर जीव आत्माओं को ही कहेंगे। सुख वा दु:ख जब शरीर में है तब ही भोगा जाता है। बच्चे जानते हैं कि अब बाबा आया है। बाबा का नाम हमेशा शिव है। हमारा नाम सालिग्राम है। शिव के मन्दिर में सालिग्रामों की भी पूजा होती है, बाबा ने समझाया था - एक है रूद्र ज्ञान यज्ञ, दूसरा है रूद्र यज्ञ। उसमें खास बनारस के ब्राह्मणों, पण्डितों को बुलाते हैं - रूद्र यज्ञ की पूजा के लिए। बनारस में ही शिव के रहने के अनेक मन्दिर हैं। शिवकाशी कहते हैं, असल नाम काशी था। फिर अंग्रेजों ने बनारस नाम रखा। वाराणसी नाम अभी रखा है। भक्ति मार्ग में आत्मा परमात्मा का ज्ञान तो है नहीं। पूजा दोनों की अलग-अलग करते हैं। एक बड़ा शिवलिंग बनाते हैं बाकी छोटे-छोटे सालिग्राम अनेक बनाते हैं। तुम जानते हो - हम आत्माओं का नाम है सालिग्राम और हमारे बाबा का नाम है शिव। सालिग्राम सब एक साइज़ के बनाते हैं तो बरोबर बाप और बेटे का सम्बन्ध है। आत्मा याद करती रहती है हे परमपिता परमात्मा। हम परमात्मा नहीं हैं। परमात्मा हमारा बाबा है, यह समझाने की मत तुमको दी गई है। दिन-प्रतिदिन तुमको श्रीमत मिलती रहती है कि कोई को भी पहले बाप का परिचय दे वर्सा दिलाना है। पहले तुमको सिद्ध करके समझाना है कि वह निराकार बाप है। यह प्रजापिता साकार है। वर्सा निराकार से मिलता है। अब बाप समझाते हैं - मेरा एक ही शिव नाम है। दूसरा कोई मेरा नाम नहीं। सभी आत्माओं के शरीर के नाम अनेक हैं। मेरा कोई शरीर है नहीं। मैं सुप्रीम सोल हूँ।

बाबा पूछते हैं बच्चे, तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है? जो सयाने होंगे वह कहेंगे देह-अभिमान सबसे बड़ा दुश्मन है जिससे ही काम की उत्पत्ति होती है। देह-अभिमान को जीतने में बड़ी मुश्किलात होती है। देही-अभिमानी बनने में ही मेहनत है। जन्म-जन्मान्तर तुम देह के सम्बन्ध में चले हो। अब जानते हो बरोबर मैं आत्मा अविनाशी हूँ, जिसके आधार से यह शरीर चलता है। रिलीजस माइन्डेड जो भी हैं वह समझते हैं कि हम आत्मा हैं, देह नहीं हैं। आत्मा का नाम एक ही रहता है। देह के नाम बदलते हैं। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। हमको बाप कहते हैं तुमको चलना है पुण्य आत्माओं की दुनिया में। यह है पाप आत्माओं की दुनिया। भ्रष्टाचारी रावण बनाते हैं। 10 शीश वाला कोई मनुष्य नहीं होता परन्तु इस बात को कोई नहीं जानते। सभी रामलीला आदि में पार्ट लेते रहते हैं। सब एक मत भी नहीं हैं। कोई-कोई इन सब बातों को कल्पना समझते हैं। परन्तु यह नहीं जानते कि रावण भ्रष्टाचारी को कहा जाता है। पराई स्त्री को चुराना यह भ्रष्टाचार है ना। इस समय सब भ्रष्टाचारी हैं क्योंकि विकार में जाते हैं। जो विकार में न जायें उनको निर्विकारी कहा जाता है, वह है रामराज्य। यह है रावण राज्य। भारत में ही रामराज्य था। भारत सबसे प्राचीन था। पहले नम्बर में सृष्टि पर सूर्यवंशी देवी देवताओं का झण्डा बुलन्द था। उस समय चन्द्रवंशी भी नहीं थे। अभी तुम बच्चों का यह सूर्यवंशी झण्डा है। तुमको मंजिल का पता लगा है फिर भूल जाते हो। स्कूल में बच्चा कभी एम आब्जेक्ट को भूल नहीं सकता। स्टूडेन्ट टीचर को वा पढ़ाई को कभी भूल नहीं सकते। यहाँ फिर भूल जाते हैं। कितनी बड़ी पढ़ाई है, 21 जन्मों के लिए राज्यभाग्य पाते हो। ऐसे स्कूल में कितना अच्छा और रोज़ाना पढ़ना चाहिए। इस कल्प अगर नापास हुए तो कल्प-कल्प नापास होते ही रहेंगे। फिर कभी भी पास नहीं होना है। तो कितना पुरुषार्थ करना चाहिए। श्रीमत पर चलना चाहिए। श्रीमत कहती है अच्छी रीति धारणा करो और कराओ। अगर ईश्वरीय डायरेक्शन पर नहीं चलेंगे तो ऊंच पद भी नहीं पायेंगे। अपनी दिल से पूछो - हम श्रीमत पर चल रहे हैं। अपने को मिया मिट्ठू नहीं समझना है। अब अपने से पूछो तो जैसे यह ब्रह्मा सरस्वती श्रीमत पर चलते, हम ऐसे चल रहे हैं? पढ़कर और पढ़ाते हैं? क्योंकि तुम सच्ची-सच्ची गीता सुनाने वाले व्यास हो। वह व्यास नहीं जिसने गीता लिखी है। तुम इस समय सुखदेव के बच्चे सुख देने वाले व्यास हो। सुखदेव शिवबाबा गीता का भगवान है। तुम उनके बच्चे व्यास हो कथा सुनाने वाले।

यह स्कूल है, स्कूल में बच्चे की पढ़ाई से नम्बर का मालूम पड़ जाता है। वह है प्रत्यक्ष, यह है गुप्त। यह फिर बुद्धि से जाना जाता है कि हम किस लायक हैं! किसको पढ़ाने का सबूत मिला है। बच्चे लिखते हैं बाबा फलाने ने हमको ऐसा तीर लगाया जो हम आपके बन गये। कोई तो सामने आते भी कह नहीं सकते कि बाबा हम तो आपके बन गये। कई बच्चियां पवित्रता के कारण मार भी खाती रहती हैं। कोई तो बच्चे बन फिर टूट भी पड़ते हैं क्योंकि अच्छी तरह से पढ़ते नहीं। नहीं तो बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं कि बच्चे सिर्फ मुझे याद करो और पढ़ो इस नॉलेज से तुम चक्रवर्ती राजा बनेंगे। घर के बाहर भी लिख दो - एक सेकेण्ड में जीवनमुक्ति मिल सकती है - जनक मिसल, 21 जन्मों के लिए। एक सेकेण्ड में तुम विश्व के मालिक बन सकते हो। विश्व के मालिक तो जरूर देवतायें ही बनेंगे ना। सो भी नई विश्व, नया भारत। जो भारत नया था सो अब पुराना हो गया है। सिवाए भारत के और कोई खण्ड को नया नहीं कहेंगे। अगर नया कहेंगे तो फिर पुराना भी कहना पड़ेगा। हम फुल नये भारत खण्ड में जाते हैं। भारत ही 16 कला सम्पूर्ण बनता है और कोई खण्ड फुल मून हो न सके। वह तो शुरू ही आधा से होता है। कितने अच्छे-अच्छे राज़ हैं। हमारा भारत ही सचखण्ड कहलाया जाता है। सच के पीछे फिर झूठ भी है। भारत पहले फुल मून होता है। पीछे तो अन्धियारा हो जाता है। पहला झण्डा है हेविन का। गाते भी हैं पैराडाइज़ था... हम अच्छी तरह से समझा सकते हैं क्योंकि हमको सारा अनुभव है। सतयुग त्रेता में हमने कैसे राज्य किया फिर द्वापर कलियुग में क्या हुआ, यह सब बुद्धि में आने से कितनी खुशी आनी चाहिए। सतयुग को सोझरा, कलियुग को अन्धियारा कहा जाता है, तब कहते हैं ज्ञान अंजन सतगुरू दिया... बाबा ने कैसे आकर तुम अबलाओं, माताओं को जगाया है। साहूकार तो कोई मुश्किल ही खड़ा होता है। इस समय सचमुच बाबा गरीब निवाज़ है। गरीब ही स्वर्ग के मालिक बनते हैं, साहूकार नहीं। इसका भी गुप्त कारण है। यहाँ तो बलिहार जाना पड़ता है। गरीबों को बलिहार जाने में देरी नहीं लगती इसलिए सुदामा का मिसाल गाया हुआ है। तुम बच्चों को अब रोशनी मिली है, परन्तु तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। और सबकी ज्योत उझाई हुई है। इतनी छोटी सी आत्मा में अविनाशी पार्ट नूंधा हुआ है। वन्डर है ना। यह कोई साइंस की शक्ति नहीं है। तुमको अब बाबा से शक्ति मिलती है, बरोबर यह अविनाशी चक्र है जो फिरता रहता है, इनका कोई आदि अन्त नहीं है। नया कोई यह बातें सुने तो चकरी में आ जाये। यहाँ 10-20 वर्ष वालों को भी पूरा समझ में नहीं आता है, न किसको समझा सकते हैं। तुमको पिछाड़ी में सब पता पड़ जायेगा कि फलाना, फलाने के पास जन्म लेगा, यह होगा... जो महावीर होंगे उन्हों को आगे चलकर सब साक्षात्कार होते रहेंगे। पिछाड़ी में तुमको सतयुग के झाड़ बहुत नजदीक दिखाई पड़ेंगे। महावीरों की ही माला है ना। पहले 8 महावीर, फिर हैं 108 महावीर। पिछाड़ी में बहुत फर्स्टक्लास साक्षात्कार होंगे। गाया भी हुआ है - परमपिता परमात्मा ने बाण मरवाये। नाटक में बहुत बातें बनाई हैं। वास्तव में यह स्थूल बाणों की बात नहीं। कन्यायें, मातायें बाणों से क्या जानें। वास्तव में यह हैं ज्ञान बाण और इन्हों को ज्ञान देने वाला बरोबर परमपिता परमात्मा है। कितनी वन्डरफुल बातें हैं। परन्तु बच्चों को एक ही मुख्य बात घड़ी-घड़ी भूल जाती है। सबसे कड़े ते कड़ी भूल होती है जो देह-अभिमान में आकर अपने को आत्मा निश्चय नहीं करते। सच कोई नहीं बतलाते। सच तो कोई आधा घण्टा, घण्टा भी सारे दिन में मुश्किल याद में रह सकते हैं। कोई को समझ में भी नहीं आता कि योग किसको कहा जाता है। मंजिल भी बहुत ऊंची है। अपने को अशरीरी समझना है, जितना हो सके उतना पुरुषार्थ करना है, जो पिछाड़ी के समय कोई भी याद न पड़े। कोई तत्व ज्ञानी, ब्रह्म ज्ञानी अच्छे होते हैं तो गद्दी पर बैठे-बैठे समझते हैं हम तत्व में लीन हो जायेंगे। शरीर का भान नहीं रहता है। फिर जब उनका शरीर छूटता है तो आस-पास सन्नाटा हो जाता है। समझते हैं कोई महान आत्मा ने शरीर छोड़ा है।

तुम बच्चे याद में रहेंगे तो कितनी शान्ति फैलायेंगे। यह अनुभव उन्हों को होगा जो तुम्हारे कुल के होंगे। बाकी तो मच्छरों सदृश्य मरने वाले हैं। तुम्हारी प्रैक्टिस हो जायेगी अशरीरी होने की। यह प्रैक्टिस तुम यहाँ ही करते हो। वहाँ सतयुग में तो आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। यहाँ तो तुम जानते हो यह शरीर छोड़ बाबा के पास जाना है। परन्तु पिछाड़ी में कोई याद न आये। शरीर ही याद न रहे तो बाकी क्या रहा। मेहनत है इसमें। मेहनत करते-करते पिछाड़ी में पास होकर निकलते हो। पुरुषार्थ वालों का भी पता तो पड़ता है ना, उनका शो निकलता रहेगा। बांधेली गोपिकायें पत्र ऐसे लिखती हैं, जो कभी छुटेली भी नहीं लिखती। उन्हों को फुर्सत ही नहीं। बांधेलियां समझती हैं शिवबाबा ने इन हाथों का लोन लिया है तो शिवबाबा का पत्र आयेगा। ऐसा पत्र तो फिर 5 हजार वर्ष के बाद आयेगा। क्यों नहीं बाबा को पत्र रोज़ लिखें। नयनों से काजल निकालकर भी लिखें। ऐसे-ऐसे ख्यालात आयेंगे। और लिखती हैं बाबा मैं वही कल्प पहले वाली गोपिका हूँ। हम आपसे मिलेंगे भी जरूर, वर्सा भी जरूर लेंगे। योगबल है तो अपने को बंधन से छुड़ाती रहती हैं। फिर मोह भी किसमें न रहे। चतुराई से समझाना है। अपने को बचाना है, तोड़ निभाने के लिए बड़ी कोशिश करनी है। मातायें समझती हैं हम पति को भी साथ ले चलें। हमारा फ़र्ज है उन्हों को समझाना। पवित्रता तो बहुत अच्छी है। बाबा खुद कहते हैं काम महाशत्रु है, इनको जीतो। मुझे याद करो तो मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाऊंगा। ऐसी बच्चियां हैं जो पति को समझाकर ले आती हैं। बांधेलियों का भी पार्ट है। अबलाओं पर अत्याचार तो होते ही हैं। यह शास्त्रों में भी गायन है - कामेशु, क्रोधेशु... कोई नई बात नहीं है। तुमको तो 21 जन्मों का वर्सा मिलता है, इसलिए थोड़ा कुछ सहन तो करना ही पड़ता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) योगबल से अपने सब बन्धनों को काट बंधनमुक्त होना है, किसी में भी मोह नहीं रखना है।

2) जो भी ईश्वरीय डायरेक्शन मिलते हैं उन पर पूरा-पूरा चलना है। अच्छी तरह से पढ़ना और पढ़ाना है। मियाँ मिट्ठू नहीं बनना है।

वरदान:-
बाप के प्यार की पालना द्वारा सहज योगी जीवन बनाने वाले स्मृति सो समर्थी स्वरूप भव

सारे विश्व की आत्मायें परमात्मा को बाप कहती हैं लेकिन पालना और पढ़ाई के पात्र नहीं बनती हैं। सारे कल्प में आप थोड़ी सी आत्मायें अभी ही इस भाग्य के पात्र बनती हो। तो इस पालना का प्रैक्टिकल स्वरूप है - सहजयोगी जीवन। बाप बच्चों की कोई भी मुश्किल बात देख नहीं सकते। बच्चे खुद ही सोच-सोच कर मुश्किल बना देते हैं। लेकिन स्मृति स्वरूप के संस्कारों को इमर्ज करो तो समर्थी आ जायेगी।

स्लोगन:-
सदा निश्चिंत स्थिति का अनुभव करना है तो आत्म-चिंतन और परमात्म-चिंतन करो।

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